MURLI 31-08-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

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“मीठे बच्चे – मनमनाभव की ड्रिल सदा करते रहो तो 21 जन्मों के लिए रूस्ट-पुस्ट (निरोगी) बन जायेंगे”
प्रश्नः- सतगुरू की कौन सी श्रीमत पालन करने में ही गुप्त मेहनत है?
उत्तर:- सतगुरू की श्रीमत है – मीठे बच्चे, इस देह को भी भूल कर मुझे याद करो। अपने को अकेली आत्मा समझो। देही-अभिमानी रहने का पुरुषार्थ करो। सबको यही पैगाम दो कि अशरीरी बनो। देह सहित देह के सब धर्मों को भूलो तो तुम पावन बन जायेंगे। इस श्रीमत को पालन करने में बच्चों को गुप्त मेहनत करनी पड़ती है। तकदीरवान बच्चे ही यह गुप्त मेहनत कर सकते हैं।

ओम् शान्ति। बच्चे बैठे हैं – अपने भाई और बहिनों को ड्रिल सिखलाने। यह कौनसी ड्रिल है? इसमें बच्चों को कुछ कहना नहीं होता है। वह जो जिस्मानी ड्रिल आदि करते हैं उसमें तो कहना पड़ता है। यह तो सुप्रीम टीचर है जो गीता का भगवान भी है, जो बच्चों को बैठ योग की ड्रिल भी सिखलाते हैं। यह ड्रिल भी गुप्त है। ड्रिल सिखाई इसलिए जाती है कि स्टूडेन्ट रूस्ट-पुस्ट (हेल्दी) हों। तुम बच्चे जानते हो कि इस मनमनाभव की ड्रिल से 21 जन्मों के लिए बहुत रूस्ट-पुस्ट रहेंगे। कभी बीमार नहीं होंगे। तो यह कितनी अच्छी रूहानी ड्रिल है। बाप समझाते हैं मनमनाभव, इसमें कहने की भी दरकार नहीं। सिर्फ समझाया जाता है कि अपने को आत्मा समझो। देही-अभिमानी भव। भव का अर्थ ही है कि तुम बाप को याद करो तो एवरहेल्दी बन जायेंगे। कल्प पहले भी हम इस रूहानी ड्रिल से एवरहेल्दी बने थे। रूहानी ड्रिल, रूहानी बाप परमपिता परमात्मा शिव ही सिखलाते हैं। भगवान तो उनको ही कहा जाता है, जिनकी पूजा भी होती है। शिवाय नम: भी कहते हैं ना। ब्रह्मा देवता नम: शिव परमात्माए नम: कहेंगे। यह ड्रिल कोई जिस्मानी मनुष्य नहीं सिखलाते हैं। ऐसे नहीं कि तुमको यह ड्रिल ब्रह्मा ने सिखाई है। नहीं, भल ब्रह्माकुमार कुमारियाँ कहलाते हो परन्तु… चिट्ठी पर भी लिखते हो शिवबाबा केअरऑफ ब्रह्मा। वह तो गुप्त हो गया। लेकिन मनुष्यों को कैसे पता पड़े, ब्रह्मा तो प्रजापिता है। तो सारी दुनिया उनके बच्चे हैं। प्रजापिता है ना। ड्रिल सिखलाने वाला तो निराकार बाप है। वह गुप्त है। गुप्त होने के कारण मनुष्यों को समझने में भी डिफीकल्टी होती है। ब्रह्मा को तो भगवान नहीं कहा जाता। यहाँ नाम ही दिखाते हैं – ब्रह्माकुमार कुमारियाँ अर्थात् ब्रह्मा की सन्तान। जब कोई आता है तो उनको समझाना है कि यह नई दुनिया रचने वाला ब्रह्मा नहीं है लेकिन निराकार बाप है। जो ब्रह्मा द्वारा रचना रचते हैं। पारलौकिक परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा रचते हैं गोया सुप्रीम सोल की रचना हुई।

