AW.(10) 10-03-1969 “अपने पुराने संस्कारों पर विन करने वाले ही नम्बरवन बन सकेंगे”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“अपने पुराने संस्कारों पर विन करने वाले ही नम्बरवन बन सकेंगे”
(कुमारियों के पहले ग्रुप की टीचर्स ट्रेनिंग में अव्यक्त बापदादा की मधुर शिक्षायें)
जो भी सब कुमारियाँ आई हुई हैं, उन सबके अन्दर लक्ष्य क्या है? क्या लक्ष्य रखकर आई हो? (कोई ने कहा भट्ठी का अनुभव करने) अनुभव करने का भी लक्ष्य क्या है? क्यों यह अनुभव करने चाहती हो? टीचर्स का लक्ष्य क्या है? भट्ठी में तो पकेंगी लेकिन भट्ठी में पक करके क्या बनना है! वह लक्ष्य तो क्लीयर जरूर होना चाहिए ना। क्या बनना है और कैसा बनना है! जैसे साकार रूप में मात पिता कर्म करके दिखलाने के एक एक्जाम्पुल बने हैं, इसी रीति एक शब्द में यही कहेंगे कि सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर कैसे होना चाहिए। न सिर्फ टीचर लेकिन जैसे तीन रूप हैं पिता, शिक्षक और गुरू। इस ही रीति से जगत माता और जगत के प्रति निमित्त टीचर, साथ-साथ सतगुरु। सतगुरू खुद नहीं बन सकते लेकिन सतगुरू के साथ पूरा सम्बन्ध जुटाने वाले। श्रीमत पर चलकर चलने वाली बनना है। यह मुख्य बातें हर टीचर में जब आ जाती हैं तो उस टीचर की रिजल्ट सर्वोत्तम निकलती है। टीचर बनना तो सहज है लेकिन टीचर पन की क्वालिफिकेशन में मुख्य सब संस्कार जो ज्ञान और योग के भरने हैं, वह बहुत जरूरी हैं। और जगत माता पन का, शक्ति पन का, दिव्य गुणधारी दैवी पन का और साथ-साथ योद्धे पन का यह सब संस्कार हरेक जब अपने में ठीक रीति भरेंगे तब दुनिया में नाम बाला होगा। ऐसा लक्ष्य रखा है? कन्या होते हुए भी जगत माता हैं। अगर कन्या समझेंगे तो फिर कुछ-कुछ बातों में सर्विस करते हुए अनासक्त रहेंगे। कन्यापन अर्थात् प्युरिटी। तो कुमारी पन भी पूरा रखना है लेकिन कुमारी पन के साथ-साथ बेहद जगत माता हूँ, यह भी समझना है। यह सब आत्मायें जो तरस रही हैं, दु:खी हो चिल्ला रही हैं उन्हों की ज्ञान और योग से पालना करनी है। जब ऐसी अपनी वृत्ति स्मृति और दृष्टि रखेंगे तब दृष्टि में रूहानियत होगी। जिस्मानी पन निकल जायेगा और रूहानी दृष्टि होती जायेगी। हरेक को यही लक्ष्य रखना है कि नम्बरवार होते भी नम्बर वन बनकर दिखाऊंगी लेकिन वन नम्बर कैसे बनेंगी? जब अपने सर्व पुराने संस्कारों के ऊपर विन करेंगी, वही वन बनेंगी। इतनी हिम्मत और हुल्लास हरेक को अपने में रखना है। और अगर इतनी कुमारियाँ सम्पूर्ण टीचर बनकर निकले फिर तो विनाश कितना जल्दी होगा? क्योंकि आप सम्पूर्ण बनेगी तो फिर सृष्टि भी सम्पूर्ण चाहिए। यह अपूर्ण सृष्टि जल्दी-जल्दी खत्म हो सम्पूर्ण सृष्टि आ जायेगी। फिर शक्तियों का नाम कोने-कोने में बाला होगा। सबको मुख्य यही सोचना चाहिए कि कब भी अपने अन्दर पुराने संस्कारों को प्रगट होने नहीं देना है। संकल्प से ही उनको खत्म करना है। अगर संकल्प आता भी है तो संकल्प को स्थान देकर उनकी पालना नहीं करना। संकल्प को संकल्प तक ही खत्म करना है। फिर आखरीन यह हो जायेगा – संकल्प में ही पुराने संस्कार इमर्ज नहीं होंगे।
