AW.(33)18-09-1969/त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की युक्तियां
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
“त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की युक्तियां”
किसको देखते हो? आकार को देखते वा अव्यक्त को देखते हो? अगर अपनी वा औरों की आकृति को न देख अव्यक्त को देखेंगे ता आकर्षण मूर्त बनेंगे। अगर आकृति को देखते तो आकर्षण मूर्त नहीं बनते हो। आकर्षण मूर्त बनना है तो आकृति को मत देखो। आकृति के अन्दर जो आकर्षण रूप है उसको देखने से ही अपने से औरों को आकर्षण होगा। तो अब यही अव्यक्त सर्विस रही हुई है। व्यक्त में क्यूं आ जाते हो? इसका कारण क्या है? अव्यक्त बनना अच्छा भी लगता फिर भी व्यक्त में क्यूं आते हो? व्यक्त में आने से ही व्यर्थ संकल्प आते हैं और व्यर्थ कर्म होते हैं तो व्यक्त से अव्यक्त बनने में मुश्किल क्यूं लगती है? व्यक्त में जल्दी आ जाते हैं अव्यक्त में मुश्किल से टिकते हैं। इसका कारण क्या है? (भूल जाते हैं।) भूलते भी क्यूं हैं? देह अभिमान क्यूं आ जाता है? मालूम भी है, जानते भी हो, अनुभव भी किया है कि व्यक्त में और अव्यक्त में अन्तर क्या है? नुकसान और फायदा क्या है? यह भी सब मालूम है। जब तुम याद में बैठते हो तो देह-अभिमान से देही-अभिमानी में कैसे स्थित होते हो? क्या कहते हो? बात तो बड़ी सहज है। जो आप सबने बताया वो भी पुरुषार्थ का ही है। लेकिन जानते और मानते हुए भी देह अभिमान में आने का कारण यही है कि देह का आकर्षण रहता है। इस आकर्षण से दूर हटने के लिए कोशिश करनी है। जैसे कोई खींचने वाली चीज़ होती है तो उस खिंचाव से दूर रखने के लिए क्या किया जाता है? चुम्बक होता है तो ना चाहते हुए भी उस तरफ खिंच आते हैं। अगर आपको उस आकर्षण से किसी को दूर करना है तो क्या करेंगे? कोई चीज़ ना चाहते हुए भी उसको खींचती है और आपको उस चीज़ से उसे दूर करना है तो क्या करेंगे? वा तो उनको दूर ले जायेंगे या तो बीच में ऐसी चीज़ रखेंगे जो वो आकर्षण न कर सके। यह दो तरह से होता है या तो दूर कर देना है या दोनों के बीच में ऐसी चीज़ डाल देंगे तो वो दूर हो जाते। इसी प्रकार यह देह अभिमान या यह व्यक्त भाव जो है, यह भी चुम्बक के मुआफिक है। ना चाहते हुए भी फिर उसमें आ जाते हैं। बीच में क्या रखेंगे? स्वयं को जानने के लिए क्या आवश्यकता है जिससे स्वयं को और सर्वशक्तिमान बाप को पूर्ण रीति जान सकते हो? एक ही शब्द है। स्वयं को और सर्वशक्तिमान बाप को पूर्ण रीति जानने के लिए संयम चाहिये। जब संयम को भूलते हो तो स्वयं को भी भूलते और सर्वशक्तिमान को भी भूलते हैं। अलबेलेपन का संस्कार भी क्यों आता है? कोई न कोई संयम को भूलते हो। तो संयम जो है वो स्वयं को और सर्वशक्तिमान बाप को समीप लाता है। अगर संयम में कमी है तो स्वयं और सर्वशक्तिमान से मिलन में कमी है। तो बीच की जो बात है वह संयम है। कोई ना कोई संयम जब छोड़ते हो तो यह याद भी छूटती है। अगर संयम ठीक है तो स्वयं की स्थिति ठीक है और स्वयं की स्थिति ठीक है तो सब बातें ठीक हैं। तो यह देह की जो आकर्षण है वो बार-बार अपनी तरफ आकर्षित करती है। अगर बीच में यह संयम (नियम) रख दो तो यह देह की आकर्षण आकर्षित नहीं करेगी। इसके लिये तीन बातें ध्यान में रखो। एक स्वयं की याद, संयम और समय। यह तीन बातें याद रखेंगे तो क्या बन जायेंगे? त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ। संगमयुग का जो आप सबका टाइटिल है वो सब प्राप्त हो जायेगा। स्वयं को जानने से सर्वशक्तिमान बीच में आ ही जाता है। तो इन तीनों बातों तरफ ध्यान दो।
