(24)06-07-1969/“To become a true ornament, remove all your flaws and become pure.”

AW.(24)06-07-1969/“सच्ची जेवर बनने के लिए अपनी सब खामियों को निकाल स्वच्छ बनो”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“सच्ची जेवर बनने के लिए अपनी सब खामियों को निकाल स्वच्छ बनो”

(टीचर्स के प्रति अव्यक्त बापदादा के महावाक्य)

सभी किसकी याद में बैठे हो? एक की याद थी या दो की? जो एक की याद में थे वह हाथ उठायें। और जो दो की याद में थे वह भी हाथ उठायें। अब वह दो कौन? अव्यक्त-वतन वासी वा व्यक्त-वतन वासी? आप सब टीचर्स हैं ना। आपके पास कोई जिज्ञासू आवे तो उनको कौन-सा ठिकाना देंगे? सबको टीचिंग क्या देंगे! आप टीचर्स हो ना। टीचर्स अपने टीचर का शो निकालते है। जिज्ञासू को जिस रीति परवरिश करेंगे और ठिकाना देंगे, वह टीचर का शो निकलता है। अगर आप जिज्ञासू को आने से ही अव्यक्त वतन का ठिकाना देंगे जो रास्ता कब देखा ही नहीं तो पहुंचेगा कैसे? पहले एड्रेस कौन-सी दी जाती है? आप संग्रहालय में क्या समझाते हो? जिज्ञासू को क्या परिचय दते हो? उनको कौन-सा रास्ता कौन-सा ठिकाना देते हो? बीज किसने बोया? बीज तो बीज ही है। वह बीज भल सड़ भी जाए तो भी समय पर कुछ न कुछ टालियां आदि निकलती रहती हैं। बरसात पड़ती है तो निकल आता है। आप बीज को भूल जायेंगे तो फिर रास्ता कैसे बतायेंगे। बीज कौन-सा है?

टीचर्स को युक्तियुक्त बोलना चाहिए। छोटे बच्चे तो नहीं हो ना। छोटे बच्चों को पहले से सिखलाया जाता है। आप तो सीखकर इतनी परवरिश लेकर यही इम्तहान देने आये हो। पढ़ेगे भी साथ में, इम्तहान भी देंगे। दोनों कार्य इकट्ठे चलेंगे। बाप अव्यक्त वतन वासी बना तो आप सबाको भी अव्यक्त-वतन वासी बनना है। वह किस सृष्टि पर खड़े होकर अव्यक्त बने? आपको कहाँ बनना है? (साकार सृष्टि में तो सृष्टि है।) सृष्टि तो आलराउन्ड गोल है। सृष्टि में सारा झाड़ समाया हुआ ह़ै परन्तु सृष्टि का ठिकाना संगम है। संगम की बलिहारी है, जिसने आप सबको यहाँ पहुंचाया। आप अपने ठिकाने को भूल जायेंगे तो फिर क्या होगा? ठिकाना देने वाला ही भूल जायेगा। ठिकाना पक्का याद करो। और बापदादा की जो पढ़ाई मिली है उनको धारण करो। धारण से धैर्यवत, अन्तर्मुख होंगे। धैर्यता होगी तो इस कलियुगी रावण राज्य को खत्म कर देंगे। तो अब पढ़ाई का समय और साथ-साथ इम्तहान देने का भी समय है। यह हुई एक बात।

दूसरी बात जरा ध्यान में रखो इतना समय जो बापदादा की गोद में पले और उसमें जो भी कुछ कर्तव्य किया। ऐसे भी है कोई ने लज्जा के मारे बापदादा से छिपाया है। ऐसे नहीं बाप को पहचान कर सब बाप के आगे रखा है। नहीं। जो समझते हैं ऐसी भी भूल हुई है, जैसे कोई अपनी दिल से भूल नहीं करते हैं, परन्तु अलबेलाई से हो जाती है। तो वह सबको लिखना है। बापदादा से जिन्होंने बात की है, उन्हों को भी लिखना है। सारी जन्म-पत्री। यह अन्त का समय है ना, 84 जन्मों का हिसाब-किताब यहाँ ही चूक्तू होता है। सच्चाई और सफाई अक्षर तो कहते हैं परन्तु सच्चाई और सफाई में भी अन्तर क्या है, उस अर्थ को नहीं समझा है। अब उसकी गहराई में जाकर सारा लिखना है।

