(20) 09-06-1969 /“Sweet form of sloth – laziness”

AW.(20) 09-06-1969 /“सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य”

सभी व्यक्त में होते अव्यक्त स्थिति में हो? अव्यक्त स्थिति किसको कहते हैं, उसकी पहचान है? पहले है अव्यक्त स्थिति की पहचान और पहचान के बाद फिर है परख तो इन दोनों बातों का ज्ञान है? अव्यक्त स्थिति किसको कहते है? (व्यक्त का भान न रहे) व्यक्त में कार्य करते हुए भी व्यक्त का भान कैसे नहीं रहेगा? व्यक्त में होते हुए अव्यक्त स्थिति रहे, यह कितना अनुभव होता है, आज यह सभी से पूछना है! अव्यक्त स्थिति में ज्यादा से ज्यादा कितना समय रहते हो? ज्यादा में ज्यादा कितना समय होना चाहिए, मालूम है? (आठ घंटा) सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से तो आठ घंटा भी कम से कम है। आप के वर्तमान पुरुषार्थ के हिसाब से आठ घंटा ज्यादा है? (कोई ने भी हाथ नहीं उठाया) अच्छा। जो 6 घंटे तक पहुंचे हैं वह हाथ उठायें। (कोई नहीं उठाते हैं।) अच्छा 4 घंटे तक जो पहुंचे हैं वह हाथ उठाये (कोई ने 4 घंटे में कोई ने 2 घंटे में हाथ उठाया) इस रिजल्ट के हिसाब से कितना समय पुरुषार्थ का चाहिए? कोर्स भी पूरा हो गया। रिवाइज कोर्स भी हो रहा है फिर भी मैजारिटी की रिजल्ट… इसका क्या कारण है? सभी पुरुषार्थ भी करते हो, उमंग भी है, लक्ष्य भी है फिर भी क्यों नहीं होता है? (अटेन्शन कम है) किस बात का अटेन्शन कम है? यह तो अटेन्शन सभी रखते हैं कि लायक बनें, नज़दीक आयें फिर भी मुख्य कौन सा अटेन्शन कम है, जिस कारण अव्यक्त स्थिति कम रहती है? सभी पुरुषार्थी ही यहाँ बैठे हो। ऐसा कोई होगा जो कहे मैं पुरुषार्थी नहीं हूँ। पुरुषार्थी होते हुए भी कमी क्यों? क्या कारण है? अन्तर्मुख रहना चाहते हुए भी क्यों नही रह सकते हो? बाहरमुखता में भी क्यों आ जाते हो? ज्ञानी तू आत्मा भी तो सभी बने हैं, ज्ञानी तू आत्मा, समझदार बनते हुए फिर बेसमझ क्यों बन जाते हो। समझ तो मिली है। समझ का कोर्स भी पूरा हो चूका है। कोर्स पूरा हुआ गोया समझदार बन ही गये। फिर भी बेसमझ क्यों बनते हो?

मुख्य कारण यह देखा जाता है – कोई-कोई में अलबेलापन आ गया है, जिसको सुस्ती कहते हैं। सुस्ती का मीठा रूप है आलस्य। आलस्य भी कई प्रकार का होता है। तो मैजारिटी में किस न किस रूप में आलस्य और अलबेलापन आ गया है। इच्छा भी है, पुरुषार्थ भी है लेकिन अलबेलापन होने कारण जिस तरह से पुरुषार्थ करना चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। बुद्धि में ज्यादा ज्ञान आ जाता है तो उससे फिर ज्यादा अलबेलापन हो जाता है। जो अपने को कम समझदार समझते हैं वह फिर भी तीव्र पुरुषार्थ कर रहे हैं। लेकिन जो अपने को ज्यादा समझदार समझते हैं, वह ज्यादा अलबेलेपन में आ गये हैं। जैसे पहले-पहले पुरुषार्थ की तड़पन थी। ऐसा बन कर दिखायेंगे। यह करके दिखायेंगे। अभी वह तड़पन खत्म हो गई है। तृप्ति हो गई है। अपने आप से तृप्त हो गये हैं। ज्ञान तो समझ लिया, सर्विस तो कर ही रहे हैं। चल ही रहे हैं, यह तृप्त आत्मा इस रूप से नहीं बनना है। पुरुषार्थ में तड़प होनी चाहिए। जैसे बांधेलियां तड़फती हैं तो पुरुषार्थ भी तीव्र करती हैं। और जो बांधेली नहीं, वह तृप्त होती हैं तो अलबेले हो जाते हैं। ऐसी रिजल्ट मैजारिटी पुरुषार्थियों की देखने में आती है। हमेशा समझो कि हम नम्बरवन पुरुषार्थी बन रहे हैं। बन नहीं गये हैं। तीनों कालों का ज्ञान बुद्धि में आने से अपने को ज्यादा समझदार समझते हैं। पहले भी सुनाया था ना – जहाँ बालक बनना चाहिए वहाँ मालिक बन जाते हो, जहाँ मालिक बनना चाहिए वहाँ बालक बन जाते हो। तो अभी बच्चे रूप का मीठा-मीठा पुरुषार्थ तो कर रहे हो। राज्य के अधिकारी तो बन गये। तिलक भी आ गया लेकिन यह ढीला और मीठा पुरुषार्थ अभी नहीं चल सकेगा। जितना शक्तिरूप में स्थित होंगे तो पुरुषार्थ भी शक्तिशाली होगा। अभी पुरुषार्थ शक्तिशाली नहीं है। ढीला-ढीला है। पुरुषार्थी तो सभी हैं लेकिन पुरुषार्थ शक्तिशाली जो होना चाहिए वह शक्ति पुरुषार्थ में नहीं भरी है। सवेरे उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने की कोई न कोई प्वाइन्ट सामने रखो। अमृतवेले जैसे रूह-रूहान करते हो वैसे ही अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने के लिए भी कोई न कोई प्वाइन्ट विशेष रूप से बुद्धि में याद रखो। अभी विशेष पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। साधारण पुरुषार्थ करने के दिन अभी बीत रहे हैं। जैसे विशेष फंक्शन आदि के प्रोग्राम रखते हो ना वैसे अब यही समझना है कि समय थोड़ा है। उसमें विशेष पुरुषार्थ का प्रोग्राम रखना है। यह विशेष पुरुषार्थ करने का लक्ष्य रख आगे बढ़ना है। अगर ऐसी ढीली रिजल्ट में रहेंगे तो जो आने वाली परीक्षायें हैं उनकी रिजल्ट क्या रहेगी? परीक्षायें कड़ी आने वाली हैं। उसका सामना करने के लिए पुरुषार्थ भी कड़ा चाहिए। अगर पुरुषार्थ साधारण, परीक्षा कड़ी तो रिजल्ट क्या होगी?

