AW.(34)28-09-1969/“पूरे कोर्स का सार – कथनी करनी एक करो”
“पूरे कोर्स का सार – कथनी करनी एक करो”
किस रूप में मुलाकात कर रहे हो? अव्यक्त रूप से वा स्नेह रूप से वा शक्ति रूप से? बाप रूप से तो मुलाकात कर ही रहे हो। लेकिन स्नेह रूप में वा शक्ति रूप में वा अव्यक्त रूप में? वर्तमान कौनसा विशेष रूप है? सारे दिन में इन तीनों रूपों में से ज्यादा कौनसा रूप रहता है? इन तीनों में से श्रेष्ठ कौनसा है? (हर एक ने अपना समाचार सुनाया) अब सिर्फ प्रश्न पूछते हैं फिर स्पष्ट करेंगे। अब सबने जो एक्स्ट्रा ट्रेनिंग कोर्स लिया है, इसमें सबसे पावरफुल प्वाइंट कौन सी ली है? जो प्वाइंट आगे विघ्नों को एक सेकेण्ड में खत्म कर दे। हर एक ने भिन्न-भिन्न प्वाइंट तो सुनाई अब जिन्होंने भी प्वाइंट सुनाई है, वो फिर भी अपना अनुभव लिख भेजें कि इस प्वाइंट को यूज़ करने से कितने समय में विघ्न दूर हुआ है। जैसे कोई दवाई एक यूज़ करके देखता है फिर अनेकों को उसका लाभ लेने में सहज होता है। तो यह सब भिन्न-भिन्न प्वॉइन्ट जो निकली हैं उन सब का सार दो शब्दों में याद रखो जिसमें आपकी सब बातें आ जायें। यह जो अब कोर्स किया है उसका मुख्य सार दो अक्षरो में याद रखना है कि जो कहते हैं वो करना है। कहते हैं हम ब्रह्माकुमारी हैं। हम बापदादा के बच्चे आज्ञाकारी हैं। मददगार हैं। जो भी बातें कहते हो वो प्रैक्टिकल करना है। कहना अर्थात् करना। कहने और करने में अन्तर नहीं हो। यही आपके कोर्स का सार है। कहते तो आप कई वर्षों से हो विकार बुरी चीज़ है, औरों को भी सुनाते हो लेकिन खुद घर गृहस्थी से न्यारे होकर नहीं चलते हो। तो अपना ही कहना और करना बदल जाता है। इसलिए आज से यह बात याद रखो। जो कहेंगे सो करेंगे। जो भी सोचते हो अथवा दुनिया को भी जो कहते हो वो करके दिखाना है। सिर्फ कहना ही नहीं, करना है। अब सर्विस जो रही है वो कहने से नहीं होगी। लेकिन अपनी करनी से होगी। कथनी, करनी और रहनी कहते हैं ना। तो कथनी करनी और रहनी तीनों ही एक हो तब कर्मातीत अवस्था में जल्दी से जल्दी पहुंच सकेंगे। हर समय यह चेक करो जो कहती हूँ वो करती हूँ? कहते हो हम सर्वशक्तिमान की सन्तान हैं और करते क्या हो? कमजोरी की बात। आज से यह पक्का करो कि जो कहूँगी सो करुंगी। जो खुद ऐसे बनेंगे उनको देख कर और भी आपे ही करेंगे। आपको मेहनत करने की जरूरत नहीं रहेगी। अब तक तो यही उलाहने मिलते रहते हैं कि कहते एक हैं करते तो दूसरा हो। उलाहनों को खत्म करना है। उलाहना खत्म हो फिर क्या बन जायेंगे? अल्लाह (ऊंच) बन जायेंगे। जितना अल्लाह बनेंगे तो फिर ना चाहते हुए नाम बाला होगा। तो किये हुए कोर्स की यह शिक्षा है मुख्य सार।