कोई भी चित्र को देखते हो (चित्र अर्थात् शरीर) तो चित्र को नहीं देखो। लेकिन चित्र के अन्दर जो चेतन है उसको देखो। और उस चित्र के जो चरित्र हैं उन चरित्रों को देखो। चेतन और चरित्र को देखेंगे तो चरित्र तरफ ध्यान जाने से चित्र अर्थात् देह के भान से दूर हो जायेंगे। एक-एक में कोई ना कोई चरित्र जरूर है। क्योंकि ब्राह्मण कुल भूषण ही चरित्रवान है। सिर्फ एक बाप का ही चरित्र नहीं है। लेकिन बाप के साथ जो भी मददगार हैं उनकी भी हर एक चलन चरित्र है। तो चरित्र को देखो और चेतन वा विचित्र को देखो। तो यह कहें विचित्र और चरित्र। अगर यह दो बातें देखो तो देह की आकर्षण, जो ना चाहते हुए भी खींच लेती है वो दूर हो जायेगी। वर्तमान समय यही मुख्य पुरुषार्थ होना चाहिए। जबकि आप लोग कहते ही हो कि हम बदल चुके हैं। तो फिर यह सब बातें ही बदल जानी चाहिए फिर पुराने संस्कार और यह पुरानी बातें क्यूं? अपने को बदलने के लिए पहले यह जो भाव हैं, उस भाव को बदलने से सब बातें बदल जायेंगी। आसक्ति में आ जाते हैं ना। तो आसक्ति के बजाय अगर अपने को शक्ति समझो तो आसक्ति समाप्त हो जायेगी। शक्ति न समझने से अनेक प्रकार की आसक्तियां आती हैं। कोई भी आसक्ति चाहे देह की, चाहे तो देह के पदार्थो की कोई भी आसक्ति उत्पन्न हो तो उस समय यही याद रखो कि मैं शक्ति हूँ। शक्ति में फिर आसक्ति कहां! आसक्ति के कारण उस स्थिति में आ नहीं सकते हैं। तो आसक्ति को खत्म कर दो। इसके लिए यही सोचो कि मैं शक्ति हूँ।
माताओं को विशेष कौनसा विघ्न आता है? (मोह) मोह किस कारण आता है? मोह मेरा से होता है। लेकिन आप सबका वायदा क्या है? शुरू-शुरू में आप सब-जब आये तो आपका वायदा क्या था? मैं तेरी तो सब कुछ तेरा। पहला वायदा ही यह है। मैं भी तेरी और मेरा सब कुछ भी तेरा। तो फिर भी मेरा कहाँ से आया? तेरे को मेरे से मिला देते हो। इससे क्या सिद्ध हुआ कि पहला वायदा ही भूल जाते हो। पहला-पहला वायदा ही सब यह करते है – जो कहोगे वो करेंगे, जो खिलायेंगे, जहाँ बिठायेंगे…। यह जो वायदा है, वह वायदा याद है? बाप तुमको अव्यक्त वतन में बिठाते हैं। तो आप फिर व्यक्त वतन में क्यूं आ जाते हो? वायदा तो ठीक नहीं निभाया। वायदा है जहाँ बिठायेंगे वहाँ बैठेंगे। बाप ने तो कहा नहीं है कि व्यक्त वतन में बैठो। व्यक्त में होते अव्यक्त में रहो। पहला-पहला पाठ ही भूल जायेंगे तो फिर ट्रेनिंग क्या करेंगे। ट्रेनिंग में पहला पाठ तो पक्का करवाओ। यह याद रखो कि जो वायदा किया है उसको निभाकर दिखायेंगे। (जो मातायें ट्रेनिंग में आई हुई हैं) आप सब सरेण्डर हो? जब सरेण्डर हो चुके हो तो फिर मोह कहाँ से आया। जब कोई जलकर खत्म हो जाता है तो फिर उसमें कुछ रहता है? कुछ भी नहीं। अगर कुछ है तो इसका मतलब कि तीर लगा है लेकिन पूरे जले नहीं हैं। मरे हैं, जले नहीं हैं। रावण को भी पहले मारते हैं फिर जलाते हैं। तो मरजीवा बने हो परन्तु जलकर एकदम खाक बन जाएं, वो नहीं बने हैं। सरेण्डर का अर्थ तो बड़ा है। मेरा कुछ रहा ही नहीं। सरेण्डर हुआ तो तन-मन-धन सब कुछ अर्पण। जब मन अर्पण कर दिया तो उस मन में अपने अनुसार संकल्प उठा ही कैसे सकते हैं! तन से विकर्म कर ही कैसे सकते हैं! और धन को भी विकल्प अथवा व्यर्थ कार्यों में लगा ही कैसे सकते हो! इससे सिद्ध है कि देकर फिर वापिस ले लेते हैं। जबकि तन, मन, धन दे दिया है तो मन में क्या चलाना है वो भी श्रीमत मिलती है, तन से क्या करना है, वो भी मत मिलती है, धन से क्या करना है वो भी मालूम है। जिनको दिया उनकी मत पर ही तो चलना होगा। जिसने मन दे दिया उसकी अवस्था क्या होगी? मनमनाभव। उसका मन वहाँ ही लगा रहेगा। इस मंत्र को कभी