Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 18-06-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने के लिए सदा इसी स्मृति में रहो कि हम किसके बच्चे हैं, अगर बाप को भूले तो सुख गुम हो जायेगा” | |
| प्रश्नः- | बाप के मिलने की स्थाई खुशी किन बच्चों को रहती है? |
| उत्तर:- | जिन बच्चों ने एक से अपने सर्व सम्बन्ध जोड़े हैं, जो एक बाप की याद में रहने की ही मेहनत करते हैं, किसी देहधारी को याद नहीं करते उन्हें ही स्थाई खुशी रहती है। अगर देहधारी की याद है तो बहुत रोना पड़ेगा। विश्व का मालिक बनने वाले कभी रोते नहीं। |
| गीत:- | बचपन के दिन भुला न देना…….. |
ओम् शान्ति। बाप कहते हैं मीठे बच्चों – हम बेहद के बाप के बच्चे हैं, यह भूलो मत। यह भूले तो अपने को रुला देंगे। छी-छी दुनिया में बुद्धि चली जायेगी। बाप की याद रहने से अतीन्द्रिय सुख भासता है। वह सुख, बाप को भूल जाने से गुम हो जायेगा। हरदम याद रहना चाहिये कि हम बाबा के बच्चे हैं, नहीं तो अपने को रुला देंगे। सब भगवान के बच्चे हैं, सब कहते हैं हे बाबा, हे परम पिता परमात्मा रक्षा करो। परन्तु बाप से रक्षा कब होती है – यह किसको भी पता नहीं है। साधू-सन्त आदि कोई भी नहीं जानते कि बाप से हमको मुक्ति-जीवनमुक्ति कब मिलनी है क्योंकि भगवान को ही कण-कण में कह दिया है। अब तुम बच्चे बेहद के बाप को जान गये हो। मोस्ट बील्वेड बाप है, उससे प्यारी वस्तु और कोई होती नहीं। ऐसे बाप को न जानना बड़ी भारी भूल है। शिव जयन्ती क्यों मनाते हैं, वह कौन है? यह भी कोई नहीं जानते। बाप कहते हैं तुम कितने बेसमझ बन गये हो। माया रावण ने तुमको क्या बना दिया है! अभी तुम बच्चे जानते हो यह हमारी जन्म भूमि है। मैं हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आता हूँ। वह फिर कह देते 40 हज़ार वर्ष बाद जब यह कलियुग पूरा होगा तब आयेंगे। चित्र भी दिखाया जाता है त्रिमूर्ति का। त्रिमूर्ति मार्ग नाम भी रखा है परन्तु तीन मूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को कोई नहीं जानते। ब्रह्मा क्या करके गया? विष्णु और शंकर क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं, कुछ भी नहीं जानते। बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। बाप है रचयिता। उनकी यह कितनी बड़ी रचना है। कितना बेहद का नाटक है। इसमें बेहद के मनुष्य रहते हैं। आज से 5 हज़ार वर्ष पहले जब सतयुग था, भारत में जब इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो और कोई राज्य नहीं था। भगवती श्री लक्ष्मी, भगवान श्री नारायण को कहा जाता है। राम-सीता को भी भगवान राम, भगवती सीता कहते हैं। अब यह भगवान नारायण, भगवती लक्ष्मी कहाँ से आये? राज्य करके गये हैं। परन्तु उनकी जीवन कहानी तो एक भी नहीं जानते। सिर्फ गाते रहते हैं हे भगवान दु:ख हर्ता सुख कर्ता। परन्तु यह किसकी बुद्धि में नहीं आता – वह दु:ख हर्ता, सुख कर्ता कैसे है। कौन-सा सुख सबको दिया? और कब सबका दु:ख हरा? कुछ भी नहीं जानते।
