MURLI 22-09-2026 |BRAHMA KUMARIS

Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

22-09-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम सेन्सीबुल बने हो तो कमाई का बहुत-बहुत शौक रहना चाहिए। धन्धे आदि से भी समय निकाल बाप को याद करो तो कमाई होती रहेगी”
प्रश्नः- तुम बच्चों को अभी कौन सी ऐसी श्रीमत मिलती है, जो कभी नहीं मिली?
उत्तर:- 1- तुम्हें इस समय बाप श्रीमत देते हैं – मीठे बच्चे, सवेरे-सवेरे उठकर बाप की याद में बैठो तो पूरा वर्सा मिलेगा। 2- गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो, ऐसी श्रीमत दूसरे सतसंगों में कभी मिल नहीं सकती। उन सतसंगों में बाप और वर्से की बात नहीं।
गीत:- तुम्हीं हो माता पिता……

ओम् शान्ति। इस भारत में खास और सारी दुनिया में आम अनेक प्रकार के सतसंग होते हैं। ऐसे कोई भी सतसंग या चर्च या मन्दिर नहीं होंगे जहाँ मनुष्यों की बुद्धि में हो कि हम यह वर्सा पा रहे हैं। यहाँ तुम बच्चे बैठे हो, सभी सेन्टर्स में अपने बेहद बाप की याद में बैठे हैं – इस विचार से कि हम अपने बाप से सुखधाम का वर्सा पा रहे हैं। ऐसे और कोई सतसंग वा चर्च आदि में नहीं समझेंगे। तुम बच्चों की बुद्धि में ही है। तुम बच्चे जानते हो कि हम बेहद के बाप की याद में बैठे हैं। नई दुनिया स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। सब बच्चे एक बाप से वर्सा ले रहे हैं। इतने ढेर बच्चे वृद्धि को पाते रहते हैं। सबको श्रीमत मिलती है, सवेरे उठकर बाप को याद करो। हम बाबा से यह वर्सा लेने वाले हैं। हम उस बाप के बने हैं। आत्मा को अब पहचान मिली है बाप से। बाप डायरेक्शन देते हैं मुझे याद करो और गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहो। सबको यहाँ आकर बैठना तो नहीं है। स्कूल में पढ़कर फिर अपने-अपने घर चले जाते हैं। हर एक बच्ची-बच्चा अपने टीचर से वर्सा पा सकता है। यह भी ऐसे ही है। रोज़ पढ़कर फिर घर में जाकर भल धन्धा आदि करो। तुम गृहस्थ व्यवहार में भी हो और फिर स्टूडेन्ट भी हो। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहना है। ऐसे कोई संन्यासी आदि नहीं कहते। यहाँ तुम प्रैक्टिकल में बैठे हो। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनते हो। पवित्र बनकर परमपिता परमात्मा को दूसरे कोई याद नहीं करते हैं। भल गीता सुनते हैं, पढ़ते हैं परन्तु याद तो नहीं करते हैं ना। कथनी और करनी में फ़र्क है। तुम जानते हो हमारा बाप नॉलेजफुल है, उसमें सारे ड्रामा चक्र की नॉलेज है। अभी हमको भी नॉलेज मिल रही है। यह चक्र बड़ा अच्छा है। यह पुरुषोत्तम युग होने के कारण तुम्हारा यह जन्म भी पुरुषोत्तम है। एक्स्ट्रा मास होता है ना।

