AW.(13) 17-04-1969 ““पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं”
(आबू ‘आध्यात्मिक संग्रहालय’ का उद्घाटन)
सर्व स्नेही बच्चों को बाप की नमस्ते। आपका स्नेह किससे है? (कोई ने कहा बाप से, कोई ने कहा सर्विस से) और भी किससे स्नेह है? अभी भी एक बात रह गई है। बापदादा से स्नेह तो है, लेकिन साथ-साथ पुरुषार्थ से भी ज्यादा स्नेह रखना चाहिए। दैवी परिवार से स्नेह, सर्विस से स्नेह, बापदादा से स्नेह, यह तो है ही। लेकिन वर्तमान समय पुरुषार्थ से ज्यादा स्नेह रखना चाहिए। जो पुरुषार्थ के स्नेही होंगे वो सबके स्नेही होंगे। पुरुषार्थ से हरेक का कितना स्नेह है वो हरेक को चेक करना है। बापदादा से भी स्नेह इसलिए है कि वो पुरुषार्थ कराते हैं। प्रालब्ध से भी स्नेह तब होगा जब पहले पुरुषार्थ से स्नेह होगा। दैवी परिवार का भी स्नेह तब तक ले अथवा दे नहीं सकते जब तक पुरुषार्थ से स्नेह नहीं। अगर पुरुषार्थ से स्नेह है तो वो एक दो के स्नेह के पात्र बन सकते हैं। स्नेह के कारण ही यहाँ इकट्ठे हुए हो, लेकिन बापदादा के स्नेह में रहते हो। अब पुरुषार्थ से भी स्नेह रखना है। क्योंकि यही पुरुषार्थ ही तुम बच्चों की सारे कल्प की प्रालब्ध बनाता है।
जितना बच्चों का स्नेह है उतना उससे बहुत अधिक बापदादा का भी है। जितना जो स्नेही है उतना उसको स्नेह का रेसपान्ड मिलता रहता है। अव्यक्त रूप से स्नेह को लेना है। अव्यक्त स्नेह का पाठ कहाँ तक पढ़ा है? वर्तमान समय का पाठ यही है। अव्यक्त रूप से स्नेह को लेना और स्नेह से सर्विस का सबूत देना है। यह अव्यक्ति स्नेह का पाठ कहाँ तक पक्का किया है? अब क्या रिजल्ट समझते हो? आधे तक पहुंचे हो? मैजारटी की रिजल्ट पूछते हैं। (कोई ने कहा 25 प्रतिशत कोई ने कहा 75 प्रतिशत) 25 प्रतिशत और 75 प्रतिशत में कितना फर्क है। मैजारटी 25 प्रतिशत समझते हैं, ऐसी रिजल्ट क्यों हैं? इसका कारण क्या है? 25 प्रतिशत अव्यक्त स्नेह है तो बाकी 75 प्रतिशत कौन सा स्नेह है? मैजारटी की अगर 25 प्रतिशत रिजल्ट रही तो जो भविष्य समय आने वाला है उसमें पास मार्क्स कैसे होंगी? अब तो अव्यक्त स्नेह ही मुख्य है। अव्यक्त स्नेह ही याद की यात्रा को बल देता है। अव्यक्त स्नेह ही अव्यक्ति स्थिति बनाने की मदद देता है। 25 प्रतिशत यह रिजल्ट क्यों? कारण सोचा है? समय अनुसार अब तक यह रिजल्ट नहीं होनी चाहिए। समय के प्रमाण तो 75 प्रतिशत होनी चाहिए। फिर ऐसी रिजल्ट बनाने के लिए क्या करेंगे? उसका तरीका क्या है? (अन्तर्मुखता) यह तो सदैव कहते हो अन्तर्मुख होना है। लेकिन ना होने का कारण क्या है?
