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15/10-12-1992 – “Remain in the remembrance of the Forefather and the Worship-worthy One, and provide elevated sustenance to everyone.”

June 12, 2026July 3, 2026omshantibk07@gmail.com

AV-15/10-12-1992-“पूर्वज और पूज्य की स्मृति में रहकर सर्व की अलौकिक पालना करो”

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“पूर्वज और पूज्य की स्मृति में रहकर सर्व की अलौकिक पालना करो”

आज विश्व-रचता बाप अपनी श्रेष्ठ रचना को देख रहे हैं। सर्व रचना में से श्रेष्ठ रचना आप ब्राह्मण आत्मायें हो क्योंकि आप ही विश्व की पूर्वज आत्मायें हो। एक तरफ पूर्वज हो, साथ-साथ पूज्य आत्मायें भी हो। इस कल्प-वृक्ष की फाउण्डेशन अर्थात् जड़ आप ब्राह्मण आत्मायें हो। इस वृक्ष के मूल आधार ‘तना’ भी आप हो। इसलिए आप सर्व आत्माओं के लिए पूर्वज हो। सृष्टि-चक्र के अन्दर जो विशेष धर्म-पिता कहलाये जाते हैं उन धर्म-पिताओं को भी आप पूर्वज आत्माओं द्वारा ही बाप का सन्देश प्राप्त होता है, जिस आधार से ही समय प्रमाण वो धर्म-पितायें अपने धर्म की आत्माओं प्रति सन्देश देने के निमित्त बनते हैं। जैसे ब्रह्मा बाप ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर है, तो ब्रह्मा के साथ आप ब्राह्मण आत्मायें भी साथी हो। इसलिए आप पूर्वज आत्मायें गाई हुई हो।

पूर्वज आत्माओं का, डायरेक्ट चाहे इन्डायरेक्ट, सर्व आत्माओं से कनेक्शन है। जैसे वृक्ष की सर्व टाल-टालियों का सम्बन्ध जड़ से वा तना से जरूर होता है। चाहे किसी भी धर्म की छोटी वा बड़ी टाल-टालियाँ हों लेकिन सम्बन्ध स्वत: ही होता है। तो पूर्वज हुए ना। आधा कल्प राज्य-अधिकारी बनने के बाद फिर पूज्य आत्मायें बनते हो। पूज्य बनने में भी आप आत्माओं जैसी पूजा और किसी भी धर्म के आत्माओं की नहीं होती। जैसे आप पूज्य आत्माओं की विधिपूर्वक पूजा होती है, ऐसे कोई धर्म-पिता की भी पूजा नहीं होती। बाप के कार्य में जो आप ब्राह्मण साथी बनते हो, उन्हों की भी देवता वा देवी के रूप में विधिपूर्वक पूजा होती है। और कोई भी धर्म-पिता के साथी धर्म की पालना करने वाली आत्माओं की विधिपूर्वक पूजा नहीं होती, गायन होता है। स्टैच्यू (मूर्ति) बनाते हैं लेकिन आप जैसे पूज्य नहीं बनते।

आपका गायन भी होता है तो पूजा भी होती है। गायन की विधि भी आप ब्राह्मण आत्माओं की सबसे न्यारी है। जैसे आप देवात्माओं का गायन बहुत सुन्दर रूप से कीर्तन के रूप में होता है, आरती के रूप में होता है, ऐसे अन्य आत्माओं का गायन इसी प्रकार से नहीं होता। ऐसे क्यों होता? क्योंकि आप श्रेष्ठ रचना पूर्वज और पूज्य हो। आदि आत्मायें आप ब्राह्मण आत्मायें हो क्योंकि आदि देव ब्रह्मा के सहयोगी श्रेष्ठ कार्य के निमित्त बने हो। अनादि रूप में भी परम आत्मा के अति समीप रहने वाले हो। आत्माओं का जो चित्र दिखाते हो उसमें सबसे समीप आत्मायें कौनसी दिखाते हो? उसमें आप हो। तो अनादि रूप में भी अति समीप हो जिसको डबल विदेशी कहते हैं नियरेस्ट और डियरेस्ट। ऐसे अपने को समझते हो?

पूर्वज का क्या काम होता है? पूर्वज सभी की पालना करते हैं। बड़ों की पालना ही प्रसिद्ध होती है। तो आप सभी पूर्वज आत्मायें सर्व आत्माओं की पालना कर रहे हो? या सिर्फ अपने आने वाले स्टूडेन्ट्स की पालना करते हो? वा सम्बन्ध-सम्पर्क वाली आत्माओं की पालना करते हो? सारे विश्व की आत्माओं के पूर्वज हो वा सिर्फ ब्राह्मण आत्माओं के पूर्वज हो? जो जड़ वा तना होता है वह सारे वृक्ष के लिए होता है। वा सिर्फ अपने तना के लिए ही होता है? सब टाल-टालियों के लिए होता है ना। जड़ अथवा तना द्वारा सारे वृक्ष के पत्तों को पानी मिलता है। वा सिर्फ थोड़ी टाल-टालियों को पानी मिलता है? सबको मिलता है ना। लास्ट वाले पत्तों को भी मिलता है। इतना बेहद का नशा है? वा बेहद से हद में भी आ जाते हो? कितनी सेवा करनी है! हर एक पत्ते को पानी देना है अर्थात् सर्व आत्माओं की पालना करने के निमित्त हो।

किसी भी धर्म की आत्माओं को मिलते हो वा देखते भी हो तो “हे पूर्वज आत्मायें! ऐसे अनुभव करती हो कि यह सब आत्मायें हमारे ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर की वंशावली है, हम ब्राह्मण आत्मायें भी मास्टर ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर हैं अर्थात् पूर्वज हैं, यह सब हमारे हैं?” वा सिर्फ ब्राह्मण आत्मायें हमारी हैं? जब भाई-भाई कहते हैं तो आप पूर्वज आत्मायें बड़े भाई अर्थात् बाप समान हो। इस स्मृति को ही प्रैक्टिकल लाइफ में अनुभव करना है और कराना है। आप सभी पूर्वज आत्माओं की पालना का स्वरूप क्या है? लौकिक जीवन में भी पालना का आधार क्या होता है? पालना करना अर्थात् किसी को भी शक्तिशाली बनाना। किसी भी विधि से, साधन से पालना द्वारा शक्तिशाली बनाते – चाहे भोजन द्वारा, चाहे पढ़ाई द्वारा। लेकिन पालना का प्रत्यक्ष स्वरूप आत्मा में शक्ति, शरीर में शक्ति आती है। तो पालना का प्रत्यक्ष स्वरूप हुआ शक्तिशाली बनाना।

आप पूर्वज आत्माओं के पालना की विधि क्या है? अलौकिक पालना का स्वरूप है स्वयं में बाप द्वारा प्राप्त हुई सर्व शक्तियां अन्य आत्माओं में भरना। जिस आत्मा को जिस शक्ति की आवश्यकता है, उसकी उस समय उस शक्ति द्वारा पालना करना – ऐसी पालना करनी आती है? पूर्वज तो हो ना। सभी पूर्वज आत्मायें हो कि छोटे हो? सभी पूर्वज हैं या कोई-कोई विशेष आत्मायें हैं? तो पूर्वजों को पालना करनी आती है ना। सिर्फ सेन्टर की पालना करते हो या सारे विश्व की आत्माओं की पालना करते हो? सिर्फ प्रवृत्ति की पालना करते हो वा विश्व की पालना करते हो? वर्तमान समय आप पूर्वज आत्माओं के पालना की सर्व आत्माओं को आवश्यकता है।