सबसे खौफनाक मनुष्य कौनसा होता है जिनसे सब डर जाते हैं? दुनिया की बात तो दुनिया में रही। लेकिन इस दैवी परिवार के अन्दर सबसे खौफनाक, नुकसान कारक वो है जो अन्दर एक और बाहर से दूसरा रूप रखता है। वो पर-निन्दक से भी जास्ती खौफनाक है। क्योंकि वो कोई के नज़दीक नहीं आ सकता। स्नेही नहीं बन सकता। उनसे सब दूर रहने की कोशिश करेंगे। इसलिए इस भट्ठी में आप लोगों को यह शिक्षा मिली। इसको सच्चाई और सफाई कहा जाता है। सफाई किस बात में? सच्चाई किस बात में? इनका भी बड़ा गुह्य रहस्य है। सच्चाई जो करें वो ही वर्णन करें। जो सोचें वही वर्णन करें। बनावटी रूप नहीं। मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों रूप में चाहिए। अगर मन में कोई संकल्प उत्पन्न होता है तो उसमें भी सच्चाई चाहिए। सफाई, अन्दर में कोई भी विकर्म का किचडा नहीं हो, कोई भी भाव-स्वभाव पुराने संस्कारों का भी किचड़ा नहीं हो। जो ऐसी सफाई वाला होगा वो ही सच्चा होगा और जो सच्चा होता है उसकी परख क्या होती है? जो सच्चा होगा वह सबका प्रिय होगा। उसमें भी सबसे पहले तो वह प्रभुप्रिय होगा। सच्चे पर साहब राजी होता है। तो पहले प्रभुप्रिय होगा, फिर दैवी परिवार का प्रिय होगा। उसको कोई भी ऐसी नज़र से नहीं देखेगा। उनकी नज़र में, वाणी में, उनके कर्म में ऐसी परिपक्वता होगी जो कभी भी ना खुद ही डगमग होगा ना ही दूसरों को करेगा। जो सच्चा होगा वह प्रिय होगा। कई समझते हैं कि हम तो सच्चे हैं लेकिन मुझे समझा नहीं जाता है। सच्चा हीरा कभी छिप थोड़ेही सकता है। इसलिए ही यह समझना मैं ऐसा हूँ परन्तु मुझे ऐसा समझा नहीं जाता है – यह भी सच्चाई नहीं है। सच्चाई कभी छिप नहीं सकती है और सच्चे सबके प्रिय बन जाते हैं। कई यह भी समझते हैं कि हम नज़दीक नहीं हैं इसलिए ही प्रख्यात नहीं हैं। लेकिन जो सच्चे और पक्के होते हैं वो दूर होते हुए भी अपनी परख छिपा नहीं सकते। कोई कितना भी दूर हो लेकिन बापदादा के नज़दीक होगा। जो बाप के नज़दीक हैं वो सबके नज़दीक हैं। तो सच्चा बनना। सफाई का सबूत चलन में दिखता है। सिर्फ समझना ही नहीं हैं लेकिन कर्म में करके दिखाना है। जो कर्म हो वो भी दूसरों के सर्विस के निमित्त हो। अपनी मन्सा, वाचा, कर्मणा को चेक करो। आप अपने को क्या कहलवाते हो? और बापदादा भी आप सभी को क्या टाइटिल देते हैं, वह याद है? सर्विसएबुल बच्चे। तो जो सर्विसएबुल हैं उनका हर संकल्प, हर शब्द, हर कर्म सर्विस ही करेगा। भाषण करना, किसी को समझाना सिर्फ यही सर्विस नहीं है। परन्तु जो सविसएबुल हैं वो हर सेकेण्ड सर्विस ही करते रहते हैं। तो अपने को देखना है कि हमारी हर सेकेण्ड सर्विसएबुल चलन होती है? वा कहाँ डिस-सर्विस वाली चलन तो नहीं है? जब नाम सर्विसएबुल हैं तो कर्म भी ऐसा ही होना चाहिए। इसलिए जो कहना है वो करना भी है। यह याद रखने से पुरुषार्थ में सहज सफलता पायेंगे। कई बहुत खुश होते हैं कि हमने इतने जिज्ञासु समझाये, इतने भाषण किये, बहुत सर्विस की लेकिन वो भी हद की सर्विस है। अब तो बेहद की सर्विस करनी है। मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों रूपों से बेहद की सर्विस हो – उसको कहा जाता है सर्विसएबुल। अब अपने को देखो कि हम सर्विसएबुल बने हैं? ऐसा सर्विसएबुल फिर स्नेही भी बहुत होगा। अब ऐसा सभी ने ठप्पा लगाया है वा कोई साहस भी रख रहे हैं? जब करना ही है तो गोया ठप्पा लग ही