MURLI 12-04-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

12-04-26
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 30-11-09 मधुबन

बाप वा सर्व का प्रिय बनने के लिए सन्तुष्टमणि बन हर परिस्थिति के प्रभाव से मुक्त रहो

आज चारों ओर के सन्तुष्ट आत्माओं को देख रहे हैं। सन्तुष्ट मणियां चारों ओर अपने मणि की चमक फैला रही हैं। सबसे बड़े से बड़ी स्थिति है ही सन्तुष्टता की। सदा सन्तुष्ट सभी को प्रिय लगते हैं, बाप को तो प्रिय हैं ही। सदा सन्तुष्ट वही रह सकता है जिसको सर्व प्राप्तियां हैं। प्राप्तियों का आधार सन्तुष्टता है इसलिए ऐसी आत्मायें सर्व ब्राह्मण आत्माओं को प्रिय हैं। सर्व प्राप्तियां अर्थात् सदा सन्तुष्ट। सन्तुष्ट आत्मा का वायुमण्डल में भी प्रभाव पड़ता है और सर्व प्राप्तियां हैं परमात्मा की देन। परमात्मा बाप द्वारा सर्व शक्तियां, सर्व गुण, सर्व खजाने प्राप्त की हुई आत्मा सदा सन्तुष्ट रहती है। सन्तुष्ट आत्मा की स्थिति सदा प्रगतिशील रहती है। परिस्थिति सन्तुष्ट आत्मा के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकती क्योंकि जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ सर्व शक्तियां, सर्व गुण स्वत: ही आते हैं। एक सन्तुष्टता अनेक गुणों को अपना लेती है। तो हर एक अपने से पूछे कि मैं सदा सन्तुष्ट आत्मा रहती हूँ! सन्तुष्ट आत्मा सदा सर्व के, बाप के समीप और समान स्थिति में रहती है। लेकिन इस स्थिति में रहने के लिए बहुत साक्षी दृष्टा अवस्था चाहिए, त्रिकालदर्शी अवस्था चाहिए। हर कर्म त्रिकालदर्शी अर्थात् हर बात के तीनों कालों को परख फिर कर्म करने वाले। इसके लिए दो बातें आवश्यक हैं। वह दो बातें हैं सम्बन्ध और सम्पत्ति। सम्बन्ध भी अविनाशी, सम्पत्ति भी अविनाशी। वह प्राप्त होता है अविनाशी बाप द्वारा। जब अविनाशी सम्पत्ति और सम्बन्ध प्राप्त हो जाता तो आत्मा सदा सन्तुष्ट और बाप की, सर्व आत्माओं की अति प्रिय हो जाती है। कोई भी परिस्थिति माया के रूप में आती है तो घबराते नहीं हैं। ऐसे महसूस करते हैं जैसे बेहद के पर्दे पर मिक्की माउस का खेल चल रहा है। परेशान नहीं होते, मिक्की माउस का खेल देख मनोरंजन करते हैं। माया के भिन्न-भिन्न रूप, भिन्न-भिन्न मिक्की माउस के रूप में अनुभव करते हैं। ऐसी स्थिति का अनुभव बाप द्वारा सर्व को प्राप्त करना ही है और किया भी है।

बापदादा देखते हैं – निर्भय, एकाग्र बुद्धि बन विजयी आत्मायें कोई भी परिस्थिति में डगमग नहीं होती। जो बाप की हर बच्चे में शुभ आशा है कि हर बच्चा सदा विजयी बन बाप को अपना विजय का स्वरूप दिखावे, तो हर एक अपने से पूछे मैं कौन? बाप-दादा ने पहले भी सुनाया है कि कभी-कभी का शब्द समय प्रमाण अभी ब्राह्मण डिक्शनरी से समाप्त कर दो। जब बाप से सदा का वर्सा लेना है तो हर प्राप्ति सदा प्राप्त हो क्योंकि बाप के दिल की आशाओं को पूर्ण करने वाले आशाओं के दीपक हैं। उनके संकल्प में भी कभी-कभी शब्द आ नहीं सकता, क्यों? सदा बाप के साथ और बाप के साथी हैं। साथ रहने वाले भी और साथी बन विश्व परिवर्तन का कार्य करने वाले।

