(28)22-07-1969/“Remain free from any basis within your sanskars; become mature in the disciplines.”

AW.(28)22-07-1969/“संस्कारों में निराधार रहते, नियमों में परिपक्व बनो”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“संस्कारों में निराधार रहते, नियमों में परिपक्व बनो”

सब खुशराजी हैं? खुश-खैराफत पूछने की आवश्यकता है? बापदादा तो समझते हैं – अब यह पूछने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सब बालिग बच्चे बन गये हैं। हर एक ने नर्क से स्वर्ग बनाने की जिम्मेवारी का ताज तो पहन ही लिया है। ताजधारी खुद औरों से खुश खैराफत पूछते हैं। सतयुग में आप जब राज़े बनेंगे तो अपनी प्रजा से खुश खैराफत पूछेंगे। तो वह संस्कार यहाँ ही भरने हैं ना। अभी जो संस्कार भरे जाते हैं वही फिर अनेक जन्म चलेंगे। उसमें मुख्य संस्कार है – जिसको कहा जाता है ‘निराधार’। निर-आधार का मतलब यह नही कि दैवी सम्बन्ध के नियमों का भी आधार नहीं लेना है। नियमों में पूरा ही परिपक्व रहना है। नियमों में भी पूरे रहें और निराधार भी पूरा रहें। ऐसी अवस्था कब और कहाँ देखी है? साकार रूप का सबूत सबने देखा। जितना ही नियमों में सम्पूर्ण उतना ही निराधार। निराधार होते हुए भी कोई भी बात को रखने लिए बच्चों की राय बिना नहीं करते थे। यह है नियमों का पालन कर सिखलाना। कई बच्चे निराधार तो हो जाते हैं लेकिन निराधार होते-होते कहाँ छोटे-छोटे नियमों से छूट जाते हैं। लेकिन दोनों ही बातें एक साथ चलना यह है ब्राह्मण कुल की मर्यादा के अन्दर रहना। ब्राह्मणों का मुख्य काम क्या होता है? दूसरे को भी बन्धन में बांधना। दूसरों को बांधना अर्थात् खुद भी उसमें बन्धे रहें। जितना ही मर्यादा में बन्धे हुए रहते उतना ही फिर न्यारे और प्यारे भी रहते। ब्राह्मण कुल की मर्यादाओं पर कहाँ तक चल रहे हैं – यह हर एक को देखना है। ब्राह्मणों की मुख्य मर्यादा कौन सी है? मर्यादा जो होती है उनके अन्दर रहना पड़ता है। तो श्रीमत पर चलना ही मुख्य मर्यादा पूर्ण रीति चल रही हैं? अगर कोई मर्यादा से छूट जाता है तो उनको कुल से निकाला जाता है। कलियुग में कुल से निकाल देते हैं। लेकिन यहाँ निकाला नहीं जाता है, यहाँ स्वयं ही निकल जाते हैं। तो इस मुख्य मर्यादा में कहाँ तक हम चल रहे हैं, उसकी भी पूरी जांच रखनी चाहिए। सारे दिन में जो भी कर्म होते हैं, उनकी चेकिंग होनी चाहिए। ब्राह्मण कुल की मर्यादा अनुसार हमारी मन्सा-वाचा-कर्मणा चली? अगर ब्राह्मण कुल की मर्यादा प्रमाण नहीं चलते तो जिस समय ऐसा कर्म होता है, उस समय जैसे कुल से बाहर निकल जाते हैं। ब्राह्मण पने का का नशा नहीं रहता है। विस्मृति हो जाती है। समझना चाहिए कि हम मर्यादा में रहेंगे तब औरों को मर्यादा सिखला सकेंगे? नामधारी जो ब्राह्मण हैं उनका यही कर्तव्य चलता है। जो भी कर्तव्य होता है उसकी मर्यादायें ब्राह्मण ही आकर सिखलाते हैं और कराते हैं। तुम ब्राह्मण अभी मर्यादाओं में चले हो तब यह यादगार अब तक चलता आ रहा है। जो खुद सीखे हुए होंगे वही औरों को सिखलायेंगे। श्रीमत है एक शब्द। लेकिन उनका रहस्य बहुत है। श्रीमत प्रमाण संकल्प उठें, श्रीमत ने यह भी बताया है संकल्प क्या करना है, देखना कैसे है, बोलना क्या है, कर्म किस स्थिति में स्थित होकर करना है, भोजन कैसे करना है, अगर सोना है तो भी कैसे? यह सब श्रीमत मिली हुई है। याद में रहकर सोना, अपना चार्ट देखकर सोना। यह भी श्रीमत की मर्यादा है। संकल्प तक मर्यादायें क्या हैं, सब पता है। उसमें सब आ जाता है। तो हर कर्म को चेक करो। वृत्ति, दृष्टि, स्मृति कैसे रहती है। हर बात मर्यादा के अन्दर होनी चाहिए। किन बातों से छूटना होता है, किन बातों में फिर बंधना भी होता है। यह थोड़े समय का मीठा बन्धन अनेक बन्धनों से मुक्त करने वाला है। अभी यह आधार न रखो कि कोई हमारा चार्ट देखकर रिजल्ट पूछेगा तब हम आगे बढ़ेंगे। नहीं। अब अपने आपको ही देखते आगे बढ़ते चलो। बापदादा का सहारा तो है ही लेकिन फिर भी छोटी-छोटी बातों में अपने आपको ही ध्यान रखना है। रोज का चार्ट अपना देख खुद ही चेकिंग कर आगे बढ़ना हैं। सब होवनहार राज्य सम्भालने वाले हो। तो जो औरों को सम्भालने वाला होता है वह अपने को नहीं सम्भाल सकेंगे? अगर अपना पोतामेल नहीं सम्भाल सकेंगे तो राजधानी कैसे सम्भालेंगे। अच्छा, कुमारियाँ सोच रही हैं, हमारी रिजल्ट कब निकलेगी? रिजल्ट निकालने योग्य हो? ऐसी रिजल्ट है जो आधे पास हों। कैसा भी कड़ा इम्तहान लेवें तो आधा अन्दाज पास हो जायेगी? इम्तहान भी बड़ा लेना है। यूँ इम्तहान का पेपर सुनाया नहीं जाता है लेकिन यहाँ सुना भी देते हैं। एक इम्तहान तो यह लेंगे कि 8 घण्टा याद में रह सकते हैं? वाचा का भी इम्तहान लेंगे। तीन मिनट में सारे ज्ञान की मुख्य प्वॉइन्ट्स कैसे स्पष्ट हो जाएं। तीन मिनट में सारे ज्ञान का सार ऐसा किसको समझाओ जो दूसरे दिन इच्छुक हो जरूर सुनने आये। कर्मणा का भी कड़ा इम्तहान लेंगे। फिर रिजल्ट निकालेंगे। न सिर्फ यहाँ तक लेकिन जहाँ भी जायेंगी वहाँ से एक मास की रिजल्ट का पता पड़ेगा। तब फाइनल मार्क्स मिलेगी। ऐसी तैयारी करनी है फिर देखेंगे रिजल्ट में कितने पास हुए।