समाचार तो सब इन्ट्रेस्ट से सुनते हो कि क्या-क्या हो रहा है। (अयोध्या की घटना के बाद कई स्थानों से हिंसा के समाचार मिल रहे हैं) लेकिन पूर्वज आत्माओं ने समाचार सुनने के बाद सर्व की पालना की? अशान्ति के समय आप पूर्वज आत्माओं का और विशेष कार्य स्वत: ही हो जाता है। तो हे पूर्वज! अपने पालना की सेवा में लग जाओ। जैसे अशान्ति के समय विशेष पुलिस वा मिलेट्री समझती है कि यह हमारा कार्य है अशान्ति को शान्त करना। ऑर्डर द्वारा पहुँच जाते हैं और ऐसे टाइम पर विशेष अटेन्शन से अपनी सेवा के लिए अलर्ट हो जाते हैं। आप सबने हलचल का समाचार तो सुना, लेकिन सेवा में अलर्ट हुए वा सुनने का ही आनन्द लिया? अपना पूर्वजपन स्मृति में आया? सभी आत्माओं की शान्ति की शक्ति से पालना की? या यही सोचते रहे यहाँ यह हुआ, वहाँ यह हुआ? विशेष आत्माओं की ऐसे समय पर सेवा की अति आवश्यकता है। अपनी वृत्ति द्वारा, मन्सा-शक्ति द्वारा विशेष सेवा की? वा जैसे विधिपूर्वक याद में रहते हो, सेवा करते हो, उसी रीति ही किया? आप रूहानी सोशल वर्कर भी हो। तो रूहानी सोशल वर्कर ने अपनी विशेष एक्स्ट्रा सोशल सेवा की? इतनी अपनी जिम्मेवारी समझी? या प्रोग्राम मिलेगा तो करेंगे? ऐसे समय पर सेकेण्ड में अपनी सेवा पर अलर्ट हो जाना चाहिए। यही आप पूर्वज आत्माओं की जिम्मेवारी है।

अभी भी विश्व में हलचल है और यह हलचल तो समय प्रति समय बढ़नी ही है। आप आत्माओं का फर्ज है ऐसे समय पर आत्माओं में विशेष शान्ति की, सहन शक्ति की हिम्मत भरना, लाइट-हाउस बन सर्व को शान्ति की लाइट देना। समझा, क्या करना है? अभी अपनी जिम्मेवारी वा फर्ज-अदाई और तीव्र गति से पालन करो जिससे आत्माओं को रूहानी शक्ति की राहत मिले, जलते हुए दु:ख की अग्नि में शीतल जल भरने का अनुभव करें। यह फर्ज-अदाई कर सकते हो? दूर से भी कर सकते या जब सामने आयेंगे तब करेंगे? कर तो रहे हो लेकिन अभी और जैसे हलचल तेज होती जाती है, तो आपकी सेवा भी और तेज हो। समझा, पूर्वजों की पालना क्या है? ऐसे नहीं कि पूर्वज हैं लेकिन पालना नहीं कर सकते। पूर्वज का काम ही है पालना द्वारा शक्ति देना। श्रेष्ठ शक्तिशाली स्थिति द्वारा परिस्थिति को पार करने की शक्ति अनुभव कराओ। अच्छा!

चारों ओर के सर्व आदि देव ब्रह्मा के मददगार आदि आत्माओं को, सर्व आत्माओं के फाउण्डेशन पूर्वज आत्माओं को, सदा सर्व आत्माओं प्रति बेहद सेवा की श्रेष्ठ वृत्ति रखने वाली आत्माओं को, सर्व रूहानी सोशल सेवाधारी आत्माओं को बापदादा का याद, प्यार और नमस्ते।

दादियों से मुलाकात:- वर्तमान समय अशान्त आत्माओं को शान्ति देना – यही सभी का विशेष कार्य है। रहमदिल बाप के बच्चों को सर्व आत्माओं के प्रति रहम आता है ना। रहमदिल क्या करता है? रहम का अर्थ ही है किसी भी प्रकार की हिम्मत देना, निर्बल आत्मा को बल देना। तो आत्माओं के दु:ख का संकल्प तो मास्टर सुखदाता आत्माओं के पास पहुँचता ही है। जैसे वहाँ दु:ख की लहर है, ऐसे ही विशेष आत्माओं में सेवा की विशेष लहर चले – देना है, कुछ करना है। क्या किया वो हर एक को सेवा का एक्स्ट्रा चार्ट चेक करना चाहिए। जैसे साधारण सेवा चलती है, वो तो चलती है। लेकिन वर्तमान समय वायुमण्डल द्वारा, वृत्ति द्वारा सेवा का विशेष अटेन्शन रखो। इसी से स्व की स्थिति भी स्वत: ही शक्तिशाली हो जायेगी। ऐसी लहर फैलाई है? विश्व के राजे बनते हैं तो सर्व आत्माओं के प्रति लहर होनी है ना। वंचित कोई आत्मा न रह जाये। चाहे अन्य धर्म की आत्मायें हों लेकिन हैं तो अपनी वंशावली। चाहे कोई भी धर्म की आत्मायें हैं लेकिन जड़ तो एक ही है। यह लहर है? (नहीं है) अटेन्शन प्लीज़!

अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात

ग्रुप नं. 1 – व्यर्थ के प्रभाव में आने वाले नहीं, अपना श्रेष्ठ प्रभाव डालने वाले बनो

सदा अपने को पुरुषार्थ में आगे बढ़ने वाली आत्मा हूँ – ऐसे अनुभव करते हो? पुरुषार्थ में कभी भी कभी ठहरती कला, कभी उतरती कला ऐसा नहीं होना चाहिए। कभी बहुत अच्छा, कभी अच्छा, कभी थोड़ा अच्छा ऐसा नहीं। सदा बहुत अच्छा। क्योंकि समय कम है और सम्पूर्ण बनने की मंजिल श्रेष्ठ है। तो अपने भी पुरुषार्थ की गति तीव्र करनी पड़े। पुरुषार्थ के तीव्र गति की निशानी है कि वह सदा डबल लाइट होगा, किसी भी प्रकार का बोझ नहीं अनुभव करेगा। चाहे प्रकृति द्वारा कोई परिस्थिति आये, चाहे व्यक्तियों द्वारा कोई परिस्थिति आये लेकिन हर परिस्थिति, स्व-स्थिति के आगे कुछ भी अनुभव नहीं होगी। स्व-स्थिति की शक्ति पर-स्थिति से बहुत ऊंची है, क्यों? यह स्व है, वह पर है। अपनी शक्ति भूल जाते हो तब ही पर-स्थिति बड़ी लगती है। सदा डबल लाइट का अर्थ ही है कि लाइट अर्थात् ऊंचे रहने वाले। हल्का सदा ऊंचा जाता है, बोझ वाला सदा नीचे जाता है। आधा कल्प तो नीचे ही आते रहे ना। लेकिन अभी समय है ऊंचा जाने का। तो क्या करना है? सदा ऊपर।

शरीर में भी देखो तो आत्मा का निवास-स्थान ऊपर है, ऊंचा है। पांव में तो नहीं है ना। जैसे शरीर में आत्मा का स्थान ऊंचा है, ऐसे स्थिति भी सदा ऊंची रहे। ब्राह्मण की निशानी भी ऊंची चोटी दिखाते हैं ना। चोटी का अर्थ है ऊंचा। तो स्थूल निशानी इसीलिए दिखाई है कि स्थिति ऊंची है। शूद्र को नीचे दिखाते हैं, ब्राह्मण को ऊंचा दिखाते हैं। तो ब्राह्मणों का स्थान और स्थिति दोनों ऊंची। अगर स्थान की याद होगी तो स्थिति स्वत: ऊंची हो जायेगी। ब्राह्मणों की दृष्टि भी सदा ऊपर रहती है। क्योंकि आत्मा, आत्माओं को देखती है, आत्मा ऊपर है तो दृष्टि भी ऊपर जायेगी। कभी भी किससे मिलते हो या बात करते हो तो आत्मा को देखकर बात करते हो, आत्मा से बात करते हो। आपकी दृष्टि आत्मा की तरफ जाती है। आत्मा मस्तक में है ना। तो ऊंची स्थिति में स्थित रहना सहज है।

जब ऐसी स्थिति हो जाती है तो नीचे की बातों से, नीचे के वायुमण्डल से सदा ही दूर रहेंगे, उसके प्रभाव में नहीं आयेंगे। अच्छा प्रभाव पड़ता है या खराब भी पड़ जाता है? अगर प्रवृत्ति में खराब वायुमण्डल हो, फिर क्या करते हो? प्रभावित होते हैं? खराब को अच्छा बनाने वाले हो या प्रभाव में आने वाले हो? क्योंकि माया भी देखती है कि अच्छा, अंगुली तो पकड़ ली है। अंगुली के बाद हाथ पकड़ेगी, हाथ के बाद पांव पकड़ लेगी। इसलिए प्रभाव में नहीं आना। प्रभाव में आने वाले नहीं, श्रेष्ठ प्रभाव डालने वाले। तो ब्राह्मण आत्मा अर्थात् सदा डबल लाइट, ऊंचे रहने वाले। इसी स्मृति से आगे उड़ते चलो। अच्छा!