तुम बच्चे अभी यहाँ राजयोग सीख रहे हो – भगवती लक्ष्मी, भगवान नारायण बनने के लिए। जानते हैं भगवती सीता, भगवान राम भी बनने का है। 8 जन्म सतयुग में पूरे करके फिर राम-सीता के राज्य में आने वाले हैं। 21 जन्म के लिए बेहद की राजाई तुम यहाँ स्थापन कर रहे हो। तुम भगवती भगवान स्वर्ग के मालिक बन रहे हो। स्वर्ग कोई आसमान में नहीं है। यह भी किसको पता नहीं है। बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि हैं। कहते हैं फलाना स्वर्ग पधारा। परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। अच्छा क्या क्रिश्चियन, बौद्धी सब हेविन में जायेंगे? वह बाद में आकर अपना धर्म स्थापन करते हैं। तो फिर वह स्वर्ग में कैसे आ सकते? स्वर्ग किसको कहा जाता, यह भी उनको पता नहीं है। संन्यासी लोग कहते ज्योति ज्योत समाया। कोई फिर कहते निर्वाणधाम गया। निर्वाण भी तो लोक है ना। वह तो निवास स्थान है। ज्योति ज्योत में लीन होने की बात ही नहीं। ज्योति में मिल जाए तो फिर तो आत्मा ही खत्म हो जाए। खेल ही खत्म हो जाता है। इस ड्रामा से कोई भी आत्मा छूट नहीं सकती। कोई भी मोक्ष को पा नहीं सकते। गीत का अर्थ भी कोई समझते नहीं हैं। न जीवनमुक्ति का अर्थ समझते हैं, न आत्मा-परमात्मा का अर्थ समझते हैं।
बाप कहते हैं – तुम्हारी शक्ल तो मनुष्य की है, जो इन देवताओं की भी थी। सतयुग आदि में देवतायें थे। उन्हों का 2500 वर्ष राज्य चला। बाकी 2500 वर्ष की बात है, जिसमें और सब धर्म आते हैं। 5 हज़ार वर्ष के बदले मनुष्य कह देते लाखों वर्ष कल्प वृक्ष की आयु है। परन्तु तुम्हारी बात समझने के लिए भी नहीं आयेंगे। हाँ, आयेंगे भी वही, जिन्होंने कल्प पहले आकर समझा होगा। पहले तो समझाना है – एक है हद का संन्यास, जो संन्यासी लोग घरबार छोड़ जाए जंगल में रहते हैं, पहले-पहले वह सतोप्रधान थे। फिर अब तमोप्रधान बने हैं तो जंगलों से लौटकर आए बड़े-बड़े महल बनाये हैं। इन संन्यासियों ने भी पवित्रता के आधार पर भारत को थमाया जरूर है। भारत की सेवा की है। यह संन्यास धर्म नहीं होता तो भारत एकदम विकारों में जल मरता, पतित बन जाता। यह भी ड्रामा बना हुआ है। उन्हों में पहले पवित्रता की ताकत थी, जिससे भारत को थमाया है। इन देवताओं का जब राज्य था तो भारत कितना साहूकार था। इन्हों के इतने बड़े-बड़े हीरे-जवाहरों के महल थे। वह सब कहाँ गये? सब नीचे चले गये। लंका और द्वारिका के लिए कहते हैं – समुद्र के नीचे चली गई। अभी तो है नहीं। सोने के महल आदि सब थे ना। जब मन्दिरों आदि में हीरे-जवाहरात लगा सकते हैं, तो वहाँ क्या नहीं होगा! कितनी तुम बच्चों को खुशी होनी चाहिए। बाबा फिर से आया हुआ है। कहते हैं बाप को याद करो। याद एक को ही करना है, जिससे विकर्म विनाश होते हैं। परन्तु वह भूल जाते हैं और देहधारी की याद आ जाती है। देहधारी की याद से तो कुछ भी