(1-2) – “Do I truly know the Supreme Soul, or do I merely believe in Him?

RAJYOG(1-2)-“क्या मैं परमात्मा को वास्तव में जानता हूं या केवल मानता हूं?

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डिस्क्लेमर

यह अध्याय ब्रह्माकुमारीज़ की साकार एवं अव्यक्त मुरलियों, राजयोग शिक्षाओं तथा आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर सरल भाषा में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य परमात्मा के वास्तविक परिचय को समझना और उसे जीवन में अनुभव करने की विधि को सहज रूप में प्रस्तुत करना है। इसमें दिए गए उदाहरण केवल समझ को सरल बनाने के लिए हैं। पाठकों से निवेदन है कि वे मूल मुरलियों एवं ईश्वरीय शिक्षाओं का स्वयं अध्ययन करके अपने विवेक से सत्य को अनुभव करें।


अध्याय : क्या मैं परमात्मा को वास्तव में जानता हूँ या केवल मानता हूँ?

प्रस्तावना

मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न है – मैं कौन हूँ और मेरा कौन है?

जब तक इन दोनों प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता, तब तक जीवन की खोज समाप्त नहीं होती। हम अनेक संबंध बनाते हैं, अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं, लेकिन फिर भी मन के भीतर एक खालीपन बना रहता है। इसका कारण है कि हमने अपने वास्तविक स्वरूप और अपने वास्तविक संबंध को भुला दिया है।

राजयोग हमें सिखाता है कि मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ, बल्कि एक चैतन्य, ज्योतिर्मय, अविनाशी आत्मा हूँ। लेकिन केवल आत्मा को जान लेना ही पर्याप्त नहीं है। आत्मा को अपने परम पिता परमात्मा का भी परिचय चाहिए, क्योंकि आत्मा और परमात्मा का संबंध ही राजयोग का आधार है।


परमात्मा को जानना और केवल मानना – दोनों में अंतर

बहुत से लोग कहते हैं कि वे भगवान को मानते हैं। वे मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं और भगवान का नाम भी लेते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल मान लेना ही परमात्मा को जानना है?

परमात्मा को जानना अर्थात्—

  • उनका वास्तविक परिचय समझना,
  • उनसे संबंध जोड़ना,
  • उनकी याद में शक्ति अनुभव करना,
  • जीवन में शांति, प्रेम और आनंद का अनुभव करना।

केवल मान्यता परिवर्तन नहीं लाती, लेकिन अनुभव जीवन को बदल देता है।

उदाहरण

किसी व्यक्ति ने बिजली के बारे में बहुत पढ़ लिया, लेकिन कभी स्विच ऑन नहीं किया। वह बिजली के अस्तित्व को मानता तो है, पर उसकी रोशनी और शक्ति का अनुभव नहीं कर सकता।

इसी प्रकार बहुत से लोग परमात्मा को मानते हैं, लेकिन जब तक परमात्मा से योग नहीं जुड़ता, तब तक उनकी शांति, प्रेम और शक्ति का अनुभव नहीं होता।


परमात्मा कौन है?

राजयोग सिखाता है कि परमात्मा एक हैं।

वे—

  • सभी आत्माओं के पिता हैं,
  • निराकार हैं,
  • जन्म-मरण से परे हैं,
  • ज्ञान, प्रेम, शांति और शक्ति के सागर हैं।

परमात्मा भी आत्मा की तरह चैतन्य सत्ता हैं, लेकिन वे कभी जन्म नहीं लेते, कभी कर्मबंधन में नहीं आते और कभी अपने स्वरूप को नहीं भूलते।


मुरली महावाक्य

“सभी आत्माओं का एक ही बाप है।”
— साकार मुरली (विभिन्न मुरलियों का मुख्य सार)

“शिव निराकार बाप है।”
— साकार मुरली (मुरली सार)

“मुझे याद करो तो शक्ति मिलेगी।”
— साकार मुरली का प्रसिद्ध महावाक्य
(सटीक तिथि के लिए मूल मुरली संस्करण देखें।)


आत्मा और परमात्मा में अंतर

आत्मा और परमात्मा दोनों चैतन्य, निराकार और ज्योति-बिंदु स्वरूप हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं।

आत्मा जन्म-मरण के चक्र में आती है, जबकि परमात्मा जन्म-मरण से परे हैं।

आत्मा सीखती है, संस्कार बदलती है और कभी-कभी अपनी शक्तियों को भूल जाती है। लेकिन परमात्मा सदैव संपूर्ण, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं।

आत्मा सीमित शक्ति रखती है, जबकि परमात्मा सभी शक्तियों के सागर हैं।


उदाहरण : बैटरी और पावर सोर्स

मोबाइल की बैटरी दिनभर उपयोग के बाद कमजोर हो जाती है। उसे पुनः चार्ज करने के लिए पावर सोर्स से जोड़ना पड़ता है।

इसी प्रकार आत्मा भी देह-अभिमान, चिंता, तनाव, क्रोध और दुख के कारण शक्तिहीन हो जाती है। तब उसे पुनः अपने मूल शक्ति-स्रोत अर्थात् परमात्मा से जुड़ने की आवश्यकता होती है।

राजयोग वही प्रक्रिया है जिसके द्वारा आत्मा पुनः चार्ज होती है।


परमात्मा निराकार क्यों हैं?

