10/06-4-1995–”Become a conqueror of Maya by remaining in the stage of remembrance of the spiritual personality of purity.”

AV-10/06-4-1995-“प्योरिटी की रूहानी पर्सनालिटी की स्मृति स्वरूप द्वारा मायाजीत बनो”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“प्योरिटी की रूहानी पर्सनालिटी की स्मृति स्वरूप द्वारा मायाजीत बनो”

आज स्नेह के सागर बापदादा चारों ओर के सर्व स्नेही बच्चों को देख रहे हैं। हर एक स्नेही बच्चों के मूरत में रुहानी पर्सनालिटी की झलक देख रहे हैं। बाहर के रूप में तो साधारण पर्सनालिटी वाले हैं लेकिन रुहानी पर्सनालिटी में सबसे नम्बरवन हैं। दुनिया में अनेक प्रकार की पर्सनालिटीज़ गाई जाती हैं। शरीर की भी पर्सनालिटी, कोई विशेषता की भी पर्सनालिटी और कोई विशेष पोजीशन की भी पर्सनालिटी, लेकिन आप सबके चेहरे पर, चलन में कौन-सी पर्सनालिटी है? प्योरिटी की पर्सनालिटी। प्योरिटी ही पर्सनालिटी है। जितना-जितना जो प्योर हैं उतनी उनकी पर्सनालिटी न सिर्फ दिखाई देती है लेकिन अनुभव होती है। सभी अपने रुहानी पर्सनालिटी को अनुभव करते हो? आप जैसी पर्सनालिटी सतयुग से अब तक कोई की है? सारे कल्प में चक्कर लगाओ तो आप जैसी पर्सनालिटी है? नहीं है ना! तो आपको अपने रुहानी पर्सनालिटी का नशा है! अनादि काल में तो परमधाम में भी आप विशेष आत्माओं की पर्सनालिटी सबसे ऊंची है। चाहे आत्मायें सब चमकती हुई ज्योति हैं लेकिन आप रुहानी पर्सनालिटी वाली आत्माओं की चमक अन्य सब आत्माओं से न्यारी और प्यारी है। अपने अनादि काल की पर्सनालिटी को स्मृति में लाओ। आई स्मृति में? देख रहे हो? बापदादा के साथ-साथ कैसे रुहानी पर्सनालिटी में दिखाई दे रहे हैं। अपने आपको देख सकते हो? तो चले जाओ अनादि काल में। कितने टाइम में जा सकते हो? जाने में कितना टाइम लगेगा? सेकेण्ड से कम ना! कि एक दिन, एक घण्टा चाहिये? सेकेण्ड से भी कम जहाँ चाहो वहाँ पहुँच सकते हो। तो अनादि काल की अपनी पर्सनालिटी देख ली? अभी अनादि काल से आदि काल में आ जाओ। आ गये या अभी चल रहे हो? पहुँच गये? तो अनादि काल से आदि काल में अपनी रुहानी पर्सनालिटी देखो – कितनी श्रेष्ठ पर्सनालिटी है! तन की भी तो मन की भी तो धन की भी और सम्बन्ध की भी। सब प्रकार की पर्सनालिटी कितनी श्रेष्ठ है! तो आदि काल की पर्सनालिटी देख रहे हो? कितने सुन्दर लगते हो, कितने सजे हुए हो, कितने सुख, शान्ति, प्रेम, आनन्द स्वरूप हो तो आदि काल में भी अपनी पर्सनालिटी को देखो। स्पष्ट दिखाई देती है वा 5 हज़ार वर्ष हो गये तो थोड़ा स्पष्ट नहीं है? सभी को स्पष्ट है? होशियार हो सभी। तो आदि काल भी अपना देख लिया। अभी आओ मध्य काल में तो मध्य काल में भी आपकी पर्सनालिटी क्या रही? आपके जड़ चित्र कितने विधिपूर्वक पूजे और गाये जाते हैं। चाहे कितने भी धर्मात्मा, महात्मा, नेतायें पर्सनालिटी वाले गाये जाते हैं लेकिन आपके जड़ चित्रों की पर्सनालिटी के आगे उनकी पर्सनालिटी कुछ भी नहीं है। जैसे आप सबकी पूजा होती है वैसे कोई महात्मा या नेता की, धर्म आत्मा की विधिपूर्वक पूजा होती है? कभी देखी है? आपके जड़ चित्रों जैसे श्रृंगार किसका होता है? तो मध्य काल में भी आप आत्माओं के प्योरिटी की पर्सनालिटी की विशेषता कितनी श्रेष्ठ है! अपना चित्र देखा? आपकी पूजा होती है कि नहीं? सिर्फ बड़े-बड़ों की होती है, हमारी नहीं! डबल विदेशियों के मन्दिर हैं? देखा है, उसमें आपका चित्र है? कि सुना है तो कहते हो कि हाँ होंगे! स्मृति में है? तो मध्य काल भी आपका अति श्रेष्ठ है और अब लास्ट जन्म में जो मरजीवा ब्राह्मण जन्म है उसकी पर्सनालिटी देखो कितनी बड़ी है! गायन कितना है – कोई भी श्रेष्ठ कार्य अब तक भी आपके नामधारी ब्राह्मण ही करते हैं। चाहे ब्राह्मण अभी ब्राह्मण रहे नहीं हैं लेकिन नाम के तो ब्राह्मण है ना! आपके नाम से आपकी पर्सनालिटी के कारण वो भी श्रेष्ठ गाये जाते हैं। तो ब्राह्मण जन्म की पर्सनालिटी कितनी श्रेष्ठ है! आदि काल, अनादि काल, मध्य काल और अब अन्त काल – सारे कल्प में आपकी पर्सनालिटी सदा ही महान् रही है। लौकिक पर्सनालिटी वालों का अगर नाम भी आता है तो कोई विशेष बुक में उन्हों का नाम आता है – फलाने-फलाने हैं। लेकिन आपका नाम किसमें आता है? साधारण बुक में नहीं आता है, शास्त्रों में आता है। जो भी आदि काल से शास्त्र बने उसमें किसके चरित्र हैं? किसका गायन है? किसकी कहानियाँ हैं? तो लौकिक पर्सनालिटी वालों का गायन विशेष बुक में होता है और आपका गायन शास्त्रों में होता है और शास्त्रों को कितना रिगार्ड देते हैं। बड़े विधिपूर्वक शास्त्र को सम्भालते हैं, उसको भी बड़े पूज्य के रूप में देखते हैं। जो सच्चे भक्त हैं वो शास्त्र को विधिपूर्वक रखते भी हैं और पढ़ते भी हैं। ऐसे रिवाजी किताबों के माफिक नहीं रखते। तो अपनी पवित्रता की पर्सनालिटी को सदा ही इमर्ज रूप में स्मृति में रखो। जानते हैं… या हैं तो हम ही… ऐसे मर्ज नहीं। स्मृति स्वरूप में रखो। जिसके बुद्धि में ये इमर्ज रूप में स्मृति रहती है तो स्मृति ही समर्थी का आधार है। और जहाँ समर्थी है वहाँ माया आ सकती है? समर्थ आत्मा के पास माया का आना असम्भव है। मेहनत करने की आवश्यकता ही नहीं है। माया का काम है आना लेकिन आपका काम अभी समय प्रमाण भगाना नहीं है। माया आई और भगाया। नहीं, आपका काम है सदा मायाजीत रहना। तो मायाजीत हो वा माया को बार-बार भगाने वाले हो? अभी भगाना पड़ता है, थोड़ा-थोड़ा वो दर्शन देने के लिये आ जाती है! नहीं ना! डबल फारेनर्स ने माया को सदा के लिए भगा दिया? या भगाते ही रहते हैं? क्या हॉल है? माया सदा के लिए भाग गई? अभी नहीं आयेगी ना? कि थोड़ा-थोड़ा आये, कोई हर्जा नहीं? फिर भी आधा कल्प की दोस्ती है, फ्रैण्ड है ना! उसको ऐसे ही छोड़ देंगे, आवे ही नहीं! सुनाया ना कि समय समाप्त होने के पहले बहुत काल का मायाजीत बनने का अभ्यास चाहिये। अन्त में नहीं हो सकेगा। अगर अन्त में मायाजीत बनने का पुरुषार्थ भी करेंगे तो क्या हॉल होगा? बापदादा तोते की कहानी सुनाते हैं ना कि तोते को कहा नलके पर नहीं बैठना, पर नलके पर बैठकर ही बोल रहा था। ऐसे ही अन्त काल में अगर बहुत काल का अभ्यास नहीं होगा तो मन में सोचते रहेंगे कि मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ, लेकिन माया का प्रभाव भी होता रहेगा, और कोशिश भी करेंगे मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ लेकिन होगा ही नहीं। इसीलिये क्या करना है? अभी से मायाजीत बनने का अभ्यास करो। और उसका सहज साधन है अपने रुहानी पर्सनालिटी को स्मृति स्वरूप में रखो। पर्सनालिटी वाले की निशानी क्या होती है? जो ऊंची पर्सनालिटी वाले होते हैं उसकी कहाँ भी, किसी में भी आंख नहीं जायेगी। ये ऐसा है, ये ऐसा है, ये ऐसा करता, ये ऐसे करती, मैं क्यों नहीं करुँ, मैं क्यों नहीं कर सकती हूँ/कर सकता हूँ… दूसरे के प्राप्ति में आंख नहीं जायेगी। क्यों? रुहानी पर्सनालिटी वाला सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न है। स्वभाव में भी सम्पन्न, संस्कार में भी सम्पन्न और सम्बन्ध-सम्पर्क में भी सम्पन्न, भरपूर। वो कभी अपने प्राप्तियों के भण्डार में कोई अप्राप्ति अनुभव ही नहीं करेगा। क्यों? रुहानी पर्सनालिटी के कारण वो सदा ही मन से भरपूर होने के कारण सन्तुष्ट रहता है। आंख दूसरे की प्राप्ति में तब जाती है जब अपने में अप्राप्ति अनुभव करते हो। तो कोई अप्राप्ति है क्या? गीत क्या गाते हो – अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खजाने में। ये गीत मुख से नहीं, मन से गाते हो ना? जो गाते हैं वो हाथ उठाओ। अच्छा, डबल विदेशी भी गीत गाते हो? अच्छा!

