Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 01-12-2025 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – रोज़ विचार सागर मंथन करो तो खुशी का पारा चढ़ेगा, चलते-फिरते याद रहे कि हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं” | |
| प्रश्नः- | अपनी उन्नति करने का सहज साधन कौन-सा है? |
| उत्तर:- | अपनी उन्नति के लिए रोज़ पोतामेल रखो। चेक करो – आज सारा दिन कोई आसुरी काम तो नहीं किया? जैसे स्टूडेन्ट अपना रजिस्टर रखते हैं, ऐसे तुम बच्चे भी दैवी गुणों का रजिस्टर रखो तो उन्नति होती रहेगी। |
| गीत:- | दूर देश के रहने वाला….. |
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं दूर देश किसको कहा जाता है। दुनिया में एक भी मनुष्य नहीं जानता। भल कितना भी बड़ा विद्वान हो, पण्डित हो इनका अर्थ नहीं समझते। तुम बच्चे समझते हो। बाप, जिसको सब मनुष्यमात्र याद करते हैं कि हे भगवान… वह जरूर ऊपर मूलवतन में है, और किसको भी यह पता नहीं है। इस ड्रामा के राज़ को भी अभी तुम बच्चे समझते हो। शुरू से लेकर अभी तक जो हुआ है, जो होने का है, सब बुद्धि में है। यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, वह बुद्धि में रहना चाहिए ना। तुम बच्चों में भी नम्बरवार समझते हैं। विचार सागर मंथन नहीं करते हैं इसलिए खुशी का पारा भी नहीं चढ़ता है। उठते-बैठते बुद्धि में रहना चाहिए कि हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं। आदि से अन्त तक मुझ आत्मा को सारे सृष्टि के चक्र का मालूम है। भल तुम यहाँ बैठे हो, बुद्धि में मूलवतन याद आता है। वह है स्वीट साइलेन्स होम, निर्वाणधाम, साइलेन्स धाम, जहाँ आत्मायें रहती हैं। तुम बच्चों की बुद्धि में झट आ जाता है, और कोई को पता नहीं। भल कितने भी शास्त्र आदि पढ़ते सुनते रहे, फायदा कुछ भी नहीं। वह सब हैं उतरती कला में। तुम अभी चढ़ रहे हो। वापिस जाने के लिए खुद तैयारी कर रहे हो। यह पुराना कपड़ा छोड़ हमको घर जाना है। खुशी रहती है ना! घर जाने के लिए आधाकल्प भक्ति की है। सीढ़ी नीचे उतरते ही गये। अभी बाबा हमको सहज समझाते हैं। तुम बच्चों को खुशी होनी चाहिए। बाबा भगवान हमको पढ़ाते हैं – यह खुशी बहुत रहनी चाहिए। बाप सम्मुख पढ़ा रहे हैं। बाबा जो सभी का बाप है, वह हमको फिर से पढ़ा रहे हैं। अनेक बार पढ़ाया है। जब तुम चक्र लगाकर पूरा करते हो तो फिर बाप आते हैं। इस समय तुम हो स्वदर्शन चक्रधारी। तुम विष्णुपुरी के देवता बनने के लिए पुरुषार्थ कर रहे हो। दुनिया में और कोई भी यह नॉलेज दे न सके। शिवबाबा हमको पढ़ा रहे हैं, यह खुशी कितनी रहनी चाहिए। बच्चे जानते हैं यह शास्त्र आदि सब भक्ति मार्ग के हैं, यह सद्गति के लिए नहीं। भक्ति मार्ग की सामग्री भी चाहिए ना। अथाह सामग्री है। बाप कहते हैं इससे तुम गिरते आये हो। कितना दर-दर भटकते हैं। अभी तुम शान्त होकर बैठे हो। तुम्हारा धक्का खाना सब छूट गया। जानते हो बाकी थोड़ा समय है, आत्मा को पवित्र बनाने के लिए बाप वही रास्ता बता रहे हैं। कहते हैं मुझे याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे फिर सतोप्रधान दुनिया में आकर राज्य करेंगे। यह रास्ता कल्प-कल्प अनेक बार बाप ने बताया है। फिर अपनी अवस्था को भी देखना है, स्टूडेन्ट पुरुषार्थ कर अपने को होशियार बनाते हैं ना। पढ़ाई का भी रजिस्टर होता है और चलन का भी रजिस्टर होता है। यहाँ तुम्हें भी दैवीगुण धारण करने हैं। रोज़ अपना पोतामेल रखने से बहुत उन्नति होगी – आज सारा दिन कोई आसुरी काम तो नहीं किया? हमको तो देवता बनना है। लक्ष्मी-नारायण का चित्र सामने रखा है। कितना सिम्पुल चित्र है। ऊपर में शिवबाबा है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा यह वर्सा देते हैं तो जरूर संगम पर ब्राह्मण-ब्राह्मणियां होंगे ना। देवतायें होते हैं सतयुग में। ब्राह्मण हैं संगम पर। कलियुग में हैं शूद्र वर्ण वाले। विराट रूप भी बुद्धि में धारण करो। हम अभी हैं ब्राह्मण चोटी, फिर देवता बनेंगे। बाप ब्राह्मणों को पढ़ा रहे हैं देवता बनाने के लिए। तो दैवी गुण भी धारण करने हैं, इतना मीठा बनना है। कोई को दु:ख नहीं देना है। जैसे शरीर निर्वाह के लिए कुछ न कुछ काम किया जाता है, वैसे यहाँ भी यज्ञ सर्विस करनी है। कोई बीमार है, सर्विस नहीं करते हैं तो उनकी फिर सर्विस करनी पड़ती है। समझो कोई बीमार है, शरीर छोड़ देते हैं, तुमको दु:खी होने की वा रोने की बात नहीं। तुमको तो बिल्कुल ही शान्ति में बाबा की याद में रहना है। कोई आवाज़ नहीं। वह तो शमशान में ले जाते हैं तो आवाज़ करते जाते हैं राम नाम संग है। तुमको कुछ भी कहना नहीं है। तुम साइलेन्स से विश्व पर जीत पाते हो। उन्हों की है साइंस, तुम्हारी है साइलेन्स।
तुम बच्चे ज्ञान और विज्ञान का भी यथार्थ अर्थ जानते हो। ज्ञान है समझ और विज्ञान है सब कुछ भूल जाना, ज्ञान से भी परे। तो ज्ञान भी है, विज्ञान भी है। आत्मा जानती है हम शान्तिधाम के रहने वाले हैं फिर ज्ञान भी है। रूप और बसन्त। बाबा भी रूप-बसन्त है ना। रूप भी है और उनमें सारे सृष्टि चक्र का ज्ञान भी है। उन्होंने विज्ञान भवन नाम रखा है। अर्थ कुछ नहीं समझते। तुम बच्चे समझते हो इस समय साइंस से दु:ख भी है तो सुख भी है। वहाँ सुख ही सुख है। यहाँ है अल्पकाल का सुख। बाकी तो दु:ख ही दु:ख है। घर में मनुष्य कितने दु:खी रहते हैं। समझते हैं कहाँ मरें तो इस दु:ख की दुनिया से छूटें। तुम बच्चे तो जानते हो बाबा आया हुआ है हमको स्वर्गवासी बनाने। कितना गद्गद् होना चाहिए। कल्प-कल्प बाबा हमको स्वर्गवासी बनाने आते हैं। तो ऐसे बाप की मत पर चलना चाहिए ना।
बाप कहते हैं – मीठे बच्चे, कभी कोई को दु:ख न दो। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनो। हम भाई-बहन हैं, यह है प्यार का नाता। और कोई दृष्टि जा नहीं सकती। हर एक की बीमारी अपनी-अपनी है, उस अनुसार राय भी देते रहते हैं। पूछते हैं बाबा यह-यह हालत होती है, इस हालत में क्या करें? बाबा समझाते हैं भाई-बहन की दृष्टि खराब नहीं होनी चाहिए। कोई भी झगड़ा न हो। मैं तुम आत्माओं का बाप हूँ ना। शिवबाबा ब्रह्मा तन से बोल रहे हैं। प्रजापिता ब्रह्मा बच्चा हुआ शिवबाबा का, साधारण तन में ही आते हैं ना। विष्णु तो हुआ सतयुग का। बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर नई दुनिया रचने आया हूँ। बाबा पूछते हैं तुम विश्व के महाराजा-महारानी बनेंगे? हाँ बाबा, क्यों नहीं बनेंगे। हाँ, इसमें पवित्र रहना पड़ेगा। यह तो मुश्किल है। अरे, तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं, तुम पवित्र नहीं रह सकते हो? लज्जा नहीं आती है? लौकिक बाप भी समझाते हैं ना – गंदा काम मत करो। इस विकार पर ही विघ्न पड़ते हैं। शुरू से लेकर इस पर हंगामा चलता आया है। बाप कहते हैं – मीठे बच्चों, इस पर जीत पानी है। मैं आया हूँ पवित्र बनाने। तुम बच्चों को राइट-रांग, अच्छा-बुरा सोचने की बुद्धि मिली है। यह लक्ष्मी-नारायण है एम ऑब्जेक्ट। स्वर्गवासियों में दैवीगुण हैं, नर्कवासियों में अवगुण हैं। अभी रावणराज्य है, यह भी कोई समझ नहीं सकते। रावण को हर वर्ष जलाते हैं। दुश्मन है ना। जलाते ही आते हैं। समझते नहीं कि यह है कौन? हम सब रावण राज्य के हैं ना, तो जरूर हम असुर ठहरे। परन्तु अपने को कोई असुर समझते नहीं। बहुत कहते भी हैं यह राक्षस राज्य है। यथा राजा-रानी तथा प्रजा। परन्तु इतनी भी समझ नहीं। बाप बैठ समझाते हैं रामराज्य अलग होता है, रावणराज्य अलग होता है। अभी तुम सर्वगुण सम्पन्न बन रहे हो। बाप कहते हैं मेरे भक्तों को ज्ञान सुनाओ, जो मन्दिरों में जाकर देवताओं की पूजा करते हैं। बाकी ऐसे-ऐसे आदमियों से माथा नहीं मारो। मन्दिरों में तुमको बहुत भक्त मिलेंगे। नब्ज भी देखनी होती है। डॉक्टर लोग देखने से ही झट बता देते हैं कि इनको क्या बीमारी है। देहली में एक अजमलखाँ वैद्य मशहूर था। बाप तो तुमको 21 जन्मों के लिए एवर हेल्दी, वेल्दी बनाते हैं। यहाँ तो हैं ही सब रोगी, अनहेल्दी। वहाँ तो कभी रोग होता नहीं। तुम एवरहेल्दी, एवरवेल्दी बनते हो। तुम अपने योगबल से कर्मेन्द्रियों पर विजय पा लेते हो। तुम्हें यह कर्मेन्द्रियाँ कभी धोखा नहीं दे सकती हैं। बाबा ने समझाया है याद में अच्छी रीति रहो, देही-अभिमानी रहो तो कर्मेन्द्रियाँ धोखा नहीं देंगी। यहाँ ही तुम विकारों पर जीत पाते हो। वहाँ कुदृष्टि होती नहीं। रावण राज्य ही नहीं। वह है ही अहिंसक देवी-देवताओं का धर्म। लड़ाई आदि की कोई बात नहीं। यह लड़ाई भी अन्तिम लगनी है, इनसे स्वर्ग का द्वार खुलना है। फिर कभी लड़ाई लगती ही नहीं। यज्ञ भी यह लास्ट है। फिर आधाकल्प कोई यज्ञ होगा ही नहीं। इसमें सारा किचड़ा स्वाहा हो जाता है। इस यज्ञ से ही विनाश ज्वाला निकली है, सारी सफाई हो जायेगी। फिर तुम बच्चों को साक्षात्कार भी कराया गया है, वहाँ के शूबीरस आदि भी बहुत स्वादिष्ट फर्स्टक्लास चीजें होती हैं। उस राज्य की अभी तुम स्थापना कर रहे हो तो कितनी खुशी होनी चाहिए।
