(16) 08-05-1969 /“The method to correct thoughts, words and actions”

AW.(16) 08-05-1969 /“मंसा, वाचा, कर्मणा को ठीक करने की युक्ति”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“मंसा, वाचा, कर्मणा को ठीक करने की युक्ति”

आज बाप खास एक विशेष कार्य के लिये आये हैं। यहाँ जो भी सभी बैठे हैं वह सभी अपने को निश्चय बुद्धि समझते हैं? (नम्बरवार हैं) भले नम्बरवार हैं लेकिन निश्चयबुद्धि हैं? निश्चय बुद्धि का टाइटल दे सकते हैं। निश्चय में नम्बर होते हैं वा पुरुषार्थ में नम्बर होते हैं? निश्चय में कब भी परसेन्टेज नहीं होती है, न निश्चय में नम्बरवार होते हैं। पुरुषार्थ की स्टेज में नम्बर हो सकते हैं। निश्चय बुद्धि में नम्बर नहीं होते। वा तो है निश्चय वा संशय। निश्चय में अगर जरा भी संशय है चाहे मन्सा में, चाहे वाचा में अथवा कर्मणा में, लेकिन मन्सा का एक भी संकल्प संशय का है तो संशय बुद्धि कहेंगे। ऐसे निश्चय बुद्धि सभी हैं? निश्चय बुद्धि की मुख्य परख कौन-सी है? परखने की कोई मुख्य बात है? आपके सामने कोई नया आये उनकी हिस्ट्री आदि आप ने सुनी नहीं है, उनको कैसे परख सकेंगे? (वायब्रेशन आयेगा) कौन-सा वायब्रेशन आयेगा जिससे परख होगी? अभी यह प्रैक्टिस करनी है। क्योंकि वर्तमान समय बहुत प्रजा बढ़ती रहेगी। तो प्रजा और नज़दीक वाले को परखने के लिए बहुत प्रैक्टिस चाहिए।

परखने की मुख्य बात यह है कि उनके नयनों से ऐसा महसूस होगा जैसे कोई निशाने तरफ किसका खास अटेन्शन होता है तो उनके नयन कैसे होते हैं? तीर लगाने वाले वा निशाना लगाने वाले जो मिलेट्री के होते हैं, वो पूरा निशाना रखते हैं। उनके नयन, उनकी वृत्ति उस समय एक ही तरफ होगी। तो जो ऐसा निश्चय बुद्धि पक्का होगा उनके चेहरे से ऐसे महसूस होगा जैसेकि कोई निशानेबाज है। आप लोगों को मुख्य शिक्षा मिलती है एक निशाने को देखो अर्थात् बिन्दी को देखो। तो बिन्दी को देखना भी निशाने को देखना है। तो निश्चय बुद्धि की निशानी क्या होगी? पूरा निशाना होगा। निशान जरा भी हिल जाता है तो फिर हार हो जाती है। निश्चय बुद्धि के नयनों से ऐसे महसूस होगा जैसे देखते हुए भी कुछ और देखते हैं। उनके बोल भी वही निकलेंगे। यह है निश्चय बुद्धि की निशानी। निशानेबाज की स्थिति नशे वाली होती है तो निश्चय बुद्धि की परख है निशाना और उनकी स्थिति नशे वाली होगी। यह प्रैक्टिस अभी करो। फिर जज करो हमारी परख ठीक है वा नहीं। फिर प्रैक्टिस करते-करते परख यथार्थ हो जायेगी। दृष्टि में सृष्टि कहा जाता है ना। तो आप उनकी दृष्टि से पूरी सृष्टि को जान सकते हो।

मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों को ठीक करने लिये सिर्फ तीन अक्षर याद रहें। वह तीन अक्षर कौन से हैं? यह तीन अक्षर रोज मुरली में भी आते हैं। मन्सा के लिए है निराकारी। वाचा के लिए है निरंहकारी। कर्मणा के लिए है निर्विकारी। देवताओं का सबूत वाचा और कर्मणा का यही है ना। तो निराकारी, निरंहकारी और निर्विकारी यह तीन बातें अगर याद रखी तो मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों ही बहुत अच्छे रहेंगे। जितना निराकारी स्थिति में रहेंगे उतना ही निरंहकारी और निर्विकारी भी रहेंगे। विकार की कोई बदबू नहीं रहेगी। यह है मुख्य पुरुषार्थ। यह तीन बातें याद रखने से क्या बन जायेंगे? त्रिकालदर्शी भी बन जायेंगे। और भविष्य में फिर विश्व के मालिक। अभी बनेंगे त्रिलोकीनाथ और त्रिकालदर्शी। त्रिलोकीनाथ का अर्थ तो समझा है ना। जो तीनों लोकों के ज्ञान को सिमरण करते हैं वह हैं त्रिलोकीनाथ क्योंकि बाप के साथ आप सभी बच्चे भी हैं।

