AW.(08)26-01-1970/Offering water signifies making a vow.

AW.(08)26-01-1970/जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना

“जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना”

आज शिव जयन्ति मनाने के लिए बुलाया है। कैसे मनाने चाहते हो? मिलना ही मनाना है। लोग मिलने के लिए मनाते हैं और बच्चे मिलने को ही मनाना समझते हैं। तो मिलना अर्थात् मना लिया अब बाकी क्या रहा। आप बच्चों का मनाना एक तो है मिलना और दूसरा है अपने समान बनाना। तो मिलना और बनाना, यही है मनाना। आज के दिवस पर यह दो बातें करनी है। मिलन तो मना ही रहे हो बाकी आप समान बनाना। यह दोनों बातें की गोया शिवजयन्ति मनाई। जब भक्त लोग जल चढ़ाने के लिए जाते हैं तो भी बीच में ब्राह्मण होते हैं, जो उनसे कराते हैं। तो आप भी ब्राह्मण हो। जैसे भक्त लोग जल चढ़ाते हैं वैसे तुम बच्चे बाप के ऊपर आत्माओं से जल चढ़वाते हो। यह जल अथवा दूध चढ़ाने की रस्म क्यों चली है? जिस समय जल चढ़ाते हैं उस समय मन में क्या सोचते हैं, मालूम है? जल वा दूध जो चढ़ाते हैं उनका भाव अर्थ यह है। जब कोई भी प्रतिज्ञा करनी होती है तो हाथ में जल उठाते हैं, सूर्य को भी जल चढ़ाते हैं तो अन्दर में प्रतिज्ञा करते हैं। तुम्हारे पास भी जब कोई आते हैं तो पहले-पहले उन्हों से प्रतिज्ञा का जल लो। एक प्रतिज्ञा कराते हो ना कि हम आज से एक शिवबाबा के ही बनकर रहेंगे। तो पहले उनसे प्रतिज्ञा कराते हो। वह लोग भी अन्दर में प्रतिज्ञा कर फिर स्वयं सम्मुख आकर देवताओं पर अर्पण होते हैं। जो पूरे भक्त होते हैं वह सारा ही अपने को उनके आगे झुकाते हैं अर्थात् अपने को अर्पण कर देते हैं। तो तुम भी पहले उन्हों से प्रतिज्ञा कराते हो। जब पक्के हो जाते हैं, तो सम्पूर्ण स्वाहा कराते हो। ऐसी सर्विस करनी है। बिल्कुल न्यौछावर कराना। आप ने कितनों को न्यौछावर कराया है? जो जितना स्वयं न्यौछावर बने हैं उतना ही औरों को बनाते हैं। अगर स्वयं ही सम्पूर्ण न्यौछावर नहीं बने हैं तो औरों को भी इतना ही आप समान बनाते हैं। अभी न्यौछावर होने में मेहनत और समय दोनों ही लगता है। लेकिन थोड़े ही समय में न्यौछावर होने वालों की क्यू लग जायेगी। जैसे वहाँ यादगार है काशी कलवट खाने का। स्वयं अपनी इच्छा से कटने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यहाँ भी तैयार हो जायेंगे। आप लोगों को इच्छा पैदा करने की मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। स्वयं अपनी इच्छा से जम्प देने के लिए तैयार हो जायेंगे। यह क्यू लगनी है। अभी नहीं लग रही है। इसका भी कारण है। बच्चों के पास अभी कौन सी क्यू लगी हुई है? जब वह क्यू खत्म हो जायेगी, तब वह क्यू लगेगी। मालूम है अभी कौन सी क्यू लगी हुई है? (संकल्पों की) संकल्पों में भी मुख्य क्या हैं, जो ही पुरुषार्थ में ढीलापन लाती है। व्यर्थ संकल्पों का मूल कारण क्या होता है? पुराने संस्कार किस रूप में आते हैं? एक शब्द बताओ जिसमें व्यर्थ संकल्पों का बीज आ जाये। व्यर्थ संकल्प वा विकल्प जो चलते हैं तो एक ही शब्द बुद्धि में आता है कि यह क्यों हुआ, क्यों से व्यर्थ संकल्पों की क्यू शुरू हो जाती है। अंग्रेजी में भी आप देखेंगे क्यू शब्द की निशानी सभी से टेढ़ी होती है। तो क्यों की क्यू बड़ी लम्बी है। इस क्यू के समाप्ती बाद ही सम्पूर्णता आयेगी। फिर वह क्यू लगेगी। जब क्यों शब्द निकलेगा, फिर ड्रामा की भावी पर एकरस स्थेरियम रहेंगे। तो अभी क्यों के क्यू को खत्म करना है। समझा। एक क्यों शब्द से सेकेण्ड में कितने संकल्प पैदा हो जाते हैं? क्यों से फिर कल्पना करना शुरू हो जाता हैं। तो बाप भी बच्चों से यह जल की लोटी चढ़वाने के लिए आये हैं। कोई भी प्रतिज्ञा करते हैं तो जल को साक्षी रखकर करते हैं। तो अब यह लोटी चढ़ानी है।