अव्यक्त वतन से बापदादा बच्चों की सर्विस करने और साफ बनाने लिए आये हैं। बाप सेवा करते हैं। आप सब बच्चों का शुरू से लेकर अन्त तक बाप सेवक है। सेवा करने लिए सदैव तैयार है। बाप को कितना फखुर रहता है – हमारे बच्चे सिरमोर हैं, आंखों के सितारे हैं, जिन्हों के लिए स्वर्ग स्थापन हो रहा है। उस स्वर्ग के वासी बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। जो समझते हैं हम लक्ष्मी-नारायण बनेंगे इतना लक्ष्य पकड़कर फिर भी गफलत करते रहते हैं तो इसलिए बापदादा फिर भी सेवा करने आये हैं। अन्त मती सो गति। समय नहीं है। समय बहुत नज़दीक आने वाला है। आप शेरनी शक्तियों को भुजायें तैयार करनी हैं तब तो दुश्मन से लड़ सकेंगे। अगर अपने में फेथ नहीं, बापदादा का पूरा परिचय नहीं तो न शक्ति सेना बन सकेंगे, न वह शक्तिपने के अलंकार आयेंगे। अगर शक्ति अपने में धारण की तो फिर आने वालों को भी पूरा ठिकाना मिलेगा। और वह सब शक्ति सेना में दाखिल हो जायेंगे, तो अपने को सच्चा जेवर बनाने के लिए, सब खामियां निकाल स्वच्छ बनना है। सोना कितने किस्म का होता है! कोई 9 कैरेट कोई 12…। प्युअर तो प्युअर ही है। कैरेट अक्षर निकल जाना चाहिए। अपने को करेक्ट करना है। अब करेक्शन करने का समय मिला है। यह बात अच्छी रीति ध्यान पर रखना।

धरत परिये धर्म न छोड़िये। कौन-सा धर्म, कौन-सा धरत? मालूम है? एक बार वायदा कर लिया, बापदादा को हाथ दे दिया फिर धर्म को नहीं छोड़ना है। पतिव्रता नारी जो होती है वह अपने धर्म में बहुत पक्की रहती है। आप सच्ची-सच्ची सीता, सच्ची लक्ष्मी हो जो महालक्ष्मी बनने वाली हो। अपने लक्ष्य से अगर उतर गये हो तो फिर जम्प मार लक्ष्य पर बैठ जाओ। बापदादा आप बच्चों की सेवा करने के लिए सेवक बनकर शिक्षा दे रहे हैं। फरमान नहीं करते हैं परन्तु शिक्षा देते हैं। क्योंकि बाप टीचर भी है, सतगुरू भी है। अगर बच्चों को फरमान करे और न मानें तो वह भी अच्छा नहीं इसलिए शिक्षा देते हैं।

आज फाउन्डेशन पड़ता है। छोटे बच्चों को तो टीका लगाया जाता है, उनको रास्ता बताना होता है, क्या करना है, कैसे बनना है। आप सबको रास्ता तो मिल ही गया है। आप औरों को रास्ता बताने निमित्त बने हो। अगर उस रास्ते में कोई गड़बड़ है, अगर-मगर है तो वह निकालनी है। अब भी नहीं निकलेगी तो आगे के लिए जो शक्तियों को बल मिला है, वह खलास समझो। ऐसा बापदादा को कहाँ-कहाँ दिखाई दे रहा है। तब संगठन में सबके दिलों को एक दिल बनाने, पूरा रास्ता बताने लिए आपको बुलाया है। आप सबको खुशी होगी। छोटे-छोटे बच्चों को कहाँ फंक्शन आदि पर ले जाना होता है तो बहुत खुशी होती है ना। वहाँ जायेंगे, नया कपड़ा पहनेंगे। आप सबको नया कपड़ा श्रृंगार आदि कौन-सा करना है? एक तरफ सेवक भी बनना है। सेवक अर्थात् पतित आत्माओं का उद्धार करना। उस सेवा को कायम रखो। आप सबको आने वाली आत्माओं का कैसे उद्धार करना है? कैसे विघ्नों को हटाना है? तीर में जौहर भरा हुआ होगा तो एक ही बार में पूरा तीर लग जायेगा। उस आत्मा का भी उद्धार हो जायेगा। छोटी-छोटी बच्चियां किसका उद्धार करेंगी। कौन-सा पहाड़ उठाया है? पहाड़ उठाने कौन निमित्त है? गोप-गोपिकायें। गोपिका भी तब हो सकती जब पूरा कर्तव्य करे। पहाड़ भी तब उठा सकते जब इतना बल हो। तो इन सब बातों की रोशनी देने लिए बाप को आना पड़ा है।