“निराधार बनो, लेकिन नियमों में परिपक्व रहो | श्रीमत की मर्यादा से बनाओ अपना श्रेष्ठ संस्कार | 22 जुलाई 1969 अव्यक्त मुरली”

अध्याय 1:  ताजधारी बनो—जिम्मेदारी के संस्कार भरो

बापदादा याद दिलाते हैं कि ब्राह्मण जीवन केवल स्वयं के परिवर्तन का जीवन नहीं है, बल्कि नर्क से स्वर्ग बनाने की जिम्मेदारी लेने का जीवन है। आज जो संस्कार हम धारण करते हैं, वही आगे भी हमारे जीवन में चलते हैं।

उदाहरण:
जैसे कोई राजा बनने से पहले प्रजा की देखभाल के संस्कार सीखता है, वैसे ही भविष्य के विश्व-राज्य की जिम्मेदारी के लिए आज से ही श्रेष्ठ संस्कारों का अभ्यास करना है।

मुरली नोट्स — 22 जुलाई 1969:

  • स्वयं में श्रेष्ठ संस्कार भरना।
  • दूसरों की खुशी और कल्याण का ध्यान रखना।
  • भविष्य की जिम्मेदारी के संस्कार वर्तमान में ही धारण करना।

अध्याय 2:  “निराधार” का सही अर्थ क्या है?

