RVS.भाग -3(19)“वर्तमान में आत्म-स्मृति ही सच्चा राजयोग है।”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
वर्तमान क्षण की शक्ति: अभी बदलो, अभी श्रेष्ठ बनो
राजयोग के वैज्ञानिक सिद्धांत | जीवन परिवर्तन का विज्ञान | अध्याय 19
“अभी नहीं तो कब? वर्तमान क्षण की शक्ति | भूतकाल छोड़ें, भविष्य बनाएं | Rajyoga Chapter 19”
वैकल्पिक शीर्षक:
“आपका जीवन केवल इसी क्षण बदल सकता है! | वर्तमान की शक्ति | राजयोग का गहरा रहस्य”
प्रस्तावना
राजयोग के वैज्ञानिक सिद्धांतों की श्रृंखला के जीवन परिवर्तन का विज्ञान — भाग 3 में आपका स्वागत है।
इस अध्याय में हम एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर मनन करेंगे:
अध्याय 19 — वर्तमान क्षण की शक्ति
हमारा शरीर वर्तमान में बैठा होता है, लेकिन हमारा मन अक्सर कहीं और होता है।
कभी हम बीते हुए कल की गलतियों में उलझे रहते हैं और कभी आने वाले कल की चिंता में खो जाते हैं। इसी बीच वर्तमान का वह अनमोल क्षण, जिसमें हम वास्तव में कुछ कर सकते हैं, हमारे हाथ से निकल जाता है।
इस अध्याय का मूल प्रश्न है:
क्या जीवन को भूतकाल या भविष्य में बदला जा सकता है?
उत्तर है—वास्तविक परिवर्तन का अवसर केवल वर्तमान कर्म में होता है।
1. माइंडफुलनेस क्या है?
आधुनिक मनोवैज्ञानिक संदर्भ में Mindfulness को सामान्यतः वर्तमान क्षण में जागरूक और उपस्थित रहने के अभ्यास के रूप में समझा जाता है।
सरल भाषा में:
जहां शरीर है, वहां मन भी हो।
यदि आप भोजन कर रहे हैं तो आपका ध्यान भोजन पर हो।
यदि आप किसी से बात कर रहे हैं तो आपका ध्यान सामने वाले व्यक्ति पर हो।
यदि आप कोई कार्य कर रहे हैं तो उस कार्य में पूरा ध्यान हो।
राजयोग के संदर्भ में इसे सजग वर्तमान चेतना और आत्म-स्मृति के अभ्यास से जोड़ा जा सकता है।
उदाहरण
आप ऑफिस में एक फाइल पर काम कर रहे हैं।
फाइल सामने है, लेकिन मन कल हुई बातचीत में है।
काम कर रहे हैं, लेकिन साथ-साथ भविष्य की चिंता चल रही है।
एक समय में एक कार्य पर पूरा ध्यान देना वर्तमान में सजग रहने का व्यावहारिक अभ्यास हो सकता है।
2. भूतकाल, भविष्य और वर्तमान
तीन शब्दों को समझिए:
भूतकाल = अनुभव
जो हो चुका है, वह हमारे लिए अनुभव और सीख बन सकता है।
भविष्य = संभावना
भविष्य अभी सामने नहीं आया है। उसके बारे में हम योजना और सकारात्मक तैयारी कर सकते हैं।
वर्तमान = कर्म का समय
विचार, निर्णय और कर्म करने का वास्तविक अवसर वर्तमान में ही मिलता है।
इसलिए इस अध्याय का महत्वपूर्ण सूत्र है:
“वर्तमान ही भविष्य का निर्माता है।”
3. बीज और फल का उदाहरण
कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में एक बीज है।
आप उसे आज मिट्टी में बोते हैं।
बीज आज बोया जाता है, लेकिन उसका फल भविष्य में मिलता है।
इसी प्रकार:
आज का विचार → आज का निर्णय → आज का कर्म → संस्कार → भविष्य की दिशा
इसलिए भविष्य की चिंता में खोने के बजाय वर्तमान में श्रेष्ठ बीज बोना अधिक महत्वपूर्ण है।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति भविष्य में शांत जीवन चाहता है, तो आज से ही उसे अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों में शांति का अभ्यास करना होगा।
4. तीर का उदाहरण — भूतकाल और वर्तमान
एक तीर धनुष से निकल चुका है।
क्या उसे वापस बुलाया जा सकता है?