बापदादा से, सर्विस से स्नेह तो है ही। लेकिन पुरुषार्थ से स्नेह कम है। इसका भी कारण यह देखा जाता है कि बहुत करके परिस्थितियों को देख परेशान हो जाते हैं। परिस्थितियों का आधार ले स्थिति को बनाते हैं। स्थिति से परिस्थिति को बदलते नहीं। समझते हैं कि जब परिस्थिति को बदलेंगे तब स्थिति होगी। लेकिन होनी चाहिए स्व-स्थिति की पावर जिससे ही परिस्थितियां बदलती हैं। वो परिस्थिति है, यह स्व-स्थिति है। परिस्थिति में आने से कमजोरी में आ जाते। स्व-स्थिति में आने से शक्ति आती है। तो परिस्थिति में आकर ठहर नहीं जाना है। स्व-स्थिति की इतनी शक्ति है जो कोई भी परिस्थिति को परिवर्तन कर सकती है। स्व-स्थिति की कमजोरी होने के कारण कहाँ-कहाँ परिस्थिति प्रबल हो जाती है। मैजारटी बच्चे यही कहते रहते हैं – बाबा, इस बात को ठीक करो तो हम ऐसे बनें। इस बात की रुकावट है। ऐसे कोई विरले हैं जो अपनी हिम्मत दिखाते हैं कि इस परिस्थिति को पार करके ही दिखायेंगे। अर्जी डालते हैं, यह भी ठीक है लेकिन अर्जी के साथ-साथ जो शिक्षा मिलती है, उसको स्वरूप में लाते नहीं। सबकी अर्जियों की फाईल बहुत इकट्ठी हो गई है। जैसे धर्मराज के चौपड़े होते हैं ना। वैसे वर्तमान समय बापदादा पास बच्चों की अर्जियां बहुत हैं। हरेक का फाईल है। मुख्य बात तो सुनाई कि पुरुषार्थ से स्नेह रखना है। अपने को आप क्या कहते हो? (पुरुषार्थी हैं) आप पुरुषार्थी हो फिर पुरुषार्थ को नहीं जानते हो, अपनी फाईल को जानते हो? अपना पुरुषार्थ क्या है उसका पता है? साकार रूप में फाईनल स्थिति देखी ना। तो साकार रूप में कर्म करके दिखाया तो उससे फाईनल स्टेज का पता पड़ा ना। फाईनल स्टेज के प्रमाण जो कुछ कमी देखने में आती है, उस कमी को शीघ्र निकालना ही पुरुषार्थ से प्यार है। धीरे-धीरे नहीं करना चाहिए। साकार का भी मुख्य गुण देखा वह कोई भी बात को पीछे के लिए नहीं छोड़ते थे। अभी ही करना है। जैसे ही वो ”अभी करते थे“ वैसे ही अभी करना है। ऐसे नहीं कि कब कर लेंगे, 10 व 15 दिन के बाद कर लेंगे। मधुबन जाकर पिछाड़ी को प्रैक्टिस कर लेंगे। ऐसे इन्तजार बहुत करते हैं। इन्तजाम को भूल जाते हैं। इन्तजाम नहीं करते। बातों का इन्तजार बहुत करते हैं। इन्तजार को निकाल इन्तजाम में लग जायेंगे फिर 75 प्रतिशत रिजल्ट हो जायेगी।
वर्तमान समय मैजारटी के पुरुषार्थ की रिजल्ट 75 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए। कारण भी सुना रहे हैं, कोई समय का इन्तजार कर रहे हैं कोई समस्याओं का, कोई सम्बन्धों का, कोई फिर अपने शरीर का। लेकिन जैसे हैं, जो भी सामने हैं वैसी ही हालतों में इस ही शरीर में हमको सम्पूर्ण बनना है, यह लक्ष्य रखना है। अभी कुछ आधार होने के कारण अधीन बन जाते हैं। बातों के अधीन हैं। हरेक अपनी-अपनी कहानी अमृतवेले सुनाते हैं। कोई कहते हैं शरीर का रोग ना हो तो हम बहुत पुरुषार्थ करें। कोई कहते बन्धन हटा दो। लेकिन यह तो एक बन्धन हटेगा दूसरा आयेगा। तन का बन्धन हटेगा, मन का आयेगा, धन का आयेगा, सम्बन्ध का आयेगा फिर क्या करेंगे? यह खुद नहीं हटेंगे। अपनी ही शक्ति से हटाने हैं। कई समझते हैं बापदादा हटायेंगे या समय प्रमाण हटेंगे। परन्तु यह नहीं समझना है। अभी तो समय नज़दीक पहुंच गया है, जिसमें अगर ढीला पुरुषार्थ रहा तो यह पुरुषार्थ का समय हाथ से खो देंगे। अभी तो एक-एक सेकेण्ड, एक-एक श्वाँस, मालूम है कितने श्वाँस चलते हैं? अनगिनत हैं ना। तो एक-एक श्वाँस, एक-एक सेकेण्ड, सफल होना चाहिए अभी ऐसा समय है। अगर कुछ भी अलबेलापन रहा तो जैसे कई बच्चों ने साकार मधुर मिलन का सौभाग्य गंवा दिया, वैसे ही यह पुरुषार्थ के सौभाग्य का समय भी हाथ से चला जायेगा। इसलिए पहले से ही सुना रहे हैं। पुरुषार्थ से स्नेह रख पुरुषार्थ को आगे बढ़ाओ।
ऊपर से सारा खेल देखते रहते हैं। तुम भी आकर देखो तो बड़ा मजा आयेगा। बहुत रमणीक खेल बच्चों का देखते हैं। आप भी देख सकते हो। अगर अपनी ऊंच अवस्था में स्थित होकर देखो तो अपने सहित औरों का भी खेल देखने में आयेगा। बापदादा तो देखते रहते हैं। हंसी का खेल है। बड़े-बड़े महारथी शेर से नहीं डरते, मगर चींटी से डर जाते हैं। शेर से बड़ा सहज मुकाबला कर लेते, लेकिन चींटी को कुचलने का तरीका नहीं जानते। यह है महारथियों का खेल। घोड़ेसवार पता है क्या करते हैं? (गैलप करते हैं) घोड़ेसवारों का भी खेल देखते हैं। महारथियों का तो सुनाया? घोड़ेसवार जो हैं, उन्हों की हिम्मत उत्साह बहुत है, पुरुषार्थ में कदम भी बढ़ाते हैं। लेकिन गैलप करते-करते (फिसल जाते हैं) फिसलते भी नहीं, गिरते भी नहीं, थकते भी नहीं। अथक भी हैं, चलते भी बहुत अच्छे हैं लेकिन जो मार्ग की सीन सीनरियां हैं उनमें आकर्षित हो जाते हैं। अपने पुरुषार्थ को चलाते भी रहते हैं लेकिन देखने के संस्कार जास्ती हैं। यह क्या कर रहे हैं, यह कैसे करते हैं, तो हम भी करें। रीस करते हैं। तो घोड़े सवारों में देखने का आकर्षण ज्यादा है। प्यादों की एक हंसी की बात है। खेल सुना रहे हैं ना। वो क्या करते हैं? होती है बहुत छोटी सी बात लेकिन उसको इतना बड़ा पहाड़ बना देते। पहाड़ को राई नहीं। राई को पहाड़ बनाकर उसमें खुद ही परेशान हो जाते हैं। है कुछ भी नहीं, उनको सब कुछ बना देते। ऊंचा-ऊंचा देख हिम्मतहीन हो जाते हें। फिर भी वर्तमान समय जो भी तीनों ही हैं उनमें से आधा क्वालिटी ऐसी है जो अपने को कुछ बदल रहे हैं। इसलिए फिर भी बापदादा हर्षित होते हैं, उन्हों की हिम्मत हुल्लास, कदम आगे बढ़ता हुआ देख। हरेक से पूछें कि कौन महारथी, कौन घोड़सवार, कौन प्यादे हैं तो बता सकेंगे?
पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं
17 अप्रैल 1969 — अव्यक्त मुरली
स्थान: आबू — “आध्यात्मिक संग्रहालय” का उद्घाटन
मुख्य विषय: पुरुषार्थ, अव्यक्त स्नेह, स्व-स्थिति, हिम्मत-उल्लास और तीव्र पुरुषार्थ
यह मुरली 17 अप्रैल 1969 की है और आधिकारिक Brahma Kumaris मुरली पोर्टल पर इसी शीर्षक के साथ उपलब्ध है।
क्या आपका स्नेह सच में पुरुषार्थ से है? | “पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं” | 17 अप्रैल 1969 अव्यक्त मुरली
Short Title
“पुरुषार्थ से प्यार है या परिस्थितियों से?” | अव्यक्त मुरली
Disclaimer
Disclaimer: यह अध्याय 17 अप्रैल 1969 की अव्यक्त मुरली पर आधारित एक अध्ययनात्मक एवं आध्यात्मिक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य मुरली के संदेश को सरल भाषा, उदाहरणों और आत्म-चिंतन के माध्यम से समझने में सहायता करना है। मूल मुरली का अर्थ और संदर्भ सर्वोपरि है। यह प्रस्तुति किसी व्यक्तिगत, चिकित्सकीय, कानूनी या अन्य पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।
अध्याय 1 — सच्चा स्नेह किससे?
बापदादा बच्चों से पूछते हैं—आपका स्नेह किससे है?
बच्चे कहते हैं—बाप से, सर्विस से।
लेकिन मुरली एक और महत्वपूर्ण बात सामने रखती है:
बापदादा से स्नेह के साथ-साथ पुरुषार्थ से भी अधिक स्नेह होना चाहिए।
दैवी परिवार से स्नेह, सर्विस से स्नेह और बापदादा से स्नेह तो है ही, लेकिन वर्तमान समय में पुरुषार्थ से स्नेह विशेष रूप से आवश्यक है। क्योंकि पुरुषार्थ ही भविष्य की प्रालब्ध का आधार बनता है।
उदाहरण
किसी विद्यार्थी को अपने शिक्षक से बहुत प्रेम है, लेकिन पढ़ाई से प्रेम नहीं है। क्या वह परीक्षा में श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त कर सकता है?
इसी प्रकार बापदादा से स्नेह है, लेकिन अपने पुरुषार्थ से स्नेह नहीं है, तो स्नेह का वास्तविक सबूत कहाँ दिखाई देगा?
बाप से स्नेह की निशानी है—पुरुषार्थ में आगे बढ़ना।
अध्याय 2 — पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही
मुरली का मुख्य सूत्र है:
“जो पुरुषार्थ के स्नेही होंगे वो सबके स्नेही होंगे।” जब व्यक्ति अपने पुरुषार्थ को महत्व देता है तो वह दूसरों की कमियों में उलझने के बजाय स्वयं को परिवर्तन करने पर ध्यान देता है।
ऐसी आत्मा—
- परिवार में स्नेह बनाए रखती है।
- सेवा में सहयोगी बनती है।
- दूसरों के संस्कारों को स्वीकार करना सीखती है।
- अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करती है।
- बापदादा के प्रति सच्चे स्नेह का सबूत देती है।
आत्म-चेकिंग
“मेरा दूसरों से स्नेह कितना है?” पूछने से पहले पूछें:
“मेरा अपने पुरुषार्थ से स्नेह कितना है?”