“मंसा, वाचा, कर्मणा को ठीक करने की मास्टर चाबी 🔑 | निराकारी • निरंहकारी • निर्विकारी | निश्चय बुद्धि की पहचान”

📖 अध्याय: मंसा, वाचा, कर्मणा को ठीक करने की युक्ति

🌸 भूमिका

आध्यात्मिक जीवन में केवल ज्ञान सुनना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब मंसा, वाचा और कर्मणा — हमारे विचार, बोल और कर्म — एक ही श्रेष्ठ दिशा में चलने लगते हैं।

इस शिक्षण का मुख्य सूत्र है:

मंसा — निराकारी
वाचा — निरंहकारी
कर्मणा — निर्विकारी

इन तीन शब्दों को स्मृति में रखकर यदि जीवन की चेकिंग की जाए, तो आत्मा अपने पुरुषार्थ की स्थिति को सहज रूप से पहचान सकती है।


अध्याय 1: निश्चय बुद्धि की वास्तविक पहचान

निश्चय बुद्धि का अर्थ केवल यह कहना नहीं है कि “मुझे विश्वास है।” निश्चय बुद्धि की वास्तविक परख हमारे संकल्प, दृष्टि, वाणी और कर्म में दिखाई देती है।

निश्चय में प्रतिशत नहीं होता। पुरुषार्थ में नम्बर हो सकते हैं, लेकिन निश्चय या तो है या नहीं है।

उदाहरण

एक विद्यार्थी को अपने लक्ष्य पर पूरा निश्चय है। रास्ते में कठिनाई आती है, फिर भी वह लक्ष्य नहीं छोड़ता। उसकी दृष्टि बार-बार लक्ष्य की ओर जाती है।

इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में निश्चय बुद्धि की दृष्टि भी एक ही लक्ष्य पर स्थिर रहती है।

आत्म-चेकिंग

क्या मेरा निश्चय परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता है?

यदि हाँ, तो पुरुषार्थ को और मजबूत करने की आवश्यकता है।


अध्याय 2: निशानेबाज जैसी एकाग्रता

निश्चय बुद्धि की तुलना एक ऐसे निशानेबाज से की गई है जिसका पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर होता है।

उसके नयन, वृत्ति और ध्यान एक ही दिशा में होते हैं।

राजयोग में “बिन्दी को देखना” केवल एक बिन्दु को देखने का अभ्यास नहीं है। यह बुद्धि के निशाने को एकाग्र करने की स्मृति भी है।

उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति पढ़ते समय बार-बार मोबाइल, बातचीत या दूसरी बातों में उलझता है, तो उसका ध्यान लक्ष्य से हट जाता है।

इसी प्रकार यदि बुद्धि बार-बार व्यर्थ संकल्पों और परिस्थितियों में उलझती है, तो आध्यात्मिक निशाना कमजोर हो जाता है।

अभ्यास

“मेरा निशाना एक है — परमात्म स्मृति और आत्मिक स्थिति।”

दिन में कुछ क्षण रुककर अपनी दृष्टि और बुद्धि को फिर से लक्ष्य पर स्थिर करें।


अध्याय 3: दृष्टि में सृष्टि

एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सूत्र है:

“दृष्टि में सृष्टि।”

हम जिस दृष्टि से व्यक्ति और परिस्थिति को देखते हैं, उसी के अनुसार हमारी अनुभूति और प्रतिक्रिया बनने लगती है।

उदाहरण

एक ही परिस्थिति में दो व्यक्ति हैं।

एक व्यक्ति सोचता है —
“यह मेरे लिए समस्या है।”

दूसरा सोचता है —
“यह मेरी स्थिति को मजबूत करने का अवसर है।”

परिस्थिति समान है, लेकिन दृष्टि अलग है, इसलिए अनुभव भी अलग है।

इसलिए पहले परिस्थिति को बदलने के बजाय अपनी दृष्टि को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास करना चाहिए।


अध्याय 4: मंसा को ठीक करने की युक्ति — निराकारी

मंसा अर्थात् हमारे संकल्प।

जब आत्मा निराकारी स्थिति में रहती है, तो संकल्पों में देह-अभिमान, अहंकार और व्यर्थता कम होने लगती है।

उदाहरण

किसी ने हमारी बात नहीं मानी।

व्यर्थ संकल्प:

“मेरी बात क्यों नहीं मानी? मुझे ही क्यों नजरअंदाज किया?”