अच्छा आज तो गोपों से मुलाकात करते हैं। अपने पुरुषार्थ में सन्तुष्ट हो? चल तो रहे हो लेकिन कितनी परसेन्टेज में? जो समझते हैं हम 75 प्रतिशत श्रीमत पर चल रहे हैं वह हाथ उठायें। (कइयों ने हाथ उठाया) अच्छा मुख्य श्रीमत क्या है? मुख्य श्रीमत यही है कि ज्यादा से ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना। क्योंकि इस याद की यात्रा से ही पवित्रता, दैवीगुण और सर्विस की सफलता भी होगी। जो 75 प्रतिशत श्रीमत पर चलते हैं उन्हों का याद का चार्ट कितना है? याद का चार्ट भी 75 प्रतिशत होना चाहिए। इसको कहेंगे पूरी-पूरी श्रीमत पर चलने वाले। आज खास गोपों को आगे किया है। गोपियों को पीछे मंगाया है क्योंकि जब भी मिलन की कोई बात होती है तो गोपियां जल्दी आ जाती हैं। गोप देखते-देखते रह जाते हैं। गोपों को ज़िम्मेवारी भी देनी है। यूँ तो दी हुई है। जैसे आप लोगों के चित्र में दिखाया है ना कि द्वापर के बाद ताज उतर जाते हैं। तो यह जिम्मेवारी का ताज भी दिया हुआ तो है लेकिन कभी-कभी जानबूझ कर भी उतार देते हैं और माया भी उतार देती है। सतयुग में तो ताज इतना हल्का होता है जो मालूम भी नहीं पड़ता है कि कुछ बोझ सिर पर है। सतयुग की सीन सीनरियां सामने आती हैं कि नहीं? सतयुग के नज़ारे स्वयं ही सामने आते हैं या लाते हो? जितना-जितना आगे बढ़ेंगे तो न चाहते हुए भी सतयुगी नज़ारे स्वयं ही सामने आयेंगे। लाने की भी जरूरत नहीं। जितना-जितना नज़दीक होते जायेंगे, उतना-उतना नज़ारे भी नज़दीक होते जायेंगे।

सतयुग में चलना है और खेल-पाल करना है। यह तो निश्चित है ही आज जो भी सभी बैठे हैं उनमें से कौन समझता है कि हम श्रीकृष्ण के साथ पहले जन्म में आयेंगे? उनके फैमिली में आयेंगे वा सखी सखा बनेंगे वा तो स्कूल के साथी बनेंगे? जो समझते हैं तीनों में से कोई न कोई जरूर बनेंगे ऐसे निश्चय बुद्धि कौन है? (सभी ने हाथ उठाया) नज़दीक आने वालों की संगमयुग में निशानी क्या होगी? यहाँ कौन अपने को नज़दीक समझते हैं? यज्ञ सर्विस वा जो बापदादा का कार्य है उसमें जो नज़दीक होगा वही वहाँ खेल-पाल आदि में नज़दीक होंगे। यज्ञ की जिम्मेवारी वा बापदादा के कार्य की जिम्मेवारी के नज़दीक जितना-जितना होंगे उतना वहाँ भी नज़दीक होंगे। नजदीक होने की परख कैसे होगी? हरेक को अपने आप से पूछना चाहिए – जितनी बुद्धि, जितना तन-मन-धन और जितना समय लौकिक जिम्मेवारियों में देते हो उतना ही इस तरफ देते हो? इस तरफ ज्यादा देना चाहिए। अगर ज्यादा नहीं तो उसका वज़न एक जैसा है? अगर दोनों तरफ का एक जितना है तो भी नज़दीक गिना जायेगा। इस हिसाब से अपने को परखना है। अभी तक रिजल्ट में लौकिक जिम्मेवारियों का बोझ ज्यादा देखने में आता है। खास मुख्य गोपों को यह बातें जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि आज का दिन जो बीता कितना समय लौकिक जिम्मेवारी तरफ दिया और कितना समय अलौकिक वा पारलौकिक जिम्मेवारी तरफ दिया? कितने मददगार बने? यह चेकिंग करते रहेंगे तो पता पड़ेगा कि कौन सा तरफ खाली है। सभी प्रकार की परिस्थितियों में रहते हुए भी कम से कम दोनों तरफ एक जितना ज़रूर होना चाहिए। कम नहीं। उस तरफ कम हुआ तो हर्जा नहीं। इस तरफ कम नहीं होना चाहिए। तो फिर लौकिक ज़िम्मेवारी के कमी को भी ठीक कर सकेंगे। परमार्थ से व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है। कोई-कोई कहते हैं पहले व्यवहार को ठीक कर परमार्थ में लगें। यह ठीक नहीं है। तो यह खास ध्यान रखना है।