मधुबन में विशेष रेस्पान्सीबिल्टी पाण्डव-दल की है। तो उस दल में अब बल होना चाहिए। पाण्डव-दल में बल होगा तो फिर इस पाण्डव भवन के अन्दर आसुरी सम्प्रदाय तो क्या लेकिन आसुरी संकल्प भी नहीं आ सकते। इतना पहरा देना है। वह पहरा देना तो बहुत सहज है। जैसे इस गेट की रखवाली करते हो वैसे माया का जो गेट है, उसकी भी रखवाली करनी है। ऐसे पाण्डव सेना तैयार है जो आसुरी संस्कारों को, आसुरी संकल्पों को भी इस पाण्डव भवन के अन्दर आने न दो? अब पहले अपने अन्दर यह पहरा मजबूत होगा तब पाण्डव भवन में यह मजबूती ला सकते हैं। ऐसा पहरा देते हो? कौन-कौन ऐसी हिम्मत रखते हैं कि हम पाण्डव सेना अपने पाण्डव भवन की ऐसी रखवाली करेंगे। ऐसी रखवाली अगर पाण्डव करते रहें तो फिर यह पाण्डव भवन एक जादू का घर हो जायेगा। जो कैसी भी आत्मा आये, आते ही आसुरी संस्कारों और व्यर्थ संकल्पों से मुक्त हो जायें। ऐसे निर्विकल्प बनाने का जादू का घर हो जायेगा। ऐसी सर्विस जब करेंगे तब प्रत्यक्षता होगी। एक दो से सुनते ही लोग दौड़ेगे। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा वैसे दु:ख अशान्ति भी बढ़ने के कारण हरेक आत्मा सुख चैन की प्यासी होगी। और उसी प्यास में तरसती हुई आत्मायें इस पाण्डव भवन के अन्दर आने से ही एक सेकेण्ड में सुख चैन का अनुभव करेंगी तब प्रभाव निकलेगा। एक-एक चैतन्य मूर्ति के समान दर्शन मूर्त हो जायेंगे। एक एक रत्न का दर्शन करने के लिए दूर दूर से प्यासी आत्मायें आयेंगी। लेकिन जब ऐसा पहरा देना शुरू करेंगे तब। जैसे संगठन का बल है, स्नेह का बल भी है, एक दो को सहयोग देने का बल भी है। अभी सिर्फ एक बल चाहिए, जिसकी कमी होने कारण ही माया की प्रवेशता हो जाती है। वह है सहनशीलता का बल। अगर सहनशीलता का बल हो तो माया कभी वार कर नहीं सकती। तो यह चारों बल चाहिए।