तुम बच्चे जानते हो कि हम बरोबर बाप से पुरुषोत्तम बन रहे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम, हम फिर से बन रहे हैं। फिर 84 का चक्र खाया, यह बुद्धि में ज्ञान है। और कोई सतसंग में यह नहीं समझाते हैं। तुम समझते हो हमको यह बनना है। बनाने वाला एक ही बाप है। इन लक्ष्मी-नारायण के चित्र पर तुम अच्छी रीति समझा सकते हो। बरोबर ब्रह्मा द्वारा योगबल से इन्होंने यह पद पाया है। ऐसे बुद्धि में इमर्ज करना चाहिए। ब्रह्मा-सरस्वती, लक्ष्मी-नारायण के दो रूप भी दिखाये हैं। ब्रह्मा-सरस्वती फिर प्रजा भी दिखानी पड़े। हर एक बात पर अच्छी रीति विचार करना चाहिए। बाप कहते हैं – मुझे याद करो। ब्रह्मा को भी कहते हैं मुझे याद करो तो यह बनेंगे। गोया ब्रह्मा मुख वंशावली सबको कहा मुझे याद करो। कैसे याद करना है, यह भी बुद्धि में है। चित्र भी सामने रखे हैं। इन पर समझाना बड़ा सहज है। बाप का परिचय देना है। प्रदर्शनी में भी इस पर समझाओ। यह निश्चय बैठता है कि बरोबर यह सबका बेहद का बाप है। इस हिसाब से हमें बेहद का वर्सा मिलना चाहिए। हम निराकारी आत्मायें तो भाई-भाई हैं। जब साकार में आयें तो भाई बहिन बनें, तब पढ़ सकें। भाई-बहिन बनेंगे ही ब्रह्मा के बच्चे। वर्सा बाप से मिलता है। यह बुद्धि में बिठाना है। कोई को भी समझाओ। पहले बाप का परिचय दो। हम ब्रदरहुड हैं, सर्वव्यापी कहने से फादरहुड हो जाता है। फादरहुड को वर्सा कहाँ से मिलेगा। फादर-फादर कहते गिरते आये हैं। वर्सा कुछ भी नहीं। अभी ब्रदर-हुड समझने से ही वर्सा मिलेगा। तो उस पर अच्छी रीति समझाने से बुद्धि में जो अष्ट देवतायें आदि बैठे हुए हैं, वह सब निकल जायेंगे। बोलो दो बाप हैं। रूहानी बाप जिससे सर्व की सद्गति होनी है, वही सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं। सब सुखी हो जाते हैं। उनको कहा जाता है हेविनली गॉड फादर, स्वर्ग रचने वाला। पहले बाप का प्रभाव बुद्धि में बिठाना चाहिए। यह है आत्माओं का बेहद का बाप। उनको ही पतित-पावन कहते हैं। तुम आत्मा परमपिता परमात्मा के बच्चे हो। यह निश्चय पक्का करो। मूल बात पहले यह बुद्धि में बिठानी है। यह समझें तब खुशी का पारा चढ़े और कहें कि हम बाप को याद जरूर करेंगे। हमको निश्चय होता है, हम बाप को याद कर विश्व का मालिक बनेंगे। यह खुशी बहुत रहेगी। समझदार होगा और बुद्धि में पूरा निश्चय होगा तो कहेगा ऐसा बेहद का बाप जो दादा में आता है, पहले तो उनसे मिलें। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ही हमसे बात कर सकेंगे। तुम आत्मा तो उनसे मिली नहीं हो तो याद कैसे करेंगे। बच्चे एडाप्ट हों तो याद पड़े। एडाप्ट ही नहीं होंगे तो याद कैसे पड़ेगा। पहले उनके बनो। ऐसे बाप के साथ तो झट मिलना चाहिए। बाप भी यही पूछेंगे तुम अपने को आत्मा समझते हो? मैं तुम आत्माओं का बाप हूँ। शिव-बाबा तुमसे बात कर रहे हैं। मेरी आत्मा का बाप सो तुम्हारा भी बाप है। वह पूछते हैं तुमको निश्चय है कि सब आत्माओं का बाप बरोबर एक ही है। वही वर्सा देंगे। पवित्र भी बनना है। सिवाए उनके और सब भूल जाना है।