एक दो के स्वभाव भिन्न-भिन्न तो होंगे ही लेकिन स्वभाव से बचने के लिए अपने में क्या धारणा करनी चाहिए? सरलता। जितनी सरल बुद्धि, सरल दृष्टि, सरल वाणी होगी उतना ही स्वभावों का टक्कर नहीं होगा।
कुमारियाँ भट्ठी नाम से घबराती तो नहीं हो? यह तो मीठी भट्ठी है, इसमें ही तो सोना बनना है। कोई भी मन में मुश्किलात महसूस हो तो मन की बातें मन में नहीं रखना। मन की बातें वाणी में भल लाना है, लेकिन कहाँ? स्थान देखकर लाना है। यह भी किचड़ा है ना। किचड़े को कहाँ डाला जाता है? जो स्थान मुकरर होता है। यहाँ वहाँ किचड़े को डाला तो फिर वह वायुमण्डल में फैल जायेगा। इसलिए कोई भी मन में ऐसा संकल्प आये जिसको व्यर्थ संकल्प, विकल्प कहें वह निमित्त बने हुए स्थान के सिवाए किसी से नहीं करना। नहीं तो वायुमण्डल को बिगाड़ने के निमित्त बनने से पुरुषार्थ में यह बाधा पड़ जाती है। इसलिए जैसा लक्ष्य रखा है तो कोई भी अपने सामने रूकावट डालने की बातें नहीं रखना। मिटाते हटाते चलते चलो। तब लक्ष्य को पा सकती हो। हर मुरली में लक्ष्य तो दिया ही है। क्या करना है, क्या देखना है, क्या सोचना है। जैसे डायरेक्शन है उस प्रमाण ही चलते चलना है।
घर में सिकीलधे होते हैं तो बाप उनको श्रृंगारते हैं ना। तो आप कुमारियाँ कौन सा श्रृंगार करेंगी? गहने पहने हुए हैं? हर वक्त अपने गहनों से सजी हुई रहना। उतारना नहीं। जो रॉयल फैमिली वाले होते हैं वह कब गहने उतारते नहीं हैं। जो गरीब होते हैं वह कब-कब पहनते हैं। आप सब तो किसके बच्चे हो? कौन से गहने पहने हुए हैं? तिलक कौन सा है? (राजतिलक) राजतिलक तो आपके सतयुगी माँ बाप देंगे। संगमयुग का नया तिलक कौन सा है? विजयी बनने की विक्टरी। आज विजयी रत्न बनने की निशानी तिलक रूप में कुमारियों को दे रहे हैं। अच्छा, चिन्दी पहनी है। कौन सी चिन्दी पहननी है? चिन्दी है – स्वदर्शन चक्र की। यह भी कब भूलना नहीं हैं। कुण्डल कौन से पहनेंगी? (शंख) शंखध्वनी होती रहती। अच्छा, कंगन कौन से पहनेगी? नियम रूपी कंगन बांधना हैं। लेकिन जितने जो नियम पालन करेंगे उतने कंगन पड़ेंगे। कोई दस-दस कंगन भी पहनते हैं, कोई एक भी पहनते हैं। ज्यादा कंगन जब होते हैं तब शोभनिक होती हैं। जितने नियमों की पालना करते हैं उतने ही कंगन पड़े हुए हैं। अच्छा, घुंघरू कौन से पहनेंगी? घुंघरू में आवाज होता हैं ना तो ज्ञान घुंघरू का आवाज सब सुनें। कृष्ण के लिए कहते हैं घुंघरू की आवाज से गोपिकायें आती थी। तुम्हारी ज्ञान घुंघरू की आवाज से कौन आयेंगे? आपके भक्त और प्रजा। जितना-जितना सुरीली आवाज होगा वैसे-वैसे आकर्षण होगी। यह सब गहनें हर वक्त पहने ही रहना है। कहाँ माया उतार न दे। उतारने वाले भी बड़े तेज हैं। प्यार-प्यार से उतार भी देते हैं। इसलिए कब उतारने नहीं देना।