गया। अपने में शक क्यूं रखते हो? कि ना मालूम परीक्षा में पास हों वा फेल हो। होशियार स्टूडेन्टस् सदैव निश्चय से कहते हैं कि हम तो नम्बरवन आयेंगे। अगर पहले से ही अपने में संशय रखेंगे तो संशय की रिजल्ट क्या होती है? फिर विजयी बन ना सकें। अगर जरा भी संशय रखा तो विजयी नहीं बनेंगे। जब तक निश्चय नहीं है। आप लोगों ने शुरू से ही दाँव लगाया है कि वर्सा लेके ही छोड़ेंगे या सोचा था कि देखेंगे? दाँव लगाया गोया बन ही गये।
जब अपने को निश्चय बुद्धि कहते हैं तो कोई भी बात में, ना बाप में, ना बाप की नालेज में, ना बाप के परिवार में संशय वा विकल्प उठना चाहिए। हम शिवबाबा के बच्चे हैं। तो सर्वशक्तिमान के बच्चे निश्चय बुद्धि हैं। यह कौन बोलता है? सर्वशक्तिवान के बच्चे बोलते हैं। निश्चय रखने से ही विजय हो जायेगी। भल करके अन्दर समझो कि ना मालूम क्या होगा? परन्तु फिर भी निश्चय में विजय हो जायेगी। अगर निश्चय नहीं है तो आपका कर्म भी वैसा ही चलेगा। निश्चय रखेंगे कि हमको करना ही है तो कर्म भी वैसा ही होगा। अगर ख्याल करेंगे कि अच्छा देखेंगे, करेंगे, तो कर्म भी ढीला ही चलेगा। कभी भी अपने में कमज़ोरी की, संशय की फीलिंग नहीं आनी चाहिए। कमज़ोरी के संकल्प ही संशय है। अब कहाँ तक यह पुराने संस्कार और संकल्प रहेंगे! पुराने संस्कार भी नहीं। संस्कार तो मोटी चीज़ है। लेकिन पुराने संकल्प खत्म होने चाहिए। तब कहेंगे भट्ठी से पककर निकल रहे हैं। भट्ठी का अर्थ ही क्या है? भट्ठी में सारा जलकर खत्म हो जाते हैं। रूप ही बदल जाता है। कोई भी चीज़ भट्ठी में डालेंगे तो उनका रूप, गुण आदि सब बदल जायेगा। आप भी भट्ठी करते हैं तो रूप, गुण बदलना चाहिए। ईट जब पकती है तो पहले मिट्टी होती है फिर पकने से उनका रूप गुण बदल जाता है। और कर्तव्य भी बदल जाता है। इसी रीति अपना रूप गुण और कर्तव्य तीनों ही बदलते जाना है। यह है भट्ठी की रिजल्ट। अब बताओ कि बदल लिया है? वा बदलेंगे? आपके उमंगों के साथ बापदादा की भी मदद है। जितना आप अपने में निश्चय रखेंगे उतना बापदादा भी अवश्य मददगार बनते हैं। स्नेही को अवश्य सहयोग मिलता है। किससे भी सहयोग लेना है, तो स्नेही बनना है। स्नेही को सहयोग की मांगनी नहीं करनी पड़ती है। बापदादा के स्नेही बनेंगे, परिवार के भी स्नेही बनेंगे। तो सभी का सहयोग स्वत: ही प्राप्त होगा। मुख्य यही दो बातें है निश्चय बुद्धि और नष्टोमोहा, यह तो तिलक माथे पर लगा ही दिया है। स्लोगन भी याद रखना है जो कहेंगे वो करेंगे यह है माताओं की सजावट। माताएं श्रृंगार ज्यादा करती हैं ना। तो इन माताओं का श्रृंगार रत्नों से किया जाता है। सबसे चमकने वाला श्रृंगार होता है रत्नों का। सोने में भी रत्न होता है तो जास्ती चमकता है। तो बापदादा ने इन माताओं को रत्नों से श्रृंगारा है। क्योंकि संगम पर सोने से भी ज्यादा हीरा बनना है। जितना-जितना अपने को रत्नों से सजायेंगे उतना ही ना चाहते हुए भी दुनिया की नज़र आपके तरफ जायेगी। दुनिया को कहने की दरकार नहीं होगी कि हमारी तरफ देखो। यह ज्ञान रत्नों का श्रृंगार दूर वालों का भी ध्यान खिंचवायेगा। इसलिए इन रत्नों के श्रृंगार को सदा के लिए कायम रखेंगे ऐसा निश्चय करना है।