बाकी टीका तो एक ही बार बापदादा ने लगा दिया है। लाल टीका है या चन्दन का? लाल टीका है सूरत की शोभा। चन्दन है आत्मा की शोभा। तुमको जेवर भी सूरत की शोभा के लिए नहीं पहनने हैं। वस्त्र भी दुनिया को दिखाने लिए नहीं पहनने हैं। परन्तु आन्तरिक अपने को ऐसा श्रृंगारना है, जेवर ऐसा पहनना है जो लोक-पसन्द हो वा दिल पसन्द हो। लोक पसन्द है बाहर मुख। दिल पसन्द है अन्तर्मुख। तो अन्तर्मुख होकर अपने को सजाना है। लोकपसन्द भाषण किया। खुश किया परन्तु भाषा का जो रहस्य, तन्त है वह एक-एक अपनी कर्मेन्द्रियों में बस जाए, तब ही शोभा हो। कर्तव्य से दैवी गुणों का शो हो। दैवी गुणों का क्लास होता है सज़ने के लिए। ऐसे ही सज-सज कर संगम से पार होना है। फिर अपने घर जाना है। फिर घर से कहाँ जाना है? ससुरघर। कन्या ससुरघर जाती है अगर पढ़ी लिखी अक्लमंद नहीं होती तो सासु-ससुर कहते हैं इनमें चलने, उठने, बैठने का अक्ल नहीं है। अब तुमको ससुरघर चलना है। तो बाप कदम-कदम को नहीं देखते। परन्तु एक-एक कर्मेन्द्रियों को देखेंगे। कदम अक्षर मोटा है। कदम से पदम मिलता है। वह अपने कल्याण के लिए है। परन्तु कर्मेन्द्रियों को सजाना है। गहना पहनकर चलना है। अब सजने के लिए किसके पास आये हो? बापदादा के घर सो अपने घर आये। सजाने वाले कौन हैं? जब सगाई होती है तो गहना बनाने वाला एक होता है, पहनाने वाला दूसरा होता है। तो अब सज़कर चलना है। समझा।

समझू, सयानी टीचर तो हो ही। 15 दिन की रिजल्ट मानो अन्त की रिजल्ट है। इतना पुरुषार्थ कर प्रवीण टीचर सबको बनना है। फिर जब अपना सेन्टर जाकर सम्भालेंगे तो आने वाले को दृष्टि से सतयुगी सृष्टि दिखा सकेंगे। वह तब होगा जब गहने अच्छी रीति पहनेंगे। अगर लापरवाही से कोई गहना गिर गया तो नुकसान भी होगा और सजावट की शोभा भी चली जायेगी। इसलिए न शोभा को हटाना है, न गहनों को उतारना है। बड़ी बात नहीं है। छोटी समझेंगे तो सहज समझ आयेगी। अगर कहेंगे बहुत बड़ा ऊंचा ज्ञान है, तो कोई नहीं आयेगा। कहेंगे 7 दिन में जीवन मुक्ति की प्राप्ति होती है तो लाटरी लेने सब आयेंगे। लाटरी सब डाल देते हैं, फिर लाटरी में किसको कुछ मिल जाता है तो नसीब मानते हैं। चांस है देखें नसीब किसका लगता है। किसको बड़ी लाटरी मिलती हैं, किसको छोटी। पेपर लास्ट में होगा। 3 नम्बर निकलेंगे। जितना जो पुरुषार्थ करेंगे उतना नम्बर मिलेगा। नसीब को बनाना खुद के हाथ में है। तो अब लॉटरी की इन्तजार में नहीं रहना, इन्तजाम करते रहना। अच्छा।

बहुत कुछ खजाना मिला। अब उसको अपने पास जमा करो। और गऊ मिसल उगारना है। आप सब गायें भी हो। गोपियां भी हो। पहाड़ को कैसे उठाना है। गऊ बन कैसे उगारना है, यह कर्तव्य इस भट्टी में करना है। बहु रूप धारण कर बहु कर्तव्य बजाना है। भट्टी के अन्दर सब अनुभव करना है। जितना पुरुषार्थ करेंगे उतनी रिजल्ट निकलेगी। सम्पूर्ण अवस्था को प्राप्त करने का लक्ष्य क्या है? साधन क्या है? उसको जानना है। साधन मिल जायेंगे तो लक्ष्य को पकड़ लेंगे।

रत्नों की भी परख चाहिए ना। पूरी वैल्यू रखनी है। जेवर की वैल्यु जवाहरी ही परख सकेगा। जिनको परख नहीं उनके पास वैल्यु नहीं रहेगी। परख तब होगी जब जेवर पर पॉलिश हो, चमक हो। तब वैल्यु भी होगी और पहचानने वाले पहचान लेंगे। चमकदार नहीं होगा तो खरीद कौन करेंगे? समझेंगे पता नहीं सच्चा है वा झूठा जेवर है। पैसा भी देवे, जेवर भी काम का न हो इससे क्या फायदा। तो आप सबकी पूरी सज़ावट हो जायेगी, तो खरीददार भी निकलेंगे और आप वतनवासी बनते जायेंगे।