कुमारियाँ हैं तो उम्मीदवार लेकिन कौन सी परसेन्टेज में उम्मींद पूरी करनी है वह मालूम पड़ जायेगा। हरेक को यही सोचना है कि हम कोई कमाल करके दिखाऊं। बापदादा की जो उम्मींद हैं वह उम्मींद का सितारा अपने मस्तक के बीच चमका के दिखाना है। कुमारियों का ग्रुप तो अच्छा है। टीचर भी अच्छी मिली है। जहाँ भी जिसका गुण देखो वह जल्दी से उठाना। क्योंकि हरेक में कोई न कोई विशेष गुण होता है। तो हरेक से गुण उठाते-उठाते सर्वगुण सम्पन्न बनना है। अगर अवगुण देखो तो पीठ कर लेना। खिलौना देखा है ना। सीता के सामने रावण करते हैं तो पीठ कर देती। राम सामने आता तो राम के सम्मुख हो जाती है। आप भी सीता तो हो ही। गुण देखो तो धारण करना। अवगुण को देखते हुए भी नहीं देखना। सुनते हुए नहीं सुनना। न सोचना। सुनना और देखना तो दूसरी स्टेज है। सभी कुमारियों को विक्टरी का टीका दिया और ऊपर में बिन्दी देते हुए मुख मीठा कराया? इस टीके को कायम रखने की हिम्मत हैं ना। आज जैसे मस्तक चमक रहे हैं ऐसे अविनाशी चमकते हैं।
पुराने संस्कारों पर विजय ही नम्बरवन बनने की कुंजी
कुमारियों की टीचर्स ट्रेनिंग में अव्यक्त बापदादा की मधुर शिक्षाएँ
📅 मुरली नोट्स — अव्यक्त बापदादा
स्रोत: कुमारियों के पहले ग्रुप की टीचर्स ट्रेनिंग में अव्यक्त बापदादा की शिक्षाएँ
विषय: सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर बनने का लक्ष्य, पुराने संस्कारों पर विजय, पवित्रता और दिव्य गुणों की धारणा
अध्याय 1: टीचर बनने का वास्तविक लक्ष्य
कुमारियों को केवल टीचर बनने का लक्ष्य नहीं रखना है, बल्कि सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर बनने का लक्ष्य रखना है। टीचर के साथ-साथ पिता, शिक्षक और गुरु—इन तीनों रूपों की श्रेष्ठ विशेषताओं को जीवन में धारण करना है।
मुरली नोट:
श्रीमत पर चलकर चलने वाली बनना और सतगुरु के साथ पूरा सम्बन्ध जोड़ना—यह श्रेष्ठ टीचर की मुख्य योग्यता है।
उदाहरण:
जैसे एक श्रेष्ठ शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने व्यवहार से भी विद्यार्थियों को प्रेरणा देता है, वैसे ही राजयोगी टीचर का जीवन स्वयं एक उदाहरण होना चाहिए।
अध्याय 2: नम्बरवन बनने का रहस्य — पुराने संस्कारों पर विजय
हर कुमारिका का लक्ष्य होना चाहिए—“मैं नम्बरवार नहीं, नम्बरवन बनकर दिखाऊँगी।”