अध्याय 3 — पुरुषार्थ ही प्रालब्ध बनाता है
मुरली स्पष्ट करती है कि पुरुषार्थ ही सारे कल्प की प्रालब्ध बनाता है।
इसलिए केवल भविष्य के अच्छे फल की इच्छा करना पर्याप्त नहीं है।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य की इच्छा करे लेकिन रोज अपनी दिनचर्या को ठीक न करे, तो केवल इच्छा से परिणाम नहीं मिलेगा।
उसी प्रकार:
श्रेष्ठ प्रालब्ध की इच्छा → श्रेष्ठ पुरुषार्थ → श्रेष्ठ कर्म → श्रेष्ठ प्राप्ति।
इसलिए प्रालब्ध से पहले पुरुषार्थ को महत्व देना है।
अध्याय 4 — अव्यक्त स्नेह का पाठ
मुरली में वर्तमान समय का एक विशेष पाठ बताया गया है:
अव्यक्त रूप से स्नेह लेना और स्नेह से सर्विस का सबूत देना।
अव्यक्त स्नेह केवल भावनात्मक अनुभव नहीं है। उसका परिणाम हमारी स्थिति और सेवा में दिखाई देना चाहिए।
अव्यक्त स्नेह की निशानी
यदि बापदादा से स्नेह है तो—
याद मजबूत होगी।
स्थिति ऊँची होगी।
सेवा में उमंग होगा।
पुरुषार्थ तीव्र होगा।
अर्थात् स्नेह का वास्तविक प्रमाण स्वरूप है।
अध्याय 5 — 25% या 75%?
मुरली में बच्चों की अव्यक्त स्नेह की रिजल्ट पर चिंतन कराया गया है। कुछ बच्चों ने 25 प्रतिशत और कुछ ने 75 प्रतिशत बताया।
फिर प्रश्न उठता है:
यदि वर्तमान समय में रिजल्ट केवल 25 प्रतिशत है तो भविष्य की परीक्षा में पास मार्क्स कैसे आएंगी?
समय के प्रमाण रिजल्ट अधिक श्रेष्ठ होनी चाहिए।
यहाँ मुख्य शिक्षा है:
सिर्फ स्नेह की बात नहीं करनी है, स्नेह को पुरुषार्थ में बदलना है।
आत्म-चेकिंग
आज स्वयं से पूछें:
- मेरी याद कितनी स्थिर है?
- परिस्थिति आने पर मेरी स्थिति कितनी स्थिर रहती है?
- मेरी सेवा में स्नेह का कितना सबूत दिखाई देता है?
- क्या मैं अपने पुरुषार्थ को प्राथमिकता देता हूँ?
अध्याय 6 — परिस्थिति या स्व-स्थिति?
मुरली का एक बहुत शक्तिशाली संदेश है:
परिस्थिति के आधार पर अपनी स्थिति नहीं बनानी है।
स्व-स्थिति की शक्ति से परिस्थिति को बदलना है।
परिस्थिति में आने से कमजोरी आती है।
स्व-स्थिति में स्थित होने से शक्ति आती है।
इसलिए समस्या यह नहीं कि परिस्थिति कैसी है।
मुख्य प्रश्न यह है:
“उस परिस्थिति में मेरी स्व-स्थिति कैसी है?”
उदाहरण
दो व्यक्तियों के सामने एक ही समस्या आती है।
पहला व्यक्ति कहता है:
“यह समस्या खत्म होगी तभी मैं शांत रहूँगा।”
दूसरा व्यक्ति कहता है:
“मैं अपनी शांति को इस समस्या के अधीन नहीं होने दूँगा।”
दूसरा व्यक्ति स्व-स्थिति की शक्ति का प्रयोग कर रहा है।
अध्याय 7 — “बाबा, यह बात ठीक कर दो…”
मुरली में बताया गया है कि कई बच्चे कहते हैं:
“बाबा, यह परिस्थिति ठीक हो जाए तो हम ऐसे बनें।”
यह सोच पुरुषार्थ को परिस्थिति के अधीन बना देती है।
लेकिन सच्चा पुरुषार्थी कहता है:
“परिस्थिति चाहे जैसी हो, मैं इसे पार करके दिखाऊँगा।”
यही हिम्मत है।
याद रखने योग्य सूत्र
परिस्थिति मेरी परीक्षा है, मेरी पहचान नहीं।
मेरी पहचान मेरी स्व-स्थिति से है।
अध्याय 8 — अर्जी के साथ शिक्षा को स्वरूप बनाना
बापदादा के पास बच्चों की अनेक अर्जियाँ आती हैं। अपनी समस्या बताना गलत नहीं है।
लेकिन केवल अर्जी देना पर्याप्त नहीं।
अर्जी + शिक्षा = परिवर्तन
यदि शिक्षा सुनने के बाद भी वही संस्कार चलते रहें, तो पुरुषार्थ अभी प्रैक्टिकल नहीं हुआ।
उदाहरण
यदि कोई कहता है:
“मुझे क्रोध बहुत आता है।”
और उसे क्रोध को जीतने की शिक्षा मिलती है, लेकिन अगली बार वही प्रतिक्रिया फिर होती है, तो अभी शिक्षा स्वरूप नहीं बनी।
सच्चा पुरुषार्थ होगा:
समस्या पहचानी → शिक्षा ली → अगली परिस्थिति में प्रयोग किया → धीरे-धीरे संस्कार बदला।
अध्याय 9 — पुरुषार्थ से प्यार की निशानी
मुरली में बहुत स्पष्ट दिशा दी गई है:
जो कमी फाइनल स्टेज के प्रमाण में दिखाई देती है, उसे शीघ्र निकालना ही पुरुषार्थ से प्यार है।
अर्थात् अपनी कमी को भविष्य पर नहीं छोड़ना।
यह नहीं:
“कभी न कभी ठीक हो जाएगा।”
बल्कि:
“जो समझ आया, उसे अभी से बदलना है।”
अध्याय 10 — “अभी करना है”
साकार रूप की एक विशेषता बताई गई है—बातों को पीछे के लिए नहीं छोड़ना।
दो मानसिकताएँ
पहली:
“10-15 दिन बाद अभ्यास करेंगे।”
दूसरी:
“जो समझ आया, उसका अभ्यास आज से शुरू करेंगे।”
मुरली का संदेश है:
इंतजार को निकालो, इंतजाम में लगो।
यही पुरुषार्थ को तीव्र बनाने की युक्ति है।
अध्याय 11 — इंतजार नहीं, इंतजाम
कई बार हम किसी चीज के बदलने का इंतजार करते हैं:
- समय बदल जाए।
- परिस्थिति बदल जाए।
- सम्बन्ध बदल जाएँ।
- शरीर ठीक हो जाए।
- समस्या समाप्त हो जाए।
- कोई दूसरा व्यक्ति बदल जाए।
लेकिन सच्चा पुरुषार्थ इन सबका इंतजार नहीं करता।
जो साधन और परिस्थिति अभी मिली है, उसी में सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य रखता है।
अध्याय 12 — शरीर और बंधनों का आधार
कई बार व्यक्ति सोचता है:
“शरीर ठीक हो जाए तो मैं अच्छा पुरुषार्थ करूँगा।”
या:
“मेरा बंधन हट जाए तो मैं आगे बढ़ूँगा।”
लेकिन एक बंधन हटने के बाद दूसरा बंधन सामने आ सकता है।
तन का बंधन हटे तो मन का,
मन का हटे तो धन का,
धन का हटे तो सम्बन्ध का।
इसलिए बाहरी बंधनों के खत्म होने का इंतजार नहीं करना है।
अपनी शक्ति से बंधनों को पार करना है।
अध्याय 13 — एक-एक सेकण्ड, एक-एक श्वास सफल
मुरली वर्तमान समय को अत्यंत महत्वपूर्ण बताती है।
एक-एक सेकण्ड और एक-एक श्वास को सफल करना है।
अलबेलापन इस श्रेष्ठ समय को हाथ से निकाल सकता है।
व्यावहारिक उदाहरण
अमृतवेले में पाँच मिनट अतिरिक्त याद का अवसर मिला—सफल करें।
किसी ने आलोचना की—स्थिति को स्थिर रखने का अवसर मिला—सफल करें।
किसी संस्कार को पहचान लिया—उसे बदलने का अवसर मिला—सफल करें।
इस प्रकार हर परिस्थिति पुरुषार्थ की प्रयोगशाला बन सकती है।
अध्याय 14 — महारथी, घोड़ेसवार और प्यादे
मुरली में पुरुषार्थ की विभिन्न अवस्थाओं को खेल के उदाहरण से समझाया गया है।
महारथी
महारथी बड़ी-बड़ी परिस्थितियों से नहीं डरते।
लेकिन कभी-कभी बड़ी समस्या से तो सामना कर लेते हैं, छोटी-सी कमजोरी में फँस जाते हैं।
इसे मुरली में शेर और चींटी के उदाहरण से समझाया गया है।
उदाहरण
बड़ी जिम्मेवारी सहज संभाल लेना, लेकिन छोटी-सी आलोचना पर मन खराब हो जाना।
यह “चींटी” को पहचानने की जरूरत है।
घोड़ेसवार
घोड़ेसवारों में हिम्मत और उत्साह होता है। वे आगे बढ़ते हैं और पुरुषार्थ में कदम भी रखते हैं।
लेकिन उनकी कमजोरी है—दूसरों को देखकर आकर्षित होना।
“वह क्या कर रहा है?”
“वह कैसे कर रहा है?”
“हम भी ऐसा करें।”
यह देखने और री-स करने का आकर्षण पुरुषार्थ की एकाग्रता को प्रभावित कर सकता है।
उदाहरण
अपना पुरुषार्थ करने के बजाय लगातार यह देखना कि दूसरा व्यक्ति कितना आगे बढ़ गया।
तुलना पुरुषार्थ की शक्ति को बाहर ले जाती है।
प्यादे
प्यादे छोटी बात को बहुत बड़ा बना देते हैं।
मुरली इसे राई को पहाड़ बनाना कहकर समझाती है।
उदाहरण
किसी ने एक छोटी बात कह दी।
विचार शुरू हुए:
“उसने ऐसा क्यों कहा?”
“शायद वह मुझे पसंद नहीं करता।”
“अब आगे क्या होगा?”