नहीं।
यह भूतकाल का उदाहरण है।
लेकिन दूसरा तीर अभी धनुष पर रखा है।
उसे किस दिशा में छोड़ना है?
यह निर्णय अभी लिया जा सकता है।
यही वर्तमान की शक्ति है।
जो हो चुका है उसे हम बदल नहीं सकते, लेकिन अभी जो करना है उसकी दिशा पर ध्यान दे सकते हैं।
5. “अभी बदलो” — वर्तमान की शक्ति
अक्सर हम अपने जीवन में परिवर्तन को भविष्य के लिए टाल देते हैं:
“कल से शुरू करूंगा।”
“अगले महीने से ध्यान करूंगा।”
“समय मिलने पर योग करूंगा।”
“अभी परिस्थितियां ठीक नहीं हैं।”
लेकिन परिवर्तन का वास्तविक अभ्यास अभी शुरू होता है।
एक छोटा श्रेष्ठ विचार, एक सही निर्णय और एक श्रेष्ठ कर्म वर्तमान क्षण को बदल सकता है।
6. व्यर्थ संकल्प — ऊर्जा की चोरी
हमारी मानसिक शक्ति का एक बड़ा हिस्सा अनावश्यक विचारों में खर्च हो सकता है।
जैसे:
“ऐसा क्यों हुआ?”
“उसने ऐसा क्यों कहा?”
“कल क्या होगा?”
“अगर ऐसा हो गया तो?”
इन प्रश्नों पर विचार करने से पहले स्वयं से पूछें:
क्या इस विचार से वर्तमान में कोई उपयोगी कर्म निकल रहा है?
यदि उत्तर नहीं है, तो ध्यान को वर्तमान के किसी सार्थक कार्य की ओर वापस लाया जा सकता है।
उदाहरण
यदि किसी ने कल आपको कुछ कठोर शब्द कहे थे, तो दो विकल्प हैं:
विकल्प 1: पूरे दिन उसी घटना को दोहराते रहना।
विकल्प 2: घटना से सीख लेना और वर्तमान में अपने श्रेष्ठ कर्म पर ध्यान देना।
दूसरा विकल्प वर्तमान को बचाता है।
7. राजयोग क्या सिखाता है?
राजयोग केवल यह नहीं कहता कि वर्तमान में रहो।
यह आत्म-स्मृति का अभ्यास भी सिखाता है।
अर्थात:
“मैं शरीर नहीं, इस शरीर को चलाने वाली चेतन आत्मा हूं।”
जब व्यक्ति आत्म-स्मृति का अभ्यास करता है, तो वह अपने विचारों और कर्मों को अधिक सजगता से देखने का प्रयास कर सकता है।
आत्म-स्मृति का सरल अभ्यास
कुछ क्षण शांत होकर मन में अनुभव करें:
“मैं आत्मा हूं।”
“मैं अभी यहां हूं।”
“मैं शांत हूं।”
“मैं परमात्मा की संतान हूं।”
इन वाक्यों को केवल दोहराना ही उद्देश्य नहीं है; इनके अर्थ को अनुभव करने का प्रयास करना महत्वपूर्ण है।
8. दैनिक जीवन में माइंडफुलनेस के उदाहरण
भोजन करते समय
मोबाइल को एक तरफ रखें और भोजन पर ध्यान दें।
भोजन करें — केवल भोजन करें।
परिवार में
जब कोई आपसे बात कर रहा हो, तो केवल उत्तर देने के लिए नहीं, बल्कि समझने के लिए सुनें।
ऑफिस में
एक समय में एक कार्य पूरा करने का प्रयास करें।
पहली फाइल → पूरा ध्यान → कार्य पूर्ण → अगली फाइल।
सेवा करते समय
सेवा को केवल कार्य न मानकर सजगता और शुभ भावना के साथ करने का अभ्यास करें।
मुरली सुनते समय
केवल शब्द सुनने के बजाय स्वयं से पूछें:
“इस शिक्षा को मैं आज अपने जीवन में कैसे उतार सकता हूं?”