आज अमृतवेले कोई बच्चे विशेष याद आए जो साकार रूप में ज्यादा साथ रहे हैं, आज विशेष उनकी याद आई क्योंकि आजकल साथ रहने वालों का पुरुषार्थ पहले से बहुत अच्छा है इसलिए पुरुषार्थ के स्नेह में उनकी याद आई। वर्तमान समय मधुबन वालों में परिवर्तन विशेष देखने में आ रहा है। हर स्थान में एक-एक रत्न चमक कर जा रहे हैं। अब एक-एक चमका हुआ रत्न फिर जाकर आप समान कैसे बनाते हैं वह अब देखेंगे। कभी भी हिम्मतहीन बोल नहीं बोलने चाहिए। पुरुषार्थहीन व हिम्मतहीन बनना – वह अब जमाना गया। अब तो मददगार बनना है और बनकर दिखाना है। अभी सबके दिल के अन्दर यह रहता है कि हम भी जल्दी ही जायें। आगे तो कहते थे कि संगमयुग में जितना जास्ती रहें उतना ही जास्ती अच्छा है। क्योंकि साकार के साथ में ही संगम के सुहेज़ थे। अभी तो चाहते हैं कि जहाँ अपना रहबर वहीं हम राही भी चलें। तुम लोगों की चलन, वाणी से भी ज्यादा सर्विस करेगी। डबल सर्विस में सफलता होगी तभी डबल ताज मिलेगा। बोलो सिंगल ताजधारी बनना है या डबल? कि बने ही हुए हैं? शक्तिरूप बनने का साधन क्या है? शक्तिरूप तभी बन सकेंगे जब कि अव्यक्त स्थिति होगी। अव्यक्त स्थिति में रहकर भल व्यक्त में आते भी हैं तो सिर्फ सर्विस अर्थ। सर्विस समाप्त हुई तो फिर अव्यक्त स्थिति में रहना ऐसा अभ्यास रखना है।
जो बली चढ़ जाता है उनको रिटर्न में क्या मिलता है? बलि चढ़ने वालों को ईश्वरीय बल बहुत मिलता है। जो सम्पूर्ण स्वाहा होते हैं वही सदा सुहागिन बनते हैं। उनका सुहाग खत्म नहीं होता है। जो सदा सुहागिन होते हैं उनकी अविनाशी बिन्दी सदैव होती है। आत्म-स्थिति में स्थित रहने की बिन्दी सदा सुहागिन को हर समय मस्तिष्क में याद रहती है। सदा सुहागिन की और कौनसी निशानी होती है? एक तो बिन्दी दूसरा कंगन होता है, वो है संगम रूपी कंगन। दोनों कभी भी नहीं उतारेंगे। संगम के कंगन उतार देने से सुहाग खत्म हो जाता है। अभी विशेष कमाल की सर्विस करनी है। अपने संग से सबको ऐसा रंग लगाओ जो कि कभी उतर नहीं सके। म्युज़ियम में तो सिर्फ संदेश लेकर चले जाते हैं। लेकिन अब यह ध्यान रखना है कि हमारे संग का रंग इतना तो अविनाशी रहे जो कि कभी भी वह उतर नहीं सके। अभी जम्प देकर आगे जाना है। पहले था सिर्फ चलने का समय। फिर दौड़ने का समय भी आया। अभी तो है जम्प का समय अगर दौड़ कर पहुँचने की कोशिश करेंगे तो टू लेट हो जायेंगे। जम्प देने में तो समय नहीं लगता। एकरस अवस्था में रहने लिए एक ही शुद्ध संकल्प रखना है। वो कौनसा एक? एक तो स्नेही बनना, दूसरा सर्विसएबुल हूँ। बस। इनके बिना और कोई संकल्प नहीं। सर्विसएबुल को सर्विस का ही संकल्प चलेगा। भट्ठी का जो लक्ष्य है कि खुद बदलकर औरों को बदलना है। यह लक्ष्य सदैव याद रखना है। यह है निश्चय की छाप। आप पर कौन सा छाप लगा है? निश्चय बुद्धि, नष्टोमोहा और सर्विसएबुल का। यह त्रिमूर्ति छाप की निशानी लगी हुई है। यह अपनी निशानी कायम रखनी है। आप समान औरों को अपने से भी ऊंच बनाना है। कम नहीं। हम से ऊंचा कोई बने, यह भी तो अपनी ऊंचाई है ना।