बापदादा आज चारों ओर के बच्चों की प्योरिटी की पर्सनालिटी चेक कर रहे थे। प्योरिटी की परिभाषा को भी अच्छी तरह से जानते हो। प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत नहीं, ब्रह्मचर्य व्रत में तो आजकल के सरकमस्टांस अनुसार कई अज्ञानी भी रहते हैं। ज्ञान से नहीं लेकिन हालातों को देखकर। कई भक्त भी रहते हैं। वो कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन प्योरिटी को सारे दिन में चेक करो – पवित्रता की निशानी है स्वच्छता, सत्यता। अगर सारे दिन में चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की लेकिन अगर विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर ज़रा-सा अन्तर रह गया तो वो भी स्वच्छता अर्थात् पवित्रता नहीं। व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता है। क्यों? आप सोचेंगे कि हमने पाप तो किया ही नहीं, किसको दु:ख तो दिया ही नहीं लेकिन अगर व्यर्थ चला, समय गया, संकल्प गया, सन्तुष्टता गई तो आपके पवित्रता की फाइनल स्टेज के डिग्री में फर्क पड़ जायेगा। 16 कला नहीं बन सकेंगे। 15 कला, 14 कला, साढ़े पन्द्रह कला… नम्बरवार हो जायेगा। तो अपवित्रता सिर्फ किसको दु:ख देना या पाप कर्म करना नहीं है लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो। निकल गया, बोलना नहीं था लेकिन बोल लिया, तो इसको क्या कहेंगे? मालिक हैं? इसीलिये अमृतवेले से लेकर रात तक अपने संकल्प, बोल, कर्म, सेवा – सबको चेक करो। मोटे रूप से नहीं चेक करो। अगर मोटे रूप से चेक करेंगे तो देखो चन्द्रवंशी को मोटी निशानी तीर-कमान दिया है और सूर्यवंशी को कितनी छोटी-सी मुरली दे दी है। मुरली कितनी हल्की है! और तीर कमान कितना मेहनत का है। पहले तो निशाना लगाते रहो, दूसरा बोझ उठाते रहो! और मुरली देखो – नाचो, गाओ, हंसो, खेलो। तो इसीलिये मोटे-मोटे रूप न पुरुषार्थ का रखो, न चेकिंग का रखो। अभी महीन बुद्धि बनो। क्योंकि समय समाप्त अचानक होना है, बताकर नहीं होना है। बापदादा ने तो पहले ही कह दिया है कि कोई उलहना नहीं देना – बाबा, आपने बताया क्यों नहीं? बाप कभी भी टाइम कॉन्सेस नहीं बनायेगा। अभी पूरा डायमण्ड बनना है ना! ये वायदा किया है ना? डायमण्ड जुबली मनानी है या डायमण्ड बनना है? क्या करना है? बनना भी है और मनाना भी है। दोनों साथ-साथ करना है। तो बापदादा अगले वर्ष में चेक करेंगे – वायदा निभाया या सिर्फ मुख मीठा किया? तो कौन हो? सिर्फ बोलने वाले हो या निभाने वाले हो? अच्छा! देखो, टी.वी. में आप सबका फोटो आ रहा है, फिर बदल नहीं जाना – मैं था ही नहीं, मैंने नहीं कहा था! बनना तो अच्छा है ना, तो जो अच्छी बात है उसको जल्दी करना चाहिये या देरी से? जल्दी करना चाहिये ना!