सभी खुश रहते हो ना। दु:ख की लहर तो नहीं आती? क्योंकि जो दु:खधाम छोड़ चले उनके पास दु:ख की लहर कैसे आ सकती। संगम पर दु:खधाम और सुखधाम दोनों का ज्ञान है। दोनों के नॉलेजफुल शक्तिशाली आत्मायें हैं। गलती से भी दु:खधाम में जा नहीं सकते। सदा खुश रहने वालों के पास दु:ख की लहर कभी आ नहीं सकती। अच्छा! सेवा और स्व-उन्नति दोनों का बैलेन्स रखो। ऐसे नहीं सेवा में मस्त हो गये तो स्व-उन्नति भूल गये। सेवा का शौक ज्यादा है। लेकिन दोनों का बैलेन्स। समझा? अच्छे चल रहे हैं लेकिन सिर्फ अच्छे तक नहीं रहना, और अच्छे ते अच्छे।

ग्रुप नं. 2 – अनेक भावों को समाप्त कर श्रेष्ठ आत्मिक भाव धारण करो

सबसे सहज आगे बढ़ने की विधि क्या है? आगे तो सभी बढ़ रहे हो लेकिन सबसे सहज विधि कौनसी है? योग भी सहज हो जाये, उसकी विधि क्या है? सबसे सहज विधि है “मेरा बाबा”। और कुछ भी याद न हो, हर समय एक ही बात याद हो “मेरा बाबा”। क्योंकि मन वा बुद्धि कहाँ जाती है? जहाँ मेरापन होता है। अगर शरीर-भान में भी आते हो तो क्यों आते हो? क्योंकि मेरापन है। अगर “मेरा बाबा” हो जाता तो स्वत: ही मेरे तरफ बुद्धि जायेगी। सहज साधन है “मेरा बाबा”। मेरापन न चाहते हुए भी याद आता है। जैसे चाहते नहीं हो कि शरीर याद आवे, लेकिन क्यों याद आता है? मेरापन खींचता है ना, न चाहते भी खींचता है। जब यह सदा निश्चय और स्मृति में रहे “मेरा बाबा” तो पुरुषार्थ की मेहनत करने के बजाए स्वत: ही मेरापन खींचेगा। तो सहज साधन क्या हुआ? इसीलिए ‘एक’ को ही याद करो। ‘एक’ को ही याद करना सहज होता है।

जितना-जितना गहरा सम्बन्ध जुटा हुआ होगा उतनी याद सहज होगी और सहज बात ही निरन्तर होती है। अगर सहज नहीं होगा तो निरन्तर नहीं होगा। कोई भी मेहनत का काम निरन्तर नहीं कर सकते। सारा दिन-रात कोई को मेहनत का काम दो तो मजबूरी से करेगा, लेकिन प्यार से नहीं करेगा। तो बापदादा सहज करके देता है। सहज के कारण निरन्तर होना मुश्किल नहीं है। जो सदा इस स्मृति में रहते हैं उनकी निशानी क्या होगी? वे सदा खुश रहेंगे। क्योंकि बाप से प्राप्ति होती है। तो प्राप्ति की खुशी होती है ना। तो “मेरा बाबा” की स्मृति की प्रैक्टिकल निशानी ‘खुशी’ है। कोई भी बात हो जाये लेकिन खुशी नहीं जाये। क्योंकि प्राप्ति के आगे वह बात क्या लगेगी? कुछ भी नहीं लगेगी। बाप का अर्थ ही वर्से की प्राप्ति है। बाप का सम्बन्ध क्यों प्यारा लगता है? क्योंकि वर्सा मिलता है। तो बाप कहना अर्थात् वर्से की याद स्वत: ही आती है। बाप मिला, वर्सा मिला तो खुशी होगी ना। अल्पकाल की प्राप्ति की भी खुशी होती है। तो यह तो अविनाशी प्राप्ति है, इसकी खुशी भी अविनाशी होनी चाहिए। तो खुश रहते हो? या कभी-कभी रहते हो? सदा खुश रहते हो? जो अपनी चीज होती है वह कभी भूलती नहीं है। चाहे छोटी-सी चीज भी अपनी है, तो भूलेगी? तो यह ‘खुशी’ अपना खजाना है। बाप का खजाना सो अपना खजाना। अपनी चीज भूल नहीं सकती। तो निरन्तर योगी बनना सहज है ना। इस सहज विधि से औरों को भी सहज प्राप्ति करा सकते हो। क्योंकि जब अपने को खुशी प्राप्त होती तो दूसरों को खुशी अवश्य देंगे। जिसको कोई अच्छी चीज मिलती है तो वह दूसरों को देने बिना नहीं रह सकते।

सदा अपने को जैसे बाप न्यारा और प्यारा है, ऐसे न्यारे और प्यारे अनुभव करते हो? बाप सबका प्यारा क्यों है? क्योंकि न्यारा है। जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं। न्यारा किससे? पहले अपनी देह की स्मृति से न्यारा। जितना देह की स्मृति से न्यारे होंगे उतने बाप के भी प्यारे और सर्व के भी प्यारे होंगे। क्योंकि न्यारा अर्थात् आत्म-अभिमानी। जब बीच में देह का भान आता है तो प्यारापन खत्म हो जाता है। इसलिए बाप समान सदा न्यारे और सर्व के प्यारे बनो। आत्मा रूप में किसको भी देखेंगे तो रूहानी प्यार पैदा होगा ना। और देहभान से देखेंगे तो व्यक्त भाव होने के कारण अनेक भाव उत्पन्न होंगे कभी अच्छा होगा, कभी बुरा होगा। लेकिन आत्मिक भाव में, आत्मिक दृष्टि में, आत्मिक वृत्ति में रहने वाला जिसके भी सम्बन्ध में आयेगा अति प्यारा लगेगा। तो सेकेण्ड में न्यारे हो सकते हो? कि टाइम लगेगा? जैसे शरीर में आना सहज लगता है, ऐसे शरीर से परे होना इतना ही सहज हो जाये। कोई भी पुराना स्वभाव-संस्कार अपनी तरफ आकर्षित नहीं करे और सेकेण्ड में न्यारे हो जाओ। सारे दिन में, बीच-बीच में यह अभ्यास करो। ऐसे नहीं कि जिस समय याद में बैठो उस समय अशरीरी स्थिति का अनुभव करो। नहीं। चलते-फिरते बीच-बीच में यह अभ्यास पक्का करो “मैं हूँ ही आत्मा!” तो आत्मा का स्वरूप ज्यादा याद होना चाहिए ना! सदा खुशी होती है ना! कम नहीं होनी चाहिए, बढ़नी चाहिए। इसका साधन बताया मेरा बाबा। और कुछ भी भूल जाये लेकिन ‘मेरा बाबा’ यह भूले नहीं। अच्छा!