“सब मेरे खिलाफ हैं।”
एक छोटी बात मन में बड़ा पहाड़ बन जाती है।
सच्चा पुरुषार्थी छोटी बात को वहीं समाप्त करना सीखता है।
अध्याय 15 — ऊँची अवस्था से खेल देखना
यदि हम अपनी ऊँची अवस्था में स्थित होकर परिस्थितियों और अपने संस्कारों को देखें तो बहुत कुछ स्पष्ट दिखाई देता है।
जैसे कोई व्यक्ति ऊँचाई से पूरा मैदान देख सकता है, वैसे ही ऊँची आत्मिक अवस्था से अपने और दूसरों के खेल को साक्षी होकर देख सकते हैं।
अभ्यास
जब कोई परिस्थिति आए तो तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
पहले स्वयं को याद दिलाएँ:
“मैं आत्मा हूँ। मैं इस परिस्थिति को ऊपर से देख रहा हूँ।”
फिर निर्णय लें।
अध्याय 16 — हिम्मत और हुल्लास
मुरली के अनुसार बापदादा उन बच्चों को देखकर हर्षित होते हैं जिनमें:
- हिम्मत है।
- उमंग है।
- उत्साह है।
- कदम आगे बढ़ रहा है।
- स्वयं को बदलने का प्रयास है।
इसलिए पुरुषार्थ का अर्थ परिपूर्ण होने का दावा करना नहीं है।
पुरुषार्थ का अर्थ है—हर दिन एक कदम आगे बढ़ना।
मुरली के मुख्य नोट्स
मुख्य तारीख
17 अप्रैल 1969
मुख्य शीर्षक
“पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं”
स्थान/प्रसंग
आबू — “आध्यात्मिक संग्रहालय” का उद्घाटन
मुख्य शिक्षाएँ
- पुरुषार्थ से स्नेह रखना है।
- पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं।
- पुरुषार्थ ही भविष्य की प्रालब्ध बनाता है।
- अव्यक्त स्नेह का सबूत सर्विस और स्थिति में देना है।
- परिस्थिति के आधार पर स्थिति नहीं बनानी है।
- स्व-स्थिति की शक्ति से परिस्थिति को बदलना है।
- अर्जी के साथ शिक्षा को स्वरूप में लाना है।
- अपनी कमी को भविष्य के लिए नहीं छोड़ना है।
- इंतजार नहीं, इंतजाम करना है।
- एक-एक सेकण्ड और एक-एक श्वास सफल करना है।
- शरीर, सम्बन्ध और परिस्थितियों के आधार पर अधीन नहीं बनना है।
- महारथी छोटी कमजोरियों को भी समाप्त करें।
- घोड़ेसवार दूसरों को देखकर प्रभावित न हों।
- प्यादे छोटी बात को बड़ा न बनायें।
- हिम्मत और हुल्लास से कदम आगे बढ़ाते रहें।
आज की आत्म-चेकिंग
रात को स्वयं से पूछें:
- क्या मुझे पुरुषार्थ से वास्तव में स्नेह है?
- क्या मैं परिस्थिति बदलने का इंतजार करता हूँ?
- क्या मैं अपनी स्व-स्थिति से परिस्थिति को बदल सकता हूँ?
- कौन-सी कमी मैं “बाद में” सुधारने के लिए छोड़ रहा हूँ?
- क्या मैं “इंतजार” अधिक करता हूँ या “इंतजाम”?
- क्या छोटी बात को बड़ा बनाकर स्वयं परेशान होता हूँ?
- क्या मैं दूसरों को देखकर अपने पुरुषार्थ की दिशा बदल देता हूँ?
- क्या मैं एक-एक सेकण्ड को सफल कर रहा हूँ?
- मेरी वर्तमान पुरुषार्थ की रिजल्ट कितनी है?
- क्या मेरे पुरुषार्थ से दूसरों को भी स्नेह और शक्ति मिलती है?
अंतिम चिंतन
पुरुषार्थ से स्नेह का अर्थ है—अपने परिवर्तन को सबसे अधिक महत्व देना।
परिस्थिति बदलेगी तब मैं बदलूँगा—यह पुरुषार्थ नहीं।
परिस्थिति जैसी भी हो, मैं अपनी स्व-स्थिति को शक्तिशाली बनाऊँगा—यह पुरुषार्थ है।
समय बदलेगा तब मैं तैयार होऊँगा—यह इंतजार है।
जो करना है, अभी से करना—यह इंतजाम है।
दूसरों की कमजोरी देखकर परेशान होना नहीं।
अपनी शक्ति को बढ़ाना है।
छोटी बात को पहाड़ नहीं बनाना।
दूसरों की सीन-सीनरी में आकर्षित नहीं होना।
बड़ी परिस्थितियों से डरना नहीं।
और सबसे बढ़कर—
“पुरुषार्थ से स्नेह रखो, पुरुषार्थ को आगे बढ़ाओ—क्योंकि पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं।”
पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं
प्रश्नोत्तर — मुरली आधारित अध्ययन
प्रश्न 1. वर्तमान समय हमें किससे विशेष स्नेह रखना चाहिए?