निराकारी स्थिति:

“मैं चेतन सत्ता हूँ। मेरा कार्य अपनी स्थिति को श्रेष्ठ रखना है।”

यही संकल्प को बदलने की शुरुआत है।


अध्याय 5: वाचा को ठीक करने की युक्ति — निरंहकारी

वाणी केवल शब्द नहीं है। हमारे बोल हमारी आंतरिक स्थिति का परिचय देते हैं।

निरंहकारी वाणी में नम्रता, मधुरता और आत्मिक सम्मान होता है।

उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति गलती करता है, तो दो प्रकार से बोला जा सकता है:

 “तुमसे हमेशा गलती ही होती है।”

 “कोई बात नहीं, अगली बार इसे और अच्छी तरह कर सकते हैं।”

दूसरे वाक्य में सुधार भी है और सम्मान भी।

इसलिए बोलने से पहले एक क्षण रुकना — निरंहकारी वाणी का अभ्यास बन सकता है।


अध्याय 6: कर्मणा को ठीक करने की युक्ति — निर्विकारी

कर्मणा का अर्थ है हमारे कर्म और व्यवहार।

निर्विकारी कर्म का आधार है — पवित्रता, मर्यादा और आत्मिक चेतना।

उदाहरण

जब कोई व्यक्ति हमारे साथ गलत व्यवहार करता है, तो उसी प्रकार प्रतिक्रिया देना आसान है।

लेकिन निर्विकारी स्थिति पूछती है:

“मेरे सामने परिस्थिति कैसी है, यह महत्वपूर्ण है या मेरा कर्म कैसा होना चाहिए?”

यही कर्मों को श्रेष्ठ बनाने की दिशा है।


अध्याय 7: तीन शब्द — एक सम्पूर्ण पुरुषार्थ

क्षेत्र स्मृति लक्ष्य
मंसा निराकारी श्रेष्ठ संकल्प
वाचा निरंहकारी मधुर एवं नम्र वाणी
कर्मणा निर्विकारी पवित्र कर्म

याद रखने की सरल युक्ति

सोचो — निराकारी
बोलो — निरंहकारी
करो — निर्विकारी

यदि दिनभर इन तीन शब्दों की चेकिंग की जाए, तो आत्म-परीक्षण बहुत सहज हो सकता है।


अध्याय 8: निश्चय से नशा और खुशी

निश्चय बुद्धि की स्थिति में एक प्रकार का आत्मिक नशा और खुशी दिखाई देती है।

यह बाहरी प्रदर्शन नहीं है। यह चेहरे, नयनों, बोल और कर्मों में स्वाभाविक रूप से झलकती है।

उदाहरण

जिस व्यक्ति को अपने लक्ष्य पर पूरा विश्वास होता है, वह छोटी-छोटी कठिनाइयों से जल्दी विचलित नहीं होता।

इसी प्रकार आध्यात्मिक निश्चय आत्मा को परिस्थितियों के बीच भी स्थिर रहने की शक्ति देता है।


अध्याय 9: त्रिकालदर्शी बनने का पुरुषार्थ

तीनों सूत्रों को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है। इन्हें जीवन में उतारना है।

निराकारी + निरंहकारी + निर्विकारी

इन गुणों के अभ्यास से आत्मा अपने वर्तमान कर्मों, उनके प्रभाव और भविष्य की दिशा को अधिक स्पष्टता से समझने का पुरुषार्थ करती है।

मुरली-आधारित शिक्षण में इसी संदर्भ में त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की ओर संकेत किया गया है।


मुरली नोट्स

मुरली संदर्भ: प्रस्तुत अंश में मूल मुरली की तिथि उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसलिए बिना सत्यापन के कोई तारीख जोड़ना उचित नहीं होगा। वीडियो में इसे “मुरली-आधारित अंश” के रूप में प्रस्तुत करें या मूल मुरली की प्रमाणित तिथि उपलब्ध होने पर यहाँ जोड़ें।