भूलेंगे नहीं। जो मनमनाभव होगा उसमें मोह हो सकता है? तो मोहजीत बनने के लिए अपने वायदे याद करो। यहाँ ट्रेनिंग से जब निकलेंगे तो आप कौन सा ठप्पा लगवा कर निकलेंगे? (मोहजीत का) अगर मोहजीत का ठप्पा लग जायेगा तो सीधी पोस्ट ठिकाने पर पहुंचेगी। और सीधा ठप्पा नहीं होगा तो पोस्ट ठिकाने पर नहीं पहुंचेगी। इसलिए ही ठप्पा जरूर लगाना है। इन माताओं का ही फिर समर्पित समारोह करेंगे। उसमें बुलायेंगे भी उनको जिन्होंने ठप्पा लगाया होगा। मोहजीत वालों का ही सम्मेलन करेंगे। इसलिये जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ।
त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की युक्तियाँ
📖 मुरली नोट
विषय: व्यक्त से अव्यक्त स्थिति की ओर — देह-अभिमान और मोह पर विजय
मुरली: अव्यक्त मुरली
मुरली तिथि: उपलब्ध पाठ में तारीख नहीं दी गई है, इसलिए बिना सत्यापन के कोई “Proper Date” जोड़ना उचित नहीं होगा। यदि आप मुरली की तारीख/फोटो भेज दें, तो मैं उसे बिल्कुल सही तारीख के साथ जोड़ दूँगा।
1. व्यक्त नहीं, अव्यक्त को देखो
बाबा समझाते हैं कि हमें केवल शरीर या आकृति को नहीं देखना है, बल्कि उसके अंदर रहने वाली चेतन आत्मा को देखना है।
जब हमारा ध्यान केवल आकृति पर जाता है, तो देह का आकर्षण बढ़ता है। लेकिन जब हम आत्मा और उसके श्रेष्ठ चरित्र को देखते हैं, तो हम देह-भान से ऊपर उठने लगते हैं।
उदाहरण:
किसी व्यक्ति के रूप, पहनावे या शरीर को देखने के बजाय सोचें—“यह भी एक आत्मा है, इसमें भी कोई विशेष गुण और संस्कार हैं।”
2. देह का आकर्षण कैसे समाप्त करें?
देह-अभिमान एक चुम्बक की तरह है। हम उससे दूर रहना चाहते हैं, फिर भी बार-बार उसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं।
बाबा इसके लिए बीच में संयम रखने की युक्ति बताते हैं।
जब संयम छूटता है, तो स्मृति कमजोर होती है। स्मृति कमजोर होने पर आत्म-स्थिति भी कमजोर हो जाती है।
इसलिए याद रखें:
- स्वयं की याद
- संयम
- समय की पहचान
इन तीनों को जीवन में धारण करने से स्थिति मजबूत होती है।
3. त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ
जब आत्मा स्वयं को पहचानती है और सर्वशक्तिमान बाप की याद में रहती है, तब उसकी दृष्टि श्रेष्ठ बनने लगती है।
तीन बातें विशेष याद रखें:
- स्वयं की याद — मैं आत्मा हूँ।
- संयम — हर कर्म श्रीमत और मर्यादा के अनुसार।
- समय — समय और परिस्थिति को पहचानकर श्रेष्ठ कर्म करना।
इन्हीं अभ्यासों से संगमयुग के श्रेष्ठ टाइटिल—त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ—की स्थिति प्राप्त करने का पुरुषार्थ किया जा सकता है।
4. चित्र नहीं, चरित्र देखो
बाबा की एक बहुत सुंदर युक्ति है—“चित्र को नहीं, चेतन और चरित्र को देखो।”
चित्र अर्थात शरीर दिखाई देता है, लेकिन उसके अंदर चेतन आत्मा है। हर आत्मा में कोई न कोई विशेषता और चरित्र भी है।
इसलिए किसी को देखते समय शरीर की तरफ आकर्षित होने के बजाय उसके गुण, विशेषता और चरित्र को देखना सीखें।
उदाहरण:
अगर किसी में धैर्य का गुण है तो शरीर या व्यक्तित्व देखने के बजाय उसके धैर्य को देखें। इससे हमारी दृष्टि भी गुणग्राही बनेगी।
5. आसक्ति के बजाय स्वयं को शक्ति समझो
आसक्ति देह से भी हो सकती है और देह के पदार्थों से भी।
जब भी किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक आकर्षण महसूस हो, उस समय स्वयं को याद दिलाएँ:
“मैं आत्मा हूँ, मैं शक्ति हूँ।”
शक्ति की स्मृति बढ़ने से आसक्ति कमजोर होती जाती है।
✨ अभ्यास
दिन में कई बार स्वयं से पूछें:
“मैं इस समय आत्मा होकर देख रहा हूँ या देह होकर?”
