RAJYOG(1-3)-क्या आपका योग केवल अभ्यास है या परमात्म संबंध का जीवित अनुभव?
अध्याय : क्या मेरा योग केवल अभ्यास है या परमात्म संबंध का जीवित अनुभव है?
राजयोग – अभ्यास से अनुभव की ओर
भूमिका
आज का मनुष्य बाहरी रूप से जितना व्यस्त दिखाई देता है, भीतर से उतना ही खाली अनुभव करता है। जीवन में तनाव, चिंता, असंतोष और अशांति बढ़ती जा रही है। अनेक लोग नियमित रूप से राजयोग का अभ्यास भी करते हैं, फिर भी मन में प्रश्न रहता है—“मैं योग तो करता हूँ, लेकिन वह गहरी शांति और आनंद क्यों अनुभव नहीं होता जिसकी मुरलियों में बात कही जाती है?”
इसका कारण यह है कि बहुत बार हमारा योग केवल अभ्यास (Practice) बनकर रह जाता है, जबकि राजयोग का वास्तविक लक्ष्य परमात्म संबंध का जीवित अनुभव (Living Relationship with God) है।
जब तक योग केवल बैठने की क्रिया है, तब तक परिवर्तन सीमित रहता है। लेकिन जब योग जीवन बन जाता है, तब आत्मा का प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक संबंध परमात्म स्मृति से भर जाता है।
1. योग का उद्देश्य केवल बैठना नहीं, अनुभव करना है
यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन दो घंटे योग करे, लेकिन पूरे दिन क्रोध, चिंता, तनाव और अशांति में रहे, तो वह योग केवल अभ्यास है।
लेकिन यदि थोड़े समय के योग के बाद भी पूरा दिन मन हल्का, बुद्धि स्थिर, हृदय प्रेम से भरपूर और कर्म सहज हो जाएँ, तब समझना चाहिए कि आत्मा ने परमात्म संबंध का अनुभव करना शुरू कर दिया है।
इसीलिए योग का लक्ष्य केवल समय देना नहीं, बल्कि परमात्मा का साथ अनुभव करना है।
साकार मुरली महावाक्य
“मामेकम् याद करो।”
अर्थात एक परमात्मा की स्मृति में रहो। केवल याद करने का प्रयास नहीं, बल्कि स्मृति को जीवन बना लो।
2. जीवित अनुभव क्या होता है?
जीवित अनुभव का अर्थ है कि परमात्मा केवल ज्ञान का विषय न रहें, बल्कि जीवन का साथी बन जाएँ।
ऐसी आत्मा हर परिस्थिति में अनुभव करती है—
- बाबा मेरे साथ हैं।
- मैं अकेला नहीं हूँ।
- मुझे निर्णय लेने में उनकी शक्ति मिल रही है।
- मेरा मन शांत है।
- मेरा हृदय प्रेम से भरा हुआ है।
फिर योग किसी विशेष समय तक सीमित नहीं रहता।
योग जीवन बन जाता है।
जैसे कोई बच्चा अपने पिता के साथ चलते समय सुरक्षित अनुभव करता है, उसी प्रकार राजयोगी आत्मा हर परिस्थिति में परमात्मा का साथ अनुभव करती है।
3. राजयोग का वास्तविक अर्थ
अनेक लोग समझते हैं कि राजयोग का अर्थ है—
- आँखें बंद करना
- विचार रोकना
- एकाग्रता करना
- ध्यान लगाना
लेकिन सहज राजयोग इससे कहीं अधिक गहरा है।
राज अर्थात श्रेष्ठ, सर्वोच्च, आत्म-स्वराज्य।
योग अर्थात संबंध, कनेक्शन, याद और मिलन।
इस प्रकार राजयोग का अर्थ है—
आत्मा का परमात्मा के साथ श्रेष्ठ संबंध।
जब मन, बुद्धि और संस्कार तीनों श्रीमत पर चलने लगते हैं, तब आत्मा अपने ऊपर राज्य करने लगती है।
यही स्वराज्य है।
मुरली महावाक्य (साकार)
“मन, बुद्धि और संस्कार को श्रीमत पर चलाओ।”
यही वास्तविक राजयोग है।
4. राजयोग कल्पना नहीं, चेतन जागृति है
आज अनेक लोग योग करते समय कल्पना करते हैं—
- परमधाम कैसा होगा?