फायदा नहीं। बाप कहते हैं – मामेकम् याद करो। किसी भी देहधारी को याद नहीं करो। अम्मा मरे तो भी हलुआ खाना…. एक बाप की याद से ही कमाई है। हम शिवबाबा के बच्चे हैं, उनसे वर्सा लेना है। इस समय बाप को याद नहीं किया तो फिर बहुत पछताना पड़ेगा, रोना पड़ेगा। विश्व के मालिक बनने वालों को रोने की क्या दरकार है। तुम बाप को भूलते हो तब ही माया थप्पड़ लगाती है इसलिए बाबा बार-बार समझाते हैं कि बाप को और वर्से को याद करो। अमरनाथ ने अमरपुरी में एक पार्वती को तो बैठ अमरकथा नहीं सुनाई होगी। जरूर बहुत होंगे। जो भी मनुष्य मात्र हैं सबको बाप समझाते हैं कि अब पतित मत बनो, यह अन्तिम जन्म पवित्र बनो। वहाँ स्वर्ग में कोई विकार नहीं होते। अगर वहाँ भी विकार होता तो फिर स्वर्ग और नर्क में फर्क क्या हुआ? देवी-देवताओं की महिमा गाते हैं – सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण… हैं। भगवान आकर भगवान-भगवती ही बनायेंगे, सिवाए भगवान के कोई बना न सके। भगवान तो एक ही है। गाया भी जाता है – भगवान-भगवती की राजधानी। यथा राजा-रानी तथा प्रजा भी वही होगी। परन्तु भगवान-भगवती कहा नहीं जाता इसलिए कहा जाता है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। यह किसको पता नहीं है। इनकी (ब्रह्मा की) आत्मा को भी बाप समझाते हैं। एक बाप की, एक दादा की – दो आत्मायें हैं ना। एक आत्मा 84 जन्म लेती है, दूसरी आत्मा पुनर्जन्म रहित है। बाप कभी पुनर्जन्म नहीं लेते हैं। एक ही बार आकर सारे विश्व को पवित्र बनाने के लिए हमको राजयोग सिखाते हैं। बाप तुमको समझाते हैं – मैंने इनमें प्रवेश किया है। यह 84 जन्म भोग आये हैं। अब इनके बहुत जन्मों का यह अन्तिम जन्म है। अब मैं निराकार हूँ तो कैसे आकर बच्चों को राजयोग सिखलाऊं? प्रेरणा से तो कुछ हो न सके। श्रीकृष्ण भगवानुवाच तो हो न सके। वह कैसे आ सकता है? वह तो है ही सतयुग का प्रिन्स, 16 कला सम्पूर्ण… फिर त्रेता में होते हैं 14 कला सम्पूर्ण, फिर द्वापर में श्रीकृष्ण को क्यों ले गये हैं? उनको तो पहले आना चाहिए। बाप समझाते हैं – पहले, बाप को याद करो। नहीं तो माया एकदम थप्पड़ मार देगी। छुईमुई का एक झाड़ होता है। हाथ लगाओ तो मुरझा जाये। तुम्हारा भी ऐसा ही हाल होता है, बाप को याद नहीं किया और खलास। गीत में भी सुना – बचपन के दिन भुला नहीं देना। बाप को भूले तो कहाँ न कहाँ चोट लग जायेगी। बाप कहते हैं – तुम हमारे बच्चे हो ना। यह शरीर तो विष से पैदा हुआ है। वह इनके लौकिक माँ-बाप हैं। यह तो है पारलौकिक बाप और इनको फिर अलौकिक बाप कहा जाता है। यह हद का था, फिर बेहद का बन गया। अभी देखो यह लौकिक बच्ची (निर्मल-शान्ता) बैठी है। यह लौकिक भी है, अलौकिक भी है, पारलौकिक भी है। बाकी शिवबाबा के तो भाई-बहिन है नहीं। न लौकिक, न अलौकिक, न पारलौकिक। कितना फ़र्क है। एक बाप का बनना मासी का घर नहीं है। ऐसे बाप से सम्बन्ध जोड़ना है, टाइम लगता है। शिवबाबा