खास गोपों में बापदादा की उम्मीद है जो गोप ही पूरी कर सकते हैं। गोपियों से नहीं हो सकती। वह कौन सी उम्मीद है? पाण्डवों का मुख्य कार्य यही है जो कई प्रकार के लोग और कई प्रकार की परीक्षायें समय प्रति समय आने वाली भी हैं और आती भी रहती हैं तो परीक्षा और लोगों की परख यह विशेष गोपों का काम है। क्योंकि पाण्डवों को शक्तियों की रखवाली करने का मुख्य कार्य है। शक्तियों का काम है तीर लगाना लेकिन हर प्रकार की परीक्षा और लोगों को परखना और शक्तियों की रखवाली करना पाण्डवों का काम है। इतनी ज़िम्मेवारी उठा सकते हो? कि शक्तियों के रखवाली की आप को आवश्यकता है? कहां-कहां देखने मे आता है पाण्डव अपनी रखवाली की औरों से उम्मीद रखते हैं लेकिन पाण्डवों को अपनी रखवाली के साथ चारों ओर की रखवाली करनी है। बेहद में दृष्टि होनी चाहिए न कि हद में। अगर अपनी ही रखवाली नहीं करेंगे तो फिर औरों की मुश्किल हो जायेगी।

अध्याय 1: अव्यक्त स्थिति क्या है?

मुरली का पहला प्रश्न बहुत गहरा है—

“अव्यक्त स्थिति किसको कहते हैं?”

सरल शब्दों में, अव्यक्त स्थिति का अर्थ है—
व्यक्त देह में कार्य करते हुए भी देह और व्यक्तपन के भान से न्यारे रहना।

अर्थात् हम शरीर से कर्म कर रहे हैं, लोगों से बात कर रहे हैं, अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं, लेकिन बुद्धि की स्थिति आत्मिक और न्यारी बनी रहे।

उदाहरण

एक व्यक्ति ऑफिस में काम कर रहा है। उसके सामने अनेक परिस्थितियाँ आती हैं। वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करता है, लेकिन अंदर से यह स्मृति रखता है—

“मैं आत्मा हूँ। मैं इस शरीर द्वारा अपना पार्ट बजा रहा हूँ। मेरा वास्तविक आधार परमात्म स्मृति है।”

यही अभ्यास व्यक्त में रहते हुए अव्यक्त स्थिति की ओर ले जाता है।

मुरली नोट

अव्यक्त स्थिति की पहचान केवल बोलने या सोचने की बात नहीं है; उसकी परख व्यवहार और परिस्थितियों में होती है।


अध्याय 2: पहचान के बाद है परख

सिर्फ यह जान लेना कि “मुझे अव्यक्त बनना है” पर्याप्त नहीं है।

मुरली हमें दो चरण देती है—

  1. अव्यक्त स्थिति की पहचान
  2. अपनी स्थिति की परख

अपने आप से पूछें:

  • क्या कार्य करते समय मेरी बुद्धि बार-बार देह और व्यक्त भाव में चली जाती है?
  • क्या परिस्थितियाँ मेरी शांति छीन लेती हैं?
  • क्या मैं अंतर्मुख रहना चाहता हूँ, लेकिन जल्दी बाहरमुख हो जाता हूँ?
  • क्या मेरा याद का समय बढ़ रहा है?
  • क्या मेरा पुरुषार्थ पहले से अधिक शक्तिशाली हो रहा है?

यही वास्तविक आत्म-चेकिंग है।


अध्याय 3: आठ घंटे अव्यक्त स्थिति – लक्ष्य कितना बड़ा है?

मुरली में अव्यक्त स्थिति में रहने के समय पर विशेष रूप से प्रश्न किया गया। सम्पूर्ण स्थिति के हिसाब से आठ घंटे भी कम से कम बताए गए हैं।

यहाँ प्रश्न केवल संख्या का नहीं है।

मुख्य बात है—

“मैं व्यक्त भाव से कितना समय न्यारा रह सकता हूँ?”