आज बापदादा की जयन्ति के साथ सभी बच्चों की भी तो जयन्ति है। तो इस जयन्ति पर चारों बल अपने में धारण करेंगे तो फिर यह पाण्डव भवन सारी दुनियाँ में देखने और अनुभव करने का विशेष स्थान गिना जायेगा। इस पाण्डव भवन का महत्व सारे विश्व में होगा। महत्व बढ़ाने वाले कौन? पाण्डव सेना और शक्ति सेना। मधुबन निवासी ही मधुबन के महत्व को बढ़ा सकते हैं। पाण्डवों के लिए तो प्रसिद्ध है कि वह कभी भी प्रतिज्ञा से हिलते नहीं थे। एक परसेन्टेज की भी कमी हुई तो इसको कमी ही कहा जायेगा। पाण्डव सेना को एग्जाम्पुल बनना है। जो आप लोगों को देख औरों को भी प्रेरणा मिले। कोई भी मधुबन में आये तो यह विशेषता देखे कि यह सभी इतने अनेक होते हुए भी एक और एक की ही लगन में मगन हैं। और एकरस स्थिति में स्थित हैं। जब ऐसा दृश्य देखेंगे तब प्रत्यक्षता की निशानी देखने में आयेगी। आप सबकी प्रतिज्ञा ही प्रत्यक्षता को लायेगी। तो आज पहले प्रतिज्ञा का जल चढ़ाना है फिर सौगात भी मिलेगी। प्रतिज्ञा की तीन लकीर दिखाते हैं। बेलपत्र भी जो चढ़ाते हैं वह भी तीन पत्तों का होता है। तो आज के दिन तीन प्रतिज्ञा कराई हैं। सहनशीलता का बल अपने में धारण करेंगे, क्यों की क्यू को खत्म करेंगे और आसुरी संस्कारों पर पहरा देना है। तो तीन प्रतिज्ञा का यह बेलपत्र चढ़ाना है। भक्त लोग तो खेल करते हैं लेकिन ज्ञान सहित खेल करना वह तो बच्चे ही जानते हैं। इसलिए आज के शिवरात्रि का यादगार फिर भक्ति में यह रस्म माफिक चलता है। पहले आरम्भ बच्चे ही करते हैं ज्ञान सहित। और फिर भक्त कापी करते हैं अन्धश्रद्धा से। जरूर कभी किया है तब यादगार बना है।

भगवान बच्चों को कहते हैं वन्दे मातरम् कितना फर्क हो गया। इतना नशा रहता है? जिस बाप की अनेक भक्त वन्दना करते हैं, वह स्वयं आकर कहते हैं वन्दे मातरम्। इस खुमारी की निशानी क्या होगी? उनके नयन, उनके मुखड़े, उनकी चलन, बोल आदि से खुशी झलकती रहेगी। जिस खुशी को देख कईयों के दु:ख मिट जायेंगे। ऐसी मातायें जिनको बापदादा स्वयं वन्दना करते हैं, उनकी निशानी है खुशी। चेहरा ही अनेक आत्माओं को हर्षायेगा। अज्ञानी लोग सवेरे उठ कोई ऐसी शक्ल देखते हैं तो कहते हैं सवेरे उनकी शक्ल देखी तब यह प्रभाव पड़ा। तो शक्ल का प्रभाव पड़ता है। तो आप बच्चों का हर्षित चेहरा देख सभी के अन्दर हर्ष आ जायेगा। ऐसा होने वाला है। अच्छा! जितना अपने ऊपर चेकिंग करेंगे उतनी चेन्ज आती जायेगी। संकल्प, कर्म, समय, संस्कार इन चारों के ऊपर चेकिंग करनी है कदम-कदम पर।

अध्याय: जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना

5 मार्च 1970 | अव्यक्त बापदादा | मधुबन

मुख्य विचार: शिव जयन्ति केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि मिलने और अपने को बाप समान बनाने की प्रतिज्ञा करने का दिन है। मुरली में जल चढ़ाने को प्रतिज्ञा का प्रतीक बताते हुए स्वयं में परिवर्तन पर जोर दिया गया है।

1. शिव जयन्ति कैसे मनायें?