तुम बच्चे पत्र के ऊपर लिखते हो शिवबाबा केअरऑफ ब्रह्मा। तो यह भी याद करने की युक्ति है। शिवबाबा सिखलाते हैं ब्रह्मा द्वारा। बस सिर्फ कहते हैं मनमनाभव और कोई तकलीफ नहीं दी जाती सिर्फ कहा जाता है कि तुम अपनी उन्नति चाहते हो और सचखण्ड का मालिक बनने चाहते हो तो सचखण्ड स्थापन करने वाला तो एक ही सत्य बाप है, उसे याद करो। बेहद का बाप ही आकर बच्चों को कहते हैं कि मुझे याद करो तो पापों से मुक्त होंगे। श्रीकृष्ण को पतित-पावन नहीं कहा जाता है सिवाए परमपिता परमात्मा के। और कोई नाम नहीं लेंगे। गॉड फादर ही कहेंगे। सब उनको फादर कहते हैं फिर उनको सर्व-व्यापी कैसे कह सकते। कहते हैं वह आते हैं लिबरेट करने के लिए। यह मनुष्य नहीं जानते। तो कल्प की आयु ही उल्टी लिख दी है। अब बच्चों को यह ड्रिल करनी है। ज्ञान तो मिला हुआ है। जब बैठते हो तो अपने को देही समझकर बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। टीचर सामने बैठता है गद्दी पर, तो शोभता है। कायदा है कि ड्रिल कराने के लिए टीचर जरूर चाहिए। कोई बड़ा टीचर तो कोई छोटा टीचर होता है। अब तुम्हारा इम्तहान लेने की कोई दरकार नहीं क्योंकि तुम खुद जानते हो कि हम कितना समय मोस्ट बील्वेड बाप को याद करते हैं। ब्रह्मा कोई मोस्ट बील्वेड नहीं है। बील्वेड मोस्ट वह है जो सदा पावन है। तुम बच्चे जानते हो कि सबसे प्यारा कौन है। मनुष्य परमात्मा को ही याद करते हैं हे दु:ख हर्ता सुख कर्ता। उसको लिबरेटर भी कहते हैं अर्थात् दु:खों से मुक्त करने वाला। तो बच्चों को अपना पुरुषार्थ करना है। ड्रामा प्लैन अनुसार यह दुनिया पावन होनी जरूर है और पावन दुनिया बनने के लिए आग लगनी है। यह भी जानते हो आग कैसे लगेगी। विनाश होने बिगर दुनिया पावन बन नहीं सकेगी। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ…. रूद्र और शिव कोई फ़र्क नहीं है। परन्तु शिव नाम है मुख्य। बाकी तो अपनी-अपनी भाषा में अनेक नाम रख दिये हैं। असुल नाम है शिव। शिव जयन्ती भी मनाते हैं। भारत में ही शिवजयन्ती मशहूर है। बेहद के बाप की शिव जयन्ती है तो आते भी जरूर होंगे। शिवबाबा का नाम बाला है। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना कराने वाला है। तो उस ऊंच ते ऊंच बाप को याद करना पड़े। ब्रह्मा ऊंच ते ऊंच नहीं है। वास्तव में ब्रह्मा ऊंच से ऊंच बनते हैं। फिर नीचे भी उतरते हैं। तुम बी.के. भी नीचे थे अब ऊंच बन रहे हो। एकदम ऊंच बाप के घर चले जायेंगे। तुम इस समय त्रिकालदर्शी बन रहे हो। तुम खुद जानते हो कि हम ही स्वदर्शन चक्रधारी हैं। हम ब्रह्माण्ड और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानने वाले हैं। ब्रह्माण्ड अर्थात् ऊंच, जहाँ सभी आत्मायें निवास करती हैं। दुनिया में कोई और नहीं जो समझाये कि मूलवतन में आत्मायें रहती हैं। विश्व और ब्रह्माण्ड अलग-अलग हैं। आत्मायें रहती हैं निर्वाणधाम में, जिसको शान्तिधाम कहा जाता है। वह सबको प्यारा लगता है। उसका असली नाम निर्वाणधाम वा शान्तिधाम है। आत्मा का स्वरूप है शान्त। एक शान्तिधाम फिर है मूवीधाम और यह है टॉकी धाम। मूवीधाम में जास्ती रहने का नहीं है। शान्तिधाम में तो बहुतों को रहना होता है, और कोई स्थान नहीं है। आत्मा जब बाप को और घर को याद करती है तो ऊपर में याद करती है। बीच के धाम को तो तुम्हारे सिवाए और कोई नहीं जानते हैं। मनुष्यों को तो इतना ज्ञान है नहीं। सिर्फ कहते हैं ब्रह्मा विष्णु शंकर सूक्ष्मवतन में रहते हैं। बाकी उन्हों के आक्यूपेशन का पता नहीं है। 84 जन्म लेते हैं। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा है। यह है लीप युग। यह थोड़े समय का है। जैसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यह तुम्हारा हीरे जैसा उत्तम बनने का ऊंच जन्म है। शूद्र से ब्राह्मण बनना सबसे उत्तम है। ब्राह्मण बनते हो तो दादे का वर्सा लेने के हकदार बनते हो।