अब कोई ऐसी नई इन्वेन्शन निकालो जो “कम खर्चा बाला नशीन” हो। खर्चा भी कम हो, आवाज भी ज्यादा फैले। जैसे कोई समय था प्रदर्शनी की इन्वेन्शन निकाली, मेले की इन्वेन्शन निकाली। यह नवीनता थी ना। लेकिन अब तो पुरानी बात हो गई। ऐसे कोई नई इन्वेन्शन निकालो जो सभी कहें कि हमको भी ऐसे करना है। जैसे अभी शान्ति-अनुभूति की नई बात निकाली तो सब अच्छा अनुभव करते हैं ना। ऐसे सेवा की कोई नई इन्वेन्शन निकालो। कॉन्फ्रेन्स होना या मेला होना यह अभी पुरानी लिस्ट में आ गया। तो कोई नवीनता करके दिखाना। समझा?

स्वयं को भी आगे बढ़ाओ और सेवा को भी आगे बढ़ाओ। क्योंकि सुनाया ना अभी बेहद की सेवा करनी है! सर्व धर्म की आत्माओं को भी सन्देश पहुँचाना है। तो कितनी सेवा अभी रही हुई है! अभी तीव्र गति से सेवा को बढ़ाओ। लेकिन स्व की उन्नति पहले, बाद में सेवा। सिर्फ सेवा नहीं। स्वउन्नति और सेवा की उन्नति – जब दोनों साथ होंगी तब सेवा की सफलता अविनाशी होगी। नहीं तो थोड़े समय की सफलता होगी। अच्छा! अभी देखेंगे कि क्या नवीनता निकालते हो?

ग्रुप नं. 3 – फरिश्ता बनना है तो सर्व लगाव की जंजीरों को समाप्त करो

बाप समान निराकारी और आकारी इसी स्थिति में स्थित रहने वाली आत्मायें अनुभव करते हो? क्योंकि शिव बाप है निराकारी और ब्रह्मा बाप है आकारी। तो आप सभी भी साकारी होते हुए भी निराकारी और आकारी अर्थात् अव्यक्त स्थिति में स्थित हो सकते हो या साकार में ज्यादा आ जाते हो? जैसे साकार में रहना नेचुरल हो गया है, ऐसे ही मैं आकारी फरिश्ता हूँ और निराकारी श्रेष्ठ आत्मा हूँ यह दोनों स्मृतियां नेचुरल हों। क्योंकि जिससे प्यार होता है, तो प्यार की निशानी है समान बनना। बाप और दादा निराकारी और आकारी हैं और दोनों से प्यार है तो समान बनना पड़ेगा ना। तो सदैव यह अभ्यास करो कि अभी-अभी आकारी, अभी-अभी निराकारी। साकार में आते भी आकारी और निराकारी स्थिति में जब चाहें तब स्थित हो सकें। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियां आपके कन्ट्रोल में हैं। आंख को वा मुख को बंद करना चाहो तो कर सकते हो। ऐसे मन और बुद्धि को उसी स्थिति में स्थित कर सको जिसमें चाहो। अगर फरिश्ता बनने चाहें तो सेकेण्ड में फरिश्ता बनो ऐसा अभ्यास है या टाइम लगता है? क्योंकि हलचल जब बढ़ती है तो ऐसे समय पर कौन-सी स्थिति बनानी पड़ेगी? आकारी या निराकारी। साकार देहधारी की स्थिति पास होने नहीं देगी, फेल कर देगी। अभी भी देखो किसी भी हलचल के समय अचल बनने की स्थिति फरिश्ता स्वरूप या आत्म-अभिमानी स्थिति ही है। यही स्थिति हलचल में अचल बनाने वाली है। तो क्या अभ्यास करना है? आकारी और निराकारी। जब चाहें तब स्थित हो जाएं, इसके लिए सारा दिन अभ्यास करना पड़े, सिर्फ अमृतवेले नहीं। बीच-बीच में यह अभ्यास करो।

फरिश्ता सदा ही ऊपर से नीचे आता है, फिर नीचे से ऊपर उड़ जाता है। फरिश्ता सेकेण्ड में ऊंचा क्यों उड़ जाता? क्योंकि उसका कोई लगाव नहीं होता न देह से, न देह की पुरानी दुनिया से। तो चेक करो कि लगाव की कोई जंजीरें रही हुई तो नहीं हैं? अगर कोई भी लगाव की जंजीर वा धागा लगा हुआ होगा तो उड़ सकेंगे? वह रस्सी वा धागा खींचकर नीचे ले आयेगा। तो फरिश्ता अर्थात् जिसका पुरानी दुनिया से कोई रिश्ता नहीं हो। ऐसे है या थोड़ा-थोड़ा रिश्ता है? मोटे-मोटे धागे खत्म हो गये। सूक्ष्म कोई रह तो नहीं गये? बहुत महीन धागे हैं। ऐसे न हो मोटे-मोटे को देखकर समझो कि स्वतन्‍त्र हो गये और जब उड़ने लगो तो नीचे आ जाओ। तो सूक्ष्म रीति से चेक करो। अंश-मात्र भी नहीं हो। सुनाया था ना कि कई बच्चे कहते हैं इच्छा नहीं है कोई चीज़ की लेकिन अच्छा लगता है। तो यह क्या हुआ? अंश-मात्र हो गया ना। जो चीज़ अच्छी लगेगी वह अपनी तरफ आकर्षित करेगी ना। तो ‘इच्छा’ है मोटा धागा और ‘अच्छा’ है सूक्ष्म धागा। मोटा तो खत्म कर दिया, लेकिन सूक्ष्म है तो उड़ने नहीं देगा।

बाप से प्यार अर्थात् बाप समान बनना। रोज़ फरिश्ते की बात सुनते हो ना। सिर्फ सुनते हो या बन गये हो? बन रहे हैं या बन गये हैं? कब तक बनेंगे? विनाश तक? उससे पहले बनेंगे तो उसका हिसाब है। ऐसे नहीं, 10 साल में विनाश होगा तो 9 साल के बाद एक साल में बन जाओ। ऐसे नहीं करना। बहुतकाल का चाहिए। अगर थोड़े समय का अभ्यास होगा तो थोड़े समय तो स्थित होंगे लेकिन बहुतकाल नहीं हो सकेंगे, मेहनत करनी पड़ेगी। अभी मेहनत कर लो, तो उस समय मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। अगर मेहनत करते-करते चले गये तो रिजल्ट क्या होगी? कहाँ जायेंगे सूर्यवंश में या चन्द्रवंश में? तो चेक करो और चेंज करो। जो कमी हो उसको भरते जाओ। सम्पन्न बनो। सदैव याद रखो कि बाप को प्यार का सबूत देना है – समान बनना है। सदा अपने को बाप समान बनाने का अभ्यास और तीव्र गति से बढ़ाओ। अच्छा!

ग्रुप नं. 4 – मालिक सो बालक – यह डबल नशा निर्विघ्न बना देगा

सदा मालिकपन और बालकपन के नशे में रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? जब चाहो मालिकपन की स्थिति में स्थित हो जाओ और जब चाहो तो बालकपन की स्थिति में स्थित हो जाओ – ऐसा अनुभव है? या जिस समय बालक बनना हो उस समय मालिक बन जाते और जिस समय मालिक बनना हो उस समय बालक बन जाते? जब चाहो, जैसे चाहो वैसी स्थिति में स्थित हो जाओ – ऐसे है? क्योंकि यह डबल नशा सदा ही निर्विघ्न बनाने वाला है। जब भी कोई विघ्न आता है तो उस समय जिस स्थिति में स्थित होना चाहिए, उसमें स्थित न होने कारण विघ्न आता है।

