AAT-34-क्या उस समय मात-पिता होंगे? जब सतयुग की शुरुआत होगी तो क्या माता-पिता होंगे?
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नई सृष्टि की शुरुआत का छिपा हुआ रहस्य।
क्या उस समय मात-पिता होंगे?
जब सतयुग की शुरुआत होगी तो क्या माता-पिता होंगे?
क्या समझते हैं?
जब नई सृष्टि की शुरुआत होगी तो क्या माता-पिता होंगे?
क्या हम इस सच को स्वीकार कर सकेंगे? कौन सा सच है?
पुरानी सृष्टि में माता-पिता होते हैं। क्या मतलब?
पुरानी सृष्टि में माता-पिता होते हैं। जन्म शरीर से होता है।
स्वार्थ, मोह और वासनाएं सब होती हैं। सुख और दुख का संघर्ष चलता है।
और जब नई सृष्टि होती है तब क्या होता है? पहले दिन जब नई सृष्टि का आरंभ होता है तो आत्माएं स्वयं प्रकाशित होंगी।
स्वयं प्रकाशित होने का क्या मतलब होगा? माता-पिता नहीं होंगे।
ऐसा क्यों? पवित्रता, प्रेम और शांति।
पवित्रता भी होगी, प्रेम भी होगा और शांति होगी।
सुख, स्वास्थ्य और दिव्यता — यह सब वहां पर होगा।
यह ज्ञान जीवन बदल सकता है।
यह एक ऐसा छिपा हुआ रहस्य है जो अब तक किसी ने नहीं बताया।
आइए जानें नई सृष्टि की दिव्य व्यवस्था, जहां होगा सिर्फ प्रेम, शांति और आनंद।
नई सृष्टि की शुरुआत का छिपा हुआ रहस्य।
क्या उस समय माता-पिता होंगे?
डिस्क्लेमर: यह स्पीच ब्रह्मा कुमारी की मुरलियों के आधार पर आध्यात्मिक ज्ञान को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें दिए गए उदाहरण समझ को आसान बनाने के लिए हैं तथा कुछ स्थानों पर व्याख्या भी है। इसलिए श्रोताओं से निवेदन है कि वे स्वयं मुरलियों का अध्ययन करें और अपनी बुद्धि से सत्य को समझें।
आज हम एक ऐसे प्रश्न पर विचार करने जा रहे हैं जो सुनने में तो बहुत सरल है, लेकिन इसका उत्तर पूरे सृष्टि चक्र को समझा देता है। जिसको इसका उत्तर समझ में आ गया, उसे सृष्टि चक्र की समझ आ जाती है।
क्योंकि सबसे बड़ा प्रश्न सबकी बुद्धि में रहता है कि सृष्टि का आरंभ कहां होता है।
जिसके लिए हमने पीछे प्रश्न किया हुआ है कि सृष्टि का आरंभ हर सेकंड नया होता है, हर सेकंड सृष्टि का आरंभ और अंत होता है। कोई एक ऐसा समय नहीं है जहां आरंभ और अंत ना हो। हर सेकंड आरंभ भी हो रहा है और साथ के साथ अंत भी हो रहा है। उसी सेकंड में आरंभ है और उसी सेकंड में अंत है।
यह ज्ञान का बहुत गहरा पॉइंट है। इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझना है। यदि किसी को इस बात में डाउट हो तो वह पूछ सकता है।
क्या नई सृष्टि की शुरुआत में माता-पिता होंगे?
या हम थोड़ा सा नई सृष्टि की शुरुआत के बारे में समझें।
इस समय सारी दुनिया एकदम तमोप्रधान, पतित और भ्रष्ट है। परमात्मा आकर सारी आत्माओं को सतोप्रधान बनाते हैं।
अब जब वे सतोप्रधान बन जाते हैं, तब उनके माता-पिता निर्विकारी संतान को जन्म देते हैं। जो सतोप्रधान बनते हैं, वे यहीं पर निर्विकारी संतान को जन्म देते हैं।
सतयुग का आरंभ, नई सृष्टि का आरंभ, निर्विकारी आत्माओं के जीवन से शुरू होता है।
वहां वे आत्माएं नहीं आ सकतीं जिनका जन्म विकार से हुआ है।
अब लक्ष्मी-नारायण, जो सतयुग के पहले दिन संसार में आने वाली आत्माएं हैं, उनके जन्म देने वाले माता-पिता का अपना जन्म विकारी माता-पिता द्वारा हुआ होता है। परंतु वे अपने योगबल से निर्विकारी संतान को जन्म देते हैं।
जब सृष्टि का परिवर्तन होना है, उस परिवर्तन में जो विकारी माता-पिता हैं और विकार से जन्म लेने वाली सारी सृष्टि है, वह विनाश को प्राप्त होती है। अर्थात उनके शरीर नष्ट हो जाते हैं और आत्माएं परमधाम में चली जाती हैं।
जो आत्माएं नई सृष्टि में आने वाली हैं, वे भी परमधाम जाकर वापस आती हैं। इसमें कोई देरी नहीं लगती। जीरो टाइम, जीरो डिले।
नई सृष्टि में आत्माएं जागृत अवस्था में आती हैं और शुरुआत होती है। केवल पवित्र आत्माएं ही आती हैं।
जब पुरानी दुनिया समाप्त हो जाएगी, सब कुछ बदल जाएगा, तब क्या कोई परिवार होगा? क्या कोई माता-पिता होंगे?