बाप बच्चों को कहते हैं बच्चे सदैव मनमनाभव। बाप का मैसेज सबको देते रहो। बाप को कहा ही जाता है – मैसेन्जर और कोई भी मैसेन्जर अथवा पैगम्बर नहीं है। वह तो आकर अपना धर्म स्थापन करते हैं। पैगम्बर सिर्फ एक है वही आकर तुमको पवित्र बनने का पैगाम देते हैं। वह आते हैं – धर्म स्थापन करने। वह कोई वापिस ले जाने वाले गाइड नहीं हैं। वह तो एक ही सतगुरू सद्गति देने वाला है। सच बोलने वाला, सच्चा रास्ता बताने वाला तो एक ही परमपिता परमात्मा शिव है। तो बहुत गुप्त मेहनत करनी है बच्चों को। अभी तुम जानते हो कि हमको यह देह भूलकर एक बाप को याद करना है। शरीर छूटा तो सारी दुनिया छूट जाती है। आत्मा अकेली बन जाती है। बाप कहते हैं – देही-अभिमानी बनो तो फिर कोई भी मित्र-सम्बन्धी याद नहीं पड़ेंगे। हम आत्मा हैं, हम चले जायेंगे बाप के पास। बाप राय देते हैं कि तुम मेरे पास कैसे आ सकते हो। यह बाबा भी नामीग्रामी है। इन द्वारा बाप सभी आत्माओं का गाइड बन मच्छरों सदृश्य वापिस ले जाते हैं। यह यथार्थ ज्ञान सिर्फ तुम बच्चों की बुद्धि में है। तुमको पाण्डव सेना भी कहते हैं। पाण्डवपति स्वयं साक्षात् परमपिता परमात्मा है, जो तुम बच्चों को ड्रिल सिखला रहे हैं। हूबहू कल्प पहले मुआफिक। जब विनाश होगा तो सब आत्मायें शरीर छोड़ चली जायेंगी। सतयुग में जब थोड़ी आत्मायें हैं तो एक राज्य है। अभी अनेक हैं फिर जरूर एक होगा। यह ज्ञान सारा दिन बुद्धि में सिमरण करना है। बच्चों को प्रदर्शनी पर भी समझाना है। जब न्यु देहली थी तो नया भारत था। एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। आदि सनातन कोई हिन्दू धर्म नहीं था। हम ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। यह और धर्म वाले मानेंगे नहीं। जो पहले आते हैं वही 84 जन्म लेते हैं। यह हैं बिल्कुल सहज समझने की बातें। अब तुम बच्चों की बुद्धि में है कि अब नाटक पूरा होता है। सभी एक्टर्स आ गये हैं। 84 जन्म पूरे किये, अब फिर घर चलना है क्योंकि बहुत थक गये हो ना। भक्ति मार्ग है ही थकने का मार्ग। बाप कहते हैं – अब मेरे को याद करो औरों को भी पैगाम दो कि देह सहित देह के सब धर्म छोड़ अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। अशरीरी बनो तो पावन बन जायेंगे क्योंकि अब वापिस घर चलना है। मौत सामने खड़ा है।