विघ्न-विनाशक आत्मायें हो या विघ्न के वश होने वाली हो? सदैव यह स्मृति में रखो कि हमारा टाइटल ही है ‘विघ्न-विनाशक’। विघ्न-विनाशक आत्मा स्वयं कैसे विघ्न में आयेगी? चाहे कोई कितना भी विघ्न रूप बनकर आये लेकिन आप विघ्न विनाश करेंगे। सिर्फ अपने लिये विघ्न-विनाशक नहीं हो लेकिन सारे विश्व के विघ्न-विनाशक हो। विश्व-परिवर्तक हो। तो विश्व-परिवर्तक शक्तिशाली होते हैं ना। शक्ति के आगे कोई कितना भी शक्तिशाली हो लेकिन वह कमजोर बन जाता है। विघ्न को कमजोर बनाने वाले हो, स्वयं कमजोर बनने वाले नहीं। अगर स्वयं कमजोर बनते हो तो विघ्न शक्तिशाली बन जाता है और स्वयं शक्तिशाली हो तो विघ्न कमजोर बन जाता है। तो सदा अपने मास्टर सर्वशक्तिवान स्वरूप की स्मृति में रहो।

सुना तो बहुत है, बाकी क्या रहा? बनना। सुनने का अर्थ ही है बनना। तो बन गये हो? बाप भी ऐसे शक्तिशाली बच्चों को देख हर्षित होते हैं। लौकिक में भी बाप को कौन-से बच्चे प्यारे लगते हैं? जो आज्ञाकारी, फॉलो फादर करने वाले होंगे। तो आप कौन हो? फॉलो फादर करने वाले हो। फॉलो करना सहज होता है ना। बाप ने कहा और बच्चों ने किया। सोचने की भी आवश्यकता नहीं। करें, नहीं करें, अच्छा होगा, नहीं होगा यह सोचने की भी आवश्यकता नहीं। फॉलो करना सहज है ना। हर कर्म में क्या-क्या फॉलो करो और कैसे करो यह भी सभी को स्पष्ट है। जो हर कदम में फॉलो करने वाले हैं उनको क्या नशा रहता है? यह निश्चय का नशा रहता है कि हर कर्म में सफलता हुई ही पड़ी है। होगी या नहीं होगी, नहीं। हुई ही पड़ी है। क्योंकि कल्प पहले भी पाण्डवों की विजय हुई ना। पाण्डवों ने क्या किया? भगवान् की मत पर चले अर्थात् फॉलो किया तो विजय हुई। तो वही कल्प पहले वाले हो ना। तो यह निश्चय स्वत: ही नशा दिलाता है। कोई भी बात मुश्किल नहीं लगेगी। तो सदा ही सहज और श्रेष्ठ प्राप्ति का अनुभव करते चलो। मालिक सो बालक हैं – यह डबल नशा समय प्रमाण प्रैक्टिकल में लाओ। कभी कोई खिटखिट भी हो जाये तो भी खुशी कम न हो। सदा खुश रहो। अच्छा!

ग्रुप नं. 5 – सिर्फ कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनो

अपने को सदा संगमयुगी कल्याणकारी आत्मायें अनुभव करते हो? संगमयुग एक ही इस सृष्टि-चक्र में ऐसा युग है जो चढ़ती कला का युग है। और युग धीरे-धीरे नीचे उतारते हैं। सतयुग से कलियुग में आते हो तो कितनी कलायें कम हो जाती हैं? तो सभी युगों में उतरते हो और संगमयुग में चढ़ते हो। चढ़ने के लिए भी लिफ्ट मिलती है। सभी को लिफ्ट मिली है ना। बीच में अटक तो नहीं जाती है? ऐसे तो नहीं कभी अटक जाओ, कभी लटक जाओ। ऐसी लिफ्ट मिलती है जो कभी भी न लटकाने वाली है, न अटकाने वाली है। देखो, कितने लक्की हो जो कल्याणकारी युग में आये और कल्याणकारी बाप मिला। आपका भी आक्यूपेशन है विश्व-कल्याणकारी। तो बाप भी कल्याणकारी, युग भी कल्याणकारी, आप भी कल्याणकारी और आपका आक्यूपेशन भी विश्व-कल्याणकारी। तो कितने लक्की हो! अच्छा, यह लक्क कितना समय चलेगा? सारा कल्प या आधा कल्प? जो कहते हैं आधा कल्प, वह हाथ उठाओ। जो कहते हैं सारा कल्प, वह हाथ उठाओ। सभी राइट हो। क्योंकि आधा कल्प राज्य करेंगे, आधा कल्प पूज्य बनेंगे। तो यह भी लक्क ही है।

डबल विदेशी पूज्य बनेंगे? आपके मन्दिर हैं? देखो, एक ही देवता धर्म है जिसके 33 करोड़ गाये और पूजे जाते हैं। आप उसमें तो हो ही ना। अच्छा, आबू में अपना मन्दिर देखा है? उसमें आपकी मूर्ति है? नम्बर लगाकर आये हो कि यह मेरी है? जब बाप को फॉलो करने वाले हो, तो जैसे बाप ब्रह्मा पूज्य बनेंगे, तो फॉलो करने वाले भी अवश्य पूज्य ही बनेंगे। सारा कल्प ब्रह्मा बाप के साथ राज्य का, पूजा का और पूज्य बनने का सब पार्ट बजायेंगे। ऐसा निश्चय है? पूजा भी ब्रह्मा बाप के साथ शुरू करेंगे। किसकी पूजा शुरू करेंगे? आपने पूजा की है? अपनी भी पूजा की है? देवताओं की पूजा की तो अपनी की ना। इसलिए गाया हुआ है आपे ही पूज्य, आपे ही पुजारी। इतना ब्रह्मा बाप से प्यार है जो सदा ही साथ रहेंगे। लेकिन कौन साथ रहेगा? जो फॉलो करने वाले हैं। तो जो भी कर्म करते हो वह चेक करो कि ब्रह्मा बाप समान श्रेष्ठ कर्म है या साधारण कर्म है? जब विशेष कर्म करने वाले बनेंगे तब ही विशेष ब्रह्मा आत्मा के साथ पार्ट बजायेंगे।

सदा मैं विश्व-कल्याणकारी आत्मा हूँ – इस स्मृति में रहने से जो भी कर्म करेंगे वह कल्याणकारी करेंगे। कल्याणकारी समझने से संगमयुग जो कल्याणकारी है वह भी याद आता है और कल्याणकारी बाप भी स्वत: याद आता है। सिर्फ कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनना है। सबसे बड़े भाग्य की निशानी यह है जो संगमयुग पर साधारण आत्मा बने हो। अगर साहूकार होते तो बाप के नहीं बनते, सिर्फ कलियुग की साहूकारी ही भाग्य में मिलती। तो साधारण बनना अच्छा है ना। स्थूल धन से साधारण हो लेकिन ज्ञान-धन से साहूकार हो। तो खुशी है ना कि बाप ने सारे विश्व में से हमें अपना बनाया। सारा दिन खुशी में रहते हो? मुरली रोज़ सुनते हो? कभी मिस तो नहीं करते? मिस करते हो तो फॉलो फादर नहीं हुआ ना। ब्रह्मा बाप ने एक दिन भी मुरली मिस नहीं की। अच्छा!

मधुबन निवासी और ग्लोबल हॉस्पिटल वाले – दोनों ही अपनी अच्छी सेवा कर रहे हैं। ये ग्लोबल वाले शरीरों को निरोगी बनाए आत्मा को शक्तिशाली बना रहे हैं और मधुबन निवासी सभी को सन्तुष्ट करने की सेवा कर रहे हैं। दोनों की सेवा बापदादा देख हर्षित होते हैं। सेवाधारी भी अथक बन सेवा में सदा आगे बढ़ते रहते हैं। सभी को सेवा की मुबारक! सालगांव में भी अच्छी प्यार से सेवा कर रहे हैं, आपके प्यार की सेवा सफलता को समीप ला रही है। नीचे तलहटी वाले भी अच्छी सेवा कर रहे हैं। डबल विदेशी भी अच्छी सेवा कर रहे हैं। अच्छी कर रहे हैं और अच्छी रहेगी। विदेश में भी अच्छी सेवा का उमंग है। भारत और विदेश में सेवा वृद्धि को प्राप्त कर रही है और तीव्र गति से वृद्धि को प्राप्त करना ही है। अच्छा!