- देवता कैसे होंगे?
- स्वर्ग कैसा होगा?
कुछ लोग मानसिक चित्र (Visualization) बनाते हैं।
कुछ लोग केवल मानसिक व्यायाम करते हैं।
लेकिन सहज राजयोग इन सबसे आगे है।
राजयोग का आधार कल्पना नहीं, आत्म-जागृति है।
जब आत्मा अनुभव करती है—
मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।
और
परमात्मा मेरे पिता हैं।
तब भीतर स्वतः संबंध अनुभव होने लगता है।
यह अनुभव किसी कल्पना से नहीं, बल्कि चेतना की जागृति से होता है।
5. याद करना और याद में रहना
राजयोग का सबसे बड़ा रहस्य इसी अंतर में छिपा है।
याद करना
कुछ समय प्रयास करना।
फिर संसार में आकर भूल जाना।
याद में रहना
संबंध की निरंतर अनुभूति।
याद करने में मेहनत होती है।
याद में रहने में प्रेम होता है।
याद करने में प्रयास होता है।
याद में रहने में सहजता होती है।
इसीलिए बाबा बार-बार कहते हैं—
मुरली महावाक्य
“स्मृति स्वरूप बनो।”
स्मृति स्वरूप अर्थात ऐसा नहीं कि कभी याद हो और कभी भूल जाएँ, बल्कि स्मृति ही स्वभाव बन जाए।
6. योग जीवन बनना चाहिए
यदि कोई व्यक्ति प्रातः चार बजे उठकर दो घंटे योग करे, लेकिन उसके बाद पूरे दिन क्रोध, शिकायत, ईर्ष्या और तनाव में रहे, तो योग का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।
सहज राजयोग सिखाता है—
योग को जीवन बनाओ।
चलते-फिरते…
बोलते हुए…
सेवा करते हुए…
कार्यालय में…
परिवार में…
हर परिस्थिति में परमात्म स्मृति बनी रहे।
यही सहज राजयोग है।
7. क्या राजयोग बाहरी साधनों पर निर्भर है?
आज बहुत लोग योग करते समय—
- संगीत
- गाइडेड कमेंट्री
- विशेष कमरा
- लाल प्रकाश
- मानसिक चित्र
इनका सहारा लेते हैं।
ये प्रारम्भिक अभ्यास में सहायक हो सकते हैं।
लेकिन यदि आत्मा पूरी तरह इन्हीं पर निर्भर हो जाए, तो निरंतर स्मृति कठिन हो जाती है।
क्यों?
क्योंकि अंतिम समय में—
न संगीत होगा…
न कमेंट्री…
न विशेष वातावरण…
तब केवल आत्मा की स्थिति और परमात्मा का संबंध साथ होगा।
इसीलिए बाबा भीतर की जागृति विकसित करने की प्रेरणा देते हैं।
8. सहज राजयोग कैसे अनुभव करें?