यहाँ भी बच्चे बाप के पास सम्मुख रिफ्रेश होने आते हैं। बाप सम्मुख बच्चों को समझाते हैं कि बच्चे देह-अभिमान छोड़ मामेकम् याद करो। यह पुरानी दुनिया अब खत्म होनी है। तुम एक बाप को याद कर पवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। अगर मेहनत नहीं करेंगे तो फल भी नहीं मिलेगा। फिर सज़ा खानी पड़ेगी। बाप कहते हैं कि अपनी कमाई जमा करते रहो और दूसरों को भी निमन्त्रण दो। बाप का रास्ता भी बताओ। तुम बच्चों को भी कल्याणकारी बनना है। अपने मित्र-सम्बन्धियों का भी कल्याण करना है। यहाँ तुमको देही-अभिमानी बनाया जाता है। महामन्त्र देते हैं। प्राचीन योग बाप ने ही आकर सिखाया है, जिसके लिए ही गाया जाता है – योग अग्नि से पाप दग्ध हो जायेंगे, कल्प पहले भी यही इशारा मिला था। बाप इशारा देते हैं कि अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो। रहो भल अपने गृहस्थ व्यवहार में। गाया हुआ है कि शरण पड़ी मैं तेरे। यह भी होता है – जब कोई दु:खी होते हैं तो ऊंच ताकत वाले की जाए शरण लेते हैं। यहाँ तो प्रैक्टिकल में हैं। जब बहुत दु:ख देखते हैं, सहन नहीं कर सकते हैं, लाचार होते हैं तो फिर भागकर आए बाप की शरण लेते हैं। सद्गति तो सिवाए बाप के कोई दे न सके। बच्चे जानते हैं कि पुरानी दुनिया विनाश होनी है। तैयारी हो रही है इस तरफ तुम्हारे स्थापना की तैयारी, उस तरफ विनाश की तैयारी है। स्थापना हो गई तो विनाश भी जरूर होना है। तुम जानते हो कि बाबा आया है स्थापना कराने, इन द्वारा वर्सा भी जरूर मिलेगा। बाकी प्रेरणा से थोड़ेही काम चलता है। टीचर को कहेंगे क्या कि हम आपकी प्रेरणा से पढ़ लेंगे। प्रेरणा से अगर सब कुछ होता तो शिव जयन्ती क्यों मनाई जाती? प्रेरणा से करने वाले की तो शिव जयन्ती मनाने की दरकार नहीं। जयन्ती तो सभी आत्माओं की होती है। आत्मायें सब जीव में आती हैं। आत्मा और शरीर जब मिलते हैं तो पार्ट बजाते हैं। आत्मा का तो स्वधर्म है शान्त, उसमें ही नॉलेज धारण होती है। आत्मा ही अच्छा-बुरा संस्कार ले जाती है। बाप तो स्वर्ग का रचयिता है। वहाँ तो पवित्रता ही है। अपवित्रता का नाम-निशान नहीं है। यह है विषय सागर। कितना क्लीयर समझाया जाता है तो भी किसकी बुद्धि में नहीं आता परन्तु तुम किसको भी दोष नहीं देते हो। ड्रामा के बन्धन में सब बांधे हुए हैं।

तुम समझते हो – सीढ़ी से ऊपर से नीचे उतर आये हैं। ड्रामानुसार हमको उतरना ही है फिर बाप कहते हैं – अब चढ़ने के लिए पुरुषार्थ करना है। परन्तु जिनकी तकदीर में नहीं है वह ऐसे कहते हैं। जो ऐसे कहते हैं उनसे समझ जाते हैं कि इसकी तकदीर में नहीं है। 2-4 वर्ष चलते-चलते भी गिर पड़ते हैं। महसूस भी करते हैं कि हमने बड़ी भूल की है। बड़ी चोट खाई। यह भी आधाकल्प की बीमारी है, कम नहीं है। आधाकल्प के रोगी हैं। भोगी बनने से रोगी बन जाते हैं। तो बाप आकर पुरुषार्थ करवाते हैं। श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहते हैं। इस समय तुम सच्चे-सच्चे योगी हो, योगेश्वर तुमको योग सिखलाते हैं। तुम ज्ञान-ज्ञानेश्वर भी हो फिर बनेंगे राज-राजेश्वर। ज्ञान से तुम धनवान बनते हो, योग से निरोगी एवरहेल्दी बनते हो। आधाकल्प के लिए तुम्हारे सब दु:ख दूर हो जाते हैं तो इसके लिए कितना पुरुषार्थ करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पावन बनने के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। सबको पैगाम देना है कि एक बाप को याद करो। देह सहित सब कुछ भूल जाओ।

2) योगेश्वर बाप से योग सीखकर सच्चा-सच्चा योगी बनना है। ज्ञान से धनवान और योग से निरोगी, एवरहेल्दी बनना है।