यदि आज मेरा अभ्यास बहुत कम है, तो निराश होने के बजाय धीरे-धीरे चार्ट बढ़ाना है।

उदाहरण

आज:
30 मिनट सजग याद

फिर:
1 घंटा

फिर:
2 घंटे

और धीरे-धीरे कर्म करते हुए भी याद की निरंतरता बढ़ाना।

लक्ष्य बड़ा हो, लेकिन पुरुषार्थ क्रमिक और निरंतर हो।


अध्याय 4: ज्ञान है, लक्ष्य है, फिर भी पुरुषार्थ कम क्यों?

यह मुरली का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

हम कह सकते हैं—

  • ज्ञान भी है।
  • लक्ष्य भी है।
  • उमंग भी है।
  • पुरुषार्थ करने की इच्छा भी है।
  • कोर्स भी पूरा हो चुका है।
  • रिवाइज कोर्स भी चल रहा है।

फिर भी अव्यक्त स्थिति कम क्यों रहती है?

मुरली इसका मुख्य कारण बताती है—

“अलबेलापन”

और इसी अलबेलेपन का एक मीठा रूप है—

“आलस्य”

मुरली के अनुसार, इच्छा और पुरुषार्थ होते हुए भी अलबेलापन व्यक्ति को उतना तीव्र पुरुषार्थ करने नहीं देता, जितना करना चाहिए। 


अध्याय 5: आलस्य हमेशा सोने का नाम नहीं है

यह बात विशेष रूप से समझने योग्य है।

आलस्य का अर्थ केवल शरीर का आराम करना या सोते रहना नहीं है।

आध्यात्मिक पुरुषार्थ में आलस्य कई सूक्ष्म रूपों में आ सकता है।

आलस्य के कुछ रूप

  • “अभी तो बहुत समय है।”
  • “मैं तो पुरुषार्थ कर ही रहा हूँ।”
  • “इतना तो काफी है।”
  • “मुझे सब समझ में आ गया है।”
  • “मैं दूसरों से तो अच्छा ही कर रहा हूँ।”
  • “कल से और अच्छा करूँगा।”
  • “मेरी स्थिति तो ठीक ही है।”

यही सूक्ष्म संतुष्टि कभी-कभी पुरुषार्थ की तीव्रता को कम कर देती है।


अध्याय 6: ज्ञान बढ़ा, लेकिन अलबेलापन भी बढ़ गया?

मुरली की एक बहुत गहरी बात है—

कभी-कभी बुद्धि में अधिक ज्ञान आने के कारण व्यक्ति अपने को अधिक समझदार समझने लगता है और अलबेलेपन में आ जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञान गलत है।

समस्या तब आती है जब—

ज्ञान → समझ → आत्म-संतुष्टि → अलबेलापन

बन जाता है।

सही स्थिति

ज्ञान → समझ → पुरुषार्थ → अनुभव → शक्ति → सेवा

ज्ञान का उद्देश्य स्वयं को श्रेष्ठ समझना नहीं, बल्कि स्वयं को परिवर्तित करना है।


अध्याय 7: “बन रहे हैं” या “बन गये हैं”?

मुरली हमें एक बहुत सुंदर आत्म-जांच देती है—

“हम नम्बरवन पुरुषार्थी बन रहे हैं”,
यह भावना रहे।

यह नहीं कि—

“हम नम्बरवन पुरुषार्थी बन गये हैं।”

यह अंतर बहुत सूक्ष्म है।

जब व्यक्ति समझता है कि “मैं बन गया”, तो पुरुषार्थ की तड़पन कम हो सकती है।

जब वह समझता है—

“मुझे अभी और आगे जाना है”

तो भीतर से उमंग और पुरुषार्थ जीवित रहता है।

आत्म-चेक

आज स्वयं से पूछें:

“क्या मेरे अंदर बनने की तड़पन अभी भी उतनी ही है, जितनी शुरुआत में थी?”

यदि उत्तर “कम” है, तो यही संकेत है कि पुरुषार्थ को फिर से शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है।


अध्याय 8: तड़पन खत्म न हो

शुरुआत में साधक के अंदर एक विशेष तड़पन होती है—

“ऐसा बनकर दिखाऊँगा।”
“यह करके दिखाऊँगा।”

लेकिन समय बीतने के साथ कभी-कभी मन कहने लगता है—

“ज्ञान तो समझ लिया।”
“सेवा तो कर ही रहे हैं।”
“जीवन तो चल ही रहा है।”

यहीं से अलबेलापन प्रवेश कर सकता है।

याद रखने योग्य सूत्र

तृप्ति प्राप्तियों में हो, लेकिन पुरुषार्थ में तड़पन हो।

यानी जो मिला है उसके लिए संतुष्ट रहें, लेकिन बनने और सम्पूर्णता की दिशा में पुरुषार्थ कभी ढीला न हो।


अध्याय 9: बालक कहाँ और मालिक कहाँ?