सेकेण्ड में एवररेडी बन सकते हो? सेकेण्ड में अशरीरी बन सकते हो? कि युद्ध करनी पड़ेगी कि नहीं, मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर नहीं हूँ… ऐसे तो नहीं ना! सोचा और हुआ। सोचना और स्थित होना। (बापदादा ने कुछ मिनटों तक ड्रिल कराई) अच्छा लगता है ना! तो सारे दिन में बीच-बीच में ये अभ्यास करो। कितने भी बिज़ी हो लेकिन बीच-बीच में एक सेकेण्ड भी अशरीरी होने का अभ्यास अवश्य करो। इसके लिये कोई नहीं कह सकता – मैं बिज़ी हूँ। एक सेकेण्ड निकालना ही है, अभ्यास करना ही है। अगर किसी से बातें भी कर रहे हो, किसके साथ कार्य कर रहे हो, तो उन्हों को भी एक सेकेण्ड ये ड्रिल कराओ, क्योंकि समय प्रमाण ये अशरीरीपन का अनुभव, यह अभ्यास जिसको ज्यादा होगा वो नम्बर आगे ले लेगा। क्योंकि सुनाया कि समय समाप्त अचानक होना है। अशरीरी होने का अभ्यास होगा तो फौरन ही समय की समाप्ति का वायब्रेशन आयेगा। इसलिये अभी से अभ्यास बढ़ाओ। ऐसे नहीं, अगले साल में डायमण्ड जुबली है तो अब नहीं करना है, पीछे करना है। जितना बहुत काल एड करेंगे उतना राज्य-भाग्य के प्राप्ति में भी नम्बर आगे लेंगे। अगर बीच-बीच में यह अभ्यास करेंगे तो स्वत: ही शक्तिशाली स्थिति सहज अनुभव करेंगे। ये छोटी-छोटी बातों में जो पुरुषार्थ करना पड़ता है वो सब सहज समाप्त हो जायेगा।

अच्छा सभी खुशराज़ी हैं ही या पूछना पड़ेगा? मातायें खुश हो? बहुत अच्छा। देखो, कहाँ-कहाँ से मेले में पहुँच गये हो। अच्छा चांस मिला ना, नहीं तो डेट का इन्तज़ार करते रहते हैं – हमारा नम्बर कब आयेगा, हमारा नम्बर कब आयेगा? अभी तो खुला निमन्‍त्रण था ना! सब ठीक अच्छी तरह से रह रहे हो? बेहद अनुभव हो रहा है ना? कि थोड़ी-थोड़ी तकलीफ है? बुजुर्ग माताओं को तकलीफ नहीं हुई है? लाइन में लगो तब ही खाना मिलेगा! लाइन में लगने में थकावट नहीं होती? मज़ा आता है? इतना बड़ा परिवार कब मिलेगा! तो परिवार को देखकर हर्षित होते हैं ना! भक्ति मार्ग के मेले से तो अच्छा मेला है ना? और दो दिन बढ़ा दें कि बस का खर्चा होगा? घर नहीं याद आयेगा? नौकरी नहीं याद आयेगी? ये भी कुछ नवीनता होनी चाहिये ना तो ये मेला भी एक नवीनता हुई। नवीनता का अनुभव कर लिया। अभी फिर पुरानी बातें थोड़ेही होगी, नई बातें होगी ना! नई बात पसन्द आती है या पुरानी? नई बात अच्छी लगती है ना! अच्छा।

कुमारियों से:- कुमारियाँ क्या कमाल करेंगी! कुमारियाँ टीचर बनेंगी? कुमारियाँ सभी अपने चेहरे से, चलन से, पवित्रता की परिभाषा का भाषण करेंगी। मुख से भाषण तो सभी करते हैं लेकिन आपके सम्बन्ध में जो भी सामने आये वो चेहरे और चलन से अनुभव करे कि पवित्रता की श्रेष्ठता क्या है? कभी भी कोई कुमारी किसके भी सामने जाये तो साधारण कुमारी नहीं दिखाई दे। पवित्रता की देवी अनुभव हो। देखो शुरू-शुरू में जब तपस्या के बाद सेवा पर निकले तो आप सबको किस रूप में देखते थे? देवियाँ समझते थे ना! उन्हों को साधारण स्वरूप नहीं दिखाई देता था, देवी रूप दिखाई देता था। देवियाँ आई हैं, कुमारियाँ नहीं। तो हर कुमारी अपने को देवी स्वरूप अनुभव करे और दूसरों को भी अनुभव कराये। देवी रूप के ऊपर कभी भी कोई की व्यर्थ नज़र नहीं जा सकती। औरों को भी बचा लेंगे और स्वयं भी बच जायेंगे। ऐसे नहीं कह सकते कि इसकी बुरी दृष्टि थी ना, मैं तो पवित्र हूँ लेकिन दूसरे की बुरी दृष्टि थी। अगर आपकी पॉवरफुल पवित्र दृष्टि है तो जैसे सूर्य अन्धकार को रहने नहीं देता, समाप्त हो जाता है, अन्धकार रोशनी में बदल जाता है, वैसे ही आपकी पवित्र दृष्टि, देवी स्वरूप आसुरी संस्कार को समाप्त कर देगी। तो कुमारियाँ क्या हैं? पवित्र देवियाँ। तो कुमारियाँ ऐसे समझती हैं? हाँ कहते हो तो हाथ उठाओ, अगर ना तो हाथ नहीं उठाओ। पवित्र कुमारियाँ हैं।