वरदान:- निमित्त बनी हुई आत्माओं द्वारा कर्मयोगी बनने का वरदान प्राप्त करने वाले मास्टर वरदाता भव
जब कोई भी चीज़ साकार में देखी जाती है तो उसे जल्दी ग्रहण किया जा सकता है, इसलिए निमित्त बनी हुई जो श्रेष्ठ आत्मायें हैं उन्हों की सर्विस, त्याग, स्नेह, सर्व के सहयोगीपन का प्रैक्टिकल कर्म देखकर जो प्रेरणा मिलती है वही वरदान बन जाता है। जब निमित्त बनी हुई आत्माओं को कर्म करते हुए इन गुणों की धारणा में देखते हो तो सहज कर्मयोगी बनने का जैसे वरदान मिल जाता है। जो ऐसे वरदान प्राप्त करते रहते वह स्वयं भी मास्टर वरदाता बन जाते हैं।
स्लोगन:- नाम के आधार पर सेवा करना अर्थात् ऊंच पद में नाम पीछे कर लेना।

ये अव्यक्त इशारे – अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

पवित्रता की निशानी है – स्वच्छता, सत्यता। अगर सारे दिन में चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की लेकिन अगर विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर ज़रा-सा अन्तर रह गया तो वो भी स्वच्छता अर्थात् पवित्रता नहीं है। अपवित्रता सिर्फ किसको दु:ख देना या पाप कर्म करना नहीं है लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो।

“मनमनाभव की गुप्त रूहानी ड्रिल से पावन और निरोगी बनो”

प्रश्न 1:

मनमनाभव की ड्रिल क्या है?
उत्तर: मनमनाभव की ड्रिल का अर्थ है अपने को आत्मा समझकर एक परमपिता परमात्मा शिव को याद करना। इसमें किसी प्रकार की शारीरिक मेहनत या बोलने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि बुद्धि से बाप की याद में रहना होता है।

प्रश्न 2:

मनमनाभव की ड्रिल करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: मनमनाभव की ड्रिल से आत्मा पावन बनती है, विकर्मों का विनाश होता है और आत्मिक शक्ति बढ़ती है। मुरली में इसे 21 जन्मों के लिए निरोगी और स्वस्थ बनने वाली रूहानी ड्रिल बताया गया है।

प्रश्न 3:

सतगुरू की कौन-सी श्रीमत पालन करने में गुप्त मेहनत है?
उत्तर: देह को भूलकर परमपिता परमात्मा को याद करना, अपने को अकेली आत्मा समझना, देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करना और सभी को अशरीरी बनने का पैगाम देना—इसी श्रीमत को पालन करने में गुप्त मेहनत है।

प्रश्न 4:

देही-अभिमानी बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्वयं को शरीर न समझकर आत्मा समझना और शरीर के संबंधों तथा देह-अभिमान से ऊपर उठकर अपने रूहानी पिता परमात्मा को याद करना देही-अभिमानी बनना है।

प्रश्न 5:

बाप बच्चों को कौन-सा महामंत्र देते हैं?
उत्तर: बाप कहते हैं—“मनमनाभव”, अर्थात् अपने मन-बुद्धि को मुझ परमपिता परमात्मा की याद में लगाओ और स्वयं को आत्मा समझो।

प्रश्न 6:

रूहानी ड्रिल कौन सिखलाते हैं?
उत्तर: यह रूहानी ड्रिल निराकार रूहानी बाप परमपिता परमात्मा शिव सिखलाते हैं। ब्रह्मा इसके माध्यम हैं; ड्रिल सिखलाने वाला निराकार बाप है।

प्रश्न 7:

“शिवबाबा केअर ऑफ ब्रह्मा” लिखने का क्या महत्व है?
उत्तर: यह याद करने की एक युक्ति है कि परमपिता परमात्मा शिव ब्रह्मा के माध्यम से ज्ञान और योग सिखलाते हैं। इससे बच्चों की बुद्धि में निराकार बाप की याद बनी रहती है।

प्रश्न 8:

परमपिता परमात्मा को ही पतित-पावन क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि आत्माओं को पवित्र बनाने और विकर्मों से मुक्त करने वाला एक परमपिता परमात्मा ही है। उन्हें ही दुःख हर्ता, सुख कर्ता और लिबरेटर कहा जाता है।

प्रश्न 9:

बाप को याद करने से विकर्म कैसे विनाश होते हैं?
उत्तर: जब आत्मा देह-अभिमान छोड़कर आत्म-स्मृति में स्थित होती है और परमात्मा की याद में रहती है, तब योग की अग्नि से पुराने विकर्मों के संस्कार समाप्त होने लगते हैं और आत्मा पवित्र बनती है।

