PR.Where is Paramdham? Near the infinite universe.

PR.परमधाम कहां है? अनंत ब्रह्मांड के पास।

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परमधाम कहाँ है? | ब्रह्म तत्व का अनंत रहस्य | क्या विज्ञान कभी परमधाम तक पहुँच सकता है? | Brahma Kumaris

ब्रह्म तत्व : अनंत और परमधाम का रहस्य

(12 जून 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक चिंतन)

प्रस्तावना

आज की साकार मुरली में बाबा ने एक अत्यंत गहन बात कही—

“ब्रह्म तत्व बहुत बड़ा, बेअंत है। साइंस वाले कितना भी प्रयास करें, अंत नहीं पा सकते।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)

सदियों से मनुष्य यह प्रश्न पूछता आया है—

  • परमधाम कहाँ है?
  • क्या परमधाम ब्रह्मांड के किसी कोने में स्थित है?
  • क्या कभी कोई रॉकेट या दूरबीन वहाँ पहुँच सकती है?
  • ब्रह्म तत्व को “बेअंत” क्यों कहा गया?

राजयोग और मुरली ज्ञान इन प्रश्नों का एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक उत्तर प्रस्तुत करते हैं।


अध्याय 1 : परमधाम कहाँ है?

बाबा कहते हैं—

“परमधाम सूरज, चाँद, सितारों और आकाश से भी पार है।”

इसका अर्थ केवल भौतिक दूरी नहीं है।

यदि परमधाम किसी ग्रह या आकाशगंगा के पार स्थित कोई भौतिक स्थान होता, तो एक दिन विज्ञान वहाँ पहुँच सकता था।

लेकिन मुरली स्पष्ट करती है—

परमधाम कोई भौतिक ग्रह, तारा, गैलेक्सी या पदार्थ नहीं है।

वह चेतना का एक अत्यंत सूक्ष्म, निराकार और शांति से भरा हुआ आयाम है।


अध्याय 2 : “बेअंत” का वास्तविक अर्थ क्या है?

“बेअंत” का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म तत्व परमात्मा से भी बड़ा है।

“बेअंत” का अर्थ है—

जो मनुष्य की मापने, देखने और समझने की क्षमता से परे हो।

उदाहरण

समुद्र का किनारा मनुष्य देख सकता है।

लेकिन यदि उसी समुद्र को देखने के लिए एक चींटी को भेज दिया जाए, तो उसके लिए समुद्र “बेअंत” प्रतीत होगा।

चींटी की क्षमता सीमित है।

उसी प्रकार—

परमधाम और ब्रह्म तत्व हमारी वर्तमान भौतिक इन्द्रियों और उपकरणों की सीमा से परे हैं।


अध्याय 3 : गणित का अनंत (Infinity)

गणित हमें अनंत को समझने के दो तरीके सिखाता है।


पहला अनंत : विस्तार का अनंत

संख्या बढ़ाते जाइए—

1, 10, 100, 1000, 10000, लाख, करोड़, अरब, खरब…

फिर भी अंत नहीं आता।

उदाहरण

आकाश को देखिए।

आप लाखों-करोड़ों किलोमीटर आगे चले जाएँ—

फिर भी आकाश समाप्त नहीं होगा।

जहाँ तक हमारी दृष्टि जाती है, वह हमारी सीमा है।

उसके आगे भी विस्तार है।

यही है—

विस्तार का अनंत।


मुरली नोट

“ब्रह्म तत्व बहुत बड़ा, बेअंत है। साइंस वाले कितना भी प्रयास करें, अंत नहीं पा सकते।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)


दूसरा अनंत : संकुचन का अनंत

अब दूसरी दिशा में चलिए।

1 को 10 से भाग कीजिए।

फिर 100 से।

फिर 1000 से।

फिर लाख, करोड़, अरब, खरब से।

संख्या छोटी होती जाएगी।

और छोटी।

और छोटी।

और छोटी।

लेकिन शून्य तक कभी नहीं पहुँचेगी।

इसे कहते हैं—

संकुचन का अनंत।


अध्याय 4 : आत्मा, परमात्मा और ब्रह्मलोक क्यों अनंत हैं?