की याद में रहना बड़ी मेहनत है। कई 50 वर्ष से रहने वाले भी सारा दिन शिवबाबा को याद भी नहीं करते, ऐसे भी हैं। और सबको भूल एक को याद करना बहुत-बहुत मेहनत है। कोई 1 परसेन्ट याद करते हैं, कोई 2 परसेन्ट, कोई 1/2 परसेन्ट भी मुश्किल याद करते हैं। यह बड़ी भारी मंजिल है। तो बाप समझाते हैं – बचपन को नहीं भूलना। बाप से स्वर्ग का वर्सा मिलता है। तुम जानते हो हम जीते जी मरकर बाप के आकर बने हैं – नई दुनिया में जाने के लिए। तो तुम्हें स्थाई खुशी रहनी चाहिए, ओहो! हम डबल सिरताज बनेंगे! मनुष्य थोड़ेही जानते हैं कि सतयुग में इन देवताओं को 16 कला सम्पूर्ण और 14 कला सम्पूर्ण क्यों कहते हैं? कुछ भी नहीं जानते हैं। यह भक्ति मार्ग के शास्त्र आदि फिर भी बनेंगे। यह हठयोग, तीर्थ यात्रा आदि सब फिर भी होंगे। परन्तु इससे क्या होगा? क्या हेविन में जायेंगे? नहीं, बहुत रिद्धि-सिद्धि से काम करते हैं। रिद्धि-सिद्धि वाले बहुत हैं। हज़ारों मनुष्य उनके पिछाड़ी पड़ते रहते हैं। रिद्धि-सिद्धि से बहुत घड़ियाँ आदि चीज़ें निकालते हैं। यह थोड़ेही समझते कि यह अल्पकाल के लिए सब हैं। इसमें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। यह रिद्धि-सिद्धि आदि सीखने की भी किताब होती है। कितने लाखों मनुष्य उनके पिछाड़ी पड़ते हैं। तुम बच्चे जानते हो हमको बाबा से स्वर्ग का वर्सा मिलता है। इन आंखों से जो कुछ देखते हो वह नहीं रहेगा। बाप समझाते हैं – तुम अशरीरी आये थे फिर शरीर साथ पार्ट बजाया। अगर 84 लाख का हिसाब-किताब बतायें तो 12 मास लग जायें। हो ही नहीं सकता। 84 जन्मों का हिसाब-किताब बताना तो बिल्कुल सहज है। तुम 84 का चक्र लगाते रहते हो। सूर्यवंशी हैं तो चन्द्रवंशी नहीं। सूर्यवंशी घराना पूरा हुआ फिर चन्द्रवंशी…. बनें।
अभी तुम जानते हो हम हैं ब्राह्मण वंशी फिर देवता वंशी बनना है, इसलिए हम पढ़ाई पढ़ रहे हैं। फिर सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते वैश्य, शूद्र वंशी बनेंगे। अभी अपने 84 जन्मों की स्मृति आई है। यह चक्र भी याद करना पड़े। बाप को याद करने से एवर हेल्दी, एवर वेल्दी बनेंगे। पाप कट जायेंगे। चक्र को जानने से चक्रवर्ती बन जायेंगे। तुम जानते हो यह पुरानी दुनिया कब्रिस्तान बननी है। कुछ भी नहीं रहेगा। खत्म हो जायेगा। राम गयो, रावण गयो…. राम का कितना छोटा परिवार होगा सतयुग में। अभी रावण का कितना बड़ा परिवार है। बच्चे जानते हैं कि यह राजधानी स्थापन हो रही है। हर बात में पुरुषार्थ फर्स्ट है। बाप पुरुषार्थ कराते हैं – बच्चे मुझे याद करो। जिस बाप से अथाह स्वर्ग की बादशाही मिलती है, क्या उनको याद नहीं करेंगे? बाप स्मृति दिलाते हैं कि तुम स्वर्ग के मालिक थे। अब फिर से पुरुषार्थ कर स्वर्ग के मालिक बनो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कभी भी किसी बात में छुई-मुई नहीं बनना है। ईश्वरीय बचपन को भूल मुरझाना नहीं है। इन आंखों से जो कुछ दिखाई देता है, उसे देखते भी नहीं देखना है।