तो बोलो, यह सदा का वरदान बापदादा द्वारा प्राप्त कर लिया है ना! यह तो जन्म लेते ही बापदादा हर बच्चे को सदा यही वरदान देते हैं, सदा योगी भव, पवित्र भव। उस वरदान द्वारा जो भी प्राप्तियां होती हैं वह सदा के लिए होती हैं। कभी-कभी के लिए नहीं। तो सभी बच्चे सदा के अधिकारी हैं क्योंकि बाप का हर बच्चे से चाहे लास्ट बच्चा है लेकिन बाप को हर बच्चे से दिल का प्यार है क्योंकि जो बड़े-बड़े लोग हैं, अपने को समझदार समझते हैं वह भी बाप को पहचान नहीं सके, लेकिन बापदादा के लास्ट बच्चे ने बाप को पहचान लिया। दिल से कहते हैं मेरा बाबा इसलिए बाप का हर बच्चे से अविनाशी प्यार है इसलिए हर बच्चे को बाप का वरदान है। बच्चे चाहे नम्बरवार हैं लेकिन बापदादा रोज़ एक ही समय, एक ही वरदान सभी बच्चों को इकट्ठा देते हैं। बापदादा का हर बच्चा नम्बरवार भले है लेकिन मेरा बाबा कहा तो हर रोज़ वरदान के अधिकारी बन गया। हर एक बच्चे को चाहे कहाँ भी रहते हैं, इण्डिया में रहते हैं या फॉरेन में रहते हैं लेकिन वरदान सभी को एक ही बापदादा का मिलता है और वरदान को प्राप्त कर खुश भी होते हैं लेकिन दो प्रकार के बच्चे हैं, एक बच्चे वरदान को देख खुश जरूर होते हैं लेकिन आगे नम्बर वही लेते हैं जो सिर्फ वरदान को देख खुश नहीं होते, वर्णन नहीं करते कि यह मेरा वरदान है लेकिन वरदान को फलीभूत करते हैं। वरदान से लाभ लेकर वरदान का फल निकालते हैं। बीज है लेकिन बीज को फलीभूत नहीं करें, फल नहीं निकालें तो सिर्फ खुशी होती है, वरदान से फल निकालने के लिए जैसे कोई भी बीज होता है, उसका फल निकालने के लिए उनको पानी और धूप चाहिए तभी फल निकलता है। तो यहाँ भी हर बच्चे को जब वरदान का फल निकालना है, जिससे विस्तार होता जाए, अपने ही मन में वरदान के फल द्वारा वृद्धि होती जाए, तो यहाँ भी बाप कहते हैं कि वरदान का फल निकालने के लिए बार-बार वरदान को स्मृति में लाओ। स्मृति स्वरूप के स्थिति में स्थित रहो। बार-बार सिमरण नहीं लेकिन स्मृति, यह है पानी देना और स्वरूप में स्थित होना यह है धूप लगाना। तो यह फलीभूत होने से स्वयं में भी बहुत शक्ति भरती है और दूसरे को भी उस फल द्वारा शक्ति का अनुभव करा सकते हैं।