कुमार:- कुमार भी पवित्र देव हैं। ऐसे नहीं, ये तो पवित्र देवियाँ हो गई! कुमार भी पवित्र देव हैं। किसी भी तरफ, अपवित्र दृष्टि की बात तो छोड़ो लेकिन स्वप्न मात्र भी अपवित्र वृत्ति नहीं जा सकती। कुमार हाथ उठाओ। कुमार भी बहुत हैं। तो कुमार कौन हो? पवित्र देव। देव आत्मा हूँ। मैं फलाना हूँ, नहीं। देव आत्मा हूँ, पवित्र आत्मा हूँ।

माताओं से:- मातायें बहुत हैं। मातायें क्या कमाल करेंगी? कमाल करना है ना? तो मातायें सदा ईश्वरीय स्नेह से सभी को अज्ञान की नींद से जगाओ। जैसे छोटे बच्चों को उठाती हो ना – उठो, तैयार हो, स्कूल में जाओ, तो ऐसे जगत मातायें बन अज्ञान के नींद में सोये हुए बच्चों को उठाओ। आत्माओं को जगाओ, क्योंकि जगत माता हो। जैसे अपने को हद की माता समझने से जिम्मेवारी समझती हो ना। जो भी बच्चें होंगे, 8 हो कि 6, लेकिन जिम्मेवारी समझती हो ना ऐसे बेहद की जगत मातायें बन बच्चों (आत्माओं) पर रहम करो। बच्चा माना बाप का बच्चा। कई ऐसे भी कहानियाँ सुनते हैं, कहते हैं बुरी दृष्टि नहीं है लेकिन इसको माँ समझते हैं। लेकिन माँ सिवाए ब्रह्मा बाप के और कोई आत्मा हो नहीं सकती। तो अपना बच्चा नहीं बनाना, बाप का बच्चा बनाना। तो मातायें तैयार हैं? करनी है सेवा? अच्छा, हाथ हिला रही हैं। कई बच्चे खेल बहुत करते हैं, सारे दिन में कहाँ न कहाँ, कोई न कोई नया खेल जरूर होता है। और बातें भी बड़ी अच्छी बनाते हैं। ऐसी नई-नई अच्छी बातें बनाते हैं जो न शास्त्रों में हैं न मुरली में हैं, तो अभी ये बचपन के खेल कब तक करेंगे? ये बचपन के खेल हैं। जैसे गुड़िया बनाते भी हैं, उनको बड़ा भी करते हैं, परिवार वाले भी बना देते हैं, फिर खत्म कर देते हैं। तो बातें बनाने वाले भी ऐसे करते हैं – बात को पहले जन्म देते हैं, फिर उसको विस्तार करते हैं, फिर उसमें नमक-मिर्ची डालकर, मसाला डालकर बहुत टेस्टी करते हैं, फिर एक-दो को खिलाते हैं। अभी आप सबका बचपन है या वानप्रस्थ है? वानप्रस्थ तक पहुँच गये हो ना? अभी तो वाणी से परे जाने का समय है। तो वानप्रस्थ स्थिति वाले बचपन के खेल नहीं करते लेकिन कमाल करते हैं। जब खेल में लग जाते हैं ना तो ये खेल क्या कर रहा हूँ – ये महसूस भी कम करते हैं। खेल में इतने मस्त हो जाते हैं। तो अभी वानप्रस्थ स्थिति का अनुभव करो और कराओ। बचपन के खेल खेल लिये, बहुत खेले।

अच्छा, अभी इस वर्ष के सीज़न का समय समाप्त हो रहा है। तो बापदादा को एक संकल्प है। ब्रह्मचर्य व्रत तो सभी ने बहुत सहज धारण किया लेकिन अगले वर्ष सीज़न में वही आयें जो क्रोध नहीं करे। ये हो सकता है कि फेल हो जायेंगे? बोलेंगे तो सच ना। तो ऑटोमेटिकली सीज़न कम हो जायेगी। ऐसा करें? फॉर्म में सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत का नहीं लिखना, कि 6 मास से या 6 वर्ष से ब्रह्मचर्य में रहे, लेकिन क्रोध कितने समय से नहीं किया? क्रोध पर कड़ी नज़र रखना। क्या समझते हैं? पसन्द है? पाण्डवों को पसन्द है? देखो नाम तो आउट हो जायेगा – क्यों नहीं सीज़न में आये! तो मातायें बोलो, टीचर्स बोलो – करें? हाँ जी बोलो। टीचर्स को भी आने को नहीं मिलेगा! कोई भी होगा, चाहे महारथी हो, चाहे प्यादा हो, चाहे घोड़े सवार हो – मधुबन वाले कहेंगे हम तो मधुबन में होंगे, लेकिन उन्हों को सामने नहीं बिठायेंगे। टी.वी. में जाकर देखें, सुने। ये इन्सल्ट तो है ना। किसलिये सामने नहीं आये! तो मधुबन वालों को पक्का कंगन बांधना पड़ेगा। पहले मधुबन वाले हाँ करते हैं? पहले मधुबन करेगा। ऐसे नहीं, दूसरे कहें कि पहले मधुबन को तो देखो, ये अच्छा नहीं। अच्छा, सभी तैयार हो? जो सोचे कि नहीं, बहुत मुश्किल है तो वो खड़े हो जाओ। क्योंकि पीछे वालों का हाथ दिखाई नहीं देता। कहेंगे कि हमने तो हाथ उठाया ही नहीं था। तो दादियाँ बताओ – करें? अच्छा! देखो, सभी हाँ-हाँ कर रहे हो फिर कल से सोचना शुरू नहीं करना कि ये क्या हो गया! अन्तर्मुखता से मुख को बन्द कर देना। मुख खुलेगा तब तो क्रोध होगा ना। तो इस सीज़न में क्रोध-मुक्त आत्माओं का मेला होगा। पसन्द है ना? अच्छा फिर भी बापदादा समझते हैं कि कइयों के संस्कार बहुत पक्के हैं, रिवाजी बोल भी बोलेंगे तो लगता ऐसे है जैसे क्रोध करते हैं। बोल ऐसा है, आदत पड़ गई है। इसीलिये अभी जब तक सीज़न शुरू हो तब तक के लिये अगर कभी गलती से क्रोध हो भी गया ना तो तीन बारी माफ करेंगे। तीन बार छुट्टी है। (सभी ने तालियां बजाई) अच्छा तीन बार छुट्टियाँ चाहिये तभी तालियाँ बजाई। बापदादा ने तो ट्रायल की, फेल हो गये। कहो, हम करके दिखायेंगे, विजय प्राप्त करके दिखायेंगे, ये बोलो। कुछ तो नवीनता होनी चाहिये ना! वही फॉर्म आते हैं – खाना खाया, नहीं खाया? ब्रह्मचर्य में रहे, नहीं रहे? अभी फॉर्म चेंज करेंगे। नवीनता पसन्द है ना? टीचर्स को भी नियम में रहना पड़ेगा। टीचर्स को रियायत नहीं करेंगे। स्टूडेण्ट्स को तीन बार तो टीचर्स को दो बार।