मुख्य मुरली सूत्र

🔹 निश्चय में नम्बर नहीं होते; नम्बर पुरुषार्थ की स्टेज में होते हैं।
🔹 निश्चय बुद्धि की पहचान — निशाना अटल होना।
🔹 बिन्दी को देखना अर्थात् अपने निशाने को स्थिर रखना।
🔹 दृष्टि में सृष्टि — दृष्टि को श्रेष्ठ बनाना आवश्यक है।
🔹 मंसा के लिए — निराकारी।
🔹 वाचा के लिए — निरंहकारी।
🔹 कर्मणा के लिए — निर्विकारी।
🔹 इन तीनों को स्मृति में रखने से मंसा-वाचा-कर्मणा को श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ सहज होता है।
🔹 लक्ष्य केवल पुरुषार्थी बनना नहीं, बल्कि तीव्र पुरुषार्थी बनना है।


आज की चेकिंग

रात को सोने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न करें:

1. आज मेरी मंसा कैसी रही?
क्या मैंने निराकारी स्थिति में रहकर संकल्प किए?

2. आज मेरी वाचा कैसी रही?
क्या मेरे बोल निरंहकारी और मधुर रहे?

3. आज मेरे कर्म कैसे रहे?
क्या मेरे कर्म निर्विकारी और मर्यादित रहे?

फिर एक संकल्प करें:

“मैं अपनी मंसा को निराकारी, वाचा को निरंहकारी और कर्मणा को निर्विकारी बनाकर निश्चय बुद्धि की स्थिति को शक्तिशाली बनाऊँगा।”


 “3 शब्द बदल देंगे आपकी मंसा-वाचा-कर्मणा!”

छोटा Thumbnail Text:

निराकारी  निरंहकारी  निर्विकारी


 Disclaimer

यह वीडियो आध्यात्मिक एवं शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। इसमें दिए गए विचार राजयोग एवं मुरली-आधारित आध्यात्मिक शिक्षाओं के संदर्भ में समझाए गए हैं। मुरली के मूल पाठ की तिथि उपलब्ध न होने के कारण इस अध्याय में कोई अनुमानित तारीख नहीं जोड़ी गई है। दर्शक मूल स्रोत एवं प्रमाणित मुरली तिथि के साथ संदर्भ का मिलान कर सकते हैं।

इस सामग्री का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या समुदाय की आलोचना करना नहीं है। इसे आत्म-चिंतन, आध्यात्मिक अध्ययन और सकारात्मक जीवन-परिवर्तन के संदर्भ में ग्रहण करें। यह सामग्री चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है।

मंसा, वाचा, कर्मणा को ठीक करने की युक्ति — महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: निश्चय बुद्धि किसे कहा जाता है?

उत्तर: जिसके मन, वचन और कर्म में परमात्मा तथा अपने लक्ष्य के प्रति अटूट निश्चय हो, उसे निश्चय बुद्धि कहा जाता है। निश्चय में प्रतिशत या नम्बर नहीं होते; नम्बर पुरुषार्थ की अवस्था में हो सकते हैं।

प्रश्न 2: निश्चय और संशय में क्या अंतर है?

उत्तर: निश्चय का अर्थ है दृढ़ विश्वास और स्थिर बुद्धि, जबकि संशय का अर्थ है मन में संदेह या असमंजस। मंसा, वाचा या कर्मणा में थोड़ा भी संशय निश्चय की स्थिति को कमजोर कर सकता है।

प्रश्न 3: निश्चय बुद्धि की मुख्य पहचान क्या है?

उत्तर: उसकी दृष्टि और बुद्धि का निशाना स्पष्ट और स्थिर होता है। जैसे निशानेबाज का पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर रहता है, वैसे ही निश्चय बुद्धि की वृत्ति अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहती है।

प्रश्न 4: “बिन्दी को देखना” किस बात का प्रतीक है?

उत्तर: बिन्दी को देखना बुद्धि के निशाने को एकाग्र रखने का अभ्यास है। इसका अर्थ है अपनी चेतना को परमात्म स्मृति और आत्मिक स्थिति में स्थिर रखना।

प्रश्न 5: “दृष्टि में सृष्टि” का क्या अर्थ है?