बापदादा अभी क्या चाहते हैं? क्योंकि बापदादा कुछ समय से लेके समय की वार्निंग दे रहे हैं, हर बच्चे की पढ़ाई की रिजल्ट का समय अचानक आना है, इसके लिए सदा एवररेडी। साथ-साथ बापदादा यह भी इशारा दे रहे हैं कि अभी समय है उड़ती कला के तीव्र पुरुषार्थ का। चल रहे हैं नहीं, उड़ रहे हैं। साधारण रीति से अपनी दिनचर्या व्यतीत करना, अब वह समय कॉमन पुरुषार्थ का गया इसलिए बापदादा इशारा दे रहे हैं, हर सेकण्ड, हर संकल्प चेक करो। मानो अपना तीव्र पुरुषार्थ न कर एक घण्टा साधारण पुरुषार्थ में रहे और एक घण्टे में ही अचानक अगर फाइनल पेपर का टाइम आ गया तो अन्त मते सो गति, वह एक घण्टे का साधारण पुरुषार्थ कितना नुकसान कर देगा! इसलिए बापदादा हर बच्चे को, हर संकल्प, हर सेकण्ड समय के महत्व को, समय प्रति समय इशारा दे रहे हैं। हलचल के समय अचल रहने का पुरुषार्थ तीव्र पुरुषार्थी ही कर सकता। साधारण पुरुषार्थी एवररेडी बनने में समय लगा देगा और बापदादा ने कहा है कि सेकण्ड में बिन्दी अर्थात् फुलस्टॉप, अगर तीव्र पुरुषार्थ नहीं होगा तो क्या होता है? अनुभवी तो हैं। फुलस्टॉप के बजाए क्वेश्चन मार्क तो नहीं बन जायेगा! बिन्दी कितना सहज है और क्वेश्चन कितना टेढ़ा बांका है। फुलस्टॉप तो फुलस्टॉप हो जाए। क्वामा की मात्रा भी नहीं हो, आश्चर्य की मात्रा भी नहीं हो। क्या करूं! यह सोचने का भी समय नहीं मिलेगा। तो कोई भी बच्चा यह सोच नहीं सकता कि इतना फास्ट पुरुषार्थ करना ही पेपर में पास होना है।

बापदादा देखते हैं अभी भी कारणे अकारणें क्यों, क्या, कैसे, ऐसे… यह कोई-कोई बच्चों के रोज़ के चार्ट में दिखाई देता है। बहुतों के चार्ट में बापदादा ने देखा है कि वेस्ट थॉट्स की लहर समय ले लेती है और वेस्ट की रफ्तार ऐसी तीव्र होती है जो साधारण संकल्प का एक घण्टा और फास्ट संकल्प का एक मिनट इसलिए आज यह देख रहे थे कि सबकी प्रिय, बापदादा की प्रिय सन्तुष्ट आत्मायें कौन-कौन हैं? सन्तुष्ट आत्मा के संकल्प में भी यह क्यों, क्या की भाषा स्वप्न में भी नहीं आयेगी क्योंकि उस आत्मा को विशेष तीन बातें, तीन बिन्दियां याद रहती हैं – आत्मा, परमात्मा और ड्रामा, तीन ही समय पर कार्य में लगा सकते हैं क्योंकि ऐसे समय पर सर्व शक्तियों का खजाना आवश्यक है और मास्टर सर्वशक्तिवान वह है जो जिस समय जिस शक्ति को आर्डर करे वह हाज़िर हो जाए। चाहिए सहनशक्ति और आ जावे सामना करने की शक्ति, तो है शक्ति लेकिन उस समय काम की नहीं है। तो सर्व खजानों की चाबी है तीन बिन्दियां – आप, बाप और ड्रामा।