तुम आत्मा घर से नंगी (अशरीरी) आई थी ना। कोई भी देह, सम्बन्ध नहीं था। आत्मा जब शरीर में प्रवेश करे, बड़ी हो तब उनको समझाया जाता है कि यह तुम्हारा बाबा है, यह फलाना है। आत्मा तो सब सम्बन्धों से न्यारी है। आत्मा चली जाती है तो कहा जाता है – आप मुये मर गई दुनिया। बन्धन रहित हो जाती है। जब तक दूसरा शरीर मिले। माता के गर्भ में जाकर बाहर निकले, समझदार हो फिर है सम्बन्ध की बात। तो यहाँ भी तुम बच्चों को समझाना है। जीते जी सब कुछ भूल जाना है। एक बाप को याद करना – यह है अव्यभिचारी याद। इसको ही योग कहा जाता है। यहाँ तो मनुष्यों को अनेकों की याद रहती है। तुम्हारी है अव्यभिचारी याद। आत्मा जानती है कि यह सब शरीर के सम्बन्ध खत्म हो जाने हैं। हमारा सम्बन्ध एक बाप के साथ है, बाप को जितना याद करेंगे, विकर्म विनाश होंगे। ऐसे भी नहीं कि मित्र-सम्बन्धियों को याद करने से कोई विकर्म बनेंगे। नहीं, विकर्म तब बनेंगे जब ऐसा कोई रांग कर्म करेंगे। बाकी और कोई को याद करने से विकर्म नहीं बनेंगे, हाँ, टाइम वेस्ट जरूर होगा। एक बाप को याद करने से विकर्म विनाश होते हैं। यह युक्ति है पाप कटने की। बाकी सम्बन्ध आदि तो याद रहते हैं। शरीर निर्वाह अर्थ धन्धा आदि सब करो परन्तु जितना टाइम मिले बाप को याद करते रहो, तो खाद निकल जाए। मूल बात है यह। अन्दर में ही विचार करो कि पतित से पावन कैसे बनें। बाप को याद करना पड़े। गृहस्थ व्यवहार में रहना है। संन्यासी लोग भी शरीर छोड़ फिर गृहस्थियों के पास जाकर जन्म लेते हैं। ऐसे तो नहीं जन्म-जन्मान्तर के लिए पावन बन जाते हैं। वाइसलेस वर्ल्ड तो अभी कोई है नहीं। यह है विशश वर्ल्ड। इनसे कोई निकल नहीं सकते। विशश वर्ल्ड में रहने के कारण कुछ न कुछ खामी जरूर है। बाकी दुनिया तो हैं ही दो। विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड, पावन दुनिया में देवतायें रहते थे तो समझाने में बहुत सहज होगा। इस पतित दुनिया का अभी विनाश होना है। विनाश होने के पहले बेहद बाप से वर्सा लेना है। बाबा कहते हैं – देह के सम्बन्ध छोड़ अपने को आत्मा निश्चय करो और बाप को याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे। बाप कहते हैं – तुम मुझे पतित-पावन कहते हो ना। गंगा में डुबकी लगाने वाले तो बहुत हैं। ऐसे थोड़ेही कि पावन बन जायेंगे। प्रदर्शनी में समझाना बहुत अच्छी तरह पड़ता है। प्रजापिता तो यहाँ ही चाहिए। नीचे यह ब्रह्मा और ब्रह्माकुमार-कुमारियां तपस्या कर रहे हैं। तो यह बात अच्छी रीति समझानी चाहिए। किसको भी हड्डी (जिगरी) समझाना है। बित-बित करने से बदनाम कर देंगे। अगर देखो हम कहाँ मूँझते हैं तो कहो अच्छा थोड़ा ठहरो हम दूसरी बहन को भेजते हैं। एक-दो से तीखे होते हैं ना। प्रदर्शनी मेले में जांच करनी चाहिए कि ठीक समझाते हैं। कोई डिबेट तो नहीं करते हैं। गेट पर भी पहचान वाला चाहिए। अनेक प्रकार के आते हैं ना। बड़े आदमी को जरूर रिगार्ड देंगे। फ़र्क तो जरूर रहेगा। इसमें यह नहीं आना चाहिए कि इन पर प्यार है, इन पर नहीं है। द्वैत दृष्टि है, नहीं। इनको द्वैत नहीं कहा जाता है। समझते हैं यहाँ बड़े आदमी की खातिरी की जाती है। सर्विसएबुल की खातिरी करेंगे ना। कोई ने मकान बनवाकर दिया है तो उनकी खातिरी तो जरूर करेंगे ना। तुम्हारे लिए ही तो मकान बने हैं ना। जो मेहनत कर राजा बनते हैं तो प्रजा ऑटोमेटिकली खातिरी करेगी ना। कम दर्जे वाले से, ऊंच दर्जे वाले की खातिरी तो होगी ना। बेहद के बाप की सारी दुनिया की आत्मायें बच्चे हैं। परन्तु जन्म लिया है भारत में। भारतवासी जो पहले ऊंच थे, अब नीच बन गये। तो बाप कहते हैं मैं आया हूँ पढ़ाने। मैं भारत में आता हूँ तो सबका कल्याण हो जाता है। इनपर्टीकुलर, इनजनरल तो होता है ना। अभी भारत ही नर्क है फिर स्वर्ग बनना है। तो भारत में ही तो जायेंगे ना और जगह जाकर क्या करेंगे। भारत में ही भक्ति मार्ग में पहले-पहले सोमनाथ का बड़ा आलीशान मन्दिर बनाया था। जैसे चर्च बड़े ते बड़ी विलायत में बनायेंगे क्योंकि पोप की ली हुई राजाई है। सब चर्च एक जैसी नहीं होती हैं। नम्बरवार तो होगी ना। सोमनाथ का मन्दिर कितना हीरे-जवाहरों से भरपूर था, मुसलमान आदि लूटकर ले गये। बहुत धनवान थे। चर्च से क्या लूट सकेंगे। मनुष्य धन के पिछाड़ी पड़ते हैं ना। मुहम्मद गजनवी कितना ले गया। फिर अंग्रेज आये, वह भी यहाँ से धन भेजते गये। बहुत धन ले गये। अब वह तुमको वापिस मिल रहा है, करोड़ों रुपया देते हैं। यह सब आइवेल (समय आने पर) मिल रहा है। हिसाब न मिले तो आइवेल कैसे चले।