सच्चा जेवर बनने का रहस्य | अपनी हर खामी निकालकर स्वच्छ बनो

अव्यक्त बापदादा के महावाक्य | टीचर्स के लिए विशेष मार्गदर्शन


 अध्याय परिचय

सच्चा जेवर केवल सोने और रत्नों से नहीं बनता। उसकी वास्तविक कीमत उसकी शुद्धता, चमक और परख से होती है। इसी प्रकार आत्मिक जीवन में हमारी पहचान बाहरी रूप-सज्जा से नहीं, बल्कि पवित्रता, सच्चाई, सफाई, दैवी गुणों और कर्मों की श्रेष्ठता से होती है।

अव्यक्त बापदादा टीचर्स को विशेष रूप से समझाते हैं कि यदि हमें दूसरों को सही रास्ता दिखाना है, तो पहले स्वयं उस रास्ते पर चलना होगा।

“अपने को सच्चा जेवर बनाने के लिए सब खामियां निकाल स्वच्छ बनना है।”


अध्याय 1 — टीचर का कार्य: स्वयं शिक्षक का शो बनना

टीचर केवल ज्ञान सुनाने वाला नहीं होता। टीचर के जीवन से उसके टीचर की पहचान दिखाई देनी चाहिए।

यदि कोई जिज्ञासु हमारे पास आता है, तो सबसे पहले हमें उसे सही परिचय, सही ठिकाना और सही रास्ता देना है।

उदाहरण:

यदि कोई व्यक्ति पहली बार राजयोग के बारे में जानने आता है और हम स्वयं ही अपने लक्ष्य तथा मार्ग को स्पष्ट नहीं जानते, तो हम उसे सही दिशा कैसे देंगे?

इसलिए—

पहले स्वयं स्पष्ट बनो → फिर दूसरों को स्पष्टता दो।

मुरली नोट

टीचर का शो उसके बोल से अधिक उसके जीवन से होता है।


अध्याय 2 — अपना सच्चा ठिकाना याद रखो

बापदादा समझाते हैं कि संगमयुग हमारा विशेष ठिकाना है। इसी संगम पर पढ़ाई भी है और इम्तहान भी।

हम केवल पढ़ने वाले नहीं, बल्कि पढ़ाई को जीवन में धारण करके परीक्षा देने वाले विद्यार्थी हैं।

मुख्य बिंदु

  • पढ़ाई के साथ पुरुषार्थ।
  • ज्ञान के साथ धारण।
  • धारण के साथ धैर्यता।
  • धैर्यता के साथ अन्तर्मुखता।
  • अन्तर्मुखता से विकारों और कमजोरियों पर विजय।

उदाहरण:

परीक्षा की तैयारी करने वाला विद्यार्थी केवल पुस्तक पढ़कर संतुष्ट नहीं होता। वह अपनी तैयारी को प्रश्नपत्र में सिद्ध करता है।

उसी प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान की परीक्षा परिस्थितियों और कर्मों में होती है।


अध्याय 3 — सच्चाई और सफाई: दोनों में क्या अंतर?

अव्यक्त बापदादा विशेष रूप से कहते हैं कि केवल “सच्चाई और सफाई” शब्द बोलना पर्याप्त नहीं है। इनके वास्तविक अर्थ को समझना और जीवन में उतारना आवश्यक है।

सच्चाई क्या है?

अपने मन, विचार और कर्मों की वास्तविक स्थिति को ईमानदारी से पहचानना।

सफाई क्या है?

जो कमजोरी पहचान ली, उसे दूर करने का पुरुषार्थ करना।

सच्चाई = कमजोरी को पहचानना।
सफाई = कमजोरी को निकालना।

आत्म-चिंतन

क्या मैं अपनी कमियों को स्वीकार करता हूँ?
क्या मैं अपनी गलती के लिए बहाने बनाता हूँ?
क्या मैं अलबेलाई से हुई भूलों को भी पहचानकर सुधारता हूँ?


अध्याय 4 — सारी जन्म-पत्री साफ करो

बापदादा बच्चों को अपनी सम्पूर्ण स्थिति की जाँच करने का संकेत देते हैं।

यह समय केवल दूसरों की कमियाँ देखने का नहीं, बल्कि स्वयं की जन्म-पत्री देखने का समय है।

क्या चेक करना है?