निराधार बनने का अर्थ यह नहीं कि दैवी संबंधों, मर्यादाओं और नियमों का सहारा छोड़ दिया जाए।

निराधार = देह, व्यक्ति, वस्तु और बाहरी सहारों से अंदर से न्यारा रहना।
परिपक्वता = श्रीमत और दैवी मर्यादाओं में पूरी तरह चलना।

दोनों अवस्थाएं साथ-साथ चाहिए।

उदाहरण:
एक व्यक्ति किसी जिम्मेदारी को निभाते हुए भी उसके परिणाम या प्रशंसा पर निर्भर नहीं रहता। वह अपना कर्तव्य करता है, लेकिन अंदर से न्यारा रहता है।

 मुख्य सूत्र:

“निराधार रहते हुए नियमों में परिपक्व बनो।”


अध्याय 3:  न्यारे और प्यारे बनने की कला

ब्राह्मण जीवन की विशेषता है—मर्यादा में रहते हुए न्यारा और प्यारा रहना।

जितना व्यक्ति मर्यादाओं में चलता है, उतना ही वह दूसरों के लिए उदाहरण बनता है।

उदाहरण:
यदि कोई शिक्षक स्वयं नियमों का पालन करता है, तभी उसके विद्यार्थी उसके बताए नियमों को सहज स्वीकार करेंगे।

इसलिए पहले स्वयं सीखना और धारण करना, फिर दूसरों को सिखाना—यही सच्ची सेवा है।


अध्याय 4:  श्रीमत—एक शब्द, लेकिन गहरा रहस्य

“श्रीमत” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन के लिए मार्गदर्शन है।

श्रीमत के अनुसार हमें अपने:

  • संकल्प
  • दृष्टि
  • वृत्ति
  • वाणी
  • कर्म
  • भोजन
  • विश्राम
  • स्मृति
  • योग

सभी की जांच करनी है।

हर कर्म से पहले स्वयं से पूछें:

“क्या यह कर्म श्रीमत प्रमाण है?”


अध्याय 5:  मन्सा-वाचा-कर्मणा की रोज चेकिंग

सच्ची प्रगति के लिए दूसरों द्वारा हमारी कमियां बताने की प्रतीक्षा नहीं करनी है।

हर रात अपना आत्मिक चार्ट और पोतामेल देखें।

तीन प्रश्न:

  1. मन्सा: मेरे संकल्प कैसे रहे?
  2. वाचा: मेरी वाणी कैसी रही?
  3. कर्मणा: मेरे कर्म मर्यादा प्रमाण रहे?

उदाहरण:
यदि दिन में किसी परिस्थिति में क्रोध आया, तो केवल यह न देखें कि मैंने क्या कहा; यह भी देखें कि क्रोध का संकल्प क्यों आया और अगली बार उसी परिस्थिति में श्रेष्ठ स्थिति कैसे रखूंगा।


अध्याय 6:  मीठा बंधन—जो अनेक बंधनों से मुक्त करे

श्रीमत की मर्यादाएं बंधन जैसी लग सकती हैं, लेकिन यह मीठा बंधन हमें पुराने बंधनों से मुक्त करने वाला है।

उदाहरण:
नियमित योग का अभ्यास शुरू में अनुशासन लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही अनुशासन मन को व्यर्थ संकल्पों से मुक्त करने में मदद करता है।

इसलिए नियमों को बोझ नहीं, आत्मिक सुरक्षा समझें।


अध्याय 7:  जो स्वयं को संभाले, वही राज्य संभाले

बापदादा का संकेत बहुत गहरा है—यदि हम अपना दैनिक पोतामेल नहीं संभाल सकते, तो भविष्य में बड़ी जिम्मेदारियां कैसे संभालेंगे?

आज का अभ्यास ही भविष्य की तैयारी है।

आत्म-चिंतन:

“क्या मैं स्वयं को संभालने वाला बन रहा हूँ?”