9. पांच दैनिक संकल्प
सुबह उठकर इन पांच संकल्पों का अभ्यास किया जा सकता है:
1️⃣ वर्तमान
आज मैं वर्तमान क्षण में जीऊंगा/जीऊंगी।
2️⃣ व्यर्थ चिंतन
मैं व्यर्थ चिंतन से बचने का प्रयास करूंगा/करूंगी।
3️⃣ सजग कर्म
मैं हर कर्म पूरी सजगता से करूंगा/करूंगी।
4️⃣ आत्म-स्मृति
मैं हर घंटे एक मिनट आत्म-स्मृति का अभ्यास करूंगा/करूंगी।
5️⃣ पुरुषार्थ
मेरा आज का पुरुषार्थ मेरे कल की दिशा बनाएगा।
10. स्वयं को चेक करें
रात को कुछ मिनट आत्म-चेकिंग करें।
स्वयं से पूछें:
- आज मेरा मन अधिक कहां रहा—भूतकाल में या वर्तमान में?
- क्या मैंने अनावश्यक चिंतन में समय गंवाया?
- क्या मैं कार्य करते समय पूरी तरह उपस्थित था?
- क्या मैंने किसी परिस्थिति से सीख लेकर उसे छोड़ दिया?
- क्या मैंने आत्म-स्मृति का अभ्यास किया?
- क्या आज मैंने कोई श्रेष्ठ विचार और श्रेष्ठ कर्म किया?
आप चाहें तो इसका दैनिक चार्ट भी बना सकते हैं।
11. मुरली से संबंधित अध्ययन नोट्स
इस अध्याय के विषयों को समझने के लिए कुछ संबंधित अव्यक्त मुरली संदर्भ उपयोगी हो सकते हैं। नीचे तारीखें आधिकारिक Brahma Kumaris Murli Portal पर उपलब्ध विषय-सूची के आधार पर दी जा रही हैं। इन्हें मूल मुरली के संदर्भ में पढ़ना बेहतर रहेगा।
23 मार्च 1970
“सच्ची होली मनाना अर्थात् बीती को बीती करना”
अध्याय से संबंध:
बीती हुई बातों में फंसने के बजाय उनसे सीख लेकर आगे बढ़ने की भावना।
20 मई 1972
“सार-स्वरूप बनने से संकल्प और समय की बचत”
अध्याय से संबंध:
संकल्पों और समय को व्यर्थ होने से बचाने तथा सार में रहने की दिशा।
28 जून 1977
“वेस्ट (Waste) मत करो और वेट (Weight) कम करो”
अध्याय से संबंध:
व्यर्थ विचारों और अनावश्यक मानसिक बोझ से बचने का विषय।
11 अप्रैल 1982
“व्यर्थ का त्याग कर समर्थ बनो”
अध्याय से संबंध:
व्यर्थ संकल्पों को छोड़कर समर्थ और सकारात्मक संकल्पों की ओर बढ़ना। आधिकारिक Murli Portal की विषय-सूची में यह तारीख और शीर्षक दर्ज है।
12 दिसंबर 1983
“एकाग्रता से सर्व शक्तियों की प्राप्ति”
अध्याय से संबंध:
वर्तमान कार्य में ध्यान और एकाग्रता के महत्व को समझने के लिए उपयोगी संदर्भ।
31 दिसंबर 1991
“यथार्थ चार्ट का अर्थ है — प्रगति और परिवर्तन”
अध्याय से संबंध:
दैनिक आत्म-चेकिंग और अपने पुरुषार्थ की समीक्षा से जुड़ा हुआ संदर्भ।
31 दिसंबर 1992
“सफलता प्राप्त करने का साधन — सब कुछ सफल करो”
अध्याय से संबंध:
समय, संकल्प और कर्म को सार्थक बनाने की दिशा। आधिकारिक Murli Portal पर यह मुरली इसी तारीख के साथ सूचीबद्ध है।
9 दिसंबर 1993
“एकाग्रता की शक्ति से दृढ़ता द्वारा सहज सफलता की प्राप्ति”
अध्याय से संबंध:
एकाग्रता, दृढ़ता और श्रेष्ठ पुरुषार्थ के बीच संबंध को समझने के लिए उपयोगी अध्ययन संदर्भ।