डबल विदेशी भाई-बहनों प्रति बापदादा का सन्देश

सब सेवा की लगन में मगन रहने वाले हैं। स्व-उन्नति और सेवा की उन्नति – दोनों का बैलेन्स बढ़ाते हुए आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ा रहे हैं। सेवा भी हो रही है और याद में भी बैठते ही हैं। लेकिन अभी बैलेन्स के ऊपर और अटेन्शन दिलाते चलो। कभी सेवा में बहुत आगे चले जाते, कभी स्व-उन्नति की भी लगन लग जाती है। लेकिन दोनों साथ-साथ हों तो सफलता सहज और जो चाहते हैं वही हो जाती है। तो यही अटेन्शन दिलाते रहते हो ना। जिनको बैलेन्स रखना आता है वे सदा दुआएं लेते हैं और दुआएं देते हैं। बैलेन्स की प्राप्ति है ब्लैसिंग। बैलेन्स वाले को ब्लैसिंग नहीं मिले यह हो नहीं सकता। तो बैलेन्स की निशानी है ब्लैसिंग। यदि नहीं मिलती तो बैलेन्स की कमी है। आप सभी की पालना किससे हुई? दुआओं से आगे बढ़े ना कि मेहनत करनी पड़ी? माता, पिता और परिवार की दुआओं से सहज आगे बढ़ते गये और अभी भी दुआएं मिल रही हैं। महारथियों की पालना क्या है? दुआएं ना। आपको कितनी दुआएं मिलती हैं! तो महारथी की पालना ही दुआएं हैं।

पूर्वज और पूज्य की स्मृति में रहकर सर्व की अलौकिक पालना करो

भूमिका

आज संसार अशान्ति, भय, तनाव और असुरक्षा से भरा हुआ दिखाई देता है। ऐसे समय में परमात्मा बापदादा ब्राह्मण आत्माओं को उनकी वास्तविक पहचान याद दिलाते हैं कि वे केवल स्वयं के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व की आत्माओं की पालना और कल्याण के निमित्त बनी हुई हैं।

अव्यक्त बापदादा कहते हैं:

“आप ब्राह्मण आत्मायें विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मायें हो।”
(अव्यक्त मुरली, 30 जनवरी 1993)

यह स्मृति केवल सम्मान का अनुभव कराने के लिए नहीं है, बल्कि एक महान जिम्मेदारी का बोध कराने के लिए है।


1. पूर्वज आत्मा कौन है?

सामान्य रूप से पूर्वज शब्द सुनते ही हमारे मन में दादा-परदादा का चित्र आता है। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्वज वह है जो सम्पूर्ण मानव परिवार का मूल आधार हो।

बापदादा समझाते हैं कि जैसे वृक्ष की जड़ पूरे वृक्ष को पोषण देती है, वैसे ही ब्राह्मण आत्माएँ सम्पूर्ण विश्व-वृक्ष की आध्यात्मिक जड़ हैं।

उदाहरण

यदि किसी विशाल पेड़ की जड़ को पानी दिया जाए तो उसका लाभ केवल एक शाखा को नहीं बल्कि पूरे वृक्ष को मिलता है।

उसी प्रकार जब एक योगयुक्त आत्मा शक्तिशाली संकल्प करती है, तो उसकी तरंगें अनेक आत्माओं तक पहुँचती हैं।


2. केवल ब्राह्मणों की नहीं, पूरे विश्व की पालना

कई बार हम सोचते हैं कि हमारी जिम्मेदारी केवल अपने परिवार, सेंटर या परिचित लोगों तक सीमित है।

लेकिन बापदादा कहते हैं:

“सारे विश्व की आत्माओं के पूर्वज हो।”
(अव्यक्त मुरली, 30-01-1993)

इसका अर्थ है कि हर धर्म, हर देश और हर संस्कृति की आत्मा हमारी आध्यात्मिक परिवार की सदस्य है।

एक साधारण उदाहरण

जैसे सूर्य यह नहीं देखता कि कौन किस धर्म या देश का है। वह सबको समान प्रकाश देता है।

उसी प्रकार पूर्वज आत्मा का प्यार और शुभभावना भी सबके लिए समान होती है।


3. अलौकिक पालना क्या है?

लौकिक दुनिया में पालना का अर्थ है भोजन देना, शिक्षा देना या सुरक्षा देना।

लेकिन आध्यात्मिक पालना इससे कहीं ऊँची है।

बापदादा कहते हैं:

“अलौकिक पालना का स्वरूप है स्वयं में बाप द्वारा प्राप्त हुई सर्व शक्तियाँ अन्य आत्माओं में भरना।”
(अव्यक्त मुरली, 30-01-1993)

जब कोई आत्मा दुःखी हो तो उसे शान्ति की शक्ति देना, जब कोई निराश हो तो उसे साहस देना, जब कोई भयभीत हो तो उसे विश्वास देना—यही वास्तविक अलौकिक पालना है।


4. अशान्ति के समय हमारी जिम्मेदारी

जब संसार में हिंसा, युद्ध, प्राकृतिक आपदाएँ या सामाजिक तनाव बढ़ते हैं, तब अधिकांश लोग केवल समाचार देखते हैं और चर्चा करते हैं।

लेकिन बापदादा पूछते हैं:

“समाचार सुनने के बाद सर्व की पालना की?”

यह प्रश्न हम सबके लिए है।

वर्तमान समय में इसका प्रयोग

जब किसी क्षेत्र में युद्ध हो, दुर्घटना हो या बड़ी समस्या आए—

तो केवल चिंता करने के बजाय कुछ मिनट योग में बैठकर वहाँ की आत्माओं को शान्ति और शक्ति की किरणें देना भी एक महान सेवा है।


5. रूहानी सोशल वर्कर बनो

दुनिया में अनेक सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं जो लोगों की शारीरिक सहायता करते हैं।

लेकिन ब्राह्मण आत्मा का कार्य उससे भी ऊँचा है।

बापदादा कहते हैं:

“आप रूहानी सोशल वर्कर भी हो।”

रूहानी सोशल वर्कर वह है जो संकल्पों द्वारा वातावरण को बदलने की क्षमता रखता है।

उदाहरण

यदि किसी घर में तनाव हो और एक शान्त आत्मा वहाँ प्रवेश करे तो बिना कुछ बोले भी वातावरण बदल जाता है।

यही रूहानी सेवा है।


6. “मेरा बाबा” – सहज योग की कुंजी

ग्रुप मुलाकात में बापदादा ने योग का अत्यंत सरल रहस्य बताया।

“सबसे सहज विधि है – मेरा बाबा।”
(अव्यक्त मुरली, 30-01-1993)

मन वहीं जाता है जहाँ मेरापन होता है।

जब यह अनुभव पक्का हो जाए कि परमात्मा मेरा है, तो योग कोई कठिन साधना नहीं रह जाती।

उदाहरण

जिस प्रकार माता अपने बच्चे को दिनभर याद रखती है, उसे याद करने के लिए विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।

उसी प्रकार “मेरा बाबा” का अनुभव सहज स्मृति बन जाता है।


7. न्यारे और प्यारे बनो

बापदादा कहते हैं:

“जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं।”

न्यारा बनने का अर्थ है देह-अभिमान, स्वार्थ और आसक्ति से मुक्त होना।

जब आत्मा देह की सीमाओं से ऊपर उठती है, तब उसके भीतर स्वाभाविक प्रेम उत्पन्न होता है।


8. फरिश्ता जीवन का रहस्य

फरिश्ता वह नहीं जो केवल चित्रों में दिखाई देता है।

फरिश्ता वह आत्मा है जिसका पुरानी दुनिया से लगाव समाप्त हो चुका है।

बापदादा कहते हैं:

“फरिश्ता अर्थात् जिसका पुरानी दुनिया से कोई रिश्ता नहीं हो।”