बापदादा समझाते हैं कि शिव जयन्ति मनाने का वास्तविक अर्थ केवल मिलना-जुलना या कोई कार्यक्रम करना नहीं है।

दो मुख्य बातें हैं:

  • मिलना — परमात्मा से सच्चा मिलन।

  • बनना — स्वयं को बाप समान बनाने का पुरुषार्थ।

इसलिए—

“मिलना और बनना, यही है मनाना।”

उदाहरण

जैसे किसी महान व्यक्ति के जन्मदिन पर केवल समारोह करने से उसका उद्देश्य पूरा नहीं होता, उसी प्रकार शिव जयन्ति पर केवल दीप जलाना, कार्यक्रम करना या उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं। अपने जीवन में कोई श्रेष्ठ परिवर्तन लाना ही वास्तविक उत्सव है।

मुरली नोट

शिव जयन्ति = मिलन + अपने समान बनाना।


2. जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना

मुरली में जल अथवा दूध चढ़ाने की परम्परा के पीछे प्रतिज्ञा का भाव समझाया गया है।

जब मनुष्य किसी संकल्प या प्रतिज्ञा को दृढ़ता से करता है, तो जल को साक्षी मानकर संकल्प करने की परम्परा रही है।

इसीलिए मुरली का संदेश है कि—

जल केवल एक बाहरी रस्म नहीं, बल्कि भीतर की प्रतिज्ञा का प्रतीक है।

आध्यात्मिक उदाहरण

जब कोई आत्मा ज्ञान में आती है तो पहले संकल्प करती है:

“आज से हम एक शिवबाबा के ही बनकर रहेंगे।”

अर्थात् जीवन की दिशा को परमात्मा के ज्ञान और श्रीमत के अनुसार बदलने की प्रतिज्ञा।


3. प्रतिज्ञा से सम्पूर्ण समर्पण तक

मुरली में केवल प्रतिज्ञा करने की बात नहीं है, बल्कि उस प्रतिज्ञा को जीवन में उतारने की बात है।

पहले:

प्रतिज्ञा → दृढ़ता → समर्पण → सम्पूर्णता

जो स्वयं जितना न्यौछावर होता है, उतना ही दूसरों को भी अपने समान बनाने की प्रेरणा दे सकता है।

उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति दूसरों से कहता है—

“क्रोध नहीं करना चाहिए।”

लेकिन स्वयं छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाता है, तो उसकी बात का प्रभाव कम हो जाता है।

इसके विपरीत, जो स्वयं सहनशीलता का उदाहरण बनता है, उसका जीवन ही दूसरों के लिए शिक्षा बन जाता है।


4. सबसे बड़ी “क्यू” — व्यर्थ संकल्पों की

मुरली में एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है—“क्यों की क्यू”

एक छोटा-सा शब्द:

“क्यों?”

और फिर मन में अनेक संकल्प शुरू हो सकते हैं—

  • ऐसा क्यों हुआ?

  • मेरे साथ ही क्यों?

  • उसने ऐसा क्यों कहा?

  • मुझे ही क्यों करना पड़ा?

  • आगे क्या होगा?

  • अगर ऐसा हो गया तो?

इस प्रकार एक “क्यों” से विचारों की लम्बी कतार लग सकती है। मुरली इसे व्यर्थ संकल्पों की क्यू से जोड़ती है।

अभ्यास

जब मन में आए—

“क्यों हुआ?”

तो तुरंत स्वयं को याद दिलायें:

“ड्रामा की भावी को स्वीकार करना है; व्यर्थ संकल्पों की क्यू को समाप्त करना है।”

यह बात मुरली के मूल संदेश को दैनिक अभ्यास में बदलने का एक उपयोगी तरीका है।


5. पाण्डव भवन का पहरा — बाहर से पहले अन्दर

मुरली में मधुबन के पाण्डव दल की विशेष जिम्मेदारी का उल्लेख है।

जैसे किसी भवन के गेट पर पहरा दिया जाता है, वैसे ही अपने मन-बुद्धि के द्वार पर भी पहरा देना है।

किसका पहरा?