उत्तर:
बापदादा से, सर्विस से और दैवी परिवार से स्नेह तो है ही, लेकिन वर्तमान समय पुरुषार्थ से विशेष स्नेह रखना चाहिए।
प्रश्न 2. पुरुषार्थ के स्नेही होने का क्या परिणाम होता है?
उत्तर:
जो पुरुषार्थ के स्नेही होते हैं, वे सबके स्नेही बनते हैं और दैवी परिवार के स्नेह के पात्र बनते हैं।
प्रश्न 3. प्रालब्ध से सच्चा स्नेह कब होगा?
उत्तर:
जब पहले पुरुषार्थ से स्नेह होगा। क्योंकि पुरुषार्थ ही सारे कल्प की प्रालब्ध बनाता है।
प्रश्न 4. बापदादा से हमारा स्नेह क्यों है?
उत्तर:
बापदादा से स्नेह इसलिए है क्योंकि वे हमें पुरुषार्थ कराते हैं और श्रेष्ठ स्थिति बनाने की शिक्षा देते हैं।
प्रश्न 5. अव्यक्त स्नेह का पाठ क्या है?
उत्तर:
अव्यक्त रूप से स्नेह लेना और उस स्नेह का सर्विस द्वारा सबूत देना ही अव्यक्त स्नेह का पाठ है।
प्रश्न 6. अव्यक्त स्नेह का याद की यात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
अव्यक्त स्नेह याद की यात्रा को बल देता है और अव्यक्त स्थिति बनाने में मदद करता है।
प्रश्न 7. यदि अव्यक्त स्नेह की रिजल्ट कम हो तो उसका कारण क्या है?
उत्तर:
मुख्य कारण यह है कि बापदादा और सर्विस से स्नेह तो है, लेकिन पुरुषार्थ से स्नेह कम है। साथ ही परिस्थितियों को देखकर परेशान होने से भी पुरुषार्थ कमजोर हो जाता है।
प्रश्न 8. परिस्थिति और स्व-स्थिति में क्या अंतर है?
उत्तर:
परिस्थिति बाहरी अवस्था है, जबकि स्व-स्थिति अपनी आत्मिक अवस्था है। परिस्थिति में आने से कमजोरी आती है, जबकि स्व-स्थिति में स्थित होने से शक्ति आती है।
प्रश्न 9. परिस्थितियों को बदलने का सही तरीका क्या है?
उत्तर:
परिस्थितियों के बदलने का इंतजार नहीं करना है। स्व-स्थिति की शक्ति से परिस्थितियों को परिवर्तन करना है।
प्रश्न 10. पुरुषार्थ में सबसे बड़ी रुकावट क्या बन जाती है?
उत्तर:
परिस्थितियों को आधार बनाकर अपनी स्थिति बनाना। कई बार हम सोचते हैं—“यह समस्या ठीक हो जाए तो मैं अच्छा पुरुषार्थ करूँगा।” यही सोच पुरुषार्थ को रोकती है।
प्रश्न 11. क्या बापदादा हमारी सभी परिस्थितियाँ स्वयं हटायेंगे?
उत्तर:
केवल परिस्थितियों के हटने का इंतजार नहीं करना है। अपनी हिम्मत और पुरुषार्थ की शक्ति से परिस्थितियों को पार करना है।
प्रश्न 12. केवल अर्जी लगाने से क्या पुरुषार्थ पूरा हो जाता है?
उत्तर:
नहीं। अर्जी देना ठीक है, लेकिन साथ-साथ जो शिक्षा मिलती है उसे स्वरूप में लाना आवश्यक है।
प्रश्न 13. सच्चे पुरुषार्थ से प्यार की निशानी क्या है?
उत्तर:
जो कमी दिखाई देती है, उसे भविष्य के लिए टालने के बजाय शीघ्र समाप्त करने का पुरुषार्थ करना ही पुरुषार्थ से प्यार है।
प्रश्न 14. साकार रूप से हमें कौन-सी विशेषता सीखनी चाहिए?
उत्तर:
किसी भी अच्छी बात को पीछे के लिए नहीं छोड़ना। जो करना है, उसे “अभी करना है”—यह विशेषता धारण करनी है।
प्रश्न 15. “इंतजार” और “इंतजाम” में क्या अंतर है?
उत्तर:
“इंतजार” अर्थात् समय, परिस्थिति या किसी बदलाव के आने की प्रतीक्षा करना।
“इंतजाम” अर्थात् अभी से अपनी स्थिति और पुरुषार्थ को ठीक करने की तैयारी करना।
पुरुषार्थी इंतजार नहीं करता, इंतजाम करता है।
प्रश्न 16. वर्तमान समय पुरुषार्थ की रिजल्ट कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
मुरली में कहा गया है कि वर्तमान समय मैजारिटी बच्चों की पुरुषार्थ की रिजल्ट 75 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए।
प्रश्न 17. पुरुषार्थ में किन चीजों का आधार लेकर हम अधीन बन जाते हैं?
उत्तर:
कभी परिस्थितियों का, कभी समस्याओं का, कभी सम्बन्धों का, कभी शरीर का और कभी अन्य बाहरी बातों का आधार लेकर हम अधीन बन जाते हैं।
प्रश्न 18. क्या एक बंधन हटने से सभी बंधन समाप्त हो जाते हैं?