उदाहरण

जैसे गुब्बारा तभी ऊपर उड़ता है जब उसे नीचे बाँधने वाली रस्सी खोल दी जाए।

उसी प्रकार आत्मा तभी उड़ सकती है जब लगाव की जंजीरें समाप्त हों।


9. मालिकपन और बालकपन का डबल नशा

बापदादा ने एक सुंदर स्थिति बताई—

“मालिक सो बालक”

एक ओर आत्मा मास्टर सर्वशक्तिवान है, दूसरी ओर परमात्मा की संतान है।

यह डबल नशा आत्मा को विघ्नों से सुरक्षित रखता है।


10. केवल कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनो

आज का समय केवल स्वयं की उन्नति का नहीं है।

बापदादा कहते हैं:

“सिर्फ कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनो।”

हर दिन यह संकल्प करें—

“मैं विश्व की प्रत्येक आत्मा को शान्ति, सुख और शक्ति की शुभकामना देता हूँ।”

यही विश्व सेवा है।


निष्कर्ष

इस मुरली का सार यही है कि हम अपने छोटे दायरे से निकलकर विश्व परिवार की भावना में स्थित हों।

जब हम स्वयं को पूर्वज और पूज्य आत्मा समझते हैं, तब हमारी दृष्टि, वृत्ति और संकल्प बदल जाते हैं।

हम केवल लेने वाले नहीं रहते, बल्कि देने वाले बन जाते हैं।

हम केवल अपने दुःख-सुख तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याणकारी बन जाते हैं।

संकल्प:

“मैं विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मा हूँ। मैं अपनी शुभभावना, शुभकामना और शक्तिशाली संकल्पों द्वारा सम्पूर्ण विश्व की अलौकिक पालना करने वाला/वाली हूँ।”

पूर्वज और पूज्य की स्मृति में रहकर सर्व की अलौकिक पालना करो

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 30 जनवरी 1993)


भूमिका

आज संसार अशान्ति, भय, तनाव, हिंसा और असुरक्षा से घिरा हुआ दिखाई देता है। ऐसे समय में परमात्मा बापदादा ब्राह्मण आत्माओं को उनकी वास्तविक पहचान का स्मरण कराते हैं।

हम केवल स्वयं की उन्नति के लिए नहीं आए हैं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व की आत्माओं के आध्यात्मिक पालक बनने के लिए आए हैं।

बापदादा कहते हैं—

“आप ब्राह्मण आत्मायें विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मायें हो।”
(अव्यक्त मुरली, 30 जनवरी 1993)

यह केवल सम्मान का परिचय नहीं बल्कि जिम्मेदारी का संदेश है।


अध्याय 1

पूर्वज आत्मा कौन है?

सामान्य भाषा में पूर्वज का अर्थ होता है—दादा, परदादा या हमारे वंश के प्रारम्भिक सदस्य।

लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से “पूर्वज” वह आत्मा है जो सम्पूर्ण मानव परिवार की मूल आत्मा है।

बापदादा बताते हैं कि ब्राह्मण आत्माएँ विश्व-वृक्ष की जड़ हैं।

✨ मुरली नोट

“इस कल्प-वृक्ष की फाउण्डेशन अर्थात् जड़ आप ब्राह्मण आत्मायें हो।”


उदाहरण

यदि किसी विशाल वृक्ष की जड़ को पानी दिया जाए तो उसका लाभ पूरे वृक्ष को मिलता है।

उसी प्रकार एक योगयुक्त आत्मा का शक्तिशाली संकल्प लाखों आत्माओं तक शांति की तरंगें पहुँचा सकता है।


अध्याय 2

पूर्वज होने का अर्थ – सबके प्रति अपनापन

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी जिम्मेदारी केवल अपने परिवार, सेंटर या परिचित लोगों तक सीमित है।

लेकिन बापदादा कहते हैं—

✨ मुरली नोट

“सारे विश्व की आत्माओं के पूर्वज हो।”

हर धर्म…

हर देश…

हर संस्कृति…

हर आत्मा…

हमारे आध्यात्मिक परिवार का भाग है।


उदाहरण

सूर्य कभी यह नहीं देखता कि कौन किस देश या धर्म का है।

वह सबको समान प्रकाश देता है।

उसी प्रकार पूर्वज आत्मा का प्रेम भी सबके लिए समान होता है।


अध्याय 3

अलौकिक पालना क्या है?

लौकिक जीवन में पालना का अर्थ है—

  • भोजन देना
  • शिक्षा देना
  • सुरक्षा देना

लेकिन ईश्वरीय पालना इससे कहीं ऊँची है।

✨ मुरली नोट

“अलौकिक पालना का स्वरूप है स्वयं में बाप द्वारा प्राप्त हुई सर्व शक्तियाँ अन्य आत्माओं में भरना।”


जब कोई दुःखी हो—

उसे शांति देना।

जब कोई भयभीत हो—

उसे साहस देना।

जब कोई निराश हो—

उसे आशा देना।

यही वास्तविक अलौकिक पालना है।


उदाहरण

एक दीपक स्वयं जलकर अनेक दीपकों को प्रकाशित कर देता है।

वह अपना प्रकाश खोता नहीं बल्कि फैलाता है।

योगी आत्मा भी ऐसी ही होती है।


अध्याय 4

समाचार सुनना पर्याप्त नहीं

आज लोग दिनभर समाचार देखते हैं—

युद्ध…

दुर्घटनाएँ…

हिंसा…

प्राकृतिक आपदाएँ…

लेकिन बापदादा पूछते हैं—

✨ मुरली नोट

“समाचार सुनने के बाद सर्व की पालना की?”

यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।


उदाहरण

यदि किसी देश में भूकम्प आया हो—

तो केवल दुःख व्यक्त करने के बजाय पाँच मिनट योग में बैठकर वहाँ की आत्माओं को शांति की किरणें भेजना—

यही रूहानी सेवा है।


अध्याय 5

रूहानी सोशल वर्कर कौन है?

दुनिया में सामाजिक कार्यकर्ता शरीरों की सहायता करते हैं।

लेकिन ब्राह्मण आत्मा आत्माओं की सेवा करती है।

✨ मुरली नोट

“आप रूहानी सोशल वर्कर भी हो।”


उदाहरण

कई बार एक शांत व्यक्ति किसी तनावपूर्ण वातावरण में प्रवेश करता है।

वह कुछ बोलता भी नहीं।

फिर भी वातावरण बदल जाता है।

यह योगबल की शक्ति है।


अध्याय 6

“मेरा बाबा” – सहज योग की कुंजी

ग्रुप मुलाकात में बापदादा ने योग का सबसे सरल रहस्य बताया।

✨ मुरली नोट

“सबसे सहज विधि है—मेरा बाबा।”

मन वहीं जाता है जहाँ अपनापन होता है।

यदि परमात्मा मेरा है—

तो योग स्वतः सहज हो जाता है।


उदाहरण

माता को अपने बच्चे को याद करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता।

उसी प्रकार—

“मेरा बाबा”

सहज स्मृति बन जाए—

तो योग स्वतः निरंतर हो जाता है।


अध्याय 7

न्यारे बनो, तभी प्यारे बनोगे

✨ मुरली नोट

“जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं।”

न्यारा बनने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है।

बल्कि—

देह-अभिमान,

आसक्ति,

स्वार्थ,

पुराने संस्कारों से ऊपर उठना है।


उदाहरण

कमल का फूल पानी में रहता है,

लेकिन पानी उसे भिगो नहीं पाता।

यही न्यारेपन की स्थिति है।


अध्याय 8

फरिश्ता जीवन का रहस्य

फरिश्ता कोई कल्पना नहीं है।

फरिश्ता वह आत्मा है—

जिसका पुरानी दुनिया से लगाव समाप्त हो चुका है।

✨ मुरली नोट

“फरिश्ता अर्थात् जिसका पुरानी दुनिया से कोई रिश्ता नहीं हो।”