मुरली एक बहुत सुंदर संकेत देती है—

जहाँ बालक बनना चाहिए वहाँ मालिक बन जाते हो, और जहाँ मालिक बनना चाहिए वहाँ बालक बन जाते हो

इसका व्यावहारिक अर्थ समझें।

परमात्मा की श्रीमत के सामने—

बालक बनना है।

अर्थात्—

“बाबा, आपकी श्रीमत सर्वोपरि है।”

लेकिन अपनी स्थिति, जिम्मेदारी और पुरुषार्थ के मामले में—

मालिक बनना है।

अर्थात्—

“मुझे अपने मन, बुद्धि, समय और संस्कारों की जिम्मेदारी स्वयं लेनी है।”


अध्याय 10: ढीला पुरुषार्थ नहीं, शक्तिशाली पुरुषार्थ

मुरली स्पष्ट करती है—

“जितना शक्तिरूप में स्थित होंगे, उतना पुरुषार्थ भी शक्तिशाली होगा।” 

सिर्फ पुरुषार्थी होना पर्याप्त नहीं।

प्रश्न है—

मेरा पुरुषार्थ कितना शक्तिशाली है?

कमजोर पुरुषार्थ

“कोशिश करूँगा।”

शक्तिशाली पुरुषार्थ

“मुझे करना ही है।”

कमजोर पुरुषार्थ

“आज नहीं हुआ तो कल कर लूँगा।”

शक्तिशाली पुरुषार्थ

“आज का समय वापस नहीं आएगा; मुझे अभी सजग होना है।”


अध्याय 11: अमृतवेले का विशेष अभ्यास

मुरली का एक बहुत उपयोगी अभ्यास है—

सुबह उठते ही पुरुषार्थ में शक्ति भरने वाली कोई विशेष पॉइंट बुद्धि में रखो। 

अमृतवेले केवल रूह-रूहान ही नहीं, बल्कि दिन का मुख्य पुरुषार्थ भी निर्धारित करें।

उदाहरण

आज का संकल्प:

“आज कार्य करते हुए भी मैं देह से न्यारा, आत्मिक और अव्यक्त स्थिति में रहूँगा।”

या—

“आज परिस्थिति बड़ी हो सकती है, लेकिन मेरी स्थिति उससे बड़ी होगी।”

या—

“आज मैं प्रतिक्रिया नहीं, आत्मिक स्थिति से कर्म करूँगा।”

पूरे दिन उसी एक विशेष पॉइंट को बार-बार याद करें।


अध्याय 12: विशेष पुरुषार्थ का समय

मुरली का संदेश है कि अब केवल साधारण पुरुषार्थ पर्याप्त नहीं है।

समय को पहचानकर—

“विशेष पुरुषार्थ”

करना है।

यदि परीक्षा कठिन आने वाली है तो तैयारी भी शक्तिशाली होनी चाहिए।

उदाहरण

यदि विद्यार्थी को पता है कि परीक्षा बहुत कठिन होगी, तो वह केवल इतना नहीं कहेगा—

“मैंने किताब खोल ली है।”

वह तैयारी की गुणवत्ता देखेगा।

इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में प्रश्न यह नहीं है—

“मैं पुरुषार्थ करता हूँ या नहीं?”

बल्कि—

“मेरे पुरुषार्थ में कितनी शक्ति है?”


अध्याय 13: मुख्य श्रीमत – याद की यात्रा

मुरली में मुख्य श्रीमत के रूप में विशेष जोर दिया गया है—

ज्यादा से ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना।

क्योंकि याद की यात्रा से—

  • पवित्रता आती है।
  • दैवी गुण धारण होते हैं।
  • सेवा में सफलता आती है।
  • आत्मिक शक्ति बढ़ती है।

इसलिए याद का चार्ट केवल एक संख्या नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक स्थिति का दर्पण है।

दैनिक चेकिंग

रात को स्वयं से पूछें—

आज मैंने कितने समय आत्मिक स्मृति में बिताया?

और दूसरा प्रश्न—

कितने समय तक मैं वास्तव में अव्यक्त स्थिति का अनुभव कर सका?


अध्याय 14: लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारी

मुरली विशेष रूप से जिम्मेदारी की चेकिंग की ओर संकेत करती है।

अपने दिन का हिसाब करें—

लौकिक जिम्मेदारी के लिए कितना समय?

और—

अलौकिक/परमार्थिक जिम्मेदारी के लिए कितना समय?

यह तुलना किसी को दोष देने के लिए नहीं है।

यह स्वयं की स्थिति जानने के लिए है।

उदाहरण

यदि दिन में 10 घंटे सांसारिक जिम्मेदारियों में जाते हैं और आध्यात्मिक जिम्मेदारी के लिए केवल थोड़ा समय मिलता है, तो प्रश्न उठता है—

क्या मेरा संतुलन ठीक है?