यह छोटा-सा प्रश्न हमें तुरंत अपनी स्थिति चेक करने में मदद कर सकता है।
6. मोहजीत बनने की युक्ति
विशेष रूप से माताओं के संदर्भ में मोह को एक प्रमुख विघ्न बताया गया है।
मोह का आधार है—“मेरा।”
लेकिन हमारा मूल संकल्प क्या है?
“मैं तेरा, सब कुछ तेरा।”
जब “तेरा” की स्मृति मजबूत होती है तो “मेरा” धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
उदाहरण:
परिवार, धन, वस्तु या जिम्मेदारी को अपना अधिकार मानकर आसक्त होने के बजाय सोचें—“यह मुझे सेवा के लिए मिली जिम्मेदारी है।”
इस दृष्टि से मोह के स्थान पर जिम्मेदारी और सेवा-भाव आता है।
7. सरेण्डर का वास्तविक अर्थ
सरेण्डर केवल यह कह देना नहीं है कि “मैंने सब कुछ बाप को दे दिया।”
सच्चे सरेण्डर का अर्थ है—तन, मन और धन को श्रेष्ठ मत के अनुसार चलाना।
- मन: व्यर्थ और मनमाने संकल्पों से मुक्त।
- तन: श्रेष्ठ कर्म और सेवा में लगाना।
- धन: उचित और श्रेष्ठ कार्य में लगाना।
जब मन अर्पण कर दिया, तो मन को अपनी मनमानी दिशा में चलाने के बजाय श्रीमत के अनुसार चलाना ही सच्चा समर्पण है।
8. “मनमनाभव” की स्थिति
मन को बाप की याद में लगाना ही इस अभ्यास का मुख्य आधार है।
जब मन बार-बार परमात्म-स्मृति में रहता है, तो मोह और व्यर्थ आकर्षण कमजोर होते जाते हैं।
दैनिक अभ्यास:
सुबह कुछ मिनट शांत होकर बैठें और अनुभव करें—
“मैं आत्मा हूँ… मैं शक्ति हूँ… मेरा मन परमात्म-स्मृति में है… मुझे न्यारा और प्यारा रहना है।”
9. आज का पुरुषार्थ
वर्तमान समय का मुख्य पुरुषार्थ यही है कि हम व्यक्त भाव से ऊपर उठकर अव्यक्त स्थिति का अनुभव करें।
किसी को देखते समय:
चित्र नहीं → चेतन आत्मा
देह नहीं → चरित्र
आसक्ति नहीं → शक्ति
“मेरा” नहीं → “तेरा”
व्यर्थ संकल्प नहीं → परमात्म-स्मृति
मुरली सार
“मैं आत्मा हूँ, मैं शक्ति हूँ और मुझे न्यारा-प्यारा रहना है।”जब आत्म-स्मृति, संयम और समय की पहचान जीवन का हिस्सा बनते हैं, तब देह-अभिमान और मोह पर विजय पाने का पुरुषार्थ सहज होता जाता है।
त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ कैसे बनें? | देह-अभिमान और मोह जीतने की मुरली युक्तियाँ | Avyakt Murliदूसरा विकल्प
“मैं शक्ति हूँ” — मोह और देह-अभिमान को खत्म करने की Powerful युक्ति | त्रिनेत्री बनने का अभ्यास Disclaimer
Disclaimer: यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें प्रस्तुत बातें मुरली के भाव और आध्यात्मिक शिक्षाओं की सरल व्याख्या हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या मत की आलोचना करना नहीं है। कृपया मूल मुरली पाठ एवं अधिकृत स्रोत को प्राथमिकता दें। जहाँ मुरली की सटीक तिथि उपलब्ध नहीं है, वहाँ अनुमानित तारीख प्रस्तुत नहीं की गई है।
त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की युक्तियाँ
प्रश्न 1: हमें अपनी दृष्टि में क्या परिवर्तन लाना है?