2) एक बाप की याद में ही कमाई है इसलिए देहधारियों को याद कर रोना नहीं है। बाप और वर्से को याद कर विश्व की बादशाही लेनी है।
| वरदान:- | श्रेष्ठ मत के आधार पर मायावी संगदोष से परे रहने वाले शक्ति स्वरूप भव बच्चों की एक कम्पलेन रहती है कि सम्बन्धी नहीं सुनते, संग अच्छा नहीं है, इस कारण शक्तिशाली नहीं बन सकते। लेकिन श्रेष्ठ मत के आधार पर ज्ञान स्वरूप, शक्ति स्वरूप के वरदानी बन अपनी स्थिति को अचल बनाओ। साक्षी होकर हर एक का पार्ट देखो। अपने सतोगुणी पार्ट में स्थित रहो। सदा बाप के संग में रहो तो तमोगुणी आत्मा के संग के रंग का प्रभाव पड़ नहीं सकता। |
| स्लोगन:- | कर्मयोगी वह है जो कर्म के कल्प वृक्ष की डाली पर बैठ कर्म करते भी उपराम स्थिति में रहे। |
ये अव्यक्त इशारे – सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।
जैसे काई की विशेष नेचर होती है, उस नेचर के वश न चाहते भी चलते रहते हैं। कहते हैं चाहती नहीं हूँ लेकिन मेरी यह नेचर है। ऐसे आप बच्चों की सरल नेचर हो जो सबको अनुभव हो कि यह सहज योगी, स्वत: योगी हैं। क्या करूँ, कैसे योग लगाऊं .. यह बातें खत्म। हैं ही सदा सहयोगी अर्थात् योगी। इसी एक बात को नेचर और नैचुरल करने से सभी सबजेक्ट में परफेक्ट हो जायेंगे।
एक बाप की याद, स्थाई खुशी और स्वर्ग के वर्से की प्राप्ति
(मधुबन मुरली आधारित प्रश्नोत्तर)
प्रश्न 1: अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने की सबसे बड़ी विधि क्या है?
उत्तर:
सदा इस स्मृति में रहना कि हम बेहद के बाप, परमपिता शिवबाबा के बच्चे हैं। जब आत्मा अपने ईश्वरीय जन्म को याद रखती है, तब अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होता है। जैसे ही बाप की स्मृति टूटती है, सुख भी गुम हो जाता है।
मुरली महावाक्य:
“हम बेहद के बाप के बच्चे हैं, यह भूलो मत। बाप की याद रहने से अतीन्द्रिय सुख भासता है।”
प्रश्न 2: बाप के मिलने की स्थाई खुशी किन बच्चों को रहती है?
उत्तर:
स्थाई खुशी उन्हीं बच्चों को रहती है जिन्होंने अपने सभी सम्बन्ध एक बाप से जोड़ लिये हैं और जो केवल शिवबाबा की याद में रहने की मेहनत करते हैं। जो देहधारियों में आसक्त रहते हैं, उन्हें दुःख और रोना अनुभव करना पड़ता है।
मुरली महावाक्य:
“अगर देहधारी की याद है तो बहुत रोना पड़ेगा। विश्व का मालिक बनने वाले कभी रोते नहीं।”
प्रश्न 3: बाप को भूलने से आत्मा को क्या नुकसान होता है?
उत्तर:
बाप को भूलते ही बुद्धि पुरानी दुनिया की ओर चली जाती है। माया आत्मा को दुःख, चिंता और अशान्ति में ले आती है। आत्मा अपने वास्तविक सुख और शक्ति से दूर हो जाती है।
उदाहरण:
जैसे मोबाइल चार्जर से अलग होते ही धीरे-धीरे डिस्चार्ज हो जाता है, वैसे ही आत्मा बाप की याद से दूर होते ही आध्यात्मिक शक्ति खोने लगती है।
प्रश्न 4: संसार में लोग परमात्मा को क्यों नहीं पहचान पाते?