पाण्डवों से:- पाण्डव क्या कमाल करके दिखायेंगे? पाण्डव गाये जाते हैं – विजयी पाण्डव। कोई भी पाण्डव नाम लेंगे तो पाण्डवों की दो बातें सामने आती हैं एक बाप के साथी और दूसरा पाण्डव अर्थात् विजयी, तो जो भी पाण्डव हैं वो सभी ये संकल्प करो कि किसी भी बात में हार नहीं खानी है। सदा विजयी। और निश्चय रखो विजयी माला में मुझ पाण्डव का ही पार्ट है। विजयी रत्न हूँ। सदा अमृतवेले अपने मस्तक पर विजय का तिलक रोज रिफ्रेश करो और अमृतवेले से लेकर अपने मस्तक पर विजय का तिलक इमर्ज रूप में देखो। ऐसे नहीं, मैं तो हूँ ही। नहीं…। अगर हूँ तो सारे दिन में विजय प्राप्त की या नहीं की – ये चेक करो। तो पाण्डव अर्थात् विजयी।

टीचर्स से:- टीचर्स क्या करेंगी? टीचर्स ने मेहनत तो की, बसें भर-भर कर लाई। तो टीचर्स क्या कमाल करेंगी? टीचर्स को विशेष ये लक्ष्य रखना है कि सदा हर परिस्थिति में, परिस्थिति बदले लेकिन स्थिति नहीं बदले। स्थिति सदा खजानों से सम्पन्न हो और सन्तुष्ट रहे। परिस्थिति आयेगी और चली जायेगी। लेकिन परिस्थिति की क्या शक्ति है जो आपकी सन्तुष्टता को ले जाये। तो परिस्थिति का खेल भले देखो लेकिन साक्षीपन, सन्तुष्टता की सीट पर बैठकर देखो। तो टीचर्स अर्थात् सदा सम्पन्न और सन्तुष्ट। टीचर्स का टाइटल है सन्तुष्टमणियाँ। ऐसे हैं ना? सदा सन्तुष्टमणि।

मधुबन निवासियों से:- मधुबन वाले क्या करेंगे? मधुबन वालों को बापदादा सेवा की मुबारक सदा दिल से पद्मगुणा देते हैं, अब भी दे रहे हैं। अब मधुबन वालों को आगे क्या करना है? विशेष ये पाठ पक्का करना है कि मधुबन निवासी हर कर्म में, हर संकल्प में विशेष हीरो पार्टधारी हैं। मधुबन की स्टेज पर नहीं, लेकिन विश्व की स्टेज पर संकल्प, बोल और कर्म में हीरो पार्टधारी। तो हीरो एक्टर के ऊपर न चाहते भी सबकी नज़र होती है और हीरो एक्टर थोड़ा भी नीचे ऊपर करता है तो हाहाकार हो जाता है। और अच्छा करता है तो वाह-वाह हो जाती है। तो मधुबन वाले ज़ीरो के साथ रहने वाले सदा हीरो पार्ट बजाने वाले। मधुबन में सब आ गये, हॉस्पिटल भी आ गई तो ज्ञान सरोवर भी आ गया, तलहटी भी आ गई, सब आ गये, जो भी आठ भुजायें हैं सब आ गये। समझा? मधुबन निवासी नाम सुनकर सब कितना आपको प्यार करते हैं, कहाँ भी चले जाओ, कहाँ से आये हैं? मधुबन वाले हैं। जैसे मधुबन वाला बाबा मशहूर है ऐसे मधुबन वाले भी मशहूर हैं। ऐसे समझते हो ना! अच्छा है, नशा तो है मधुबन वालों को।

अच्छा, मेला निर्विघ्न हो गया? कल तो चलाचली का मेला शुरू होगा। मिलन का मेला समाप्त हो गया, अभी चलाचली का मेला होगा। देखो, क्या नहीं आप कर सकते हो! जो चाहे वो कर सकते हो! देख लिया ना! जो सुन करके समझते थे पता नहीं क्या होगा, कैसे होगा…? और अभी क्या कहते हैं? ये तो कुछ भी नहीं है। अभी ये कॉमन हो गया ना! कि गुजरात वालों को बहुत मेहनत लगी? मेहनत करनी पड़ी? नहीं, अच्छा लगा। प्राइज़ मिलने योग्य कार्य किया है। बापदादा दिल के याद-प्यार की प्राइज़ गुजरात को दे रहे हैं। अच्छा, इसमें जो मातायें सवेरे से लेकर रोटी बनाती हैं, हाथ थक जाते होंगे, तो बाप-दादा दोनों ऐसे सेवाधारी माताओं के बाहों की मसाज़ कर रहे हैं। रोटी बनाने वाले खड़े हो जाओ। हाँ, बहुत ताली बजाओ। सब्जी काटने वाले भी हैं। सब्जी काटने वाले उठो। सबसे मुश्किल काम जो है वो है गर्मी में इतना समय गैस के आगे ठहरकर रोटी पकाना। तो मुबारक हो, मुबारक। खाने वाले नहीं होते तो ये क्या करते! देखो खाने वालों से ही तो रौनक है। जैसे मन्दिरों में घण्टे बजते हैं ना, जो जाता है घण्टे बजाता है तो इस मेले में बर्तनों के घण्टे बजते रहते हैं। अच्छी सीन होती है, जब बर्तन धुलाई करते हैं ना तो बहुत घण्टे बजते हैं बर्तनों के। तो कमाल तो खाने वालों की है ना!