अध्याय: पूरे कोर्स का सार — “कथनी और करनी एक करो”
📖 मुरली नोट
विषय: कथनी-करनी की समानता, सच्चाई-सफाई, निश्चय बुद्धि और नष्टोमोहा स्थिति
मुरली: अव्यक्त मुरली
मुरली तिथि: दिए गए पाठ में मूल तारीख दिखाई नहीं दे रही है। इसलिए बिना सत्यापन के तारीख जोड़ना उचित नहीं होगा। यदि आप मुरली की तारीख/मूल स्रोत भेजें, तो इसे सही तिथि के साथ अपडेट किया जा सकता है।
1. पूरे कोर्स का मुख्य सार
पूरे कोर्स का सार केवल दो शब्दों में याद रखना है:
“जो कहेंगे, सो करेंगे।”
हम कहते हैं—“हम ब्रह्माकुमारी हैं, बापदादा के बच्चे हैं, आज्ञाकारी और मददगार हैं।” तो इन बातों को केवल बोलना नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल जीवन में करके दिखाना है।
उदाहरण:
अगर हम कहते हैं कि क्रोध गलत है, तो परिस्थिति आने पर क्रोध पर नियंत्रण करके दिखाना ही कथनी और करनी की समानता है।
2. कथनी, करनी और रहनी
केवल बोलना पर्याप्त नहीं है। हमारी:
- कथनी — हम क्या कहते हैं।
- करनी — हम क्या करते हैं।
- रहनी — हमारा दैनिक जीवन और व्यवहार कैसा है।
जब तीनों एक हो जाते हैं, तब आत्मिक पुरुषार्थ मजबूत होता है और कर्मातीत अवस्था की ओर बढ़ना सहज होता है।
चेकिंग पॉइंट
हर दिन स्वयं से पूछें:
“जो मैं दूसरों को कहती/कहता हूँ, क्या मैं स्वयं भी उसे करती/करता हूँ?”
3. सच्चाई और सफाई
भट्ठी में विशेष शिक्षा मिली—सच्चाई और सफाई।
सच्चाई का अर्थ है कि:
- जो सोचें, वही बोलें।
- जो बोलें, वही करें।
- मन, वाणी और कर्म में समानता हो।
सफाई का अर्थ है कि अंदर पुराने विकारों, गलत भावनाओं और पुराने संस्कारों का किचड़ा न रहे।
उदाहरण:
बाहर से मीठी वाणी बोलना लेकिन अंदर किसी के प्रति ईर्ष्या रखना पूर्ण सफाई नहीं है। सच्चाई तब है जब मन और वाणी दोनों में शुभ भावना हो।
4. सच्चे व्यक्ति की पहचान
सच्चाई छिप नहीं सकती। सच्चा व्यक्ति धीरे-धीरे सबका प्रिय बनता है।
सबसे पहले वह प्रभुप्रिय बनता है और फिर दैवी परिवार का प्रिय बनता है।
सच्चे व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी से ही नहीं, बल्कि उसकी चलन, कर्म और दृष्टि से होती है।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति दूर रहकर भी लगातार श्रेष्ठ कर्म करता है, सबके प्रति शुभ भावना रखता है और सेवा में लगा रहता है, तो उसकी सच्चाई उसकी चलन से दिखाई देती है।
5. सर्विसएबुल बनने का अर्थ
सर्विस केवल भाषण करना या किसी को ज्ञान सुनाना नहीं है।
सच्चा सर्विसएबुल बच्चा हर समय अपनी:
मन्सा + वाचा + कर्मणा
से सेवा करता है।
उदाहरण
- मन्सा सेवा: किसी के लिए शुभ और शक्तिशाली संकल्प करना।
- वाचा सेवा: मधुर और ज्ञानयुक्त वाणी बोलना।
- कर्मणा सेवा: अपने कर्मों से दूसरों को प्रेरणा देना।
इसलिए स्वयं से पूछें:
“क्या मेरी हर सेकण्ड की चलन सर्विसएबुल है?”