कुछ क्षण शांत बैठिए।
स्वयं को भृकुटि के मध्य ज्योति-बिंदु आत्मा अनुभव कीजिए।
अब अनुभव करें—
मैं आत्मा हूँ…
मैं शांति स्वरूप हूँ…
अब शांति के परमधाम में ज्योति-बिंदु शिवबाबा को स्मरण करें।
धीरे-धीरे अनुभव करें—
बाबा मेरे हैं।
मैं बाबा का हूँ।
अब अनुभव करें—
उनसे शांति की किरणें मिल रही हैं।
प्रेम मिल रहा है।
शक्ति मिल रही है।
कुछ क्षण केवल अनुभव कीजिए।
यही जीवित संबंध है।
उदाहरण
मान लीजिए मोबाइल पूरी तरह चार्ज हो गया।
यदि चार्जर निकाल दिया जाए और फिर पूरे दिन मोबाइल का उपयोग किया जाए, तो बैटरी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
इसी प्रकार यदि योग केवल सुबह तक सीमित है, तो दिनभर परिस्थितियाँ आत्मा की शक्ति कम करती रहती हैं।
लेकिन यदि मोबाइल पावर बैंक से जुड़ा रहे, तो ऊर्जा लगातार मिलती रहती है।
उसी प्रकार परमात्म स्मृति निरंतर बनी रहे तो आत्मा को निरंतर शक्ति मिलती रहती है।
9. राजयोग का प्रभाव
जब आत्मा परमात्म संबंध में रहने लगती है, तब धीरे-धीरे अनेक परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं—
- देह-अभिमान कम होने लगता है।
- मन शांत रहने लगता है।
- प्रतिक्रियाएँ कम हो जाती हैं।
- निर्णय स्पष्ट होने लगते हैं।
- प्रेम स्वाभाविक बनने लगता है।
- क्षमा सहज हो जाती है।
- परिस्थितियाँ छोटी लगने लगती हैं।
मुरली महावाक्य
“याद से शक्ति मिलती है।”
यही राजयोग की सबसे बड़ी प्राप्ति है।
10. स्वयं से पूछने योग्य प्रश्न
प्रतिदिन स्वयं से पूछें—
- क्या मेरा योग केवल बैठने तक सीमित है?
- क्या पूरे दिन बाबा की स्मृति रहती है?
- क्या परिस्थितियों में मेरा मन स्थिर रहता है?
- क्या मेरे अंदर प्रेम बढ़ रहा है?
- क्या मेरा क्रोध कम हो रहा है?
- क्या परमात्म संबंध मुझे शक्ति दे रहा है?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो समझिए योग अनुभव बन रहा है।
अध्याय का सार
राजयोग कोई धार्मिक क्रिया नहीं है।
राजयोग कोई मानसिक कल्पना नहीं है।
राजयोग केवल एकाग्रता का अभ्यास नहीं है।
राजयोग आत्मा और परमात्मा के बीच जीवित, प्रेमपूर्ण और निरंतर संबंध है।
जब “मैं याद करता हूँ” समाप्त होकर “मैं याद में रहता हूँ” प्रारम्भ हो जाता है, तभी राजयोग अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होता है।
अध्याय सूत्र
“राजयोग करने की चीज़ नहीं, परमात्म संबंध में जीने की सिद्धि है।”
“योग का लक्ष्य समय देना नहीं, परमात्मा का साथ अनुभव करना है।”
“जहाँ स्मृति सहज हो जाती है, वहीं राजयोग जीवित अनुभव बन जाता है।”
बी.के. मुरली संदर्भ (अध्ययन हेतु)
- साकार मुरली: “मामेकम् याद करो।” (गीता महावाक्य का मुरली में बार-बार उल्लेख)
- साकार मुरली: “स्मृति स्वरूप बनो।”
- साकार मुरली: “याद से शक्ति मिलती है।”
- अव्यक्त महावाक्य: “सहजयोगी वही है जिसकी स्मृति स्वभाव बन गई है।”
नोट: उपरोक्त मुरली महावाक्य विभिन्न साकार एवं अव्यक्त मुरलियों में अनेक बार आए हैं। अध्ययन करते समय संबंधित मूल मुरली में दिनांक सहित संदर्भ अवश्य देखें।
YouTube डिस्क्लेमर
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की मुरलियों एवं राजयोग शिक्षाओं पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है। इसमें प्रस्तुत उदाहरण केवल विषय को सरलता से समझाने के उद्देश्य से दिए गए हैं। कुछ बिंदुओं में लेखक की व्याख्या भी सम्मिलित हो सकती है। कृपया अंतिम सत्य के लिए स्वयं नियमित रूप से साकार एवं अव्यक्त मुरलियों का अध्ययन करें तथा अपने विवेक से आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करें।