तो बापदादा का एक संकल्प है, बतायें? करना पड़ेगा। जो करने के लिए तैयार हैं, वह हाथ उठाओ। करना पड़ेगा। अच्छा सभी हाथ उठा रहे हैं। मन का हाथ उठा रहे हैं या शरीर का हाथ उठा रहे हैं? मन का हाथ पक्का होता है। बापदादा समय प्रमाण हर एक बच्चे से यह शुभ आशा रखते हैं कि 15 दिन के बाद फिर बाप का मिलना होता है, तो यह जो 15 दिन बीतें उसमें यह विशेष अभ्यास करो ट्रायल के लिए, रहना तो सदा है लेकिन 15 दिन की ट्रायल करो और अपने-अपने कनेक्शन वाले सेन्टर्स को भी कराओ, चक्कर लगाके फोन करके उनको याद दिलाओ कि होमवर्क कर रहे हो? होमवर्क क्या है? इज़ी है, हर एक भिन्न-भिन्न सरकमस्टांश बातों से क्रास तो करते ही हैं लेकिन यह 15 दिन हर एक को संकल्प, वाणी और कर्म में कम से कम 80 प्रतिशत मार्क्स लेनी हैं। फिर भी बापदादा 20 परसेन्ट छुट्टी देते हैं। है मंजूर। मंजूर हैं? देवें। यह काम देवे। अच्छा 15 दिन, माया भी सुन रही है। बातें तो आयेंगी, बातों को नहीं देखना, पास होना है, यह याद रखना। 15 दिन कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन हर एक सच्ची दिल, साफ दिल से स्वप्न में भी संकल्प, वाणी और कर्म में पास होके दिखाये। हो सकता है? हो सकता है? टीचर्स बताओ हो सकता है? 15 दिन तो कुछ भी नहीं हैं लेकिन बापदादा ट्रायल के लिए कह रहे हैं कि संकल्प भी वेस्ट नहीं, युद्ध नहीं विजयी। 15 दिन के फुल विजयी। मुश्किल है या इज़ी है? इज़ी है, हाथ उठाओ। इज़ी है? तो बापदादा यह 15 दिन की रिजल्ट देखेंगे। फिर आगे बढ़ायेंगे। 15 दिन तो कोई भी कर सकता है ना! कर सकते हैं ना! मधुबन वाले, मधुबन वाले हाथ उठाओ। यह आगे आगे मधुबन बैठा है। बहुत अच्छे हैं। फॉरेनर्स या इण्डिया वाले सभी को करना है। गांव वाले या बड़े शहर वाले सबको 15 दिन का रिकार्ड रखना है। क्या, क्यों का क्वेश्चन न उठे, क्या करें बात ही ऐसी हुई यह नहीं बताना। 80 परसेन्ट लेना ही है। फिर भी बापदादा हल्का कर रहा है, 20 परसेन्ट छोड़ रहा है क्योंकि बापदादा देखते हैं कि कहाँ-कहाँ चलते चलते माया अलबेलेपन और आलस्य में ले आती है। रॉयल आलस्य यह था, यह था, यह रॉयल आलस्य, अलबेलापन यह तीव्र पुरुषार्थ में कमी डालता है क्योंकि अभी बापदादा सभी जो भी स्टूडेन्ट हैं, हर एक स्टूडेन्ट को अभी पहले यह 15 दिन की रिहर्सल कराके कुछ समय ऐसे ही अभ्यास कराने चाहते हैं, जो सभी से हाथ उठवाये, एवररेडी तो सभी हाथ उठा सकें। इसके लिए बहुत समय का अभ्यास चाहिए। इसलिए अभी यह थोड़ा सा अभ्यास कराते हैं। अच्छा।

पहले बारी कितने आये हैं, वह उठो:- अच्छा है आपको बापदादा के सामने आने के दिन का बहुत-बहुत मुबारक हो, मुबारक हो। बाप की नज़र बच्चों पर पड़ी और बच्चों की नज़र बाप के ऊपर पड़ी। तो बहुत-बहुत बधाईयां हैं। अच्छा। और केक तो नहीं है लेकिन खुशी का केक खा लो। अच्छा है, अभी देरी से आये हो लेकिन फास्ट जाके नम्बर आगे ले सकते हो इसलिए बापदादा की तरफ से और सर्व आपके साथी भाई और बहिनों का, सबका मुबारक हो, मुबारक हो। ऐसा मिसाल होगा जो लास्ट आने वाला भी फास्ट जाके फर्स्ट लाइन में आ सकता है। अच्छा।