6. निश्चय बुद्धि — विजय की चाबी
निश्चय बुद्धि का अर्थ है—अपने लक्ष्य और बाप की शक्ति पर दृढ़ विश्वास।
यदि पहले से ही सोचेंगे, “पता नहीं मैं सफल होऊँगी या नहीं,” तो पुरुषार्थ कमजोर हो जाएगा।
इसके बजाय दृढ़ संकल्प रखें:
“मुझे करना ही है, इसलिए मैं करके दिखाऊँगी।”
निश्चय कर्म को शक्ति देता है और संशय कर्म को ढीला कर देता है।
7. भट्ठी का वास्तविक अर्थ
भट्ठी में कोई वस्तु जाने के बाद उसका रूप और गुण बदल जाता है।
इसी प्रकार आध्यात्मिक भट्ठी का उद्देश्य भी है:
पुराने रूप → नया रूप
पुराने गुण → श्रेष्ठ गुण
पुराने कर्तव्य → श्रेष्ठ कर्तव्य
उदाहरण
जैसे कच्ची ईंट आग में पककर मजबूत बनती है, वैसे ही आत्मा पुरुषार्थ की भट्ठी में पुराने संस्कारों को समाप्त करके दृढ़ और शक्तिशाली बनती है।
इसलिए प्रश्न है:
“क्या मैं केवल भट्ठी में आई हूँ, या वास्तव में बदलकर निकल रही हूँ?”
8. निश्चय बुद्धि और बापदादा का सहयोग
जितना आत्मा अपने अंदर निश्चय रखती है, उतना ही सहयोग अनुभव करती है।
स्नेही बनने पर सहयोग सहज मिलता है।
इसलिए दो विशेष बातें हमेशा याद रखें:
निश्चय बुद्धि + नष्टोमोहा
निश्चय हमें आगे बढ़ाता है और नष्टोमोहा हमें अनावश्यक आसक्ति से मुक्त करता है।
9. “मेरा” से “तेरा” की ओर
मोह का मूल है—“मेरा।”
आध्यात्मिक जीवन का मूल संकल्प है:
“मैं तेरा, सब कुछ तेरा।”
जब यह संकल्प जीवन में प्रैक्टिकल होता है, तो मन की आसक्ति धीरे-धीरे समाप्त होती है।
उदाहरण:
परिवार या जिम्मेदारियों को “मेरी चीज़” समझकर आसक्त होने के बजाय उन्हें ईश्वरीय जिम्मेदारी और सेवा समझकर निभाना।
10. अव्यक्त स्थिति और शक्तिरूप
शक्तिरूप बनने का साधन है—अव्यक्त स्थिति।
व्यक्त में आते भी हैं तो केवल सर्विस के लिए।
सर्विस पूरी हुई और फिर से अव्यक्त स्थिति में लौटना—यह अभ्यास धीरे-धीरे शक्तिरूप बनाता है।
अभ्यास
“मैं आत्मा हूँ। मैं स्नेही हूँ। मैं सर्विसएबुल हूँ।”
इन दो मुख्य स्मृतियों से व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करने का अभ्यास करें।
11. डबल सर्विस और डबल ताज
जब हमारी चलन और वाणी दोनों सेवा करने लगती हैं, तब डबल सर्विस होती है।
केवल बोलकर सेवा करना सीमित सेवा है। लेकिन जब हमारा जीवन ही दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाए, तब वह बेहद की सेवा है।
उदाहरण
आप किसी को धैर्य रखने का ज्ञान दें और स्वयं कठिन परिस्थिति में धैर्य का उदाहरण बनें—यह कथनी + करनी दोनों से सेवा है।
12. “संग का रंग” अविनाशी बनाओ
विशेष लक्ष्य यह है कि हमारे संग से दूसरों को ऐसा आत्मिक रंग लगे जो जल्दी न उतरे।
केवल संदेश देकर चले जाना पर्याप्त नहीं। हमारी:
- दृष्टि
- वाणी
- व्यवहार
- स्थिति
दूसरों पर सकारात्मक प्रभाव डाले—यही श्रेष्ठ संग है।
13. अब चलना नहीं, जम्प देना है
समय के अनुसार पुरुषार्थ भी तेज होना चाहिए।
पहले चलने का समय, फिर दौड़ने का समय, और अब जम्प देने का समय बताया गया है।
अर्थात अब पुराने ढंग से धीरे-धीरे आगे बढ़ने के बजाय दृढ़ संकल्प लेकर तुरंत परिवर्तन करना है।
उदाहरण:
“कल से बदलूँगा” के बजाय—“यह संकल्प अभी से समाप्त।”
14. त्रिमूर्ति छाप
अपने ऊपर तीन विशेष छाप कायम करनी है:
निश्चय बुद्धि + नष्टोमोहा + सर्विसएबुल