प्रश्न 10:

आत्मा का स्वधर्म क्या है?
उत्तर: आत्मा का स्वधर्म शान्ति है। आत्मा ही ज्ञान धारण करती है और अपने संस्कारों को साथ ले जाती है।

प्रश्न 11:

तीन धाम कौन-से बताए गए हैं?
उत्तर: शान्तिधाम, सूक्ष्मवतन और स्थूल सृष्टि—इन तीन अवस्थाओं/धामों का ज्ञान दिया जाता है। शान्तिधाम को निर्वाणधाम भी कहा जाता है, जहाँ आत्माएँ निवास करती हैं।

प्रश्न 12:

बच्चों को त्रिकालदर्शी क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि बच्चे सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त का ज्ञान प्राप्त करते हैं तथा ब्रह्माण्ड और सृष्टि के चक्र को समझते हैं।

प्रश्न 13:

84 जन्मों के बाद आत्माओं को क्या करना है?
उत्तर: नाटक अर्थात् सृष्टि चक्र का पार्ट पूरा होने पर आत्माओं को शरीर छोड़कर अपने घर शान्तिधाम लौटना है। इसलिए अभी से देह-अभिमान छोड़कर बाप की याद का अभ्यास करना है।

प्रश्न 14:

ज्ञान और योग से क्या प्राप्ति होती है?
उत्तर: मुरली के अनुसार ज्ञान से धनवान और योग से निरोगी, एवरहेल्दी बनने की प्राप्ति होती है। इसलिए ज्ञान और योग दोनों का अभ्यास आवश्यक है।

प्रश्न 15:

बाप बच्चों को दूसरों के प्रति क्या जिम्मेदारी देते हैं?
उत्तर: स्वयं बाप को याद करने के साथ दूसरों को भी परमात्मा का पैगाम देना है। मित्रों और संबंधियों का कल्याण करते हुए उन्हें आत्म-स्मृति और परमात्म-स्मृति का रास्ता बताना है।

प्रश्न 16:

सच्चा योगी किसे कहा जाएगा?
उत्तर: जो स्वयं को आत्मा समझकर परमपिता परमात्मा को याद करता है, देह-अभिमान से ऊपर उठने का पुरुषार्थ करता है और अपने जीवन में पवित्रता तथा योगबल धारण करता है, वह सच्चा योगी है।

प्रश्न 17:

कर्मयोगी बनने के लिए किन गुणों को धारण करना है?
उत्तर: सेवा, त्याग, स्नेह, सहयोग और श्रेष्ठ कर्मों की धारणा करनी है। निमित्त बनी श्रेष्ठ आत्माओं के प्रैक्टिकल जीवन से प्रेरणा लेकर कर्मयोगी बनना है।

प्रश्न 18:

पवित्रता की मुख्य निशानी क्या है?
उत्तर: पवित्रता की निशानी स्वच्छता और सत्यता है। उठने, बैठने, बोलने, सेवा करने और हर कर्म को विधिपूर्वक करने में स्वच्छता और सच्चाई होनी चाहिए।

प्रश्न 19:

क्या अपवित्रता केवल पाप कर्म करने को कहा जाता है?
उत्तर: नहीं। अपवित्रता केवल किसी को दुःख देना या पाप कर्म करना ही नहीं है। यदि किसी भी कार्य में सत्यता, स्वच्छता और विधि की कमी है, तो वह भी पूर्ण पवित्रता नहीं है।

प्रश्न 20:

आज की मुरली का मुख्य पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर: मुख्य पुरुषार्थ है—अपने को आत्मा समझना, देह-अभिमान छोड़ना, एक परमपिता परमात्मा को याद करना, अशरीरी बनने का अभ्यास करना, पवित्र बनना और दूसरों को भी बाप का पैगाम देना।

 मुख्य संदेश

“देह को भूलकर एक बाप को याद करो, देही-अभिमानी बनो और मनमनाभव की रूहानी ड्रिल सदा करते रहो।”

Disclaimer (डिस्क्लेमर):यह वीडियो आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं/मुरली के संदर्भ पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी धर्म, सम्प्रदाय, व्यक्ति या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। दर्शक इन विचारों को अपने विवेक और व्यक्तिगत आध्यात्मिक समझ के अनुसार ग्रहण करें।

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