मुरली का भाव है कि परमार्थ की ओर कमी नहीं होनी चाहिए। 


अध्याय 15: “पहले व्यवहार ठीक करूँ, फिर परमार्थ”

कई बार मन कहता है—

“पहले मेरी सांसारिक जिंदगी ठीक हो जाए, फिर मैं आध्यात्मिक पुरुषार्थ करूँगा।”

लेकिन मुरली इस सोच को उलट देती है।

“परमार्थ से व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है।”

अर्थात् पहले अपनी आंतरिक स्थिति को मजबूत करो।

जब बुद्धि शांत, स्थिर और शक्तिशाली होगी, तो व्यवहार की परिस्थितियों को संभालने की शक्ति भी बढ़ेगी।


अध्याय 16: नज़दीक आने की पहचान

मुरली में नज़दीकी की परख जिम्मेदारी से जोड़ी गई है।

जितना व्यक्ति यज्ञ-सेवा और बापदादा के कार्य की जिम्मेदारी के करीब होगा, उतना ही नज़दीकी का अनुभव माना जा सकता है।

लेकिन इसकी वास्तविक परख क्या है?

अपने आप से पूछें—

“मेरी बुद्धि, तन, मन, धन और समय का कितना भाग परमात्म कार्य के लिए जा रहा है?”

यह प्रश्न स्वयं को दूसरों से तुलना करने के लिए नहीं है।

यह केवल अपनी दिशा देखने के लिए है।


अध्याय 17: गोपों के लिए विशेष जिम्मेदारी

मुरली में गोपों के प्रति विशेष जिम्मेदारी की बात आती है।

पाण्डवों का एक महत्वपूर्ण कार्य बताया गया है—

परीक्षाओं का सामना करना, लोगों की परख करना और शक्तियों की रखवाली करना।

इसका व्यापक आध्यात्मिक अर्थ है—

जिम्मेदारी लेने वाला व्यक्ति केवल अपनी स्थिति की चिंता नहीं करता, बल्कि अपने आसपास के वातावरण को भी सुरक्षित और शक्तिशाली बनाने में सहयोग करता है।

सच्ची जिम्मेदारी

“मेरी रक्षा कौन करेगा?”

से आगे बढ़कर—

“मैं अपनी स्थिति मजबूत रखकर दूसरों का सहारा कैसे बनूँ?”


अध्याय 18: अपनी रखवाली – सबसे पहली जिम्मेदारी

दूसरों की मदद करने से पहले अपनी स्थिति की रखवाली आवश्यक है।

यदि अपनी बुद्धि ही बार-बार कमजोर हो रही है, तो दूसरों को शक्ति देना कठिन होगा।

इसलिए दैनिक प्रश्न रखें—

  • क्या मैं अपनी स्थिति की रखवाली कर रहा हूँ?
  • क्या मैं व्यर्थ संकल्पों से स्वयं को बचा रहा हूँ?
  • क्या मैं अपनी याद को सुरक्षित रख रहा हूँ?
  • क्या मैं परिस्थितियों को अपनी स्थिति पर हावी होने दे रहा हूँ?
  • क्या मैं शक्ति-स्वरूप में स्थित हूँ?

अध्याय 19: आज की आत्म-चेकिंग

आज रात केवल पाँच प्रश्न स्वयं से पूछें:

  1. क्या मैं व्यक्त में रहते हुए अव्यक्त स्थिति का अनुभव कर पाया?
  2. आज कितने समय मेरी बुद्धि आत्मिक स्मृति में रही?
  3. कहाँ-कहाँ अलबेलापन आया?
  4. क्या मेरा पुरुषार्थ शक्तिशाली था या केवल सामान्य?
  5. क्या आज मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी शक्ति से निभाई?

इन पाँच प्रश्नों का ईमानदार उत्तर ही वास्तविक पुरुषार्थ की शुरुआत है।


अध्याय 20: आज का Powerful Murli Point

“मैं नम्बरवन बन गया हूँ” नहीं…

“मैं नम्बरवन बनने के पुरुषार्थ में हूँ।”

यह भावना तड़पन को जीवित रखेगी।

ज्ञान को अनुभव में,
अनुभव को शक्ति में,
और शक्ति को सेवा में बदलना है।


मुरली के मुख्य Notes

1. अव्यक्त स्थिति

व्यक्त में कर्म करते हुए भी व्यक्तपन के भान से न्यारे रहना।

2. मुख्य बाधा

अलबेलापन और सुस्ती का मीठा रूप—आलस्य।

3. ज्ञान की सावधानी

ज्ञान बढ़ने के साथ आत्म-संतुष्टि नहीं, बल्कि पुरुषार्थ बढ़ना चाहिए।

4. लक्ष्य

नम्बरवन बनने की तड़पन बनाए रखना।

5. शक्ति

शक्तिरूप में स्थित होने से पुरुषार्थ शक्तिशाली बनता है।

6. अमृतवेला

सुबह एक विशेष पुरुषार्थ-पॉइंट बुद्धि में रखकर दिनभर उसका अभ्यास करना।

7. याद

ज्यादा से ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना।

8. जिम्मेदारी

लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों का ईमानदार हिसाब रखना।

9. आत्म-रक्षा

अपनी स्थिति की रखवाली करना और फिर दूसरों के लिए सहारा बनना।

10. अंतिम संदेश

साधारण पुरुषार्थ के दिन बीत रहे हैं; अब विशेष और शक्तिशाली पुरुषार्थ की आवश्यकता है।


आज का अभ्यास

सुबह अमृतवेले एक संकल्प लें:

“मैं आत्मा हूँ। मैं व्यक्त कर्म करते हुए भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव करूँगा। मेरा पुरुषार्थ ढीला नहीं, शक्तिशाली होगा। मैं बना नहीं हूँ—मैं श्रेष्ठ बनने के पुरुषार्थ में हूँ।”

दिन में जब भी आलस्य, तृप्ति या अलबेलापन महसूस हो, तुरंत स्वयं से पूछें—

“क्या मैं पुरुषार्थ कर रहा हूँ, या केवल पुरुषार्थी होने से संतुष्ट हूँ?”