जो अपनी वृत्ति, दृष्टि, स्मृति और कर्म को संभाल सकता है, वही दूसरों का मार्गदर्शन करने योग्य बनता है।


अध्याय 8:  बड़ी परीक्षा की तैयारी

मुरली में पुरुषार्थ की परीक्षा के रूप में तीन महत्वपूर्ण क्षेत्र बताए गए हैं:

 1. याद की परीक्षा

लंबे समय तक स्मृति में रहने का अभ्यास।

 2. वाचा की परीक्षा

कम समय में ज्ञान का सार स्पष्ट रूप से समझाने की क्षमता 3. कर्मणा की परीक्षा

हर कर्म को श्रेष्ठ स्थिति और मर्यादा में रहकर करना।

उदाहरण:
यदि आपको किसी व्यक्ति को राजयोग का सार केवल तीन मिनट में बताना हो, तो क्या आप ज्ञान को इतना स्पष्ट और सार रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं कि सामने वाले की रुचि अगले दिन भी बनी रहे?


अध्याय 9:  अंतिम लक्ष्य—“पास विद ऑनर”

परीक्षा केवल ज्ञान सुनने की नहीं है। वास्तविक परीक्षा है—

ज्ञान → स्मृति → संस्कार → कर्म → परिणाम

जो ज्ञान जीवन में दिखाई देता है, वही वास्तविक उपलब्धि है।

इसलिए आज से ही स्वयं की जांच करें और देखें कि हमारी मन्सा-वाचा-कर्मणा कितनी मर्यादा प्रमाण चल रही है।


आज की मुख्य मुरली पॉइंट

“निराधार रहते हुए भी नियमों में परिपक्व रहना—यही ब्राह्मण कुल की मर्यादा है।”

 आज का संकल्प

मैं आत्मा हूँ। मैं बाहरी सहारों से न्यारा रहते हुए श्रीमत और दैवी मर्यादाओं में परिपक्व रहूँगा। मैं प्रतिदिन अपनी मन्सा-वाचा-कर्मणा की चेकिंग करूँगा और स्वयं को भविष्य की जिम्मेदारियों के योग्य बनाऊँगा।

 मुरली की सही तारीख

22 जुलाई 1969 — अव्यक्त बापदादा, मधुबन
शीर्षक: “संस्कारों में निराधार रहते, नियमों में परिपक्व बनो”


  Description

“निराधार बनो, लेकिन नियमों में परिपक्व रहो।”
22 जुलाई 1969 की इस अव्यक्त मुरली में बापदादा ने ब्राह्मण जीवन की एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता समझाई—निराधार स्थिति और मर्यादाओं में परिपक्वता दोनों साथ-साथ चाहिए।

इस वीडियो में जानिए कि श्रीमत के अनुसार संकल्प, दृष्टि, वाणी और कर्म की चेकिंग कैसे करें, अपना दैनिक चार्ट कैसे देखें और किस प्रकार स्वयं को भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार करें।

निराधार + मर्यादा + आत्म-चेकिंग = श्रेष्ठ संस्कारों की नींव।

संस्कारों में निराधार रहते, नियमों में परिपक्व बनो”

1. प्रश्न: निराधार बनने का सही अर्थ क्या है?

उत्तर: निराधार बनने का अर्थ देह, व्यक्ति, वस्तु और बाहरी सहारों के प्रति अंदर से निर्भर या आसक्त न रहना है। लेकिन दैवी संबंधों और नियमों की मर्यादाओं को छोड़ना नहीं है।

2. प्रश्न: निराधार और नियमों में परिपक्व—दोनों साथ कैसे रह सकते हैं?

उत्तर: अंदर से न्यारे और स्वतंत्र रहते हुए श्रीमत तथा दैवी मर्यादाओं का पूरी तरह पालन करना ही दोनों का संतुलन है।

3. प्रश्न: ब्राह्मण जीवन की मुख्य मर्यादा क्या है?

उत्तर: श्रीमत प्रमाण चलना ही ब्राह्मण जीवन की मुख्य मर्यादा है।

4. प्रश्न: मर्यादा में रहने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: जितना मर्यादाओं में रहेंगे, उतना ही न्यारे और प्यारे बनेंगे तथा दूसरों को भी मर्यादा में चलने की प्रेरणा दे सकेंगे।

5. प्रश्न: श्रीमत केवल किन कार्यों के लिए है?

उत्तर: श्रीमत संकल्प, दृष्टि, वाणी, कर्म, भोजन, विश्राम, स्मृति और योग सहित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए मार्गदर्शन देती है।

6. प्रश्न: हमें अपने दिन की चेकिंग किन तीन स्तरों पर करनी चाहिए?