आज तक विज्ञान—

  • आत्मा को नहीं देख पाया।
  • परमात्मा को नहीं देख पाया।
  • ब्रह्मलोक को नहीं देख पाया।

हमारे सभी मापने वाले उपकरण यहाँ असफल हो जाते हैं।

इसलिए—

आत्मा, परमात्मा और ब्रह्मलोक को भी एक प्रकार से “अनंत” कहा जा सकता है।

लेकिन यह कौन सा अनंत है?

यह है—

सूक्ष्मता या संकुचन का अनंत।


उदाहरण : धूल के कण से भी सूक्ष्म

मुरली कहती है—

“आत्मा अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु है।”

कल्पना कीजिए—

यदि पूरी पृथ्वी एक स्टेडियम के समान हो, तब भी आत्मा धूल के कण से भी सूक्ष्म प्रतीत होगी।

लेकिन आश्चर्य यह है—

उसी सूक्ष्म आत्मा में—

  • मन
  • बुद्धि
  • संस्कार
  • अनेक जन्मों की स्मृतियाँ

संभावित रूप में विद्यमान रहती हैं।


अध्याय 5 : क्या परमधाम दूरी में है?

राजयोग कहता है—

परमधाम दूरी में नहीं है।

परमधाम सूक्ष्मता में है।

विज्ञान बाहर की यात्रा करता है।

राजयोग भीतर की यात्रा करता है।

विज्ञान पूछता है—

“आकाश कितना बड़ा है?”

राजयोग पूछता है—

“मैं कौन हूँ?”

“आत्मा क्या है?”

“परमात्मा कौन है?”


मुरली नोट

“देह को भूलो, मन को शांत करो, बुद्धि को सूक्ष्म बनाओ, आत्मा को पहचानो।”

जब बुद्धि सूक्ष्म बनती है, तब आत्मा स्वयं को पहचानती है और परमात्मा का अनुभव करती है।


अध्याय 6 : परमधाम में अरबों आत्माएँ कैसे रहती हैं?

बाबा कहते हैं—

“हम आत्माएँ बहुत थोड़ी जगह में रहती हैं।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)

क्यों?

क्योंकि वहाँ शरीर नहीं है।

स्थान शरीर घेरता है।

आत्मा नहीं।


उदाहरण

एक छोटी सी हार्ड डिस्क में—

  • हजारों पुस्तकें
  • लाखों चित्र
  • सैकड़ों वीडियो

संग्रहित हो सकते हैं।

जब जड़ तकनीक इतना कर सकती है—

तो चेतन आत्माएँ परमधाम में क्यों नहीं रह सकतीं?


अध्याय 7 : परमधाम में भोजन क्यों नहीं?

मुरली कहती है—

“वहाँ आत्मा अभोक्ता है।”

भोजन शरीर की आवश्यकता है।

आत्मा की नहीं।

परमधाम में—

  • शरीर नहीं
  • भूख नहीं
  • प्यास नहीं
  • कर्म नहीं

वहाँ आत्मा—

शांत,

डिस्क्लेमर:
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाए जाने वाले राजयोग एवं मुरली ज्ञान के आध्यात्मिक दृष्टिकोण को समझाने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें आत्मा, परमात्मा, परमधाम, ब्रह्म तत्व, अनंत (Infinity) तथा ब्रह्मांड से संबंधित विषयों को आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक उदाहरणों द्वारा सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह प्रस्तुति किसी धर्म, विज्ञान, वैज्ञानिक संस्था अथवा व्यक्ति विशेष की मान्यताओं का खंडन या समर्थन करने के लिए नहीं है। दर्शकों को स्वतंत्र चिंतन, अध्ययन एवं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर निष्कर्ष निकालने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