चारों ओर के बापदादा की आशाओं को पूर्ण करने वाले आशाओं के दीपक, क्यों, क्या की भाषा से न्यारे रहने वाले सदा एक-रस, सदा एक बाबा दूसरा न कोई, बाप में ही विशेष जीवन के तीन सम्बन्ध, बाप, शिक्षक, सतगुरू अनुभव करने वाले, बाप से वर्सा, टीचर से पढ़ाई का वर्सा और सतगुरू से वरदानों का वर्सा प्राप्त करने वाले पदमगुणा भाग्यवान हर बच्चे को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से:- (इस बार चारों ओर सेवाओं के प्रोग्राम बहुत अच्छे हुए हैं) सभी ने सभी को मदद भी अच्छी की है। किसी को सोच नहीं करना पड़े कैसे करें, करना ही है। एक दो की मदद से सभी प्रोग्राम अच्छे हुए। आवाज तो फैल गया। सन्देश तो मिला अभी आगे बढ़ो (योग में सभी ने बहुत अच्छी अनुभूति की) क्योंकि टापिक ही थी ना वरदान लेना है। तो योग के प्रोग्राम से अनुभव किया।

पंजाब ज़ोन के सेवाधारियों से: पंजाब को ड्रामानुसार यह संन्यासियों, महात्माओं की सेवा का चांस अच्छा मिला हुआ है और कर भी रहे हैं। पंजाब में स्थापना के समय पर जैसे सेवा आरम्भ हुई वैसे सहयोगी और वारिस क्वालिटी वाले निमित्त बने। जितना ही हंगामें वाले थे उतने ही शेर क्वालिटी भी निकली। अभी पंजाब को क्या करना है? यह विशेषता तो है अभी पंजाब वाले कोई ऐसा शेर तैयार करें नामीग्रामी, जो सभा में माइक बन अपना अनुभव सुनाये। माइक बड़ा हो, छोटा नहीं। जैसे गवर्मेन्ट के वी.आई.पी तो अलग होते हैं लेकिन महात्माओं में भी वी.आई.पी होते हैं, ऐसा कोई बड़ा माइक तैयार करो, जो अपने अनुभव से औरों को उमंग में लाये। ऐसा कोई निकालो, तैयारी करो। हो सकता है क्योंकि आजकल सभी समझते हैं कि साधू सन्त की सेवायें तो द्वापर से शुरू हुई लेकिन आप समान ऐसे बड़ा गुरू दूसरे को, शिष्य को बनावें, ऐसा एक्जैम्पुल उन्हों में नहीं होता और बापदादा ने अपने से भी होशियार बच्चों को तैयार किया है, जो पब्लिक में आते हैं, इसलिए पंजाब कोई नवीनता करके दिखाओ। वी.आई.पी तो सब तरफ से आते हैं लेकिन आप ऐसा लाओ जो सभी सुनकरके जग जावें, सन्देश मिल जाये। हो सकता है? देखेंगे। थोड़ा समय तो लगता है लेकिन ऐसा कोई तैयार करके दिखाओ। बाकी वृद्धि तो हो रही है। अच्छा।

वरदान:- बाप के हाथ और साथ की स्मृति से मुश्किल को सहज बनाने वाले बेफिक्र वा निश्चिंत भव
जैसे किसी बड़े के हाथ में हाथ होता है तो स्थिति बेफिक्र वा निश्चिंत रहती है। ऐसे हर कर्म में यही समझना चाहिए कि बापदादा मेरे साथ भी हैं और हमारे इस अलौकिक जीवन का हाथ उनके हाथ में है अर्थात् जीवन उनके हवाले है, तो जिम्मेवारी भी उनकी हो जाती है। सभी बोझ बाप के ऊपर रख अपने को हल्का कर दो। बोझ उतारने वा मुश्किल को सहज करने का साधन ही है – बाप का हाथ और साथ।
स्लोगन:- पुरुषार्थ में सच्चाई हो तो बापदादा की एकस्ट्रा मदद का अनुभव करेंगे।