लेकिन नम्बरवन बनने का आधार बाहरी सफलता नहीं, बल्कि अपने पुराने संस्कारों पर विजय है।
मुरली नोट:
“अपने सर्व पुराने संस्कारों के ऊपर विन करेंगी, वही वन बनेंगी।”
उदाहरण:
यदि किसी परिस्थिति में क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार या कोई पुराना स्वभाव सामने आता है, तो उसे कर्म में लाने के बजाय वहीं रोक देना ही संस्कार पर विजय का पुरुषार्थ है।
अध्याय 3: संकल्प को संकल्प तक ही समाप्त करना
पुराना संस्कार पहले संकल्प के रूप में इमर्ज होता है। यदि उस संकल्प को महत्व देकर उसकी पालना की जाए, तो वह संस्कार फिर मजबूत होता है।
इसलिए लक्ष्य है—संकल्प को संकल्प तक ही समाप्त करना।
मुरली नोट:
यदि पुराना संकल्प आता भी है तो उसे स्थान देकर उसकी पालना नहीं करनी है। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बनानी है कि पुराने संस्कार संकल्प में भी इमर्ज न हों।
उदाहरण:
किसी ने कुछ ऐसा कह दिया जिससे मन में प्रतिक्रिया का संकल्प आया। उस संकल्प को आगे बढ़ाने के बजाय आत्मिक स्थिति में स्थित होकर उसे वहीं समाप्त कर देना—यही संस्कारों पर विजय है।
अध्याय 4: कुमारीपन और जगत माता का संगम
कुमारीपन अर्थात् प्योरिटी।
कुमारियों को अपनी पवित्रता को कायम रखते हुए यह स्मृति भी रखनी है कि वे जगत माता हैं।
दुनिया की दु:खी और प्यासी आत्माओं की ज्ञान और योग द्वारा पालना करनी है।
मुरली नोट:
जब वृत्ति, स्मृति और दृष्टि में जगत माता की भावना होगी, तब दृष्टि में रूहानियत आएगी और जिस्मानीपन कम होता जाएगा।
उदाहरण:
हर आत्मा को केवल उसके बाहरी रूप या व्यवहार से न देखकर उसे आत्मा समझकर ज्ञान और योग की शक्ति देना—रूहानी दृष्टि का अभ्यास है।
अध्याय 5: सरलता — स्वभावों के टकराव से बचने की शक्ति
हर व्यक्ति के स्वभाव अलग-अलग होंगे। इसलिए स्वभावों के टकराव से बचने के लिए मुख्य धारणा है—
सरल बुद्धि + सरल दृष्टि + सरल वाणी = सरल व्यवहार
उदाहरण:
यदि सामने वाले का स्वभाव कठोर है, तो उसी कठोरता से जवाब देने के बजाय सरल शब्दों और शांत दृष्टि से बात करना टकराव को समाप्त कर सकता है।
मुरली नोट:
जितनी सरल बुद्धि, सरल दृष्टि और सरल वाणी होगी, उतना ही स्वभावों का टक्कर कम होगा।
अध्याय 6: “मीठी भट्ठी” से क्यों न घबरायें?
भट्ठी का अर्थ कठिनाई नहीं, बल्कि श्रेष्ठ बनने की प्रक्रिया है।
जैसे सोना भट्ठी में तपकर कुन्दन बनता है, वैसे ही पुरुषार्थ की भट्ठी में आत्मा अपने पुराने संस्कारों को समाप्त करके श्रेष्ठ बनती है।
उदाहरण:
कोई परिस्थिति हमें असहज करती है तो उसे परेशानी मानने के बजाय यह देखें—
“यह परिस्थिति मेरे किस संस्कार को समाप्त करने का अवसर है?”
यही दृष्टि भट्ठी को मीठी भट्ठी बना देती है।
अध्याय 7: व्यर्थ संकल्पों को कहाँ रखें?
