06/23-04-1993-“May you be determined and immortal”

AV-06/23-04-1993-“निश्चयबुद्धि भव, अमर भव”

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“निश्चयबुद्धि भव, अमर भव”

आज बापदादा सर्व अति स्नेही, आदि से यज्ञ की स्थापना के सहयोगी, अनेक प्रकार के आये हुए भिन्न-भिन्न समस्याओं के पेपर में निश्चयबुद्धि विजयी बन पार करने वाली आदि स्नेही, सहयोगी, अटल, अचल आत्माओं से मिलन मनाने आये हैं। निश्चय की सब्जेक्ट में पास हो चलने वाले बच्चों के पास आये हैं। यह निश्चय चाहे इस पुरानी जीवन में, चाहे अगले जीवन में भी सदा विजय का अनुभव कराती रहेगी। ‘निश्चय’ का, ‘अमर भव’ का वरदान सदा साथ रहे। विशेष आज जो बहुतकाल की अनुभवी बुजुर्ग आत्मायें हैं, उन्हों के याद और स्नेह के बन्धन में बंधकर बाप आये हैं। निश्चय की मुबारक!

एक तरफ यज्ञ अर्थात् पाण्डवों के किले का जो नींव अर्थात् फाउण्डेशन आत्मायें हैं वह भी सभी सामने हैं और दूसरे तरफ आप अनुभवी आदि आत्मायें इस पाण्डवों के किले की दीवार की पहली ईटें हो। फाउण्डेशन भी सामने है और आदि ईटे, जिनके आधार पर यह किला मजबूत बन विश्व की छत्रछाया बना, वह भी सामने हैं। तो जैसे बाप ने बच्चों के स्नेह में ”जी हज़ूर, हाज़िर” करके दिखाया, ऐसे ही सदा बापदादा और निमित्त आत्माओं की श्रीमत वा डायरेक्शन को सदा ‘जी हाज़िर’ करते रहना। कभी भी व्यर्थ मनमत वा परमत नहीं मिलाना। हाज़िर हज़ूर को जान श्रीमत पर उड़ते चलो। समझा? अच्छा! (इस प्रकार आधे घण्टे पश्चात् ही प्यारे अव्यक्त बापदादा ने हाथ हिलाते हुए सभी बच्चों से विदाई ली)

निश्चयबुद्धि भव, अमर भव

अटल निश्चय से प्राप्त होती है विजय और अमरता

डिस्क्लेमर

यह अध्याय प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त वाणियों, साकार मुरलियों तथा आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाना है। यह किसी व्यक्ति, सम्प्रदाय या धार्मिक मान्यता का विरोध नहीं करता, बल्कि आत्मिक उन्नति, आत्म-विश्वास और परमात्म-निश्चय की भावना को जागृत करने का प्रयास है।


प्रस्तावना

मानव जीवन में अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ आती हैं। कभी सफलता मिलती है, तो कभी असफलता। कभी लोग साथ देते हैं, तो कभी विरोध करते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति की वास्तविक शक्ति उसकी बुद्धि, धन या परिस्थितियाँ नहीं होतीं, बल्कि उसका निश्चय (Faith and Determination) होता है।

इसीलिए अव्यक्त बापदादा का वरदान है—

“निश्चयबुद्धि भव, अमर भव।”

अर्थात् ऐसा अटल निश्चय धारण करो कि परिस्थितियाँ बदल जाएँ, लोग बदल जाएँ, समय बदल जाए, लेकिन तुम्हारा परमात्म-विश्वास कभी न डगमगाए। ऐसा निश्चय आत्मा को सदा विजयी और अमर बना देता है।


निश्चय क्या है?

निश्चय का अर्थ केवल किसी बात को मान लेना नहीं है। निश्चय का अर्थ है—

  • मैं आत्मा हूँ।
  • परमात्मा मेरा पिता है।
  • जो कुछ हो रहा है, वह कल्याणकारी ड्रामा के अनुसार है।
  • परमात्मा की श्रीमत ही मेरे जीवन की दिशा है।
  • चाहे कैसी भी परिस्थिति आये, मैं विजय प्राप्त करूँगा।

जब ये बातें केवल ज्ञान नहीं रहतीं, बल्कि जीवन का अनुभव बन जाती हैं, तब आत्मा निश्चयबुद्धि बन जाती है।


निश्चय ही विजय का आधार है

अव्यक्त वाणी में बापदादा ने कहा कि यज्ञ की स्थापना से लेकर आज तक अनेक प्रकार की समस्याएँ और पेपर आये, लेकिन जो आत्माएँ निश्चयबुद्धि रहीं, वे सभी पेपरों को पार करती गईं।