उदाहरण

यदि गुब्बारे को नीचे रस्सी से बाँध दिया जाए—

तो वह ऊपर नहीं उड़ सकता।

उसी प्रकार

लगाव की छोटी-सी डोरी भी

आत्मा को उड़ने नहीं देती।


अध्याय 9

मालिकपन और बालकपन का डबल नशा

बापदादा कहते हैं—

“मालिक सो बालक”

एक ओर—

मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ।

दूसरी ओर—

मैं परमात्मा का बच्चा हूँ।

यही संतुलन आत्मा को विघ्नों से सुरक्षित रखता है।


✨ मुरली नोट

“यह डबल नशा सदा निर्विघ्न बनाने वाला है।”


अध्याय 10

केवल कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनो

आज का समय केवल व्यक्तिगत उन्नति का नहीं है।

पूरे विश्व के कल्याण का समय है।

✨ मुरली नोट

“सिर्फ कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनो।”


प्रतिदिन का अभ्यास

सुबह अमृतवेले संकल्प करें—

“मैं विश्व की प्रत्येक आत्मा को शांति, सुख और शक्ति की शुभकामनाएँ देता हूँ।”


निष्कर्ष

इस अव्यक्त मुरली (30 जनवरी 1993) का मूल संदेश है कि ब्राह्मण आत्मा स्वयं को केवल विद्यार्थी या साधक न समझे, बल्कि सम्पूर्ण विश्व की पूर्वज, पूज्य और रूहानी पालक आत्मा समझे।

जब यह स्मृति जागृत होती है—

  • दृष्टि बदल जाती है,
  • वृत्ति बदल जाती है,
  • सेवा बदल जाती है,
  • और जीवन विश्व-कल्याण का माध्यम बन जाता है।

आज का संकल्प

“मैं विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मा हूँ।
मैं बाप से प्राप्त सर्व शक्तियों द्वारा प्रत्येक आत्मा की अलौकिक पालना करने वाला/वाली हूँ।
मेरी वृत्ति, दृष्टि और संकल्प विश्व-कल्याणकारी हैं।”

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं, अव्यक्त मुरली एवं ईश्वरीय ज्ञान पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागरूकता, सकारात्मक सोच, आध्यात्मिक उन्नति एवं मानव कल्याण को प्रोत्साहित करना है। प्रस्तुत विचार आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्म-चिंतन हेतु हैं। किसी धर्म, सम्प्रदाय, संस्था या व्यक्ति की भावनाओं को आहत करना इसका उद्देश्य नहीं है। दर्शक अपने विवेक एवं समझ के अनुसार इन शिक्षाओं का अध्ययन करें।

“पूर्वज और पूज्य की स्मृति में रहकर सर्व की अलौकिक पालना करो”

महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

नोट: नीचे दिए गए प्रश्नोत्तर अव्यक्त मुरली दिनांक 30 जनवरी 1993 के मुख्य बिंदुओं पर आधारित अध्ययन सामग्री हैं।


प्रश्न 1. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: अपने को विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मा समझकर सम्पूर्ण विश्व की आत्माओं की अलौकिक पालना करना।


प्रश्न 2. पूर्वज आत्मा किसे कहा गया है?

उत्तर: वह आत्मा जो सम्पूर्ण विश्व-वृक्ष की आध्यात्मिक जड़ और आधार बनकर सभी आत्माओं की सेवा करती है।


प्रश्न 3. ब्राह्मण आत्माओं की विशेष पहचान क्या है?

उत्तर: वे विश्व की पूर्वज, पूज्य और विश्व-कल्याणकारी आत्माएँ हैं।


प्रश्न 4. अलौकिक पालना क्या है?

उत्तर: स्वयं में प्राप्त ईश्वरीय शक्तियों को संकल्प, दृष्टि और वृत्ति द्वारा अन्य आत्माओं तक पहुँचाना।


प्रश्न 5. पालना का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

उत्तर: निर्बल आत्माओं को शक्तिशाली बनाना।


प्रश्न 6. वर्तमान समय में विश्व को सबसे अधिक किस सेवा की आवश्यकता है?

उत्तर: शांति, सहनशक्ति और आध्यात्मिक शक्ति की।


प्रश्न 7. बापदादा ने ब्राह्मण आत्माओं को किस विशेष सेवा के लिए प्रेरित किया?

उत्तर: समाचार सुनने के साथ-साथ संकल्पों द्वारा विश्व को शांति प्रदान करने की सेवा के लिए।


प्रश्न 8. रूहानी सोशल वर्कर कौन है?

उत्तर: जो अपनी मनसा, वृत्ति और योगबल द्वारा आत्माओं की सेवा करता है।


प्रश्न 9. विश्व सेवा का सबसे श्रेष्ठ साधन क्या है?

उत्तर: शक्तिशाली संकल्प और योगयुक्त स्थिति।


प्रश्न 10. “मेरा बाबा” का अभ्यास क्यों आवश्यक है?

उत्तर: क्योंकि जहाँ अपनापन होता है, वहीं मन सहज रूप से स्थिर हो जाता है।


प्रश्न 11. सहज योग की सबसे सरल विधि क्या बताई गई है?

उत्तर: हर समय “मेरा बाबा” की स्मृति।


प्रश्न 12. न्यारे बनने का अर्थ क्या है?

उत्तर: देह-अभिमान और आसक्ति से ऊपर उठकर आत्म-अभिमानी बनना।


प्रश्न 13. प्यारा कौन बनता है?

उत्तर: जो सबसे पहले न्यारा बनता है।


प्रश्न 14. फरिश्ता किसे कहा गया है?

उत्तर: जिसका पुरानी दुनिया और देह-अभिमान से लगाव समाप्त हो गया हो।


प्रश्न 15. उड़ती कला में बाधा क्या बनती है?

उत्तर: सूक्ष्म लगाव और आकर्षण।


प्रश्न 16. “मालिक सो बालक” का क्या अर्थ है?

उत्तर: स्वयं को मास्टर सर्वशक्तिवान भी समझना और परमात्मा का आज्ञाकारी बच्चा भी समझना।


प्रश्न 17. विघ्नों पर विजय कैसे प्राप्त होती है?

उत्तर: मास्टर सर्वशक्तिवान की स्मृति में स्थित रहने से।


प्रश्न 18. विश्व-कल्याणकारी आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर: वह प्रत्येक आत्मा के प्रति शुभभावना और शुभकामना रखती है।


प्रश्न 19. संगमयुग की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

उत्तर: यह चढ़ती कला का युग है।


प्रश्न 20. ब्राह्मण जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य क्या है?

उत्तर: स्वयं को श्रेष्ठ बनाकर विश्व की सेवा करना।


प्रश्न 21. सेवा और स्व-उन्नति में कौन-सा संतुलन आवश्यक है?

उत्तर: दोनों साथ-साथ चलें, तभी सेवा स्थायी रूप से सफल होती है।


प्रश्न 22. बाप समान बनने का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?

उत्तर: सर्व के प्रति रहमदिल, दाता और विश्व-कल्याणकारी बनना।


प्रश्न 23. बापदादा के अनुसार सच्चा रहमदिल कौन है?

उत्तर: जो दुखी और निर्बल आत्माओं को हिम्मत और शक्ति देता है।


प्रश्न 24. इस मुरली का दैनिक अभ्यास क्या होना चाहिए?

उत्तर: प्रतिदिन कुछ समय विश्व की सभी आत्माओं को शांति और शक्ति की किरणें देना।


प्रश्न 25. इस मुरली का सार एक वाक्य में क्या है?

उत्तर: “स्वयं को विश्व की पूर्वज और पूज्य आत्मा समझकर सम्पूर्ण विश्व की अलौकिक पालना करना ही ब्राह्मण जीवन का श्रेष्ठ कर्तव्य है।”

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अव्यक्त मुरली-(37) “बापदादा की सर्व अलौकिक फ्रैण्ड्स को बधाई” (प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं) 31-12-1982 “बापदादा की सर्व…

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