मन में कोई व्यर्थ संकल्प या विकल्प आए तो उसे हर व्यक्ति के सामने व्यक्त नहीं करना है।
मुरली नोट:
किचड़ा जहाँ-तहाँ डालने से वातावरण खराब होता है। इसी प्रकार व्यर्थ संकल्पों को भी अनुचित स्थान पर व्यक्त करने से वातावरण प्रभावित हो सकता है।
इसलिए उचित और निमित्त स्थान पर ही मन की बात रखनी है।
उदाहरण:
किसी सेवा या साथी से जुड़ी परेशानी हो तो अनेक लोगों के बीच चर्चा करने के बजाय उचित निमित्त व्यक्ति से सही समय और सही स्थान पर बात करना श्रेष्ठ है।
अध्याय 8: कुमारियों के आध्यात्मिक गहने
बापदादा ने कुमारियों को आध्यात्मिक गहनों से सदा सजी रहने की प्रेरणा दी।
👑 विजय का तिलक
संगमयुग का तिलक है—विजयी बनने की निशानी।
🔄 स्वदर्शन चक्र
स्वदर्शन चक्र को कभी भूलना नहीं है।
🐚 शंख के कुण्डल
ज्ञान की शंखध्वनि करते रहना है।
💫 नियमों के कंगन
जितने नियमों की पालना, उतने ही आध्यात्मिक कंगन।
🔔 ज्ञान के घुंघरू
ज्ञान की मधुर आवाज ऐसी हो कि भक्त और प्रजा आकर्षित हों।
मुरली नोट:
इन आध्यात्मिक गहनों को कभी माया से उतरने नहीं देना है।
अध्याय 9: गुणों को उठाओ, अवगुणों से दृष्टि हटाओ
हर आत्मा में कोई न कोई विशेष गुण होता है। इसलिए एक-दूसरे से गुण ग्रहण करते हुए सर्वगुण सम्पन्न बनने का पुरुषार्थ करना है।
मुरली नोट:
गुण दिखाई दे तो धारण करो। अवगुण दिखाई दे तो पीठ कर लो।
उदाहरण:
यदि किसी साथी में समय की पाबंदी का गुण है, तो उस गुण को अपनाएँ। उसकी किसी कमजोरी को देखकर उसे अपने मन में स्थान न दें।
अध्याय 10: बापदादा की उम्मीद का सितारा
कुमारियाँ केवल उम्मीदवार नहीं, बल्कि बापदादा की उम्मीद का सितारा बनने वाली हैं।
लक्ष्य यह हो कि अपने पुरुषार्थ और दिव्य गुणों से ऐसी स्थिति बनायें जिससे बापदादा की उम्मीद practical रूप में दिखाई दे।
मुरली नोट:
“मैं कोई कमाल करके दिखाऊँ।”
यह संकल्प आत्मविश्वास, उमंग और हिम्मत को बढ़ाता है।
🌟 अध्याय 11: आज का श्रेष्ठ संकल्प
“मैं नम्बरवन बनने का पुरुषार्थ करूँगी।
मैं अपने पुराने संस्कारों पर विजय प्राप्त करूँगी।
मैं पवित्रता, सरलता और दिव्य गुणों को धारण करूँगी।
मैं हर आत्मा को रूहानी दृष्टि से देखूँगी।
मैं गुणों को ग्रहण करूँगी और अवगुणों से अपनी दृष्टि हटा लूँगी।
मैं बापदादा की उम्मीद का सितारा बनकर दिखाऊँगी।”
💎 मुरली का सार
नम्बरवन बनने की कुंजी बाहरी प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि अपने पुराने संस्कारों पर विजय है।
पुराने संस्कारों को संकल्प में ही समाप्त करना, सरलता धारण करना, पवित्रता कायम रखना, गुणों को ग्रहण करना और ज्ञान-योग की सेवा में स्वयं को निमित्त बनाना—यही सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर बनने का मार्ग है।
Disclaimer
यह वीडियो आध्यात्मिक एवं शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार संबंधित अव्यक्त बापदादा की आध्यात्मिक शिक्षाओं और प्रस्तुत मुरली सामग्री पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। दर्शक इन शिक्षाओं को अपने विवेक एवं व्यक्तिगत आध्यात्मिक अभ्यास के संदर्भ में समझें और ग्रहण करें।
पुराने संस्कारों पर विजय ही नम्बरवन बनने की कुंजी — प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: कुमारियों को भट्ठी में आने का मुख्य लक्ष्य क्या रखना चाहिए?