मुरली में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है कि सृष्टि के आदि में आने वालों के लिए माता-पिता नहीं होंगे।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ खाली से शुरू होगा। नहीं। संगम पर ही पवित्र आत्माओं को जन्म मिल चुका होता है।
कृष्ण का जन्म संगम के समय निर्विकारी माता-पिता द्वारा गर्भ महल में होता है। वे पवित्र बनकर संपूर्णता को प्राप्त करते हैं और सृष्टि परिवर्तन के समय परमधाम की सैर करते हैं।
सारी आत्माएं परम अवस्था में जाती हैं और सारी सृष्टि का शुद्धिकरण हो जाता है। तब वे आत्माएं सुरक्षित अपने शरीर सहित इस संसार के रंगमंच पर आती हैं।
यह प्रश्न सिर्फ जिज्ञासा नहीं है, बल्कि ज्ञान की गहराई को परखने का माध्यम है।
उनके शरीर सुरक्षित रहते हैं। जब पूरी दुनिया 100% शुद्ध हो जाती है, तब वे बाहर आते हैं और नई दुनिया आरंभ होती है।
उन्हें पुरानी दुनिया का कुछ भी याद नहीं रहता।
आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। जन्म और मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
आत्मा शरीर में प्रवेश करती है, शरीर को चलाती है और फिर छोड़ देती है। जैसे ड्राइवर गाड़ी बदलता है।
मृत्यु वास्तव में परिवर्तन है, समाप्ति नहीं।
मुरली 16 अप्रैल 2019:
“आत्मा नहीं मरती, सिर्फ शरीर बदलता है।”
इसलिए नाटक चलता रहता है। आत्मा नया शरीर लेती है और नई सृष्टि पर कदम रखती है।
विनाश का अर्थ सब कुछ समाप्त होना नहीं, बल्कि सब कुछ शुद्ध होना है।
पृथ्वी, जल, वायु — सब 100% शुद्ध हो जाते हैं।
पवित्र दुनिया को एंजॉय करने के लिए 100% पवित्र आत्माएं आती हैं। बाकी आत्माएं परमधाम में विश्राम करती हैं।
सबसे बड़ा भ्रम यह है कि विनाश के बाद कुछ नहीं बचेगा। ऐसा नहीं है। कुछ भी नष्ट नहीं होता, केवल रूपांतरण होता है।
विज्ञान भी मानता है कि कोई तत्व न तो बनाया जा सकता है और न नष्ट किया जा सकता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी पांचों तत्व कभी नष्ट नहीं होते, केवल परिवर्तन होता है।
मुरली कहती है:
“आग लगती है, आत्माएं चली जाती हैं।”
आत्माएं केवल परमधाम में शिफ्ट होती हैं और फिर जीरो टाइम, जीरो डिले में वापस आती हैं।
जैसे एक फिल्म खत्म होती है और नई फिल्म शुरू हो जाती है, वैसे ही ड्रामा पूरा होता है और नया शुरू हो जाता है।
नई सृष्टि खाली से शुरू नहीं होती। मुरली 27-06-2023:
“नंबरवार सब आते हैं।”
सबसे पहले 100% पवित्र आत्माएं आती हैं और पवित्र प्रकृति में अपना पाठ शुरू करती हैं।
आत्माएं क्रम से आती हैं, सब एक साथ नहीं आतीं। इसलिए सृष्टि में निरंतरता रहती है।
क्या उस समय माता-पिता होंगे?
हाँ, कृष्ण को रिसीव करने वाले माता-पिता पहले से चाहिए, लेकिन वे संगम पर होते हैं।
कृष्ण का जन्म सबसे पहले निर्विकारी माता-पिता द्वारा होता है।
वे साधारण नहीं, बल्कि पवित्र, योगी और तपस्वी आत्माएं होती हैं।
नई दुनिया में परिवार धीरे-धीरे बनता है।
माता-पिता, बच्चे और समाज क्रमशः बनते हैं।
मुरली 12 दिसंबर 2022:
“सारा मदार पढ़ाई पर है।”
जो आत्मा अभी श्रेष्ठ बनती है, वही आगे श्रेष्ठ जन्म लेती है।
इसलिए भविष्य अभी बन रहा है।
अंतिम निष्कर्ष:
नई सृष्टि खाली से नहीं, बल्कि पवित्र माता-पिता के माध्यम से शुरू होती है।
माता-पिता होते हैं, लेकिन वे साधारण नहीं, पवित्र योगी श्रेष्ठ आत्माएं होती हैं।
यह ज्ञान सिर्फ समझने के लिए नहीं, बनने के लिए है।
मुरली 3 मार्च 2020:
“हम बैगर टू प्रिंस बन रहे हैं।”
आज का पुरुषार्थ कल का जन्म है।
आज के योगी कल के माता-पिता बनते हैं।