ब्रह्म तत्व : अनंत और परमधाम का रहस्य

(12 जून 2026 की साकार मुरली पर आधारित आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक चिंतन)

प्रस्तावना

आज की साकार मुरली में बाबा ने एक अत्यंत गहन बात कही—

“ब्रह्म तत्व बहुत बड़ा, बेअंत है। साइंस वाले कितना भी प्रयास करें, अंत नहीं पा सकते।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)

सदियों से मनुष्य यह प्रश्न पूछता आया है—

  • परमधाम कहाँ है?
  • क्या परमधाम ब्रह्मांड के किसी कोने में स्थित है?
  • क्या कभी कोई रॉकेट या दूरबीन वहाँ पहुँच सकती है?
  • ब्रह्म तत्व को “बेअंत” क्यों कहा गया?

राजयोग और मुरली ज्ञान इन प्रश्नों का एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक उत्तर प्रस्तुत करते हैं।


अध्याय 1 : परमधाम कहाँ है?

बाबा कहते हैं—

“परमधाम सूरज, चाँद, सितारों और आकाश से भी पार है।”

इसका अर्थ केवल भौतिक दूरी नहीं है।

यदि परमधाम किसी ग्रह या आकाशगंगा के पार स्थित कोई भौतिक स्थान होता, तो एक दिन विज्ञान वहाँ पहुँच सकता था।

लेकिन मुरली स्पष्ट करती है—

परमधाम कोई भौतिक ग्रह, तारा, गैलेक्सी या पदार्थ नहीं है।

वह चेतना का एक अत्यंत सूक्ष्म, निराकार और शांति से भरा हुआ आयाम है।


अध्याय 2 : “बेअंत” का वास्तविक अर्थ क्या है?

“बेअंत” का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म तत्व परमात्मा से भी बड़ा है।

“बेअंत” का अर्थ है—

जो मनुष्य की मापने, देखने और समझने की क्षमता से परे हो।

उदाहरण

समुद्र का किनारा मनुष्य देख सकता है।

लेकिन यदि उसी समुद्र को देखने के लिए एक चींटी को भेज दिया जाए, तो उसके लिए समुद्र “बेअंत” प्रतीत होगा।

चींटी की क्षमता सीमित है।

उसी प्रकार—

परमधाम और ब्रह्म तत्व हमारी वर्तमान भौतिक इन्द्रियों और उपकरणों की सीमा से परे हैं।


अध्याय 3 : गणित का अनंत (Infinity)

गणित हमें अनंत को समझने के दो तरीके सिखाता है।


पहला अनंत : विस्तार का अनंत

संख्या बढ़ाते जाइए—

1, 10, 100, 1000, 10000, लाख, करोड़, अरब, खरब…

फिर भी अंत नहीं आता।

उदाहरण

आकाश को देखिए।

आप लाखों-करोड़ों किलोमीटर आगे चले जाएँ—

फिर भी आकाश समाप्त नहीं होगा।

जहाँ तक हमारी दृष्टि जाती है, वह हमारी सीमा है।

उसके आगे भी विस्तार है।

यही है—

विस्तार का अनंत।


मुरली नोट

“ब्रह्म तत्व बहुत बड़ा, बेअंत है। साइंस वाले कितना भी प्रयास करें, अंत नहीं पा सकते।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)


दूसरा अनंत : संकुचन का अनंत

अब दूसरी दिशा में चलिए।

1 को 10 से भाग कीजिए।

फिर 100 से।

फिर 1000 से।

फिर लाख, करोड़, अरब, खरब से।

संख्या छोटी होती जाएगी।

और छोटी।

और छोटी।

और छोटी।

लेकिन शून्य तक कभी नहीं पहुँचेगी।

इसे कहते हैं—

संकुचन का अनंत।


अध्याय 4 : आत्मा, परमात्मा और ब्रह्मलोक क्यों अनंत हैं?