इन्हें केवल टाइटिल नहीं, बल्कि जीवन की पहचान बनाना है।
अध्याय का मुख्य सार
कहना वही जो करना है, और करना वही जो श्रेष्ठ है।
सच्चाई मन, वाणी और कर्म में हो।
सफाई अंदर के संस्कारों में हो।
निश्चय बुद्धि लक्ष्य में हो।
नष्टोमोहा स्थिति संबंधों में हो।
और हर संकल्प, शब्द व कर्म सर्विसएबुल हो।
याद रखने योग्य स्लोगन
“जो कहेंगे, सो करेंगे।”“खुद बदलेंगे और दूसरों को बदलने में निमित्त बनेंगे।”
पूरे कोर्स का अंतिम सार: “जो कहेंगे, सो करेंगे!” | कथनी-करनी एक करो | निश्चय बुद्धि & नष्टोमोहा | Powerful Murli
कथनी और करनी में फर्क क्यों? | पूरे कोर्स की सबसे Powerful शिक्षा | “जो कहेंगे सो करेंगे” | Brahma Kumaris Disclaimer
Disclaimer: यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दी गई व्याख्या उपलब्ध मुरली-पाठ के भावों को सरल भाषा में समझाने के लिए है। इसे मूल अधिकृत मुरली का स्थानापन्न न माना जाए। मुरली की सटीक तिथि उपलब्ध पाठ में नहीं दी गई है, इसलिए कोई अनुमानित तारीख नहीं जोड़ी गई है। कृपया मूल/अधिकृत मुरली स्रोत को प्राथमिकता दें।
1. प्रश्न: पूरे कोर्स का मुख्य सार क्या बताया गया?
उत्तर: मुख्य सार है—“जो कहेंगे, सो करेंगे।” कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए।
2. प्रश्न: ब्रह्माकुमारी कहलाने का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: केवल कहना पर्याप्त नहीं है। स्वयं को आज्ञाकारी, मददगार और सर्वशक्तिमान बाप के बच्चे कहने के साथ-साथ इन गुणों को प्रैक्टिकल जीवन में धारण करना है।
3. प्रश्न: कथनी, करनी और रहनी का क्या महत्व है?
उत्तर: तीनों एक समान हों तभी जल्दी से जल्दी कर्मातीत अवस्था की ओर बढ़ सकते हैं।
4. प्रश्न: सच्चाई की पहचान क्या है?
उत्तर: जो मनुष्य सच्चा होता है, वह सबका प्रिय बनता है। उसकी सच्चाई केवल शब्दों में नहीं, बल्कि मनसा, वाचा और कर्मणा में दिखाई देती है।
5. प्रश्न: सफाई का क्या अर्थ है?
उत्तर: मन में विकर्मों का, गलत भावों का और पुराने संस्कारों का किचड़ा न हो। विचार, वाणी और कर्म में स्वच्छता हो।
6. प्रश्न: सर्विसएबुल बच्चे की पहचान क्या है?
उत्तर: उसका केवल भाषण या समझाना ही सर्विस नहीं है। उसके हर संकल्प, हर शब्द और हर कर्म से सर्विस होनी चाहिए।
7. प्रश्न: बेहद की सर्विस क्या है?
उत्तर: मनसा, वाचा और कर्मणा—तीनों प्रकार से आत्माओं की सेवा करना और अपने श्रेष्ठ जीवन द्वारा दूसरों को प्रेरणा देना ही बेहद की सर्विस है।
8. प्रश्न: निश्चय बुद्धि होने का क्या लाभ है?
उत्तर: निश्चय से विजय प्राप्त होती है। जब दृढ़ विश्वास होता है कि “मुझे करना ही है”, तब कर्म भी उसी दृढ़ता के अनुसार होता है।
9. प्रश्न: संशय का परिणाम क्या होता है?
उत्तर: संशय से पुरुषार्थ कमजोर होता है और कर्म भी ढीला पड़ जाता है। इसलिए स्वयं में कमजोरी या असफलता का संकल्प नहीं रखना चाहिए।
10. प्रश्न: भट्ठी का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर: भट्ठी का अर्थ है—अपने पुराने रूप, गुण और कर्तव्य को बदलना। जैसे मिट्टी की ईंट पककर मजबूत बनती है, वैसे ही पुरुषार्थ से रूप, गुण और कर्तव्य श्रेष्ठ बनाना है।
11. प्रश्न: बापदादा की मदद कब अधिक प्राप्त होती है?