तुम्हारा नाम भी है शिव शक्ति भारत मातायें। शिव से तुम शक्ति लेते हो सिर्फ याद से। धक्के खाने की कोई बात नहीं। वह समझते हैं जो भक्ति नहीं करते हैं वह नास्तिक हैं। तुम कहते हो जो बाप और रचना को नहीं जानते हैं वह नास्तिक हैं, तुम अभी आस्तिक बने हो। त्रिकालदर्शी भी बने हो। तीनों लोकों, तीनों कालों को जान गये हो। इन लक्ष्मी-नारायण को बाप से यह वर्सा मिला है। अभी तुम वह बनते हो। यह सब बातें बाप ही समझाते हैं। शिवबाबा खुद कहते हैं कि मैं इनमें प्रवेश कर समझाता हूँ। नहीं तो मैं निराकार कैसे समझाऊं। प्रेरणा से पढ़ाई होती है क्या? पढ़ाने लिए तो मुख चाहिए ना। गऊ मुख तो यह है ना। यह बड़ी मम्मा है ना, ह्युमन माता है। बाप कहते हैं मैं इन द्वारा तुम बच्चों को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाता हूँ, युक्ति बतलाता हूँ। इसमें आशीर्वाद की कोई बात नहीं। डायरेक्शन पर चलना है। श्रीमत मिलती है। कृपा की बात नहीं। कहते हैं – बाबा घड़ी-घड़ी भूल जाता है, कृपा करो। अरे, यह तो तुम्हारा काम है याद करना। मैं क्या कृपा करूँगा। हमारे लिए तो सब बच्चे हैं। कृपा करूँ तो सभी तख्त पर बैठ जाएं। पद तो पढ़ाई अनुसार पायेंगे। पढ़ना तो तुमको है ना। पुरुषार्थ करते रहो। मोस्ट बील्वेड बाप को याद करना है। पतित आत्मा वापिस जा न सके। बाप कहते हैं जितना तुम याद करेंगे तो याद करते-करते पावन बन जायेंगे। पावन आत्मा यहाँ रह नहीं सकेगी। पवित्र बने तो शरीर नया चाहिए। पवित्र आत्मा को शरीर इमप्योर मिले, यह लॉ नहीं। संन्यासी भी विकार से जन्म लेते हैं ना। यह देवतायें विकार से जन्म नहीं लेते, जो फिर संन्यास करना पड़े। यह तो ऊंच ठहरे ना। सच्चे-सच्चे महात्मा यह हैं जो सदैव सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। वहाँ रावण राज्य है नहीं। है ही सतोप्रधान रामराज्य। वास्तव में राम भी कहना नहीं चाहिए। शिवबाबा है ना। इसको कहा जाता है राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र वा शिव एक ही है। श्रीकृष्ण का तो नाम नहीं है। शिवबाबा आकर ज्ञान सुनाते हैं वह फिर रूद्र यज्ञ रचते हैं तो मिट्टी का लिंग और सालिग्राम बनाते हैं। पूजा कर फिर तोड़ देते हैं। जैसे बाबा देवियों का मिसाल बताते हैं। देवियों को सजाकर खिलाए पिलाए पूजा कर फिर डुबो देते हैं। वैसे शिवबाबा और सालिग्रामों की बड़े प्रेम और शुद्धि से पूजा कर फिर खलास कर देते हैं। यह है सारा भक्ति का विस्तार। अभी बाप बच्चों को समझाते हैं – जितना बाप की याद में रहेंगे उतना खुशी में रहेंगे। रात्रि को रोज़ अपना पोतामेल देखना चाहिए। कुछ भूल तो नहीं की? अपना कान पकड़ लेना चाहिए – बाबा आज हमसे यह भूल हुई, क्षमा करना। बाबा कहते हैं सच लिखेंगे तो आधा पाप कट जायेगा। बाप तो बैठा है ना। अपना कल्याण करना चाहते हो तो श्रीमत पर चलो। पोतामेल रखने से बहुत उन्नति होगी। खर्चा तो कुछ है नहीं। ऊंच पद पाना है तो मन्सा-वाचा-कर्मणा कोई को भी दु:ख नहीं देना है। कोई कुछ कहता है तो सुना-अनसुना कर देना है। यह मेहनत करनी है। बाप आते ही हैं तुम बच्चों का दु:ख दूर कर सदा के लिए सुख देने। तो बच्चों को भी ऐसा बनना है। मन्दिरों में सबसे अच्छी सर्विस होगी। वहाँ रिलीज़स माइन्डेड तुमको बहुत मिलेंगे। प्रदर्शनी में बहुत आते हैं। प्रोजेक्टर से भी प्रदर्शनी मेले में सर्विस अच्छी होती है। मेले में खर्चा होता है तो जरूर फायदा भी है ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप ने राइट-रांग को समझने की बुद्धि दी है, उसी बुद्धि के आधार पर दैवीगुण धारण करने हैं, किसी को दु:ख नहीं देना है, आपस में भाई-बहन का सच्चा प्यार हो, कभी कुदृष्टि न जाए।