आज तक विज्ञान—

  • आत्मा को नहीं देख पाया।
  • परमात्मा को नहीं देख पाया।
  • ब्रह्मलोक को नहीं देख पाया।

हमारे सभी मापने वाले उपकरण यहाँ असफल हो जाते हैं।

इसलिए—

आत्मा, परमात्मा और ब्रह्मलोक को भी एक प्रकार से “अनंत” कहा जा सकता है।

लेकिन यह कौन सा अनंत है?

यह है—

सूक्ष्मता या संकुचन का अनंत।


उदाहरण : धूल के कण से भी सूक्ष्म

मुरली कहती है—

“आत्मा अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु है।”

कल्पना कीजिए—

यदि पूरी पृथ्वी एक स्टेडियम के समान हो, तब भी आत्मा धूल के कण से भी सूक्ष्म प्रतीत होगी।

लेकिन आश्चर्य यह है—

उसी सूक्ष्म आत्मा में—

  • मन
  • बुद्धि
  • संस्कार
  • अनेक जन्मों की स्मृतियाँ

संभावित रूप में विद्यमान रहती हैं।


अध्याय 5 : क्या परमधाम दूरी में है?

राजयोग कहता है—

परमधाम दूरी में नहीं है।

परमधाम सूक्ष्मता में है।

विज्ञान बाहर की यात्रा करता है।

राजयोग भीतर की यात्रा करता है।

विज्ञान पूछता है—

“आकाश कितना बड़ा है?”

राजयोग पूछता है—

“मैं कौन हूँ?”

“आत्मा क्या है?”

“परमात्मा कौन है?”


मुरली नोट

“देह को भूलो, मन को शांत करो, बुद्धि को सूक्ष्म बनाओ, आत्मा को पहचानो।”

जब बुद्धि सूक्ष्म बनती है, तब आत्मा स्वयं को पहचानती है और परमात्मा का अनुभव करती है।


अध्याय 6 : परमधाम में अरबों आत्माएँ कैसे रहती हैं?

बाबा कहते हैं—

“हम आत्माएँ बहुत थोड़ी जगह में रहती हैं।”
(साकार मुरली, 12 जून 2026)

क्यों?

क्योंकि वहाँ शरीर नहीं है।

स्थान शरीर घेरता है।

आत्मा नहीं।


उदाहरण

एक छोटी सी हार्ड डिस्क में—

  • हजारों पुस्तकें
  • लाखों चित्र
  • सैकड़ों वीडियो

संग्रहित हो सकते हैं।

जब जड़ तकनीक इतना कर सकती है—

तो चेतन आत्माएँ परमधाम में क्यों नहीं रह सकतीं?


अध्याय 7 : परमधाम में भोजन क्यों नहीं?

मुरली कहती है—

“वहाँ आत्मा अभोक्ता है।”

भोजन शरीर की आवश्यकता है।

आत्मा की नहीं।

परमधाम में—

  • शरीर नहीं
  • भूख नहीं
  • प्यास नहीं
  • कर्म नहीं

वहाँ आत्मा—

शांत,
निराकारी,
स्थिर अवस्था में रहती है।


निष्कर्ष

गणित का अनंत हमें बताता है कि कुछ वस्तुएँ हमारी मापने की क्षमता से परे होती हैं।

मुरली ज्ञान हमें बताता है—

  • ब्रह्म तत्व बेअंत है।
  • ब्रह्मांड का विस्तार मनुष्य की पकड़ से बाहर है।
  • परमधाम दूरी से नहीं, सूक्ष्मता से प्राप्त होता है।
  • विज्ञान बाहर की अनंतता खोज रहा है।
  • राजयोग भीतर की अनंत सूक्ष्मता का अनुभव कराता है।

यही मुरली का गुप्त आध्यात्मिक विज्ञान है।

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