  • कौन-सी कमजोरी बार-बार आती है?
  • किस परिस्थिति में मन कमजोर होता है?
  • कहाँ अलबेलाई आती है?
  • कहाँ देह-अभिमान प्रभाव डालता है?
  • कहाँ क्रोध, मोह, लोभ या अहंकार अपनी ओर खींचता है?
  • कहाँ ज्ञान और कर्म में अन्तर दिखाई देता है?

उदाहरण:

यदि कोई विद्यार्थी रोज कहे कि “मुझे पढ़ना आता है”, लेकिन परीक्षा में उत्तर न लिख पाए, तो केवल ज्ञान का दावा पर्याप्त नहीं।

इसी प्रकार ज्ञान का वास्तविक प्रमाण कर्म है।


अध्याय 5 — “कैरेट” समाप्त करो

सोने की शुद्धता अलग-अलग कैरेट से मापी जाती है। बापदादा इसी उदाहरण से आत्मिक शुद्धता का रहस्य समझाते हैं।

यदि हम स्वयं को सच्चा जेवर बनाना चाहते हैं, तो अपनी अशुद्धियों और कमजोरियों को निकालना होगा।

आध्यात्मिक कैरेट क्या हैं?

  • थोड़ी पवित्रता
  • थोड़ी सहनशीलता
  • थोड़ी मधुरता
  • थोड़ी विनम्रता
  • थोड़ी सेवा
  • थोड़ी स्मृति

ऐसा नहीं।

लक्ष्य है — सम्पूर्ण शुद्धता।

मुरली नोट

“अपने को करेक्ट करना है। अब करेक्शन करने का समय मिला है।”


अध्याय 6 — धर्म और धरत को कभी मत छोड़ो

एक बार बापदादा को हाथ देने के बाद अपने धर्म में दृढ़ रहना है।

यहाँ धर्म का अर्थ है—अपने श्रेष्ठ आत्मिक कर्तव्य और मर्यादाओं पर दृढ़ रहना।

उदाहरण:

जैसे पतिव्रता नारी अपने धर्म में दृढ़ रहती है, वैसे ही ब्राह्मण आत्मा को अपने श्रेष्ठ धर्म और लक्ष्य में दृढ़ रहना है।

यदि लक्ष्य से नीचे आ गये हो—

रुको नहीं → स्वयं को उठाओ → फिर लक्ष्य पर बैठ जाओ।


अध्याय 7 — दैवी गुण ही असली आभूषण हैं

बाहरी आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन आत्मा की शोभा बढ़ाने वाले आभूषण हैं—

 पवित्रताशान्ति
प्रेम
सहनशीलता
नम्रता
मधुरता
सच्चाई
धैर्यता
निःस्वार्थ सेवा
आत्मिक स्मृति

महत्वपूर्ण बात

लोक-पसन्द बनने के लिए बाहरी प्रदर्शन नहीं, दिल-पसन्द बनने के लिए अन्तर्मुखता चाहिए।


अध्याय 8 — ज्ञान का शो नहीं, कर्म का शो

केवल अच्छा भाषण करना पर्याप्त नहीं है।

यदि कोई मधुरता पर भाषण करे लेकिन व्यवहार में कठोर हो, तो ज्ञान का प्रभाव कम हो जाता है।

यदि कोई सहनशीलता समझाए लेकिन छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाए, तो उसका जीवन उसके ज्ञान का विरोध करता है।

इसलिए:

ज्ञान → धारण → कर्म → दैवी गुणों का शो

यही सच्चे टीचर की पहचान है।


अध्याय 9 — सेवक बनकर सेवा करना

बापदादा स्वयं को बच्चों का सेवक बताते हुए समझाते हैं कि सेवा का वास्तविक अर्थ है—

पतित आत्माओं का उद्धार करना और विघ्नों को हटाना।

टीचर को केवल सेंटर संभालना नहीं है, बल्कि आने वाली आत्माओं को शक्ति देना है।

उदाहरण:

यदि किसी जिज्ञासु के मन में भय है, तो उसे शान्ति का अनुभव कराना सेवा है।

यदि कोई निराश है, तो उसे आत्मिक शक्ति देना सेवा है।

यदि कोई मार्ग भूल गया है, तो उसे सही दिशा दिखाना सेवा है।


अध्याय 10 — “शेरनी शक्ति” बनने का अर्थ

बापदादा टीचर्स को शक्तियों के रूप में संबोधित करते हुए कहते हैं कि शक्ति सेना को अपनी शक्ति धारण करनी है।

फेथ + ज्ञान + पवित्रता + पुरुषार्थ = आत्मिक शक्ति

यदि स्वयं में विश्वास नहीं और बाप का पूरा परिचय स्पष्ट नहीं, तो शक्ति के अलंकार धारण करना कठिन होगा।

आत्म-चिंतन

क्या मेरे अंदर परिस्थिति का सामना करने की शक्ति है?