2) बाप के हर डायरेक्शन पर चल अच्छी तरह पढ़कर अपने आप पर आपेही कृपा करनी है। अपनी उन्नति के लिए पोतामेल रखना है, कोई दु:ख देने वाली बातें करता है तो सुनी-अनसुनी कर देना है।
| वरदान:- | ईश्वरीय रॉयल्टी के संस्कार द्वारा हर एक की विशेषताओं का वर्णन करने वाले पुण्य आत्मा भव सदा स्वयं को विशेष आत्मा समझ हर संकल्प वा कर्म करना और हर एक में विशेषता देखना, वर्णन करना, सर्व के प्रति विशेष बनाने की शुभ कल्याण की कामना रखना – यही ईश्वरीय रॉयल्टी है। रॉयल आत्मायें दूसरे द्वारा छोड़ने वाली चीज़ को स्वयं में धारण नहीं कर सकती इसलिए सदा अटेन्शन रहे कि किसी की कमजोरी वा अवगुण को देखने का नेत्र सदा बंद हो। एक दो के गुण गान करो, स्नेह, सहयोग के पुष्पों की लेन-देन करो – तो पुण्य आत्मा बन जायेंगे। |
| स्लोगन:- | वरदान की शक्ति परिस्थिति रूपी आग को भी पानी बना देती है। |
अव्यक्त इशारे – अब सम्पन्न वा कर्मातीत बनने की धुन लगाओ
निराकारी स्वरूप की मुख्य शिक्षा का वरदान है “कर्मातीत भव”। आकारी स्वरूप अथवा फरिश्तेपन का वरदान है डबल-लाइट भव! डबल लाइट अर्थात् सर्व कर्म-बन्धनों से हल्के और लाइट अर्थात् सदा प्रकाश-स्वरूप में स्थित रहने वाले। ऐसे डबल लाइट रहने वाले सहज कर्मातीत स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। तो सेवाओं में आते अभी यह धुन लगाओ कि मुझे सम्पन्न वा कर्मातीत बनना ही है।
प्रश्न 1: अपनी उन्नति करने का सहज साधन कौन-सा है?
उत्तर: अपनी उन्नति के लिए रोज़ पोतामेल रखना है। चेक करें कि पूरे दिन कोई आसुरी काम या दु:ख देने वाला संकल्प तो नहीं किया। जैसे स्टूडेन्ट अपना रजिस्टर रखते हैं, वैसे ही दैवी गुणों का रजिस्टर रखने से निरंतर उन्नति होती है।
प्रश्न 2: खुशी का पारा क्यों नहीं चढ़ता?
उत्तर: खुशी का पारा इसलिए नहीं चढ़ता क्योंकि बच्चे विचार सागर मंथन नहीं करते। जब बुद्धि में बार-बार याद रहे कि “हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं”, तब स्वयम् खुशी की अनुभूति होती है।
प्रश्न 3: ‘दूर देश का रहने वाला’ किसे कहा जाता है?
उत्तर: ‘दूर देश’ अर्थात् मूलवतन, जहाँ निराकार शिवबाबा रहते हैं। दुनिया में कोई भी इस सत्य को नहीं जानता, परन्तु बाबा अपने रूहानी बच्चों को यह पहचान कराते हैं।
प्रश्न 4: आत्मा को सतोप्रधान कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर: बाबा कहते हैं—मुझे याद करो। याद की शक्ति से तमोप्रधान आत्मा सतोप्रधान बन जाती है, और फिर सतोप्रधान दुनिया (स्वर्ग) में राज्य करती है।
प्रश्न 5: देवता बनने के लिए पहला कदम कौन-सा है?