नोट: ऊपर दिए गए मुरली शीर्षक और तारीखें अध्ययन-संदर्भ के रूप में हैं। वीडियो में किसी मुरली का शाब्दिक उद्धरण देने से पहले मूल मुरली पाठ से शब्दशः सत्यापन करना उचित है।
12. “बीता हुआ बीत गया” — गहरा संदेश
भूतकाल को मिटाना संभव नहीं है।
लेकिन भूतकाल के प्रति अपनी वर्तमान प्रतिक्रिया को बदला जा सकता है।
इसलिए:
भूतकाल से सीख लो।
भविष्य से प्रेरणा लो।
लेकिन कर्म वर्तमान में करो।
यही वर्तमान की शक्ति है।
13. तीन कालों का सरल सूत्र
भूतकाल
अनुभव और सीख।
वर्तमान
पुरुषार्थ और कर्म।
भविष्य
परिणाम और संभावना।
इसलिए वर्तमान को व्यर्थ गंवाना अपने हाथ में उपलब्ध अवसर को खोना है।
14. अंतिम सार
इस पूरे अध्याय को पांच सूत्रों में समझें:
1. भूतकाल बदला नहीं जा सकता।
2. भविष्य अभी आया नहीं है।
3. कर्म केवल वर्तमान में किया जा सकता है।
4. व्यर्थ संकल्प वर्तमान की शक्ति को कमजोर कर सकते हैं।
5. आत्म-स्मृति और सजग कर्म से वर्तमान को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास किया जा सकता है।
आज की स्मृति
भूतकाल — अनुभव है।
भविष्य — संभावना है।
वर्तमान — वास्तविक शक्ति है।
जो वर्तमान को जागरूकता और श्रेष्ठ पुरुषार्थ से जीने का अभ्यास करता है, वह अपने भविष्य की दिशा को बेहतर बनाने का अवसर प्राप्त करता है।
राजयोग का स्मृति-वाक्य
“वर्तमान में आत्म-स्मृति ही सच्चा राजयोग है।”
Disclaimer / अस्वीकरण
यह वीडियो शैक्षिक, आध्यात्मिक अध्ययन, आत्मचिंतन और व्यक्तिगत विकास के उद्देश्य से बनाया गया है।
इसमें Mindfulness (सजग वर्तमान चेतना) की आधुनिक मनोवैज्ञानिक अवधारणा तथा ब्रह्मा कुमारी राजयोग एवं मुरली शिक्षाओं के बीच विषयगत संबंध को समझाने का प्रयास किया गया है।
यह वीडियो किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक, मानसिक स्वास्थ्य या वैज्ञानिक उपचार-सलाह का विकल्प नहीं है। माइंडफुलनेस, ध्यान या राजयोग के अभ्यास से संबंधित व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्याओं के लिए योग्य स्वास्थ्य-पेशेवर की सलाह लेना उचित है।
वीडियो में प्रस्तुत आध्यात्मिक व्याख्याएं राजयोग के संदर्भ में हैं। इन्हें किसी विशिष्ट चिकित्सकीय या वैज्ञानिक परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
मुरली के संदर्भों में दी गई तारीखें और शीर्षक आधिकारिक Brahma Kumaris Murli Portal की विषय-सूचियों से सत्यापित अध्ययन-संदर्भ के रूप में दिए गए हैं। मूल मुरली के शाब्दिक उद्धरण के लिए संबंधित मूल पाठ देखें।
प्रश्न 1: अध्याय 19 का मुख्य विषय क्या है?
उत्तर: अध्याय 19 का मुख्य विषय “वर्तमान क्षण की शक्ति” है। इसमें समझाया गया है कि जीवन में वास्तविक परिवर्तन करने की शक्ति वर्तमान क्षण में ही होती है।
प्रश्न 2: माइंडफुलनेस क्या है?