क्या मैं स्वयं पर विजय प्राप्त कर दूसरों को शक्ति दे सकता हूँ?


अध्याय 11 — अपना नसीब स्वयं बनाओ

बापदादा लॉटरी का सुंदर उदाहरण देते हैं।

हर कोई लॉटरी के परिणाम की प्रतीक्षा करे—यह पुरुषार्थ नहीं है।

आध्यात्मिक जीवन में नसीब की प्रतीक्षा नहीं करनी है।

सूत्र:

जितना पुरुषार्थ → उतनी प्राप्ति।

इसलिए—

 “देखेंगे क्या होता है।”
“मेरा नसीब होगा तो हो जाएगा।”

की जगह—

 “मुझे अपने नसीब को श्रेष्ठ बनाना है।”


अध्याय 12 — ज्ञान के खजाने को जमा करो

ज्ञान सुनना एक बात है और ज्ञान को अपने संस्कारों में जमा करना दूसरी बात।

यदि खजाना मिला लेकिन उसका उपयोग नहीं किया, तो उसका वास्तविक लाभ नहीं मिला।

उदाहरण:

आपके पास शान्ति का ज्ञान है, लेकिन परिस्थिति आने पर अशान्त हो जाते हैं—तो शान्ति का खजाना अभी जीवन में जमा नहीं हुआ।

इसलिए हर दिन स्वयं से पूछें—

आज मैंने कौन-सा गुण धारण किया?


अध्याय 13 — रत्न की परख और चमक

एक जवाहरी ही असली जेवर की कीमत पहचान सकता है।

उसी प्रकार आत्मिक रत्न की वास्तविक कीमत उसकी चमक और पवित्रता से पहचानी जाती है।

चमक किससे आती है?

  • स्वच्छ मन
  • श्रेष्ठ संकल्प
  • निर्मल दृष्टि
  • मधुर बोल
  • श्रेष्ठ कर्म
  • निरन्तर स्मृति
  • निःस्वार्थ सेवा

जब आत्मा में चमक आती है, तो उसके संपर्क में आने वाली आत्माएँ भी उस शक्ति को अनुभव करती हैं।


अध्याय 14 — कर्मेन्द्रियों को सजाना है

बापदादा विशेष रूप से बाहरी सजावट से आगे बढ़कर कर्मेन्द्रियों की सजावट की बात समझाते हैं।

अपनी कर्मेन्द्रियों से पूछें:

दृष्टि — क्या मैं आत्मिक दृष्टि रखता हूँ?
श्रवण — क्या मैं श्रेष्ठ बातें सुनता हूँ?
वाणी — क्या मेरे शब्द मधुर और शक्तिशाली हैं?
कर्म — क्या मेरे कर्म दैवी गुणों का परिचय देते हैं?
संकल्प — क्या मेरे विचार श्रेष्ठ और स्वच्छ हैं?

यही है वास्तविक श्रृंगार।


अध्याय 15 — सम्पूर्ण अवस्था का लक्ष्य

अन्तिम लक्ष्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अवस्था की ओर बढ़ना है।

इसके लिए दो बातें अत्यन्त आवश्यक हैं:

 लक्ष्य

सम्पूर्ण, पवित्र और दैवी अवस्था।

 साधन

स्मृति, ज्ञान, योग, धारणा, सेवा और स्व-चेकिंग।

जब साधन स्पष्ट होंगे, तब लक्ष्य तक पहुँचना सहज होगा।


 अध्याय का सार

इस पूरे संदेश का सार एक ही है—

“सच्चा जेवर बनने के लिए अपनी सब खामियों को निकालकर स्वच्छ बनो।”

टीचर वही है जिसके जीवन से शिक्षा दिखाई दे।
शक्ति वही है जो स्वयं पर विजय प्राप्त करे।
जेवर वही है जिसमें शुद्धता और चमक हो।
सेवक वही है जो दूसरों को सही ठिकाना और रास्ता दे।
और सच्चा पुरुषार्थी वही है जो अपने नसीब की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि अपने पुरुषार्थ से नसीब बनाता है।

 आज का संकल्प

“मैं अपनी कमजोरियों को छिपाऊँगा नहीं, पहचानूँगा।
पहचानकर उन्हें समाप्त करूँगा।
अपने ज्ञान को कर्म में धारण करूँगा।
अपने दैवी गुणों की चमक से बापदादा का शो करूँगा।
और स्वयं को एक सच्चा, स्वच्छ और चमकदार आध्यात्मिक जेवर बनाऊँगा।”