उत्तर:
क्योंकि लोगों ने भगवान को सर्वव्यापी या कण-कण में मान लिया है। इसलिए वे यह नहीं जानते कि परमात्मा कब आते हैं, क्यों आते हैं और कैसे मुक्ति-जीवनमुक्ति देते हैं।
मुरली महावाक्य:
“ऐसे बाप को न जानना बड़ी भारी भूल है।”
प्रश्न 5: परमात्मा इस समय हमें क्या सिखाने आये हैं?
उत्तर:
परमात्मा हमें राजयोग सिखाने आये हैं ताकि हम पुनः भगवती लक्ष्मी और भगवान नारायण जैसे स्वर्ग के मालिक बन सकें।
मुरली महावाक्य:
“तुम बच्चे यहाँ राजयोग सीख रहे हो – भगवती लक्ष्मी, भगवान नारायण बनने के लिए।”
प्रश्न 6: स्वर्ग क्या है?
उत्तर:
स्वर्ग कोई आकाश में स्थित स्थान नहीं है। स्वर्ग इस पृथ्वी पर स्थापित होने वाली दैवी, पवित्र और सुखमय दुनिया है, जहाँ विकार, दुःख और अशान्ति नहीं होते।
प्रश्न 7: मोक्ष या आत्मा का परमात्मा में लीन हो जाना क्यों असंभव है?
उत्तर:
आत्मा अविनाशी है और यह विश्व एक अनादि-अनन्त नाटक है। कोई भी आत्मा इस ड्रामा से बाहर नहीं जा सकती।
मुरली महावाक्य:
“इस ड्रामा से कोई भी आत्मा छूट नहीं सकती। कोई भी मोक्ष को पा नहीं सकते।”
प्रश्न 8: विकर्मों का विनाश किससे होता है?
उत्तर:
विकर्मों का विनाश केवल एक बाप की याद से होता है। किसी देहधारी को याद करने से कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं होता।
मुरली महावाक्य:
“मामेकम् याद करो। किसी भी देहधारी को याद नहीं करो।”
प्रश्न 9: देहधारियों की याद दुःख का कारण क्यों बनती है?
उत्तर:
क्योंकि देहधारी परिवर्तनशील हैं। उनसे आसक्ति दुःख, अपेक्षाएँ और निराशाएँ उत्पन्न करती है। लेकिन परमात्मा से सम्बन्ध आत्मा को स्थाई सुख और सुरक्षा प्रदान करता है।
उदाहरण:
जैसे पेड़ की सूखी शाखा का सहारा लेने वाला गिर जाता है, वैसे ही नश्वर सम्बन्धों पर अत्यधिक निर्भर व्यक्ति दुःखी हो जाता है।
प्रश्न 10: “अम्मा मरे तो भी हलुआ खाना” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
इसका अर्थ संवेदनहीन बनना नहीं है। इसका भाव है कि किसी भी परिस्थिति में बाप की याद और आत्मिक स्थिति को नहीं छोड़ना चाहिए। आत्मा को परिस्थिति से ऊपर रहकर ईश्वरीय स्मृति में स्थित रहना है।
प्रश्न 11: शिवबाबा की याद में रहना बड़ी मेहनत क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि अनेक जन्मों से आत्मा देह, व्यक्तियों और वस्तुओं को याद करने की अभ्यासी बन चुकी है। अब सबको भूलकर केवल एक परमात्मा को याद करना पुरानी आदत बदलने जैसा है।
मुरली महावाक्य:
“और सबको भूल एक को याद करना बहुत-बहुत मेहनत है।”
प्रश्न 12: हमें स्थाई खुशी क्यों रहनी चाहिए?
उत्तर:
क्योंकि हम परमात्मा के बने हैं और पुनः स्वर्ग के डबल सिरताज बनने जा रहे हैं। यह ईश्वरीय भाग्य ही आत्मा की स्थाई खुशी का आधार है।
मुरली महावाक्य:
“ओहो! हम डबल सिरताज बनेंगे!”