उत्तर: पहला कदम है—दैवी गुण धारण करना, बहुत मीठा बनना और किसी को भी दु:ख न देना। रजिस्टर साफ़ होगा तो देवत्व की मंज़िल प्राप्त होगी।
प्रश्न 6: गर्हस्थ जीवन में पवित्र रहने का क्या कारण है?
उत्तर: पवित्रता ही विश्व-राज्य का आधार है। बाबा कहते हैं—“क्या विश्व का मालिक बनना है?” तो पवित्रता अनिवार्य है। पवित्र आत्मा ही ऊँचे पद की अधिकारी बनती है।
प्रश्न 7: कौन-सी लड़ाई ‘आखिरी’ है और क्यों?
उत्तर: यह अन्तिम लड़ाई है—रावणराज्य की समाप्ति और स्वर्ग की स्थापना के समय की। इसी लड़ाई से स्वर्ग का द्वार खुलता है। इसके बाद आधाकल्प कोई लड़ाई नहीं होती।
प्रश्न 8: साइंस और साइलेन्स में क्या अंतर है?
उत्तर: साइंस से सुविधा भी है और दु:ख भी। परंतु साइलेन्स से आत्मा विश्व पर जीत पाती है, शक्तिशाली बनती है, और बाबा की याद में उड़ान अनुभव करती है।
प्रश्न 9: मनुष्य संसार को ‘रावणराज्य’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि यहाँ विकारों का राज्य है, सर्वत्र दु:ख है, और मनुष्य अवगुणों से भरे हुए हैं। जबकि रामराज्य—अर्थात् शिवबाबा की दुनिया—अहिंसा, पवित्रता और दैवी गुणों से भरी है।
प्रश्न 10: बाबा की कृपा से पद नहीं मिलता—ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि पद कृपा से नहीं, पुरुषार्थ से मिलता है। बाबा कहते हैं—“मैं कृपा करूँ तो सब तख़्त पर बैठ जाएँ। पद पढ़ाई अनुसार मिलता है।”
प्रश्न 11: पोतामेल रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
-
आधा पाप समाप्त हो जाता है।
-
आत्मा सतर्क बनती है।
-
दैवी गुण बढ़ते हैं।
-
उन्नति का रास्ता साफ़ होता है।
-
पढ़ाई में मन टिकता है।
प्रश्न 12: ज्ञान और विज्ञान का यथार्थ अर्थ क्या है?
उत्तर:
-
ज्ञान = समझ
-
विज्ञान = सब कुछ भूल देही-अभिमानी स्थिति में टिक जाना, ज्ञान से भी परे अनुभव।
प्रश्न 13: देवताओं की पूजा कर फिर मूर्तियाँ क्यों तोड़ दी जाती हैं?
उत्तर: यह भक्ति मार्ग का विस्तार है—पूजा की, पवित्रता अनुभव की, फिर मूर्ति विसर्जित कर दी। इसका ज्ञान अर्थ मनुष्य नहीं जानते; परंतु बाबा बच्चों को राज़ स्पष्ट बताते हैं।
प्रश्न 14: बापदादा हमें सबसे बड़ा कौन-सा वर्सा देते हैं?
उत्तर:
-
शान्ति
-
पवित्रता
-
सुख
-
और 21 जन्मों का विश्व-विरासत—लक्ष्मी-नारायण समान राज्य।
प्रश्न 15: कुदृष्टि से कैसे बचें?
उत्तर: “हम भाई-बहन आत्माएँ हैं।” यह दृष्टिकोण पक्का करने से कुदृष्टि जाती रहती है। यह प्रेम का सच्चा पवित्र नाता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer):इस वीडियो का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मकल्याण है। यह ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान की आधिकारिक मुरली नहीं है, बल्कि आज की मुरली पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन, समझ एवं सेवा के लिए तैयार किया गया प्रस्तुतीकरण है। सभी अधिकार ब्रह्माकुमारीज़, पाण्डव भवन – मधुबन के हैं।
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