मधुबन वालों ने भी बहुत मेहनत की। गुजरात को भी सहयोग देने वाले तो मधुबन वाले हैं। बहुत सहयोग दिया है ना। सबने प्यार से किया है। मेला निर्विघ्न समाप्त हो जाये – इस दृढ़ संकल्प से बहुत किया है। मधुबन वालों ने सहयोग दिया है ना या तंग किया है? मधुबन वाले तंग नहीं करते, सबको खुश करते हैं।

बापदादा तो टी.वी. में देखते हैं ना, तो ये देखा कि कोई की शक्ल के पोज़ इस बारी ज्यादा बदली नहीं हुए हैं। मैजारिटी ठीक रहे हैं, खुशी खुशी से सेवा की है। अगर थोड़ा बहुत हुआ भी है तो सहन शक्ति, समाने की शक्ति अच्छी यूज़ की है इसलिये मुबारक है। अच्छा, गर्मी लगी? कि पता ही नहीं पड़ा, आप बापदादा के याद की लहरों में लहरा रहे थे। टेन्ट में सोते हो या बापदादा की गोदी में सोते हो? टेन्ट में तो नहीं ना! टेन्ट उड़ जाये तो भी कोई हर्जा नहीं, गोदी तो है ना! लेकिन पहले थोड़ा डराया अभी प्रकृति भी समझ गई ये हटने वाले नहीं हैं। अगर छत उड़ जायेगी तो दूसरी छत आ जायेगी।

अच्छा, डबल विदेशी क्या करेंगे? अभी थोड़े हो, सिकीलधे हो। तो डबल विदेशी सदा अपने चेहरे को, सूरत को चलता फिरता म्यूज़ियम बनायेंगे। आपके नयनों को कोई देखे तो नयनों द्वारा हर्षित रुहानी आकर्षित मूर्त का चित्र देखे। साधारण नयन नहीं देखे। दिव्य नयन। जिन दिव्य नयनों में सदा बाप बिन्दु दिखाई दे। तो आपके नयन चलता-फिरता म्यूजियम बन जायें। आपका मस्तक आत्म साक्षात्कार कराये। आपके ओंठ सर्व को मुस्कराना सिखा दें। ऐसे चारों ओर चैतन्य म्यूजियम अपनी सेवा करते रहें। करने वाले हो ना? अच्छा है। उमंग-उत्साह तो अच्छा है ही और सदा उमंग-उत्साह में आगे बढ़ते रहेंगे।

डबल विदेशियों को मेले में मिलने में मज़ा आया? सिर्फ विदेश की सीज़न तो देखते ही रहते हो लेकिन इतना परिवार तो देखते नहीं हो तो डबल फायदा हो गया। बापदादा से मिलना हो गया और परिवार से भी मिलना हो गया। तो लक्की हो। अच्छा, फॉरेन के कोई भी सेन्टर्स पर रहने वाले टीचर्स हाथ उठाओ। जो भी चारों ओर सेवा में निमित्त रहते हैं उन सबको बापदादा श्रेष्ठ सेवा के भाग्यवान समझते हैं। सेवा का भाग्य प्राप्त होना ये बहुत बड़ा भाग्य है। सेवा में प्रत्यक्षफल प्राप्त होने का अनुभव बहुत सहज होता है। अभी-अभी सेवा की और अभी-अभी स्थिति में आगे बढ़ते रहे। अगर नि:स्वार्थ सेवा की तो सेवा का फल मिलता है। स्वार्थ का फल नहीं मिलता है। लेकिन आप सभी सेवाधारी हो। इसलिये सेवा का फल अवश्य मिलता है। भविष्य तो कुछ नहीं है, अभी का प्रत्यक्षफल आत्मा को उड़ती कला का बल देता है। इसलिये बापदादा निमित्त सेवाधारियों को देख खुश होते हैं। तो श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मायें हैं और सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य द्वारा अनेकों के भाग्य को जगाते रहेंगे। अच्छे हैं, अथक सेवा करते हैं। बापदादा के पास सबका रिकॉर्ड है। ऐसे नहीं, बापदादा के पास तो हम जाते ही नहीं, आते ही नहीं, पता ही नहीं… ये तो नहीं सोचते। जो गुप्त हैं वो सदा नयनों में हैं। गुप्त नहीं रह सकते हो, बाप के आगे प्रत्यक्ष हो। चाहे नाम हो, नहीं हो, सामने आओ, नहीं आओ, लेकिन सामने के बजाय नयनो में समाये हो। समझा?

चारों ओर के सर्व रुहानी प्योरिटी की पर्सनालिटी वाले विशेष आत्माओं को, सदा आदि से अन्त तक पर्सनालिटी की झलक दिखाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें, सदा पवित्रता, स्वच्छता, सत्यता के शक्ति से स्व को और विश्व को परिवर्तन करने वाले विश्व परिवर्तक आत्मायें, सदा निमित्त भाव से सेवाधारी बन प्रत्यक्षफल अनुभव करने वाले अनुभवी आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