उत्तर: माइंडफुलनेस का अर्थ है सजग वर्तमान चेतना—अर्थात व्यक्ति जिस कार्य को कर रहा है, उसमें पूरी जागरूकता और ध्यान के साथ उपस्थित रहना।
प्रश्न 3: वर्तमान क्षण इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर: क्योंकि भूतकाल में हो चुकी घटनाओं को बदला नहीं जा सकता और भविष्य अभी आया नहीं है। वर्तमान में ही हम विचार, निर्णय और कर्म कर सकते हैं।
प्रश्न 4: भूतकाल कहां रहता है?
उत्तर: भूतकाल मुख्य रूप से स्मृति में रहता है। हम उससे सीख सकते हैं, लेकिन बीती हुई घटनाओं को वापस जाकर बदल नहीं सकते।
प्रश्न 5: भविष्य कहां है?
उत्तर: भविष्य अभी वास्तविक रूप से हमारे सामने नहीं आया है। वह मुख्यतः कल्पना, संभावना और अपेक्षा के रूप में हमारे मन में रहता है।
प्रश्न 6: कर्म कब किया जा सकता है?
उत्तर: कर्म केवल वर्तमान क्षण में किया जा सकता है। वर्तमान में किए गए कर्म ही आगे चलकर हमारे अनुभवों और जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं।
प्रश्न 7: राजयोग वर्तमान के बारे में क्या सिखाता है?
उत्तर: राजयोग केवल वर्तमान में रहने की बात नहीं करता, बल्कि वर्तमान में आत्मा की स्मृति में स्थित होकर श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 8: वर्तमान और भविष्य का क्या संबंध है?
उत्तर: वर्तमान में किए गए विचार, निर्णय और कर्म भविष्य की दिशा निर्धारित करने में भूमिका निभाते हैं। इसलिए कहा जाता है—“वर्तमान ही भविष्य का निर्माता है।”
प्रश्न 9: व्यर्थ चिंतन क्या है?
उत्तर: बार-बार ऐसी बातों के बारे में सोचना जिन्हें हम बदल नहीं सकते या जिनका तत्काल कोई समाधान नहीं है, व्यर्थ चिंतन कहलाता है। जैसे—“ऐसा क्यों हुआ?”, “उसने ऐसा क्यों कहा?”, “कल क्या होगा?”
प्रश्न 10: व्यर्थ चिंतन से क्या समस्या हो सकती है?
उत्तर: लगातार व्यर्थ चिंतन से मानसिक ऊर्जा अनावश्यक रूप से खर्च हो सकती है, ध्यान भटक सकता है और वर्तमान कार्य पर हमारी एकाग्रता प्रभावित हो सकती है।
प्रश्न 11: “हर सेकंड को श्रेष्ठ बनाओ” का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि प्रत्येक वर्तमान क्षण का उपयोग जागरूकता, सकारात्मक विचार और श्रेष्ठ कर्म के लिए किया जाए। परिवर्तन को हमेशा भविष्य पर टालने के बजाय अभी से श्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न 12: तीर का उदाहरण वर्तमान को कैसे समझाता है?
उत्तर: जो तीर धनुष से निकल चुका है, उसे वापस नहीं बुलाया जा सकता। यह भूतकाल का प्रतीक है। लेकिन जो तीर अभी धनुष पर है, उसे सही दिशा में छोड़ा जा सकता है। यह वर्तमान का प्रतीक है।
प्रश्न 13: राजयोग में आत्म-स्मृति क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: आत्म-स्मृति का अर्थ स्वयं को शरीर से अलग शांत, चेतन आत्मा के रूप में अनुभव करना है। इससे व्यक्ति वर्तमान में अधिक सजग रहकर अपने विचारों और कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास कर सकता है।
प्रश्न 14: वर्तमान में आत्मा का अनुभव करने के लिए कौन-सा संकल्प किया जा सकता है?
उत्तर: मन ही मन ऐसे संकल्प किए जा सकते हैं—
“मैं आत्मा हूं।”
“मैं अभी यहां हूं।”
“मैं शांत हूं।”
“मैं परमात्मा की संतान हूं।”
प्रश्न 15: भोजन करते समय माइंडफुलनेस कैसे अपनाई जा सकती है?