  • आसुरी संस्कारों का

  • आसुरी संकल्पों का

  • व्यर्थ विचारों का

  • कमजोरियों का

मूल शिक्षा यह है कि पहले अपने अन्दर पहरा मजबूत हो, तभी वातावरण पर प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण

घर में कोई व्यक्ति आलोचना करे।

दो विकल्प हैं:

पहला: तुरंत प्रतिक्रिया → क्रोध → बहस → अशान्ति।

दूसरा: पहले मन पर पहरा → विराम → सहनशीलता → शांत उत्तर।

दूसरा विकल्प आंतरिक पहरे का अभ्यास है।


6. चार बल — मुरली का विशेष अभ्यास

मुरली में चार प्रकार के बलों की ओर संकेत किया गया है:

  1. संगठन का बल

  2. स्नेह का बल

  3. एक-दूसरे को सहयोग देने का बल

  4. सहनशीलता का बल

विशेष रूप से सहनशीलता के बल की कमी को माया के प्रवेश से जोड़ा गया है।

जीवन में उदाहरण

किसी ने कठोर शब्द कहे।

  • स्नेह का बल कहता है — व्यक्ति को समझो।

  • सहनशीलता का बल कहता है — तुरंत प्रतिक्रिया मत दो।

  • संगठन का बल कहता है — मिलकर सकारात्मक वातावरण बनाओ।

  • सहयोग का बल कहता है — एक-दूसरे को ऊपर उठाओ।


7. तीन प्रतिज्ञाएँ — बेलपत्र का आध्यात्मिक अर्थ

मुरली में शिवरात्रि के अवसर पर तीन विशेष प्रतिज्ञाओं का भाव बताया गया है:

① सहनशीलता का बल धारण करना

परिस्थितियों में स्थिर रहना और तुरंत प्रतिक्रिया न देना।

② “क्यों” की क्यू समाप्त करना

व्यर्थ प्रश्नों और कल्पनाओं की श्रृंखला को रोकना।

③ आसुरी संस्कारों पर पहरा देना

अपने मन-बुद्धि में नकारात्मक और आसुरी संस्कारों को प्रवेश न देना।

इन्हें तीन पत्तों वाले बेलपत्र के प्रतीक से जोड़ा गया है।

याद रखने का आसान सूत्र

सहनशीलता + क्यों का अंत + संस्कारों पर पहरा = प्रतिज्ञा का बेलपत्र


8. सच्ची प्रत्यक्षता कैसी होगी?

मुरली के अनुसार जब संगठन में स्नेह, सहयोग और शक्ति के साथ आंतरिक पवित्रता एवं स्थिरता दिखाई देगी, तो वातावरण स्वयं प्रभावशाली बनेगा।

ऐसा स्थान आने वाली आत्माओं को शान्ति और सुख का अनुभव कराने वाला बन सकता है।

उदाहरण

किसी व्यक्ति के पास जाकर हमें यह अनुभव हो:

“यहाँ आकर मन शांत हो गया।”

तो उसके लिए उस व्यक्ति की केवल बातें नहीं, बल्कि उसकी स्थिति और व्यवहार प्रभाव का माध्यम बनते हैं।


9. “वन्दे मातरम्” — खुशी ही पहचान

मुरली में माताओं और बच्चों के लिए एक सुंदर संकेत दिया गया है कि परमात्मा जिस आत्मा की वन्दना करते हैं, उसके जीवन में खुशी दिखाई देनी चाहिए।

यह खुशी केवल मुस्कुराने तक सीमित नहीं है।

वह दिखाई दे:

  • नयनों में

  • चेहरे पर

  • वाणी में

  • चलन में

  • व्यवहार में

ऐसा हर्षित चेहरा दूसरों के दुःख को हल्का करने का माध्यम बन सकता है।

आत्म-चेकिंग

प्रतिदिन स्वयं से पूछें:

“मेरे चेहरे को देखकर दूसरे को शान्ति मिलती है या तनाव?”