प्रश्न 13: बाप को याद करने से आत्मा को क्या-क्या प्राप्त होता है?
उत्तर:
बाप को याद करने से—
✔ विकर्म विनाश होते हैं।
✔ आत्मा एवर हेल्दी और एवर वेल्दी बनती है।
✔ स्वर्ग की बादशाही प्राप्त होती है।
✔ मन को शान्ति और स्थाई सुख मिलता है।
✔ आत्मा विश्व का मालिक बनने योग्य बनती है।
प्रश्न 14: 84 जन्मों के चक्र को जानने का क्या लाभ है?
उत्तर:
84 जन्मों के चक्र को जानने से आत्मा अपनी वास्तविक पहचान और भूमिका को समझती है तथा चक्रवर्ती राजा बनने की योग्यता प्राप्त करती है।
मुरली महावाक्य:
“चक्र को जानने से चक्रवर्ती बन जायेंगे।”
प्रश्न 15: “छुई-मुई” नहीं बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
छोटी-छोटी बातों में दुखी, निराश या मुरझा जाने वाला स्वभाव छुई-मुई स्वभाव है। ईश्वरीय बच्चे को परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
धारणा:
“ईश्वरीय बचपन को भूल मुरझाना नहीं है।”
प्रश्न 16: मायावी संगदोष से बचने की विधि क्या है?
उत्तर:
श्रेष्ठ मत पर चलकर, साक्षी भाव में रहकर और सदा बाप के संग में रहने से आत्मा संगदोष के प्रभाव से बची रहती है।
वरदान:
“श्रेष्ठ मत के आधार पर मायावी संगदोष से परे रहने वाले शक्ति स्वरूप भव।”
प्रश्न 17: कर्मयोगी किसे कहा जाता है?
उत्तर:
जो आत्मा कर्म करते हुए भी उपराम, साक्षी और बाप की याद में रहती है, वही कर्मयोगी है।
स्लोगन:
“कर्मयोगी वह है जो कर्म के कल्प वृक्ष की डाली पर बैठ कर्म करते भी उपराम स्थिति में रहे।”
प्रश्न 18: सहजयोगी बनने का रहस्य क्या है?
उत्तर:
अपनी नेचर को सरल, सहनशील और सहयोगी बनाना। जब योग प्रयास नहीं बल्कि स्वभाव बन जाता है, तब आत्मा सहजयोगी बन जाती है।
अव्यक्त इशारा:
“सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।”
अंतिम निष्कर्ष
अतीन्द्रिय सुख का रहस्य किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि इन बातों में छिपा है—
✔ सदा याद रखना कि हम बेहद के बाप के बच्चे हैं।
✔ एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ना।
✔ देहधारियों में आसक्ति न रखना।
✔ बाप और वर्से की स्मृति में रहना।
✔ परिस्थितियों में छुई-मुई न बनना।
✔ सरल, सहनशील और सहजयोगी स्वभाव बनाना।
✔ बाप की याद से विकर्मों को समाप्त कर स्वर्ग की बादशाही प्राप्त करना।
तभी आत्मा सच्चे अर्थ में अतीन्द्रिय सुख, स्थाई खुशी और विश्व की बादशाही की अधिकारी बनती है।
Disclaimer (डिस्क्लेमर): यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की साकार मुरली एवं अव्यक्त महावाक्यों के अध्ययन, मनन और आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागरूकता, सकारात्मक जीवन-दृष्टि तथा आत्म-परिवर्तन की प्रेरणा देना है। प्रस्तुत व्याख्याएँ आध्यात्मिक अध्ययन को सरल एवं व्यवहारिक रूप में समझाने के लिए दी गई हैं। यह सामग्री किसी व्यक्ति, धर्म, सम्प्रदाय या मान्यता की आलोचना हेतु नहीं है।
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