उत्तर: भोजन करते समय पूरा ध्यान भोजन पर रखें। मोबाइल या अनावश्यक विचारों से ध्यान हटाने के बजाय भोजन को सजगता के साथ ग्रहण करें।
प्रश्न 16: कार्यालय में सजगता का अभ्यास कैसे करें?
उत्तर: एक समय में एक कार्य पर पूरा ध्यान दें। उदाहरण के लिए, पहले एक फाइल का काम पूरा करें और उसके बाद दूसरी फाइल पर ध्यान दें।
प्रश्न 17: मुरली सुनते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: केवल शब्द सुनना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक संदेश को समझकर उसे जीवन में उतारने का श्रेष्ठ संकल्प करना चाहिए।
प्रश्न 18: पांच दैनिक संकल्प कौन-से हैं?
उत्तर:
- आज मैं वर्तमान क्षण में जीऊंगा/जीऊंगी।
- मैं व्यर्थ चिंतन नहीं करूंगा/करूंगी।
- मैं हर कर्म पूरी सजगता से करूंगा/करूंगी।
- मैं हर घंटे एक मिनट आत्म-स्मृति में रहूंगा/रहूंगी।
- मेरा आज का पुरुषार्थ मेरा कल का भाग्य बनाएगा।
प्रश्न 19: स्वयं को चेक करने के लिए कौन-से प्रश्न पूछने चाहिए?
उत्तर:
- मेरा मन अधिक कहां रहता है—भूतकाल में या भविष्य में?
- क्या मैं वर्तमान क्षण का आनंद ले पाता/पाती हूं?
- क्या मैं कार्य करते समय पूरी तरह उपस्थित रहता/रहती हूं?
- क्या मैं हर घंटे एक मिनट आत्म-स्मृति का अभ्यास करता/करती हूं?
प्रश्न 20: भूतकाल से हमें क्या लेना चाहिए?
उत्तर: भूतकाल से सीख और अनुभव लेना चाहिए। पिछली गलतियों को बार-बार दोहराने या उनमें उलझे रहने के बजाय उनसे सबक लेकर वर्तमान को बेहतर बनाना चाहिए।
प्रश्न 21: भविष्य से हमें क्या लेना चाहिए?
उत्तर: भविष्य से प्रेरणा और सकारात्मक संभावना लेनी चाहिए, लेकिन वर्तमान के कर्मों को भविष्य की चिंता में खोना नहीं चाहिए।
प्रश्न 22: “श्रेष्ठ वर्तमान ही श्रेष्ठ भविष्य है” का क्या अर्थ है?
उत्तर: जब हम वर्तमान में श्रेष्ठ विचार, सही निर्णय और अच्छे कर्म करते हैं, तो भविष्य के लिए बेहतर आधार तैयार होता है। इसलिए वर्तमान को श्रेष्ठ बनाना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 23: जीवन को वास्तव में कब बदला जा सकता है?
उत्तर: जीवन में वास्तविक परिवर्तन करने का अवसर वर्तमान क्षण में ही होता है, क्योंकि विचार, निर्णय और कर्म अभी किए जा सकते हैं।
प्रश्न 24: आज का श्रेष्ठ विचार क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: एक श्रेष्ठ विचार सही निर्णय और श्रेष्ठ कर्म को जन्म दे सकता है। इसी प्रकार वर्तमान के अच्छे कर्म जीवन की दिशा को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
प्रश्न 25: इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि भूतकाल अनुभव है, भविष्य संभावना है और वर्तमान वास्तविक शक्ति है। इसलिए वर्तमान क्षण में आत्म-स्मृति, सजगता और श्रेष्ठ कर्म का अभ्यास करना चाहिए।
अंतिम स्मृति
“वर्तमान में आत्म-स्मृति ही सच्चा राजयोग है।”
वर्तमान को जागरूकता से जीना, व्यर्थ चिंतन से बचना और प्रत्येक कर्म को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करना ही इस अध्याय की मुख्य प्रेरणा है।