दादियों से:- अच्छा रहा मेला? कोई तकलीफ तो नहीं हुई ना? सबके शुभ संकल्प और उमंग-उत्साह के संकल्प से सफलता है ही है। यह संगठन का संकल्प ऐसे होता है जो असफलता को मिटा देता है। जैसे किला होता है ना तो किला कमजोर तब होता है जब एक भी ईट हिलती है। और सब ईटे मजबूत हैं तो किला कभी हिल नहीं सकता। विजय है। तो ये भी संगठन से उमंग-उत्साह और श्रेष्ठ संकल्प से, सहयोग से सफलता हुई पड़ी है। अच्छा लगा और समय प्रति समय और अनुभव करते जाते हैं। पहले क्वेश्चन उठता था होगा? लेकिन जो सोचो उसमें सफलता है ही। तो सफलता मूर्त का वरदान संगठन की शक्ति को मिलता है। बापदादा सदा गुडमॉर्निंग, गुडनाइट करते हैं। अच्छा डबल विदेश उड़ रहा है ना।

अध्याय 1 : प्योरिटी ही वास्तविक रूहानी पर्सनालिटी

मुख्य संदेश

दुनिया शरीर, पद, धन और प्रसिद्धि की पर्सनालिटी को पहचानती है, जबकि बापदादा बताते हैं कि वास्तविक पर्सनालिटी केवल पवित्रता (Purity) है।

उदाहरण

जैसे एक सुगंधित पुष्प बिना बोले अपनी पहचान दे देता है, वैसे ही पवित्र आत्मा बिना परिचय दिए अपनी दिव्यता का अनुभव करा देती है।

मुरली नोट्स

  • प्योरिटी ही सबसे बड़ी पर्सनालिटी है।
  • पवित्र आत्मा को देखकर दूसरों को शांति का अनुभव होता है।
  • पर्सनालिटी दिखाई ही नहीं देती, अनुभव भी होती है।

अध्याय 2 : चारों कालों में आत्मा की महान पर्सनालिटी

मुख्य संदेश

बापदादा चार अवस्थाओं की स्मृति कराते हैं—

  • अनादिकाल
  • आदिकाल
  • मध्यकाल
  • वर्तमान ब्राह्मण जीवन

हर युग में आत्मा की महिमा श्रेष्ठ रही है।

उदाहरण

एक ही हीरा अलग-अलग प्रकाश में भी हीरा ही रहता है। उसी प्रकार आत्मा की श्रेष्ठता हर काल में बनी रहती है।

मुरली नोट्स

  • परमधाम में दिव्य ज्योति स्वरूप।
  • सतयुग में देव स्वरूप।
  • भक्ति में पूज्य स्वरूप।
  • संगमयुग में ब्राह्मण स्वरूप।

अध्याय 3 : स्मृति ही समर्थता का आधार

मुख्य संदेश

जिसकी स्मृति जागृत रहती है, उसकी शक्ति जागृत रहती है।

उदाहरण

मोबाइल की बैटरी चार्ज हो तो सभी कार्य सहज होते हैं; आत्मा की चार्जिंग परमात्म-स्मृति से होती है।

मुरली नोट्स

  • स्मृति = समर्थता।
  • समर्थ आत्मा के पास माया टिक नहीं सकती।
  • माया को भगाना नहीं, मायाजीत बनना है।

अध्याय 4 : मायाजीत बनने का सहज साधन

मुख्य संदेश

अपनी रूहानी पर्सनालिटी की निरंतर स्मृति ही मायाजीत बनने का अभ्यास है।

उदाहरण

यदि किसी विद्यार्थी ने पहले से अच्छी तैयारी की हो तो परीक्षा में घबराहट नहीं होती।

मुरली नोट्स

  • अन्त समय का अभ्यास अभी से करें।
  • “मैं आत्मा हूँ” केवल कहना नहीं, अनुभव करना है।
  • लम्बे समय का अभ्यास अन्त समय में सहायक बनता है।

अध्याय 5 : पवित्रता का सूक्ष्म अर्थ

मुख्य संदेश

पवित्रता केवल ब्रह्मचर्य नहीं, बल्कि संकल्प, बोल और कर्म की स्वच्छता भी है।

उदाहरण

साफ़ दिखाई देने वाले काँच पर भी यदि हल्की धूल हो तो चमक कम हो जाती है।

मुरली नोट्स

  • व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता है।
  • विधिपूर्वक कार्य करना पवित्रता है।
  • सत्यता और स्वच्छता पवित्रता की पहचान हैं।

अध्याय 6 : सूक्ष्म चेकिंग

मुख्य संदेश

प्रतिदिन अपने संकल्प, बोल और कर्म की सूक्ष्म जाँच करें।

उदाहरण

एक पायलट उड़ान से पहले छोटी-से-छोटी जाँच करता है; इसी प्रकार आत्मा को भी आत्म-परीक्षण करना चाहिए।

मुरली नोट्स

  • मोटी नहीं, महीन चेकिंग।
  • छोटी गलती भी संस्कार बन सकती है।
  • निरंतर जागरूकता आवश्यक है।

अध्याय 7 : अशरीरी अभ्यास

मुख्य संदेश

दिन में अनेक बार केवल एक सेकण्ड के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करें।

अभ्यास

  • मैं आत्मा हूँ।
  • मैं प्रकाश हूँ।
  • मैं परमपिता के साथ हूँ।

मुरली नोट्स

  • एक सेकण्ड का अभ्यास जीवन बदल सकता है।
  • अचानक आने वाले समय के लिए तैयार रहें।

अध्याय 8 : विशेष वर्गों के लिए बापदादा की प्रेरणा

कुमारियाँ

  • देवी स्वरूप का अनुभव कराएँ।
  • चेहरा ही संदेश बने।

कुमार

  • पवित्र देव आत्मा बनें।
  • दृष्टि और वृत्ति दोनों पवित्र रहें।

माताएँ

  • जगत माता बनकर आत्माओं को जगाएँ।

पाण्डव

  • सदैव विजयी बनने का संकल्प रखें।

टीचर्स

  • परिस्थिति बदले, स्थिति नहीं।

मधुबन निवासी

  • विश्व मंच के हीरो कलाकार बनें।

डबल विदेशी

  • चलते-फिरते आध्यात्मिक म्यूज़ियम बनें।

अध्याय 9 : इस मुरली का सार

पाँच अमूल्य शिक्षाएँ

  1. प्योरिटी ही वास्तविक पर्सनालिटी है।
  2. स्मृति से समर्थता आती है।
  3. समर्थता से माया समाप्त होती है।
  4. प्रतिदिन सूक्ष्म चेकिंग आवश्यक है।
  5. एक सेकण्ड का अशरीरी अभ्यास भविष्य का आधार है।