उत्तर: मन्सा, वाचा और कर्मणा—संकल्प कैसे रहे, वाणी कैसी रही और कर्म कैसे रहे।

7. प्रश्न: अपना चार्ट और पोतामेल क्यों देखना चाहिए?

उत्तर: अपनी वास्तविक प्रगति को जानने, कमियों को पहचानने और प्रतिदिन आत्म-सुधार करने के लिए अपना चार्ट स्वयं देखना चाहिए।

8. प्रश्न: क्या हमें अपनी रिजल्ट बताने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर रहना चाहिए?

उत्तर: नहीं। बापदादा का सहारा होते हुए भी छोटी-छोटी बातों में स्वयं अपनी स्थिति और कर्मों की जांच करनी चाहिए।

9. प्रश्न: “मीठा बंधन” किसे कहा गया है?

उत्तर: श्रीमत और दैवी मर्यादाओं में चलने को मीठा बंधन कहा गया है, क्योंकि यह हमें अनेक पुराने बंधनों से मुक्त करने वाला है।

10. प्रश्न: वृत्ति, दृष्टि और स्मृति की जांच क्यों आवश्यक है?

उत्तर: क्योंकि हमारे हर कर्म की गुणवत्ता हमारी वृत्ति, दृष्टि और स्मृति पर निर्भर करती है। इसलिए हर कर्म को मर्यादा के अंदर रखना आवश्यक है।

11. प्रश्न: दूसरों को मर्यादा सिखाने से पहले हमें क्या करना चाहिए?

उत्तर: पहले स्वयं मर्यादाओं में चलना चाहिए। जो स्वयं सीखता और धारण करता है, वही दूसरों को प्रभावशाली ढंग से सिखा सकता है।

12. प्रश्न: भविष्य के राज्य को संभालने के लिए अभी से क्या अभ्यास करना है?

उत्तर: पहले स्वयं को संभालना सीखना है। यदि हम अपना दैनिक पोतामेल और अपनी स्थिति नहीं संभाल सकते, तो भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियां कैसे संभालेंगे?

13. प्रश्न: याद की परीक्षा किस प्रकार की बताई गई है?

उत्तर: एक परीक्षा यह है कि लंबे समय तक याद में स्थित रहने का अभ्यास हो—जैसे 8 घंटे तक याद में रहने की क्षमता विकसित करना।

14. प्रश्न: वाचा की परीक्षा क्या है?

उत्तर: कम समय में ज्ञान की मुख्य बातों को स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से समझाने की क्षमता वाचा की परीक्षा है।

15. प्रश्न: तीन मिनट की परीक्षा का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: तीन मिनट में ज्ञान का सार इस प्रकार समझाना कि सुनने वाले की रुचि बढ़े और वह आगे भी ज्ञान सुनने के लिए इच्छुक हो जाए।

16. प्रश्न: कर्मणा की परीक्षा क्या है?

उत्तर: हर कर्म को श्रेष्ठ स्थिति में स्थित होकर और ब्राह्मण कुल की मर्यादाओं के अनुसार करना ही कर्मणा की परीक्षा है।

17. प्रश्न: क्या परीक्षा केवल मधुबन तक सीमित है?

उत्तर: नहीं। वास्तविक रिजल्ट इस बात से देखी जाएगी कि बाहर जाकर भी व्यक्ति अपनी स्थिति और मर्यादाओं को कितना कायम रखता है।

18. प्रश्न: सच्ची सफलता किसे कहा जा सकता है?

उत्तर: केवल ज्ञान सुनना सफलता नहीं है। जब ज्ञान संकल्प, संस्कार और कर्म में दिखाई देने लगे, तब उसे वास्तविक सफलता कहा जा सकता है।

19. प्रश्न: “निराधार” बनने का अभ्यास हमें किससे मुक्त करता है?

उत्तर: यह देह-अभिमान, आसक्ति और बाहरी सहारों पर निर्भरता जैसे बंधनों से मुक्त होने में मदद करता है।

20. प्रश्न: इस पूरी शिक्षा का मुख्य सार क्या है?

उत्तर: अंदर से निराधार, श्रीमत में परिपक्व, मर्यादाओं में दृढ़ और मन्सा-वाचा-कर्मणा की रोज चेकिंग करने वाला बनना ही श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन है।

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