जीवन में समस्या आना हार नहीं है। हार तब होती है जब हम अपना निश्चय छोड़ देते हैं।

उदाहरण

यदि कोई छात्र परीक्षा में एक बार असफल हो जाए और पढ़ाई ही छोड़ दे, तो उसकी असफलता स्थायी बन जाती है। लेकिन यदि वह निश्चय कर ले कि “मैं पुनः प्रयास करूँगा”, तो वही असफलता उसकी सफलता की सीढ़ी बन जाती है।

इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी परिस्थितियाँ परीक्षा लेने आती हैं, लेकिन निश्चय रखने वाला व्यक्ति हर पेपर में विजयी बन जाता है।


निश्चय आत्मा को अमर क्यों बनाता है?

परमात्मा का वरदान है—“अमर भव”।

इसका अर्थ केवल शरीर की अमरता नहीं है। शरीर तो परिवर्तनशील है। वास्तविक अमरता है—

  • आत्म-स्मृति की स्थिरता,
  • आत्मिक गुणों की निरंतरता,
  • परमात्म-संबंध की अखण्डता,
  • परिस्थितियों से ऊपर रहने की स्थिति।

जो आत्मा परमात्मा में निश्चय रखती है, उसके अंदर भय, असुरक्षा और निराशा धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। वह अनुभव करती है—

“मैं अविनाशी आत्मा हूँ, इसलिए मेरे गुण और मेरी आध्यात्मिक यात्रा भी अविनाशी है।”


आदि आत्माओं की विशेषता – अटल और अचल बनना

बापदादा ने यज्ञ की आदि आत्माओं को अटल, अचल और अनुभवी कहा।

अटल का अर्थ है—संकल्पों में दृढ़ रहना।

अचल का अर्थ है—परिस्थितियों से हिलना नहीं।

यज्ञ के प्रारम्भिक समय में अनेक विरोध, आर्थिक कठिनाइयाँ, सामाजिक उपहास और पारिवारिक समस्याएँ आईं, फिर भी वे आत्माएँ अपने निश्चय से नहीं डगमगाईं।

उनका विश्वास था—

“जिस कार्य का कर्ता स्वयं परमात्मा है, उसकी सफलता निश्चित है।”


मुरली महावाक्य

“निश्चयबुद्धि बच्चे सदा निश्चिन्त और विजयी रहते हैं।”
— साकार मुरली

“निश्चय में विजय समाई हुई है।”
— अव्यक्त वाणी

“श्रीमत पर चलने वाले बच्चों को हर कदम पर पदमों की कमाई जमा होती है।”
— साकार मुरली, 18-01-1970

“जितना निश्चय, उतना अनुभव।”
— अव्यक्त वाणी, 18-01-1986


पाण्डवों के किले की नींव बनना

बापदादा ने कहा कि कुछ आत्माएँ इस यज्ञ की नींव हैं और कुछ पहली ईंटें।

किसी भी विशाल भवन की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है।

इसी प्रकार ईश्वरीय परिवार की मजबूती भी उन आत्माओं पर आधारित है—

  • जो स्वयं अटल रहती हैं,
  • दूसरों को शक्ति देती हैं,
  • परिस्थिति में घबराती नहीं,
  • और परमात्मा पर पूर्ण निश्चय रखती हैं।

उदाहरण

एक विशाल वृक्ष को देखकर लोग उसकी शाखाओं की प्रशंसा करते हैं, लेकिन उसकी जड़ों को नहीं देखते। फिर भी वही जड़ पूरे वृक्ष को खड़ा रखती है।

उसी प्रकार निश्चयवान आत्माएँ ईश्वरीय परिवार की अदृश्य जड़ें हैं।


“जी हज़ूर, हाज़िर” का अर्थ

बापदादा कहते हैं—

“जैसे बाप बच्चों के स्नेह में जी हज़ूर, हाज़िर करके दिखाता है, वैसे ही बच्चे भी श्रीमत पर सदा जी हाज़िर रहें।”

इसका अर्थ है—

परमात्मा जो दिशा दे, उसमें तर्क, बहाने या अपनी मनमत न मिलाना।

परमात्मा कहे—

  • अमृतवेला करो,
  • आत्म-स्मृति में रहो,
  • सेवा करो,
  • व्यर्थ संकल्प समाप्त करो,

तो तुरंत “जी बाबा” कहकर उसे जीवन में धारण कर लेना।

यही सच्चा समर्पण है।


मनमत और परमत क्यों नुकसान पहुँचाती हैं?