उत्तर: केवल भट्ठी का अनुभव करना लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि भट्ठी में तपकर सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर बनना लक्ष्य होना चाहिए। पिता, शिक्षक और गुरु—इन तीनों रूपों की श्रेष्ठ विशेषताओं को जीवन में धारण करना है।
प्रश्न 2: एक सम्पूर्ण और श्रेष्ठ टीचर की मुख्य योग्यता क्या है?
उत्तर: ज्ञान और योग के संस्कारों को जीवन में धारण करना, श्रीमत पर चलना, दिव्य गुणों को अपनाना और शक्ति तथा योद्धा के संस्कारों को अपने जीवन में भरना श्रेष्ठ टीचर की मुख्य योग्यता है।
प्रश्न 3: कुमारियों को कुमारीपन के साथ कौन-सी भावना रखनी चाहिए?
उत्तर: कुमारीपन अर्थात् प्योरिटी को कायम रखते हुए स्वयं को जगत माता समझना चाहिए और दु:खी एवं प्यासी आत्माओं की ज्ञान-योग द्वारा पालना करनी चाहिए।
प्रश्न 4: नम्बरवन बनने का सबसे बड़ा आधार क्या है?
उत्तर: अपने सर्व पुराने संस्कारों पर विजय प्राप्त करना ही नम्बरवन बनने का मुख्य आधार है। हिम्मत और हुल्लास के साथ पुराने संस्कारों को जीतने का लक्ष्य रखना चाहिए।
प्रश्न 5: पुराने संस्कारों को समाप्त करने की युक्ति क्या है?
उत्तर: पुराने संस्कारों को संकल्प में ही समाप्त करना है। यदि कोई पुराना संकल्प इमर्ज हो भी जाए तो उसे महत्व देकर उसकी पालना नहीं करनी है। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बनानी है कि पुराने संस्कार संकल्प में भी इमर्ज न हों।
प्रश्न 6: अलग-अलग स्वभावों के टकराव से कैसे बच सकते हैं?
उत्तर: सरल बुद्धि, सरल दृष्टि और सरल वाणी धारण करने से स्वभावों का टकराव कम होगा। जितनी सरलता होगी, उतना ही व्यवहार सहज रहेगा।
प्रश्न 7: भट्ठी से घबराना क्यों नहीं चाहिए?
उत्तर: भट्ठी में ही आत्मा श्रेष्ठ बनती है। जैसे सोना भट्ठी में तपकर कुन्दन बनता है, वैसे ही पुरुषार्थ की भट्ठी में पुराने संस्कारों को समाप्त करके आत्मा श्रेष्ठ और सम्पूर्ण बनती है।
प्रश्न 8: मन में कोई व्यर्थ संकल्प या विकल्प आए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: हर बात हर स्थान पर नहीं रखनी चाहिए। मन के व्यर्थ संकल्प या विकल्प को उचित और निमित्त स्थान पर ही व्यक्त करना चाहिए, ताकि वातावरण खराब न हो और पुरुषार्थ में बाधा न पड़े।
प्रश्न 9: कुमारियों के आध्यात्मिक गहने कौन-कौन से हैं?