यही प्रश्न आज की मुरली का एक शक्तिशाली आईना बन सकता है।

“सुस्ती का मीठा रूप = आलस्य!”

नीचे छोटा Text:

“ज्ञान है… फिर भी पुरुषार्थ ढीला क्यों?”

या

“8 घंटे अव्यक्त स्थिति?!”

या

“अव्यक्त स्थिति की असली पहचान”


Disclaimer

Disclaimer:
यह वीडियो 09 जून 1969 की अव्यक्त मुरली “सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य” के आधार पर अध्ययन, चिंतन और आध्यात्मिक आत्म-चेकिंग के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

इस वीडियो में दिए गए उदाहरण और व्याख्या मूल मुरली के संदेश को सरल एवं व्यावहारिक रूप में समझाने के लिए हैं। इन्हें व्यक्तिगत आत्म-चिंतन और पुरुषार्थ के संदर्भ में लिया जाए। मूल मुरली के भाव एवं संदर्भ के लिए प्रमाणित मुरली स्रोत को प्राथमिकता दें।

सुस्ती का मीठा रूप – आलस्य

अव्यक्त स्थिति और शक्तिशाली पुरुषार्थ — महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: अव्यक्त स्थिति किसे कहते हैं?

उत्तर: व्यक्त में रहते हुए भी व्यक्तपन के भान से न्यारे रहना और आत्मिक स्मृति में स्थित रहकर कर्म करना अव्यक्त स्थिति कहलाती है।

प्रश्न 2: अव्यक्त स्थिति की पहचान क्या है?

उत्तर: कर्म करते हुए भी बुद्धि आत्मिक स्थिति में स्थिर रहे, देह और परिस्थितियों का प्रभाव कम हो तथा अंदर से न्यारेपन और शांति का अनुभव हो—यह अव्यक्त स्थिति की पहचान है।

प्रश्न 3: अव्यक्त स्थिति की पहचान के बाद क्या करना आवश्यक है?

उत्तर: पहचान के बाद अपनी स्थिति की परख करना आवश्यक है। यह देखना है कि वास्तव में दिनभर में कितने समय हम अव्यक्त स्थिति में रहे।

प्रश्न 4: सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से अव्यक्त स्थिति में कितना समय रहना चाहिए?

उत्तर: मुरली में बताया गया है कि सम्पूर्ण स्टेज के हिसाब से आठ घंटे भी कम से कम हैं। वर्तमान पुरुषार्थ के अनुसार अपनी स्थिति को देखते हुए धीरे-धीरे याद और अव्यक्त स्थिति का समय बढ़ाना है।

प्रश्न 5: सभी पुरुषार्थ करते हुए भी अव्यक्त स्थिति कम क्यों रहती है?

उत्तर: इसका मुख्य कारण अलबेलापन और सुस्ती का मीठा रूप—आलस्य बताया गया है।

प्रश्न 6: आलस्य केवल सोने या आराम करने को ही कहते हैं?

उत्तर: नहीं। आध्यात्मिक पुरुषार्थ में आलस्य सूक्ष्म रूप में भी आ सकता है—जैसे “मैं तो पुरुषार्थ कर ही रहा हूँ”, “इतना काफी है”, “बाद में और अच्छा कर लूँगा” आदि।

प्रश्न 7: ज्ञान होने के बाद भी पुरुषार्थ में कमी क्यों आ सकती है?

उत्तर: कभी-कभी अधिक ज्ञान के कारण व्यक्ति अपने को अधिक समझदार समझने लगता है। इससे आत्म-संतुष्टि और अलबेलापन आ सकता है तथा पुरुषार्थ की तड़पन कम हो सकती है।

प्रश्न 8: पुरुषार्थ में तड़पन क्यों आवश्यक है?

उत्तर: तड़पन व्यक्ति को तीव्र पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करती है। केवल यह सोचकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि ज्ञान समझ लिया और सेवा कर रहे हैं; श्रेष्ठ बनने की लगन लगातार बनी रहनी चाहिए।

प्रश्न 9: पुरुषार्थ के बारे में कौन-सी भावना रखनी चाहिए?

उत्तर: यह भावना रखनी चाहिए—“मैं नम्बरवन पुरुषार्थी बन रहा हूँ”, न कि “मैं नम्बरवन बन गया हूँ।” इससे आगे बढ़ने की उमंग और तड़पन बनी रहती है।

प्रश्न 10: शक्तिशाली पुरुषार्थ कैसे बनता है?

उत्तर: जितना हम शक्तिरूप में स्थित होंगे, उतना ही हमारा पुरुषार्थ शक्तिशाली होगा। केवल पुरुषार्थी होना पर्याप्त नहीं; पुरुषार्थ में शक्ति भरना आवश्यक है।

प्रश्न 11: अमृतवेले क्या विशेष अभ्यास करना चाहिए?