उत्तर: जब स्वयं में निश्चय और स्नेह होता है, तब सहयोग स्वतः प्राप्त होता है। स्नेही को सहयोग की मांग नहीं करनी पड़ती।
12. प्रश्न: “निश्चय बुद्धि” और “नष्टोमोहा” का क्या महत्व है?
उत्तर: ये पुरुषार्थ के दो मुख्य आधार हैं। निश्चय बुद्धि विजय दिलाती है और नष्टोमोहा बनने से आसक्ति समाप्त होकर आत्मिक स्थिति मजबूत होती है।
13. प्रश्न: “जो कहेंगे सो करेंगे” को जीवन में कैसे अपनायें?
उत्तर: प्रतिदिन स्वयं से चेक करें—
“मैंने आज जो कहा, क्या उसे करके भी दिखाया?”
यदि कथनी और करनी में अन्तर मिले तो उसी समय स्वयं को सुधारें।
14. प्रश्न: शक्तिरूप बनने का साधन क्या है?
उत्तर: अव्यक्त स्थिति में रहना। व्यक्त में आते हुए भी केवल सर्विस के निमित्त आना और सर्विस समाप्त होते ही पुनः अव्यक्त स्थिति में स्थित होने का अभ्यास करना है।
15. प्रश्न: “सदा सुहागिन” की निशानी क्या बताई गई?
उत्तर: एक निशानी बिन्दी, अर्थात् आत्म-स्थिति की याद; और दूसरी संगम रूपी कंगन, अर्थात् संगमयुग के नियम और श्रेष्ठ मर्यादाओं को सदा धारण करना।
16. प्रश्न: वर्तमान समय को “जम्प देने का समय” क्यों कहा गया?
उत्तर: क्योंकि अब केवल धीरे-धीरे चलना या दौड़ना पर्याप्त नहीं है। पुरुषार्थ में तीव्र गति से आगे बढ़ना है। जम्प देने में समय नहीं लगता, इसलिए दृढ़ संकल्प के साथ परिवर्तन करना है।
17. प्रश्न: एकरस अवस्था में रहने के लिए कौन-से संकल्प रखने हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से दो संकल्प—
- मैं स्नेही हूँ।
- मैं सर्विसएबुल हूँ।
18. प्रश्न: भट्ठी का लक्ष्य क्या है?
उत्तर: “खुद बदलकर औरों को बदलना।” स्वयं में परिवर्तन लाकर अपने संग और चलन से दूसरों को भी श्रेष्ठ परिवर्तन की प्रेरणा देना।
19. प्रश्न: त्रिमूर्ति छाप कौन-सी बताई गई है?
उत्तर: निश्चय बुद्धि, नष्टोमोहा और सर्विसएबुल। इन तीनों गुणों को जीवन में स्थायी बनाना ही अपनी पहचान को कायम रखना है।
20. प्रश्न: सबसे ऊँची सर्विस कौन-सी है?
उत्तर: स्वयं से भी ऊँचा दूसरों को बनाना। “हमसे ऊँचा कोई बने”—इसे अपनी ही ऊँचाई समझना है।
21. प्रश्न: इस शिक्षा को एक वाक्य में कैसे याद रखें?
उत्तर:
“जो कहना है, वही करना है; जो बनना है, वही करके दिखाना है।”
ब्रह्माकुमारी, मुरली, कथनी करनी, शिवबाबा, ज्ञान, राजयोग, आत्मज्ञान, निश्चय बुद्धि, नष्टोमोहा, सर्विसएबुल, अव्यक्त स्थिति, पुरुषार्थ, ईश्वरीय ज्ञान, BK Shivani, Brahma Kumaris, Murli, Rajyoga, Spirituality, Meditation, Om Shanti,Brahma Kumaris, Murli, words, deeds, Shivbaba, knowledge, Rajyoga, self-knowledge, determined intellect, destructive attachment, serviceable, latent state, effort, divine knowledge, BK Shivani, Brahma Kumaris, Murli, Rajyoga, Spirituality, Meditation, Om Shanti,