यदि परमात्मा भी शरीरधारी होते, तो वे भी समय, स्थान और परिस्थितियों की सीमाओं में बंध जाते।

लेकिन परमात्मा सभी आत्माओं के पिता हैं। इसलिए वे निराकार, ज्योति-बिंदु स्वरूप हैं।

निराकार का अर्थ यह नहीं कि उनका कोई रूप नहीं है। उनका स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म, दिव्य, ज्योति-बिंदु है, जो स्थूल आँखों से दिखाई नहीं देता।


परमात्मा को याद क्यों करें?

जब आत्मा देह-भान में आ जाती है, तब—

  • तनाव बढ़ता है,
  • भय उत्पन्न होता है,
  • अकेलापन महसूस होता है,
  • प्रेम और शांति कम हो जाती है।

ऐसी स्थिति में आत्मा को पुनः शक्ति की आवश्यकता होती है।

परमात्मा की याद आत्मा को पुनः उसकी मूल शक्तियों से भर देती है।


उदाहरण : छोटा बच्चा और पिता

एक छोटा बच्चा भीड़ में अपने पिता से बिछड़ जाए तो डर जाता है। लेकिन जैसे ही उसे अपने पिता का हाथ मिल जाता है, उसका भय समाप्त हो जाता है।

इसी प्रकार आत्मा जब स्वयं को अकेला समझती है, तब भय, चिंता और असुरक्षा अनुभव करती है। लेकिन जैसे ही वह अनुभव करती है—

“बाबा मेरे हैं और मैं बाबा का हूँ”

तो उसके भीतर सुरक्षा, प्रेम और शांति का अनुभव होने लगता है।


परमात्मा से हमारा संबंध

परमात्मा केवल पूजनीय नहीं हैं।

वे—

  • पिता हैं,
  • शिक्षक हैं,
  • सतगुरु हैं,
  • सच्चे साथी हैं,
  • सर्व संबंध निभाने वाले हैं।

जब आत्मा इन संबंधों को अनुभव करने लगती है, तब जीवन में एक अद्भुत आंतरिक सहारा प्राप्त होता है।


क्या परमात्मा का अनुभव किया जा सकता है?

हाँ।

राजयोग केवल मान्यता नहीं, बल्कि अनुभव की विधि है।

जब आत्मा स्वयं को ज्योति-बिंदु आत्मा अनुभव करती है और परमधाम में विराजमान ज्योति-बिंदु परमात्मा शिव को याद करती है, तब—

  • मन शांत होता है,
  • हृदय हल्का होता है,
  • प्रेम का अनुभव होता है,
  • आंतरिक शक्ति जागृत होने लगती है।

यही राजयोग का अनुभव है।


सहज राजयोग अभ्यास

कुछ क्षण शांत बैठें।

अपने आप से कहें—

मैं यह शरीर नहीं हूँ।
मैं ज्योति-बिंदु आत्मा हूँ।

अब अपने मन को परमधाम की ओर ले जाएँ।

अनुभव करें—

मेरे परम पिता, ज्योति-बिंदु शिव बाबा, शांति के सागर हैं।

धीरे-धीरे अनुभव करें—

बाबा मेरे हैं।
मैं बाबा का हूँ।

महसूस करें—

  • मेरे भीतर शांति है।
  • मेरे भीतर प्रेम है।
  • मेरे भीतर सुरक्षा है।
  • मेरे भीतर शक्ति है।

कुछ क्षण उसी अनुभव में स्थिर रहें।


स्व-चिंतन के प्रश्न

  • क्या मैं परमात्मा को केवल मानता हूँ या वास्तव में जानता भी हूँ?
  • क्या परमात्मा की याद मुझे शक्ति देती है?
  • क्या याद में मुझे हल्कापन अनुभव होता है?
  • क्या मैं बाबा को अपना सच्चा साथी अनुभव करता हूँ?

अध्याय सूत्र

जब आत्मा परमात्मा को पहचान लेती है, तब जीवन को सही दिशा मिल जाती है।

परमात्मा को जानना केवल एक धार्मिक विचार नहीं, बल्कि आत्मा के जीवन का सबसे बड़ा अनुभव है। जब यह अनुभव जागृत हो जाता है, तब अशांति की जगह शांति, भय की जगह सुरक्षा और कमजोरी की जगह आत्मिक शक्ति आ जाती है। तभी आत्मा कह पाती है—

“मैं अकेला नहीं हूँ। बाबा मेरे हैं और मैं बाबा का हूँ।”