जब मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि के अनुसार चलता है, तब भ्रम, चिंता और असंतोष बढ़ने लगता है।

मनमत कहती है—
“मुझे जो ठीक लगे, वही करूँगा।”

परमत कहती है—
“लोग क्या कहेंगे?”

लेकिन श्रीमत कहती है—
“जो आत्मा और संसार के कल्याण में है, वही करो।”

निश्चयबुद्धि आत्मा मनमत और परमत को छोड़कर श्रीमत पर चलती है।


सामान्य जीवन में इसका अभ्यास कैसे करें?

1. हर दिन आत्म-स्मृति का अभ्यास करें

अपने आप से कहें—
“मैं शान्त, पवित्र, शक्तिशाली आत्मा हूँ।”

2. हर परिस्थिति में कल्याण का भाव रखें

जो हुआ, उसमें भी मेरा कल्याण छिपा है।

3. निर्णय लेते समय श्रीमत को प्राथमिकता दें

भावनाओं के बजाय आध्यात्मिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लें।

4. व्यर्थ चिंतन कम करें

निश्चयवान व्यक्ति चिंता नहीं करता, बल्कि समाधान खोजता है।

5. परमात्म-संबंध को मजबूत बनायें

जितना योग, उतना निश्चय।
जितना निश्चय, उतनी विजय।


निष्कर्ष

“निश्चयबुद्धि भव, अमर भव” केवल एक वरदान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है।

जब आत्मा को यह निश्चय हो जाता है कि—

मैं आत्मा हूँ, परमात्मा मेरा पिता है, श्रीमत मेरी दिशा है और विजय मेरा भाग्य है,

तब जीवन की कोई भी परिस्थिति उसे हिला नहीं सकती।

ऐसी आत्मा अटल रहती है, अचल रहती है, सदा विजयी रहती है और परमात्मा के वरदान अनुसार “अमर भव” की अनुभूति करती है।

निश्चयबुद्धि भव, अमर भव

अटल निश्चय से प्राप्त होती है विजय और अमरता

प्रश्न 1: “निश्चयबुद्धि भव, अमर भव” का अर्थ क्या है?

उत्तर:
इस वरदान का अर्थ है कि आत्मा ऐसा अटल और अडिग परमात्म-निश्चय धारण करे कि कोई भी परिस्थिति, व्यक्ति या समय उसके विश्वास को डगमगा न सके। ऐसा निश्चय आत्मा को सदा विजयी, निश्चिंत और आत्मिक रूप से अमर बना देता है।


प्रश्न 2: मनुष्य की वास्तविक शक्ति क्या है?

उत्तर:
मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसकी बुद्धि, धन, पद या परिस्थितियाँ नहीं हैं, बल्कि उसका अटल निश्चय है। निश्चय ही व्यक्ति को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने और विजय प्राप्त करने की शक्ति देता है।


प्रश्न 3: आध्यात्मिक अर्थ में निश्चय किसे कहा जाता है?

उत्तर:
आध्यात्मिक निश्चय का अर्थ है—

  • मैं आत्मा हूँ।
  • परमात्मा मेरा पिता है।
  • जो कुछ हो रहा है, वह कल्याणकारी ड्रामा के अनुसार है।
  • परमात्मा की श्रीमत ही मेरे जीवन की दिशा है।
  • चाहे कैसी भी परिस्थिति आये, मैं विजय अवश्य प्राप्त करूँगा।

जब ये बातें अनुभव बन जाती हैं, तब आत्मा निश्चयबुद्धि बन जाती है।


प्रश्न 4: निश्चय को विजय का आधार क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि जीवन में समस्याएँ और परीक्षाएँ अवश्य आती हैं, लेकिन जो आत्मा अपने निश्चय को नहीं छोड़ती, वह हर परीक्षा को पार कर लेती है। हार परिस्थिति से नहीं होती, बल्कि अपना निश्चय छोड़ देने से होती है।


प्रश्न 5: आध्यात्मिक जीवन में पेपर और समस्याओं का क्या महत्व है?

उत्तर:
समस्याएँ आत्मा को कमजोर करने नहीं, बल्कि उसे शक्तिशाली बनाने आती हैं। वे हमारे निश्चय, धैर्य और परमात्म-विश्वास की परीक्षा लेती हैं। निश्चयवान आत्मा हर पेपर को उन्नति का अवसर बना लेती है।


प्रश्न 6: “अमर भव” का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
“अमर भव” का अर्थ शरीर की अमरता नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है—

  • आत्म-स्मृति की स्थिरता,
  • आत्मिक गुणों की निरंतरता,
  • परमात्म-संबंध की अखण्डता,
  • परिस्थितियों से ऊपर रहने की स्थिति।

प्रश्न 7: निश्चय आत्मा को अमर कैसे बनाता है?