ये अव्यक्त इशारे – महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

अगर आप से कोई टक्कर लेता है तो आप उसे अपने स्नेह का पानी दो, आप अपने मधुरता और नम्रता के गुण को नहीं छोड़ो। नम्रता की ड्रेस पहनकर रहो। यह नम्रता ही कवच है, जो सेफ्टी का साधन है। संस्कारों की रास मिलाने का सबसे सहज तरीका है – स्वयं नम्रचित और मधुरता सम्पन्न बन जाओ, दूसरे को श्रेष्ठ सीट दे दो।

प्रश्न 1: सन्तुष्ट आत्मा की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

उत्तर:
सन्तुष्ट आत्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहती है। उसे सभी प्राप्तियाँ (शक्तियाँ, गुण, खजाने) परमात्मा से प्राप्त होती हैं, इसलिए वह भीतर से पूर्ण होती है और दूसरों को भी अपनी शान्ति और खुशी का अनुभव कराती है।


प्रश्न 2: सदा सन्तुष्ट रहने का आधार क्या है?

उत्तर:
सदा सन्तुष्ट रहने का आधार है — सर्व प्राप्तियाँ। जब आत्मा को यह अनुभव हो जाता है कि उसे परमात्मा से सब कुछ मिल चुका है, तब वह स्वतः सन्तुष्ट रहती है।


प्रश्न 3: सन्तुष्ट आत्मा का वायुमण्डल पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर:
सन्तुष्ट आत्मा का वायुमण्डल पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उसकी शांति, स्थिरता और खुशी का वातावरण दूसरों को भी प्रभावित करता है और उन्हें भी शांति का अनुभव होता है।


प्रश्न 4: परिस्थिति सन्तुष्ट आत्मा को प्रभावित क्यों नहीं कर सकती?

उत्तर:
क्योंकि सन्तुष्टता के साथ सभी शक्तियाँ और गुण स्वतः आ जाते हैं। ऐसी आत्मा परिस्थितियों को साक्षी भाव से देखती है, इसलिए वह डगमग नहीं होती।


प्रश्न 5: सन्तुष्ट रहने के लिए कौन-सी अवस्थाएँ आवश्यक हैं?

उत्तर:
सन्तुष्ट रहने के लिए दो मुख्य अवस्थाएँ आवश्यक हैं:

  1. साक्षी दृष्टा अवस्था
  2. त्रिकालदर्शी अवस्था

इनसे आत्मा हर कर्म को सोच-समझकर करती है और विचलित नहीं होती।


प्रश्न 6: सदा सन्तुष्ट रहने के लिए कौन-सी दो बातें जरूरी हैं?

उत्तर:
दो मुख्य बातें हैं:

  1. अविनाशी सम्बन्ध (परमात्मा से)
  2. अविनाशी सम्पत्ति (शक्तियाँ, गुण, ज्ञान)

इनके आधार पर आत्मा सदा सन्तुष्ट रहती है।


प्रश्न 7: माया की परिस्थितियों को सन्तुष्ट आत्मा कैसे देखती है?

उत्तर:
सन्तुष्ट आत्मा माया की परिस्थितियों को ऐसे देखती है जैसे कोई मिक्की माउस का खेल चल रहा हो। वह परेशान नहीं होती, बल्कि साक्षी बनकर उसे देखती है।


प्रश्न 8: “कभी-कभी” शब्द को ब्राह्मण जीवन से क्यों समाप्त करना चाहिए?

उत्तर:
क्योंकि परमात्मा से मिलने वाला वर्सा सदा का है। इसलिए आत्मा को भी हर स्थिति में सदा स्थिर और विजयी रहना चाहिए, न कि कभी-कभी।


प्रश्न 9: वरदान को फलीभूत कैसे किया जा सकता है?

उत्तर:
वरदान को फलीभूत करने के लिए:

  • बार-बार स्मृति में लाना (पानी देना)
  • स्वरूप में स्थित होना (धूप देना)

तभी वह बीज फल देता है और आत्मा शक्तिशाली बनती है।


प्रश्न 10: तीव्र पुरुषार्थ क्या है?