मुरली नोट्स

स्रोत: अव्यक्त बापदादा के टीचर्स के प्रति महावाक्य — प्रस्तुत पाठ के आधार पर।

मूल पाठ में मुरली की सटीक तिथि उपलब्ध नहीं है। इसलिए बिना प्रमाण के कोई तारीख जोड़ना उचित नहीं होगा। यदि आप मूल अव्यक्त मुरली की तारीख/वर्ष उपलब्ध करा दें, तो उसे इस अध्याय में सही “मुरली डेट” के रूप में जोड़ा जा सकता है।

मुख्य मुरली बिंदु

  1. टीचर अपने टीचर का शो अपने जीवन से करे।
  2. जिज्ञासुओं को सही परिचय, ठिकाना और रास्ता देना है।
  3. पढ़ाई के साथ-साथ इम्तहान भी देना है।
  4. सच्चाई के साथ सफाई और करेक्शन आवश्यक है।
  5. अपनी जन्म-पत्री को चेक करके कमजोरियों को समाप्त करना है।
  6. स्वयं को सच्चा जेवर बनाने के लिए खामियों को निकालना है।
  7. कैरेट नहीं, पूर्ण पवित्रता का लक्ष्य रखना है।
  8. दैवी गुणों को कर्मेन्द्रियों में धारण करना है।
  9. अन्तर्मुख होकर स्वयं को सजाना है।
  10. सेवा को कायम रखते हुए आत्माओं का उद्धार करना है।
  11. पुरुषार्थ द्वारा अपना नसीब बनाना है।
  12. ज्ञान के खजाने को जीवन में जमा करना है।
  13. चमकदार और मूल्यवान आत्मिक रत्न बनना है।

 Disclaimer

यह वीडियो आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार प्रस्तुत किए गए अव्यक्त बापदादा के महावाक्यों एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं के आधार पर व्यवस्थित और व्याख्यायित किए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

दर्शकों से अनुरोध है कि आध्यात्मिक संदेशों को आत्म-चिंतन, स्व-परिवर्तन, सकारात्मक जीवन एवं राजयोग अभ्यास के संदर्भ में समझें। प्रस्तुत उदाहरण विषय को सरलता से समझाने के लिए हैं।

प्रश्न 1. सच्चा जेवर बनने का मुख्य अर्थ क्या है?

उत्तर: अपनी सभी खामियों, कमजोरियों और अलबेलाई को निकालकर स्वयं को स्वच्छ, पवित्र और दैवी गुणों से सम्पन्न बनाना ही सच्चा जेवर बनना है।

प्रश्न 2. टीचर की सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या है?

उत्तर: टीचर को केवल ज्ञान नहीं सुनाना, बल्कि अपने जीवन द्वारा अपने टीचर का शो करना है। उसके व्यवहार और कर्मों से ज्ञान दिखाई देना चाहिए।

प्रश्न 3. जिज्ञासु को टीचर को सबसे पहले क्या देना चाहिए?

उत्तर: जिज्ञासु को सही परिचय, सही ठिकाना और सही रास्ता देना चाहिए, ताकि वह आध्यात्मिक मार्ग को स्पष्ट रूप से समझ सके।

प्रश्न 4. पढ़ाई के साथ इम्तहान देने का क्या अर्थ है?

उत्तर: ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ उसे परिस्थितियों और कर्मों में धारण करना ही वास्तविक इम्तहान है।

प्रश्न 5. सच्चाई और सफाई में क्या अंतर है?

उत्तर: सच्चाई का अर्थ अपनी वास्तविक कमजोरियों को ईमानदारी से पहचानना है, जबकि सफाई का अर्थ उन कमजोरियों को दूर करने का पुरुषार्थ करना है।

प्रश्न 6. अपनी “जन्म-पत्री” देखने का क्या अर्थ है?

उत्तर: अपनी पूरी जीवन-यात्रा और संस्कारों को चेक करना—कहाँ गलती हुई, कहाँ अलबेलाई आई, कहाँ कमजोरी दिखाई दी और किन बातों में सुधार आवश्यक है—इसे अपनी जन्म-पत्री देखना कहा गया है।

प्रश्न 7. बापदादा ने सोने के कैरेट का उदाहरण क्यों दिया?

उत्तर: यह समझाने के लिए कि थोड़ी-सी पवित्रता पर्याप्त नहीं है। लक्ष्य पूर्ण शुद्धता का होना चाहिए। आत्मा में जितनी अधिक पवित्रता और दैवी गुणों की चमक होगी, उतनी ही उसकी वास्तविक वैल्यू होगी।

प्रश्न 8. आत्मा के वास्तविक आभूषण कौन-से हैं?