उत्तर: अमृतवेले रूह-रूहान के साथ अपने पुरुषार्थ को शक्तिशाली बनाने वाली कोई विशेष पॉइंट बुद्धि में रखनी चाहिए और पूरे दिन उसका अभ्यास करना चाहिए।

प्रश्न 12: मुख्य श्रीमत क्या है?

उत्तर: मुख्य श्रीमत है—ज्यादा से ज्यादा समय याद की यात्रा में रहना। याद की यात्रा से पवित्रता, दैवी गुण और सेवा की सफलता प्राप्त होती है।

प्रश्न 13: याद की यात्रा का क्या महत्व है?

उत्तर: याद आत्मा को शक्तिशाली और पवित्र बनाती है। इससे दैवी गुण धारण करने तथा सेवा में सफलता प्राप्त करने की शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 14: साधारण पुरुषार्थ और विशेष पुरुषार्थ में क्या अंतर है?

उत्तर: साधारण पुरुषार्थ में व्यक्ति सामान्य रूप से प्रयास करता है, जबकि विशेष पुरुषार्थ में समय की पहचान करके अधिक सजगता, शक्ति और तीव्रता के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ता है।

प्रश्न 15: कठिन परीक्षाओं का सामना करने के लिए क्या चाहिए?

उत्तर: यदि परीक्षाएँ कड़ी आने वाली हैं, तो उनका सामना करने के लिए पुरुषार्थ भी कड़ा और शक्तिशाली चाहिए। साधारण पुरुषार्थ से कठिन परीक्षा की अच्छी तैयारी नहीं हो सकती।

प्रश्न 16: लौकिक और अलौकिक जिम्मेदारियों की परख कैसे करें?

उत्तर: स्वयं से पूछें—आज मैंने कितना समय लौकिक जिम्मेदारियों में दिया और कितना समय अलौकिक अथवा परमार्थिक जिम्मेदारी में लगाया? दोनों के बीच संतुलन की ईमानदार चेकिंग करनी चाहिए।

प्रश्न 17: क्या पहले व्यवहार को ठीक करके फिर परमार्थ करना चाहिए?

उत्तर: मुरली का संदेश है कि ऐसा सोचना उचित नहीं। परमार्थ से व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है। इसलिए आंतरिक स्थिति और परमार्थिक पुरुषार्थ को मजबूत करना आवश्यक है।

प्रश्न 18: नज़दीक आने वालों की पहचान क्या है?

उत्तर: जो यज्ञ-सेवा और बापदादा के कार्य की जिम्मेदारी के जितना नज़दीक होते हैं, वे उतना ही नज़दीकी का अनुभव करते हैं। जिम्मेदारी को तन-मन-धन और समय से निभाना इसकी महत्वपूर्ण परख है।

प्रश्न 19: पाण्डवों की विशेष जिम्मेदारी क्या बताई गई है?

उत्तर: परीक्षा और लोगों की परख करना तथा शक्तियों की रखवाली करना पाण्डवों की विशेष जिम्मेदारी बताई गई है।

प्रश्न 20: दूसरों की रखवाली करने से पहले क्या आवश्यक है?

उत्तर: सबसे पहले अपनी स्थिति की रखवाली करना आवश्यक है। अपनी स्थिति मजबूत होगी तभी दूसरों के लिए सहारा और शक्ति का माध्यम बन सकेंगे।

प्रश्न 21: आज की मुरली का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: ज्ञान और लक्ष्य होने के बावजूद अलबेलापन पुरुषार्थ को ढीला न कर दे। अब साधारण नहीं बल्कि विशेष, तीव्र और शक्तिशाली पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 22: आज स्वयं से कौन-सा प्रश्न पूछना चाहिए?

उत्तर:
“क्या मैं वास्तव में तीव्र पुरुषार्थ कर रहा हूँ, या केवल पुरुषार्थी होने से संतुष्ट हो गया हूँ?”

प्रश्न 23: आलस्य से बचने का सरल उपाय क्या है?

उत्तर: अपनी स्थिति की नियमित चेकिंग करें, अमृतवेले विशेष संकल्प रखें, याद का चार्ट बढ़ाएँ और हर दिन अपने पुरुषार्थ में नई शक्ति भरने का प्रयास करें।

प्रश्न 24: इस मुरली से एक शक्तिशाली संकल्प क्या लिया जा सकता है?

उत्तर:
“मैं बना हुआ नहीं हूँ, मैं श्रेष्ठ बनने के पुरुषार्थ में हूँ। मेरा पुरुषार्थ ढीला नहीं, शक्तिशाली होगा और मैं व्यक्त में रहते हुए अव्यक्त स्थिति का अनुभव करूँगा।”

मुरली का सार

अव्यक्त स्थिति की पहचान करो → अपनी स्थिति की परख करो → अलबेलापन पहचानो → आलस्य से सावधान रहो → पुरुषार्थ में तड़पन लाओ → याद की यात्रा बढ़ाओ → शक्तिरूप बनो → विशेष और शक्तिशाली पुरुषार्थ करो।

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