उत्तर:
तीव्र पुरुषार्थ का अर्थ है — हर सेकण्ड, हर संकल्प को चेक करना और एवररेडी रहना। साधारण गति से नहीं, बल्कि उड़ती कला से आगे बढ़ना।


प्रश्न 11: “बिन्दी और क्वेश्चन मार्क” का क्या अर्थ है?

उत्तर:

  • बिन्दी (फुलस्टॉप): पूर्ण विराम, स्थिरता और स्पष्ट निर्णय
  • क्वेश्चन मार्क: संदेह, उलझन, अस्थिरता

तीव्र पुरुषार्थी आत्मा हर स्थिति में बिन्दी लगा देती है, प्रश्न नहीं उठाती।


प्रश्न 12: सन्तुष्ट आत्मा किन तीन बातों को सदा स्मृति में रखती है?

उत्तर:
तीन मुख्य बिन्दियाँ हैं:

  1. मैं आत्मा हूँ
  2. मेरा बाप परमात्मा है
  3. यह ड्रामा है

ये तीनों मिलकर आत्मा को शक्तिशाली बनाते हैं।


प्रश्न 13: बापदादा ने 15 दिन की ट्रायल में क्या लक्ष्य दिया है?

उत्तर:
15 दिन तक:

  • संकल्प, वाणी और कर्म में 80% मार्क्स लाने हैं
  • वेस्ट थॉट्स और “क्यों, क्या” से मुक्त रहना है
  • हर परिस्थिति में विजयी बनना है

प्रश्न 14: वरदान का सच्चा लाभ कौन उठाता है?

उत्तर:
वही आत्मा वरदान का सच्चा लाभ उठाती है जो केवल खुश नहीं होती, बल्कि उस वरदान को जीवन में धारण करके उसका फल निकालती है


प्रश्न 15: बेफिक्र और निश्चिंत रहने का साधन क्या है?

उत्तर:
बाप के हाथ और साथ की स्मृति ही बेफिक्र और निश्चिंत रहने का साधन है। जब आत्मा सब कुछ बाप को समर्पित कर देती है, तो वह हल्की और निर्भय बन जाती है।


 स्लोगन:

“पुरुषार्थ में सच्चाई हो तो बापदादा की एकस्ट्रा मदद स्वतः प्राप्त होती है।”

सन्तुष्टमणि, सदा सन्तुष्ट, ब्रह्माकुमारी मुरली, बापदादा, अव्यक्त मुरली, आत्मा ज्ञान, परमात्मा स्मृति, त्रिकालदर्शी, साक्षी भाव, तीव्र पुरुषार्थ, एवररेडी योगी, पवित्रता, आत्मिक शांति, माया पर विजय, सकारात्मक सोच, आध्यात्मिक ज्ञान, राजयोग मेडिटेशन, बीके ज्ञान, स्मृति स्वरूप, आत्मा परमात्मा ड्रामा, निरंतर योग, श्रेष्ठ जीवन, शक्तिशाली संकल्प, वेस्ट थॉट्स फ्री, विजय आत्मा, बेफिक्र जीवन, निश्चिंत अवस्था, मधुरता नम्रता, आध्यात्मिक प्रेरणा, BK teachings, Hindi spiritual, mindfulness India, inner peace, meditation life,Mani of contentment, Always content, Brahma Kumari Murli, BapDada, Avyakt Murli, Soul knowledge, God’s memory, Trikaldarshi, Sakshi Bhava, intense effort, Everready Yogi, purity, spiritual peace, victory over Maya, positive thinking, spiritual knowledge, Rajyoga meditation, BK knowledge, form of memory, soul God drama, continuous yoga, elevated life, powerful resolution, waste thoughts free, victorious soul, carefree life, carefree state, sweetness. humility, spiritual inspiration, BK teachings, Hindi spiritual, mindfulness India, inner peace, meditation life,