उत्तर:
जब आत्मा परमात्मा पर पूर्ण विश्वास रखती है, तब उसके अंदर का भय, असुरक्षा और निराशा समाप्त होने लगते हैं। वह अनुभव करती है कि मैं अविनाशी आत्मा हूँ और मेरा परमात्म-संबंध भी अविनाशी है। यही अनुभूति अमरता का आधार है।


प्रश्न 8: बापदादा ने आदि आत्माओं को अटल और अचल क्यों कहा?

उत्तर:
क्योंकि उन्होंने अनेक विरोधों, कठिनाइयों और परीक्षाओं के बावजूद अपने परमात्म-निश्चय को कभी नहीं छोड़ा। उनका विश्वास था कि जिस कार्य का कर्ता स्वयं परमात्मा है, उसकी सफलता निश्चित है।


प्रश्न 9: अटल और अचल बनने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
अटल बनने का अर्थ है संकल्पों में दृढ़ रहना और अचल बनने का अर्थ है परिस्थितियों से विचलित न होना। जो आत्मा परिस्थिति बदलने पर भी अपने सिद्धांत और परमात्म-संबंध को नहीं छोड़ती, वही अटल और अचल कहलाती है।


प्रश्न 10: “निश्चय में विजय समाई हुई है” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
इसका अर्थ है कि जहाँ परमात्म-निश्चय है, वहाँ सफलता निश्चित है। विजय पहले बाहर नहीं, बल्कि भीतर के विश्वास में जन्म लेती है। दृढ़ निश्चय ही विजय का बीज है।


प्रश्न 11: ईश्वरीय परिवार की नींव बनने वाली आत्माओं की विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:
वे आत्माएँ—

  • स्वयं अटल रहती हैं,
  • दूसरों को शक्ति देती हैं,
  • परिस्थितियों में घबराती नहीं,
  • परमात्मा पर पूर्ण विश्वास रखती हैं,
  • और अपने आचरण से दूसरों के लिए प्रेरणा बनती हैं।

प्रश्न 12: “जी हज़ूर, हाज़िर” का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
इसका अर्थ है कि परमात्मा जो भी श्रीमत दे, उसे बिना तर्क, बहाने और मनमत मिलाए तुरंत स्वीकार करके जीवन में धारण कर लेना। यही सच्चा समर्पण और आज्ञाकारिता है।


प्रश्न 13: मनमत और परमत आत्मा को नुकसान क्यों पहुँचाती हैं?

उत्तर:
मनमत व्यक्ति को अपनी सीमित बुद्धि में बाँध देती है और परमत उसे दूसरों की राय पर निर्भर बना देती है। दोनों ही स्थिति में भ्रम, चिंता और असंतोष बढ़ते हैं। श्रीमत ही आत्मा को स्पष्टता, शक्ति और कल्याण की दिशा प्रदान करती है।


प्रश्न 14: निश्चयबुद्धि आत्मा श्रीमत को क्यों अपनाती है?

उत्तर:
क्योंकि वह जानती है कि परमात्मा सर्वज्ञ और कल्याणकारी है। उसकी श्रीमत आत्मा और विश्व दोनों के हित में होती है। इसलिए निश्चयवान आत्मा मनमत और परमत को छोड़कर श्रीमत पर चलती है।


प्रश्न 15: सामान्य जीवन में निश्चयबुद्धि बनने का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?

उत्तर:

  1. प्रतिदिन आत्म-स्मृति का अभ्यास करें।
  2. हर परिस्थिति में कल्याण का भाव रखें।
  3. निर्णय लेते समय श्रीमत को प्राथमिकता दें।
  4. व्यर्थ चिंतन कम करें।
  5. परमात्म-संबंध और योग को मजबूत बनायें।

प्रश्न 16: “जितना योग, उतना निश्चय; जितना निश्चय, उतनी विजय” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
परमात्मा के साथ जितना गहरा संबंध होगा, उतना ही आत्मा में विश्वास और शक्ति बढ़ेगी। और जितना निश्चय बढ़ेगा, उतनी ही आत्मा परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करेगी।


प्रश्न 17: इस सम्पूर्ण अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर:
जब आत्मा को यह अटल निश्चय हो जाता है कि—

“मैं आत्मा हूँ, परमात्मा मेरा पिता है, श्रीमत मेरी दिशा है और विजय मेरा भाग्य है।”

तब जीवन की कोई भी परिस्थिति उसे डिगा नहीं सकती। ऐसी आत्मा अटल, अचल, निश्चिंत और सदा विजयी रहती है तथा “अमर भव” के वरदान का अनुभव करती है।

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