10. चार चीजों की चेकिंग

मुरली के अंत में विशेष रूप से चेकिंग की बात आती है।

हर कदम पर इन चार चीजों को देखना है:

संकल्प → कर्म → समय → संस्कार

दैनिक स्व-चेकिंग उदाहरण

चेकिंग स्वयं से प्रश्न
संकल्प आज मेरे मन में किस प्रकार के विचार चले?
कर्म मेरे कर्म बाप की शिक्षाओं के अनुरूप थे?
समय आज मेरा समय कहाँ गया?
संस्कार परिस्थिति आने पर मेरा कौन-सा संस्कार सामने आया?

 


11. आज की मुख्य सीख

इस पूरी मुरली का सार एक सरल अभ्यास में रखा जा सकता है:

“जल चढ़ाना” केवल बाहरी रस्म नहीं—अपने जीवन को प्रतिज्ञा के अनुसार ढालना है।

शिव जयन्ति को सार्थक बनाने के लिए:

  • परमात्मा से मिलन का अनुभव करें।

  • स्वयं को बाप समान बनाने का पुरुषार्थ करें।

  • व्यर्थ संकल्पों की “क्यू” को समाप्त करें।

  • सहनशीलता का बल बढ़ायें।

  • अपने मन के द्वार पर पहरा रखें।

  • चेहरे और व्यवहार से खुशी बाँटें।

  • संकल्प, कर्म, समय और संस्कार की चेकिंग करें।


“जल चढ़ाना सिर्फ रस्म नहीं! असली रहस्य क्या है? | शिव जयन्ति पर 3 महान प्रतिज्ञाएँ | 5 मार्च 1970 मुरली”

Thumbnail Text:

जल की लोटी चढ़ाओ…
लेकिन किस चीज़ की? 💧
3 प्रतिज्ञाएँ!

या:

“क्यों” की क्यू खत्म करो!
शिव जयन्ति का असली अर्थ 

प्रश्न 1: शिव जयन्ति वास्तव में कैसे मनानी है?

उत्तर: शिव जयन्ति का वास्तविक अर्थ है परमात्मा से मिलना और अपने को बाप समान बनाना। केवल उत्सव मनाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने जीवन में श्रेष्ठ परिवर्तन लाना ही सच्चा मनाना है।

प्रश्न 2: जल चढ़ाने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर: जल चढ़ाना प्रतिज्ञा करने का प्रतीक है। जैसे भक्त जल को साक्षी रखकर संकल्प करते हैं, वैसे ही ज्ञान में आत्मा परमात्मा के सामने अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रतिज्ञा करती है।

प्रश्न 3: ज्ञान में आने वाली आत्मा की पहली प्रतिज्ञा क्या होनी चाहिए?

उत्तर: मुख्य प्रतिज्ञा है—“हम एक शिवबाबा के ही बनकर रहेंगे।” अर्थात् बुद्धि और जीवन की दिशा परमात्मा की शिक्षाओं के अनुसार रखने का संकल्प।

प्रश्न 4: स्वयं न्यौछावर बनने का क्या महत्व है?

उत्तर: जो स्वयं जितना समर्पित और दृढ़ बनता है, उतना ही दूसरों को भी अपने समान बनने की प्रेरणा दे सकता है। इसलिए पहले स्वयं उदाहरण बनना आवश्यक है।

प्रश्न 5: व्यर्थ संकल्पों की “क्यू” का मुख्य कारण क्या बताया गया है?

उत्तर: मुरली में “क्यों?” को व्यर्थ संकल्पों की शुरुआत से जोड़ा गया है। एक “क्यों” से अनेक कल्पनाएँ और विचार शुरू हो सकते हैं।

प्रश्न 6: “क्यों की क्यू” को कैसे समाप्त करें?

उत्तर: परिस्थितियों को ड्रामा की भावी समझकर स्वीकार करना और व्यर्थ प्रश्नों तथा कल्पनाओं को बढ़ने न देना है। बुद्धि को स्थिर और एकरस बनाने का अभ्यास करना है।

प्रश्न 7: पाण्डव भवन के लिए किस प्रकार का पहरा आवश्यक है?