उत्तर: हमारी दृष्टि हमारी अनुभूति और व्यवहार को प्रभावित करती है। यदि दृष्टि सकारात्मक, आत्मिक और श्रेष्ठ होगी तो परिस्थितियों को देखने और संभालने का हमारा तरीका भी श्रेष्ठ बनेगा।

प्रश्न 6: मंसा को ठीक करने के लिए कौन-सा शब्द याद रखना है?

उत्तर: निराकारी। अर्थात् स्वयं को देह से अलग चेतन सत्ता समझकर आत्मिक स्थिति में रहने का अभ्यास करना।

प्रश्न 7: वाचा को ठीक करने के लिए कौन-सा शब्द याद रखना है?

उत्तर: निरंहकारी। अर्थात् वाणी में अहंकार न हो, बोलों में नम्रता, मधुरता और सम्मान हो।

प्रश्न 8: कर्मणा को ठीक करने के लिए कौन-सा शब्द याद रखना है?

उत्तर: निर्विकारी। अर्थात् हमारे कर्म पवित्र, श्रेष्ठ और मर्यादित हों तथा उनमें विकारों का प्रभाव न हो।

प्रश्न 9: मंसा, वाचा और कर्मणा के तीन मुख्य सूत्र कौन-से हैं?

उत्तर:
मंसा — निराकारी
वाचा — निरंहकारी
कर्मणा — निर्विकारी

प्रश्न 10: इन तीन शब्दों का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?

उत्तर: हर कार्य से पहले स्वयं से पूछें—
मैं क्या सोच रहा हूँ? — निराकारी?
मैं क्या बोल रहा हूँ? — निरंहकारी?
मैं क्या कर रहा हूँ? — निर्विकारी?

प्रश्न 11: निश्चय बुद्धि की स्थिति में कैसी अनुभूति होती है?

उत्तर: निश्चय बुद्धि में स्थिरता, आत्मिक नशा, खुशी और लक्ष्य के प्रति एकाग्रता रहती है। कठिन परिस्थितियाँ भी उसके निशाने को आसानी से हिला नहीं पातीं।

प्रश्न 12: यदि मन में संशय का संकल्प आ जाए तो क्या करना चाहिए?

उत्तर: पहले उसे पहचानना चाहिए, फिर बुद्धि को अपने मूल निश्चय और परमात्म स्मृति की ओर वापस लाना चाहिए। निरंतर अभ्यास से बुद्धि की स्थिरता बढ़ती है।

प्रश्न 13: निश्चय बुद्धि बनने के लिए कौन-सा अभ्यास आवश्यक है?

उत्तर: नियमित आत्म-परीक्षण, परमात्म स्मृति, एकाग्रता और अपने संकल्प, बोल तथा कर्म की चेकिंग आवश्यक है। केवल ज्ञान सुनना नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में लाना जरूरी है।

प्रश्न 14: “पुरुषार्थ” और “तीव्र पुरुषार्थ” में क्या अंतर है?

उत्तर: पुरुषार्थ का अर्थ है लक्ष्य की ओर प्रयास करना। तीव्र पुरुषार्थ का अर्थ है समय की आवश्यकता को समझकर अधिक लगन, तत्परता और निरंतरता से लक्ष्य की ओर बढ़ना।

प्रश्न 15: निराकारी, निरंहकारी और निर्विकारी बनने से क्या लाभ होगा?

उत्तर: संकल्प अधिक शुद्ध होंगे, वाणी में नम्रता आएगी और कर्मों में पवित्रता बढ़ेगी। इससे आत्मिक स्थिति मजबूत करने और निश्चय बुद्धि को स्थिर करने में सहायता मिलेगी।

प्रश्न 16: इस पूरे शिक्षण का सबसे सरल स्मृति-मंत्र क्या है?

उत्तर:

“सोचो — निराकारी।
बोलो — निरंहकारी।
करो — निर्विकारी।”

यही तीन शब्द मंसा, वाचा और कर्मणा की दैनिक चेकिंग की सरल युक्ति बन सकते हैं।

 अंतिम आत्म-चिंतन

क्या मेरा निशाना स्थिर है?
क्या मेरी मंसा निराकारी है?
क्या मेरी वाचा निरंहकारी है?
क्या मेरे कर्म निर्विकारी हैं?

यदि इन चार प्रश्नों का उत्तर प्रतिदिन ईमानदारी से खोजेंगे, तो अपने पुरुषार्थ की वास्तविक स्थिति को पहचानना और उसे श्रेष्ठ बनाना सहज हो जाएगा।

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