उत्तर: हमें केवल शरीर या आकृति को नहीं देखना है, बल्कि शरीर के अंदर रहने वाली चेतन आत्मा और उसके चरित्र को देखना है। इससे देह का आकर्षण कम होता है और आत्मिक दृष्टि विकसित होती है।
प्रश्न 2: व्यक्त से अव्यक्त स्थिति में आने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: देह-अभिमान से दूर होकर स्वयं को आत्मा समझना और बाप की याद में स्थित होना चाहिए। व्यक्त भाव में व्यर्थ संकल्प और व्यर्थ कर्म बढ़ते हैं, जबकि अव्यक्त स्थिति में आत्मिक शांति और शक्ति का अनुभव होता है।
प्रश्न 3: देह-अभिमान को चुम्बक के समान क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि देह का आकर्षण हमें बार-बार अपनी ओर खींचता है। इससे बचने के लिए संयम को बीच में रखना आवश्यक है।
प्रश्न 4: स्वयं को और सर्वशक्तिमान बाप को जानने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर: संयम आवश्यक है। संयम हमें स्वयं की पहचान और सर्वशक्तिमान बाप की याद के समीप लाता है।
प्रश्न 5: कौन-सी तीन बातें विशेष रूप से याद रखनी हैं?
उत्तर:
- स्वयं की याद
- संयम
- समय
इन तीनों के अभ्यास से श्रेष्ठ आत्मिक स्थिति बनाने में मदद मिलती है।
प्रश्न 6: त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकीनाथ बनने की युक्ति क्या है?
उत्तर: आत्म-स्मृति, संयम और समय की पहचान को जीवन में धारण करना। स्वयं को जानने से सर्वशक्तिमान बाप की याद स्वतः जुड़ जाती है।
प्रश्न 7: किसी व्यक्ति को देखते समय हमें क्या देखना चाहिए?
उत्तर: केवल चित्र अर्थात शरीर को नहीं, बल्कि उसके अंदर की चेतन आत्मा और उसके चरित्र को देखना चाहिए।
प्रश्न 8: आसक्ति को समाप्त करने का सरल उपाय क्या है?
उत्तर: जब भी किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो, स्वयं को याद करें—“मैं आत्मा हूँ, मैं शक्ति हूँ।” शक्ति की स्मृति बढ़ने से आसक्ति कमजोर होती जाती है।
प्रश्न 9: माताओं के लिए विशेष विघ्न कौन-सा बताया गया है?
उत्तर: मोह। मोह का आधार “मेरा” भाव है। इसे समाप्त करने के लिए अपने मूल वायदे—“मैं तेरा, सब कुछ तेरा”—को याद रखना चाहिए।
प्रश्न 10: सच्चे सरेण्डर का अर्थ क्या है?
उत्तर: सरेण्डर का अर्थ है तन, मन और धन को बाप की श्रीमत के अनुसार लगाना। केवल कहने से नहीं, बल्कि व्यवहार में समर्पण दिखाई देना चाहिए।
प्रश्न 11: मन अर्पण करने के बाद क्या करना चाहिए?
उत्तर: मन को मनमाने और व्यर्थ संकल्पों में नहीं लगाना चाहिए। बाप की याद में स्थित रहकर श्रेष्ठ संकल्पों को अपनाना चाहिए। यही मनमनाभव की स्थिति की ओर ले जाता है।
प्रश्न 12: मोहजीत बनने के लिए क्या याद रखना चाहिए?
उत्तर: अपना किया हुआ वायदा याद रखना चाहिए—“मैं तेरा, सब कुछ तेरा।” जब “मेरा” समाप्त होता है, तब मोह पर विजय पाने का पुरुषार्थ सहज होता है।
प्रश्न 13: अव्यक्त स्थिति में रहने का क्या लाभ है?
उत्तर: आत्मा देह से न्यारी होकर परमात्म-स्मृति में स्थित होती है। इससे व्यर्थ संकल्प कम होते हैं और शांति, शक्ति तथा आत्मिक आनंद का अनुभव बढ़ता है।
प्रश्न 14: इस मुरली का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: चित्र को नहीं, चेतन और चरित्र को देखो; आसक्ति के बजाय स्वयं को शक्ति समझो; स्वयं की याद, संयम और समय को जीवन में धारण करो।
एक लाइन का मुरली सार
“मैं आत्मा हूँ, मैं शक्ति हूँ, मेरा सब कुछ तेरा है—मुझे न्यारा और प्यारा रहना है।”
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