उत्तर: पवित्रता, शान्ति, प्रेम, सहनशीलता, नम्रता, मधुरता, सच्चाई, धैर्यता और निःस्वार्थ सेवा आत्मा के वास्तविक आभूषण हैं।

प्रश्न 9. “लोक-पसन्द” और “दिल-पसन्द” में क्या अंतर है?

उत्तर: लोक-पसन्द बनने में बाहरी प्रभाव और प्रदर्शन हो सकता है, जबकि दिल-पसन्द बनने के लिए अन्तर्मुखता, सच्चाई और दैवी गुणों की आवश्यकता है।

प्रश्न 10. ज्ञान का वास्तविक शो कैसे होता है?

उत्तर: जब ज्ञान हमारे विचारों, वाणी, दृष्टि और कर्मों में दिखाई देता है, तब ज्ञान का वास्तविक शो होता है। केवल भाषण करना पर्याप्त नहीं है।

प्रश्न 11. टीचर को सेवक क्यों कहा गया है?

उत्तर: क्योंकि टीचर का कार्य आत्माओं को सही मार्ग दिखाना, उनकी कमजोरियों और विघ्नों को दूर करने में सहायता करना तथा उन्हें आत्मिक उन्नति की ओर ले जाना है।

प्रश्न 12. “शेरनी शक्ति” बनने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर: स्वयं में फेथ, बाप का स्पष्ट परिचय, पवित्रता, आत्मिक बल और दृढ़ पुरुषार्थ आवश्यक है। तभी शक्ति बनकर दूसरों को भी शक्ति दी जा सकती है।

प्रश्न 13. अपना नसीब कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर: नसीब की प्रतीक्षा करने के बजाय पुरुषार्थ करना चाहिए। जितना श्रेष्ठ पुरुषार्थ होगा, उतनी ही श्रेष्ठ प्राप्ति और नसीब का निर्माण होगा।

प्रश्न 14. ज्ञान के खजाने को जमा करने का क्या अर्थ है?

उत्तर: ज्ञान को केवल सुनना या याद रखना नहीं, बल्कि उसे जीवन में धारण करना और परिस्थितियों में प्रयोग करना ही ज्ञान के खजाने को जमा करना है।

प्रश्न 15. आत्मिक “चमक” किससे आती है?

उत्तर: स्वच्छ मन, श्रेष्ठ संकल्प, निर्मल दृष्टि, मधुर वाणी, श्रेष्ठ कर्म, योगयुक्त स्थिति और दैवी गुणों की धारणा से आत्मा में आत्मिक चमक आती है।

प्रश्न 16. कर्मेन्द्रियों को सजाने का क्या अर्थ है?

उत्तर: अपनी दृष्टि को पवित्र, वाणी को मधुर, कर्मों को श्रेष्ठ और व्यवहार को दैवी बनाना ही कर्मेन्द्रियों का वास्तविक श्रृंगार है।

प्रश्न 17. सम्पूर्ण अवस्था प्राप्त करने के साधन क्या हैं?

उत्तर: ज्ञान, योग, धारणा, दैवी गुण, सेवा, स्व-चेकिंग और निरन्तर पुरुषार्थ सम्पूर्ण अवस्था प्राप्त करने के प्रमुख साधन हैं।

प्रश्न 18. यदि लक्ष्य से नीचे आ जाएँ तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: निराश नहीं होना चाहिए। अपनी स्थिति को चेक करके कमजोरी को दूर करें और फिर से अपने श्रेष्ठ लक्ष्य पर दृढ़ता से स्थित हो जाएँ।

प्रश्न 19. सच्चे टीचर की पहचान क्या है?

उत्तर: सच्चा टीचर वह है जिसके जीवन, व्यवहार और कर्मों से उसके द्वारा दी गई शिक्षा दिखाई दे और जो दूसरों को सही ठिकाना तथा मार्ग प्रदान कर सके।

प्रश्न 20. इस पूरे संदेश का सबसे महत्वपूर्ण संकल्प क्या है?

उत्तर: अपनी कमजोरियों को छिपाना नहीं, उन्हें पहचानना और समाप्त करना; ज्ञान को कर्म में धारण करना; दैवी गुणों से स्वयं को सजाना और एक स्वच्छ, पवित्र तथा चमकदार आध्यात्मिक जेवर बनना।


 एक लाइन में पूरा संदेश

“अपनी खामियों को निकालो, स्वयं को स्वच्छ बनाओ, दैवी गुणों से सजाओ और अपने जीवन द्वारा अपने टीचर का शो करो।”

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