उत्तर:
नहीं। एक बंधन हटेगा तो दूसरा बंधन सामने आ सकता है—तन, मन, धन या सम्बन्ध का। इसलिए बाहरी बंधनों के हटने का इंतजार नहीं करना है, बल्कि अपनी शक्ति से उन्हें पार करना है।
प्रश्न 19. पुरुषार्थ के लिए कौन-सा लक्ष्य रखना चाहिए?
उत्तर:
जैसी भी परिस्थिति हो, जैसा भी शरीर हो और जो भी परिस्थितियाँ सामने हों, इन्हीं साधनों और परिस्थितियों में सम्पूर्ण बनना है—यह लक्ष्य रखना चाहिए।
प्रश्न 20. वर्तमान समय का प्रत्येक सेकण्ड क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
क्योंकि पुरुषार्थ का समय बहुत मूल्यवान है। इसलिए एक-एक सेकण्ड और एक-एक श्वास को सफल करना है और अलबेलापन नहीं करना है।
प्रश्न 21. पुरुषार्थ के समय को खोने से क्या नुकसान हो सकता है?
उत्तर:
जिस प्रकार कुछ बच्चों ने साकार मधुर मिलन का सौभाग्य खो दिया, उसी प्रकार यदि अभी अलबेलापन रहा तो पुरुषार्थ के सौभाग्य का समय भी हाथ से निकल सकता है।
प्रश्न 22. महारथी किसे कहा गया है?
उत्तर:
महारथी वे हैं जो बड़ी-बड़ी परिस्थितियों और चुनौतियों से नहीं डरते और पुरुषार्थ में मजबूत रहते हैं।
प्रश्न 23. महारथियों की विशेष कमजोरी क्या बताई गई है?
उत्तर:
कभी वे बड़ी समस्या को तो सहज पार कर लेते हैं, लेकिन छोटी-सी बात—“चींटी”—में उलझ जाते हैं। अर्थात् छोटी कमजोरियों को पहचानकर समाप्त करने में कठिनाई होती है।
प्रश्न 24. घोड़ेसवारों की विशेषता क्या है?
उत्तर:
घोड़ेसवारों में हिम्मत और उत्साह होता है। वे पुरुषार्थ में कदम आगे बढ़ाते हैं, चलते भी अच्छे हैं और अथक रहते हैं।
प्रश्न 25. घोड़ेसवारों की मुख्य कमजोरी क्या बताई गई है?
उत्तर:
मार्ग की “सीन-सीनरी” उन्हें आकर्षित करती है। वे दूसरों को देखकर प्रभावित होते हैं—“यह क्या कर रहे हैं? यह कैसे कर रहे हैं? हम भी ऐसा करें।” इस प्रकार देखने और री-स करने का आकर्षण अधिक रहता है।
प्रश्न 26. प्यादों की कमजोरी क्या बताई गई है?
उत्तर:
छोटी-सी बात को बहुत बड़ा बना देना। वे राई को पहाड़ बना लेते हैं और फिर उसी में स्वयं परेशान हो जाते हैं।
प्रश्न 27. प्यादे छोटी समस्या को बड़ी क्यों बना देते हैं?
उत्तर:
उनमें परिस्थिति को ऊँचा और स्वयं को कमजोर देखने की आदत होती है। इसलिए छोटी बात भी बड़ी दिखाई देने लगती है और हिम्मत कम हो जाती है।
प्रश्न 28. बापदादा वर्तमान समय किन बच्चों को देखकर हर्षित होते हैं?
उत्तर:
जो बच्चे अपनी स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें हिम्मत-हुल्लास है और जिनके कदम पुरुषार्थ में आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें देखकर बापदादा हर्षित होते हैं।
प्रश्न 29. अपने पुरुषार्थ की स्थिति कैसे चेक करें?
उत्तर:
स्वयं से पूछें:
- क्या मैं परिस्थिति का इंतजार करता हूँ?
- क्या मैं अपनी स्व-स्थिति से परिस्थिति को बदलता हूँ?
- क्या मैं अपनी कमियों को तुरंत दूर करता हूँ?
- क्या मैं दूसरों को देखकर प्रभावित होता हूँ?
- क्या मैं छोटी बात को बड़ा बना देता हूँ?
- क्या मेरा पुरुषार्थ लगातार आगे बढ़ रहा है?
प्रश्न 30. इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर:
पुरुषार्थ से स्नेह रखो। परिस्थितियों के बदलने का इंतजार मत करो। अपनी स्व-स्थिति की शक्ति से परिस्थितियों को बदलो। जो पुरुषार्थ से सच्चा स्नेह रखता है, वही सबके स्नेह का पात्र बनता है।
मुख्य स्मृति
“पुरुषार्थ के स्नेही ही सबके स्नेही बनते हैं।”
परिस्थिति नहीं, स्व-स्थिति को शक्तिशाली बनाना है।
इंतजार नहीं, इंतजाम करना है।
कल नहीं, अभी करना है।
अलबेलापन नहीं, एक-एक सेकण्ड सफल करना है।
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