उत्तर: कुमारियों के आध्यात्मिक गहनों में विजय का तिलक, स्वदर्शन चक्र, शंख के कुण्डल, नियमों के कंगन और ज्ञान के घुंघरू शामिल हैं। इन्हें सदा धारण करने की स्मृति रखनी है।
प्रश्न 10: विजय का तिलक किसकी निशानी है?
उत्तर: विजय का तिलक विजयी बनने की निशानी है। हर परिस्थिति में विजय प्राप्त करने का लक्ष्य रखना है।
प्रश्न 11: स्वदर्शन चक्र को धारण करने का क्या अर्थ है?
उत्तर: स्वदर्शन चक्र को कभी नहीं भूलना अर्थात् आत्मिक ज्ञान और अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति में रहना।
प्रश्न 12: नियमों के कंगन किस बात की निशानी हैं?
उत्तर: जितने नियमों की पालना करेंगे, उतने ही आध्यात्मिक कंगन धारण करने के समान है। नियमों का पालन जीवन को श्रेष्ठ और अनुशासित बनाता है।
प्रश्न 13: ज्ञान के घुंघरू किसका प्रतीक हैं?
उत्तर: ज्ञान के घुंघरू अर्थात् ज्ञान की मधुर आवाज, जिसकी आकर्षण शक्ति से भक्त और प्रजा ज्ञान की ओर आकर्षित हों।
प्रश्न 14: दूसरों के गुण और अवगुणों के प्रति कैसी दृष्टि रखनी चाहिए?
उत्तर: हर आत्मा के गुणों को देखकर उन्हें जल्दी से जल्दी अपने जीवन में धारण करना चाहिए। गुणों को देखना और अवगुणों से दृष्टि हटा लेना ही सर्वगुण सम्पन्न बनने का पुरुषार्थ है।
प्रश्न 15: जगत माता की रूहानी दृष्टि कैसी होती है?
उत्तर: जगत माता की दृष्टि में रूहानियत होती है। आत्माओं को शरीर के रूप में न देखकर आत्मिक दृष्टि से देखना और ज्ञान-योग द्वारा उनकी पालना करना रूहानी दृष्टि का लक्षण है।
प्रश्न 16: बापदादा की उम्मीद का सितारा बनने के लिए क्या करना है?
उत्तर: अपने मस्तक पर विजय का तिलक कायम रखते हुए हिम्मत, हुल्लास, पवित्रता, दिव्य गुण और पुराने संस्कारों पर विजय का पुरुषार्थ करना है।
प्रश्न 17: एक-दूसरे से गुण उठाने का क्या लाभ है?
उत्तर: हर आत्मा में कोई न कोई विशेष गुण होता है। एक-दूसरे के गुणों को ग्रहण करते हुए धीरे-धीरे सर्वगुण सम्पन्न बनने का पुरुषार्थ किया जा सकता है।
प्रश्न 18: सच्ची विजय किसे कहा जा सकता है?
उत्तर: सच्ची विजय बाहरी परिस्थितियों या दूसरों पर विजय नहीं, बल्कि अपने मन, पुराने संस्कारों और स्वभावों पर विजय प्राप्त करना है।
प्रश्न 19: कुमारियों का मुख्य पुरुषार्थ क्या होना चाहिए?
उत्तर: पवित्रता कायम रखना, श्रीमत पर चलना, ज्ञान और योग के संस्कार भरना, सरलता धारण करना, पुराने संस्कारों पर विजय पाना और जगत माता बनकर आत्माओं की सेवा करना मुख्य पुरुषार्थ है।
प्रश्न 20: इस शिक्षा का सबसे शक्तिशाली संकल्प क्या हो सकता है?
उत्तर:
“मैं नम्बरवन बनने का पुरुषार्थ करूँगी। अपने पुराने संस्कारों पर विजय प्राप्त करूँगी, पवित्रता और सरलता को धारण करूँगी, हर आत्मा के गुणों को ग्रहण करूँगी और बापदादा की उम्मीद का सितारा बनकर दिखाऊँगी।”