उत्तर: केवल भवन के बाहरी गेट की रखवाली नहीं, बल्कि आसुरी संस्कारों और व्यर्थ संकल्पों को भीतर प्रवेश न करने देने का पहरा आवश्यक है।

प्रश्न 8: पहले पहरा कहाँ मजबूत करना है?

उत्तर: सबसे पहले अपने अन्दर। जब मन और बुद्धि पर पहरा मजबूत होगा, तभी वातावरण को भी शक्तिशाली और सकारात्मक बनाया जा सकेगा।

प्रश्न 9: मुरली में कौन-कौन से चार बल बताए गए हैं?

उत्तर:

  1. संगठन का बल

  2. स्नेह का बल

  3. एक-दूसरे को सहयोग देने का बल

  4. सहनशीलता का बल

प्रश्न 10: माया के वार से बचने के लिए कौन-सा बल विशेष रूप से आवश्यक बताया गया है?

उत्तर: सहनशीलता का बल। सहनशीलता होने पर परिस्थितियों में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय आत्मिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 11: तीन मुख्य प्रतिज्ञाएँ कौन-सी हैं?

उत्तर:

  • सहनशीलता का बल धारण करना।

  • “क्यों” की क्यू समाप्त करना।

  • आसुरी संस्कारों पर पहरा देना।

प्रश्न 12: तीन प्रतिज्ञाओं को किस प्रतीक से जोड़ा गया है?

उत्तर: इन्हें तीन पत्तों वाले बेलपत्र के प्रतीक से जोड़ा गया है, जिसे शिवरात्रि पर चढ़ाने की परम्परा है।

प्रश्न 13: “वन्दे मातरम्” की खुमारी की निशानी क्या होगी?

उत्तर: आत्मा के नयनों, चेहरे, चलन और बोल से खुशी झलकती रहे। ऐसी हर्षित स्थिति दूसरों को भी खुशी और उत्साह का अनुभव करा सकती है।

प्रश्न 14: अपनी स्थिति की चेकिंग किन चार बातों पर करनी है?

उत्तर:
संकल्प, कर्म, समय और संस्कार—इन चारों की कदम-कदम पर चेकिंग करनी है।

प्रश्न 15: सच्ची प्रत्यक्षता कब दिखाई देगी?

उत्तर: जब प्रतिज्ञाएँ केवल शब्दों तक सीमित न रहकर जीवन की स्थिति, व्यवहार और संस्कारों में दिखाई देंगी, तब प्रत्यक्षता का प्रभाव अनुभव किया जा सकेगा।

प्रश्न 16: इस मुरली का सबसे मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर: प्रतिज्ञा केवल करनी नहीं है, उसे जीवन में धारण करना है। जल चढ़ाने की बाहरी रस्म के पीछे आत्मिक परिवर्तन और दृढ़ संकल्प का भाव समझना है।

आज का संकल्प

“मैं सहनशीलता का बल धारण करूँगा/करूँगी, ‘क्यों’ की व्यर्थ क्यू को समाप्त करूँगा/करूँगी और अपने मन-बुद्धि के द्वार पर आसुरी संस्कारों के प्रति पहरा रखूँगा/रखूँगी।”

Disclaimer: यह वीडियो 5 मार्च 1970 की अव्यक्त मुरली “जल चढ़ाना अर्थात् प्रतिज्ञा करना” के आध्यात्मिक संदेश और मुख्य शिक्षाओं को सरल एवं समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें दिए गए उदाहरण और व्याख्या समझ को सहज बनाने के लिए हैं। मूल मुरली का सम्मान करते हुए दर्शकों से अनुरोध है कि वे आधिकारिक/मूल मुरली पाठ को भी अवश्य पढ़ें। यह वीडियो व्यक्तिगत आध्यात्मिक चिंतन और अध्ययन के लिए है।

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