दैनिक अभ्यास

☑ अमृतवेले आत्म-स्मृति

☑ हर घंटे एक सेकण्ड अशरीरी अभ्यास

☑ रात्रि में संकल्प-बोल-कर्म की चेकिंग

☑ व्यर्थ संकल्प समाप्त

☑ स्वयं को सदा रूहानी पर्सनालिटी अनुभव करना


प्रेरणादायक संदेश

“जब आत्मा अपनी पवित्र रूहानी पर्सनालिटी को भूल जाती है तब माया प्रभाव डालती है। जब वही स्मृति जागृत रहती है, तब जीवन सहज ही मायाजीत बन जाता है।”

ॐ शान्ति

Disclaimer

यह प्रस्तुति आध्यात्मिक अध्ययन, आत्मचिंतन और व्यक्तिगत मनन के उद्देश्य से तैयार किए गए अव्यक्त बापदादा महावाक्यों का विषयानुसार सार, अध्याय विभाजन और व्याख्यात्मक नोट्स है। इसमें दिए गए उदाहरण केवल विषय को सरलता से समझाने के लिए जोड़े गए हैं; ये मूल मुरली का शब्दशः पाठ नहीं हैं।

यदि आप मूल अव्यक्त मुरली का अध्ययन करना चाहते हैं, तो अधिकृत ब्रह्माकुमारीज़ स्रोत से मूल पाठ अवश्य पढ़ें। इस सामग्री का उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म, समुदाय या संस्था की आलोचना या तुलना करना नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक मूल्यों के अध्ययन और आत्म-उन्नति को प्रोत्साहित करना है।

नी पर्सनालिटी का आधार क्या है?

उत्तर: आत्म-स्मृति, परमात्म-स्मृति और पवित्रता रूहानी पर्सनालिटी का आधार हैं।


3. प्रश्न: आत्मा की महान पर्सनालिटी किन-किन कालों में रहती है?

उत्तर: अनादिकाल, आदिकाल, मध्यकाल और वर्तमान संगमयुग—चारों कालों में आत्मा की श्रेष्ठ पर्सनालिटी रहती है।


4. प्रश्न: स्मृति को समर्थता का आधार क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि आत्म-स्मृति से आत्मा शक्तिशाली बनती है और शक्तिशाली आत्मा पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता।


5. प्रश्न: मायाजीत बनने का सबसे सहज साधन क्या है?

उत्तर: अपनी रूहानी पर्सनालिटी को सदा स्मृति में रखना और स्वयं को आत्मा अनुभव करना।


6. प्रश्न: बापदादा के अनुसार पवित्रता का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: केवल ब्रह्मचर्य नहीं, बल्कि संकल्प, बोल, कर्म, स्वच्छता, सत्यता और विधिपूर्वक जीवन जीना ही वास्तविक पवित्रता है।


7. प्रश्न: व्यर्थ संकल्प को भी अपवित्रता क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि व्यर्थ संकल्प समय, शक्ति और संतुष्टि को नष्ट कर देते हैं तथा आत्मा की पूर्णता में बाधा बनते हैं।


8. प्रश्न: आत्म-चेकिंग किस प्रकार करनी चाहिए?

उत्तर: प्रतिदिन अमृतवेले से रात्रि तक अपने संकल्प, बोल, कर्म और सेवा की सूक्ष्म चेकिंग करनी चाहिए।


9. प्रश्न: अशरीरी बनने का अभ्यास क्यों आवश्यक है?

उत्तर: ताकि अंतिम समय में सहज आत्मस्थिति बनी रहे और आत्मा तुरंत परमात्म-स्मृति में स्थित हो सके।


10. प्रश्न: दिन में अशरीरी अभ्यास कितनी बार करना चाहिए?

उत्तर: बीच-बीच में अनेक बार, कम से कम एक सेकण्ड के लिए अवश्य करना चाहिए।


11. प्रश्न: रूहानी पर्सनालिटी वाले की पहचान क्या है?

उत्तर: वह दूसरों की प्राप्तियों को देखकर तुलना नहीं करता, क्योंकि वह स्वयं सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न होता है।


12. प्रश्न: कुमारियों को बापदादा ने कौन-सी विशेष प्रेरणा दी?

उत्तर: अपने चेहरे, दृष्टि और चलन से पवित्र देवी स्वरूप का अनुभव कराना।


13. प्रश्न: कुमारों के लिए मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: स्वयं को पवित्र देव आत्मा समझना और दृष्टि-वृत्ति को पूर्णतः पवित्र रखना।


14. प्रश्न: माताओं का विशेष कर्तव्य क्या बताया गया?

उत्तर: जगत माता बनकर आत्माओं को अज्ञान की नींद से जगाना।


15. प्रश्न: पाण्डवों की विशेष पहचान क्या है?

उत्तर: सदा विजयी रहना और हर परिस्थिति में हार न मानना।


16. प्रश्न: टीचर्स के लिए बापदादा का मुख्य लक्ष्य क्या है?

उत्तर: परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन स्थिति कभी नहीं बदलनी चाहिए; सदा सम्पन्न और संतुष्ट रहना है।


17. प्रश्न: मधुबन निवासियों के लिए विशेष संदेश क्या है?

उत्तर: विश्व रंगमंच पर हर कर्म, संकल्प और बोल में हीरो पार्ट निभाना।


18. प्रश्न: डबल विदेशियों को क्या बनने की प्रेरणा दी गई?

उत्तर: चलते-फिरते आध्यात्मिक म्यूज़ियम बनकर अपने नयनों, मुस्कान और व्यक्तित्व से परमात्म-संदेश देना।


19. प्रश्न: क्रोध पर बापदादा ने क्या विशेष संकल्प कराया?

उत्तर: क्रोध-मुक्त जीवन अपनाकर स्वयं को विजयी और शांत स्वरूप बनाना।


20. प्रश्न: इस मुरली का मुख्य सार क्या है?

उत्तर: अपनी पवित्र रूहानी पर्सनालिटी की निरंतर स्मृति में रहकर, आत्म-स्मृति और परमात्म-स्मृति द्वारा सदा मायाजीत, शक्तिशाली, संतुष्ट और विश्व-परिवर्तक बनना।

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