बाप समझाते हैं यह ड्रामा कैसे बना हुआ है। यह लेन-देन का हिसाब कैसा है। फिर भी तुम बच्चों को अब स्वर्ग का मालिक बनना है। यह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है, वह भी बच्चों को समझाया है। फिर भी कहते हैं बच्चे मनमनाभव। यह सब फिर रिपीट होगा। हर चीज़ सतो से तमोप्रधान बन जायेगी। दिन में धन्धा-धोरी आदि करते हो, वह टाइम छोड़ो। बाकी जितना टाइम मिले मुझे याद करो। धन्धे आदि में भी कभी-कभी टाइम मिलता है। कइयों की ऐसी सर्विस रहती है, सिर्फ सही की, खलास। ऐसे भी बहुत फ्री रहते हैं। फिर भी रात तो अपनी है। दिन में शरीर निर्वाह के लिए कमाई करते हो, रात को फिर यह कमाई करो। यह है भविष्य 21 जन्मों के लिए। कहा जाता है एक घड़ी, आधी घड़ी – जितना हो सके बाप की याद में रहो तो तुम्हारी बहुत कमाई होगी। सेन्सीबुल जो होगा वह समझेगा कि बरोबर बहुत कमाई कर सकते हैं। कोई-कोई चार्ट भी लिखते हैं – हमने इतना समय याद किया। अज्ञान काल में कोई अपनी दिनचर्या लिखते हैं। तुम भी चार्ट लिखेंगे तो अटेन्शन रहेगा। कोई टाइम वेस्ट तो नहीं होता है! कोई विकर्म तो नहीं किया! अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) किसी भी देहधारीं को याद कर अपना टाइम वेस्ट नहीं करना है। ऐसा कोई रांग कर्म न हो जो विकर्म बन जाए।

2) जीते जी सब कुछ भूल एक बाप को याद करना है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। साथ-साथ सेन्सीबुल बन रात में भी जागकर यह अविनाशी कमाई करनी है। याद का चार्ट रखना है।

वरदान:- सम्पूर्ण स्टेज और स्टेटस की स्मृति से सदा ऊंच कर्तव्य करने वाले बाप समान भव
सदैव यह स्मृति में रहे कि मैं हर समय, हर सेकण्ड, हर कर्म करते हुए स्टेज पर हूँ तो हर कर्म पर अटेन्शन रहने से सम्पूर्ण स्टेज के नजदीक आ जायेंगे। साथ-साथ वर्तमान और भविष्य स्टेटस की स्मृति रहने से हर कर्म श्रेष्ठ होगा। यही दो स्मृतियां बाप समान बना देंगी। समानता में आने से एक दो के मन के संकल्पों को सहज ही कैच कर लेंगे। इसके लिए सिर्फ संकल्पों पर कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए। अपने संकल्पों की मिक्सचर्टी न हो।
स्लोगन:- ईर्ष्या और अप्राप्ति का कारण इच्छायें हैं, जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ प्रसन्नता है।

 

ये अव्यक्त इशारे – अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

हर सेकेण्ड, हर संकल्प चेक करो कुछ दिया? लिया तो नहीं? देते जाओ। लेना है बाप से, वह तो ले ही लिया, अब देना है। जितना-जितना देने में बिज़ी होंगे तो कोई भी बातें क्रास करना मुश्किल नहीं लगेगा। सब बातें बहुत सहज हो जायेंगी क्योंकि महादानी बनने से महान् शक्ति की प्राप्ति स्वत: होती है।

प्रश्न 1

प्रश्न: बच्चों को अभी कौन-सी ऐसी श्रीमत मिलती है जो कभी नहीं मिली?
उत्तर: सवेरे-सवेरे उठकर बाप की याद में बैठो तो पूरा वर्सा मिलेगा और गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहो। ऐसी श्रीमत दूसरे सतसंगों में नहीं मिलती।

प्रश्न 2

प्रश्न: सभी बच्चे किस विचार से बाप की याद में बैठे हैं?
उत्तर: हम बेहद के बाप से सुखधाम और नई दुनिया स्वर्ग का वर्सा प्राप्त कर रहे हैं।

प्रश्न 3

प्रश्न: बाप बच्चों को गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए क्या बनने की श्रीमत देते हैं?
उत्तर: गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र बनने की।

प्रश्न 4

प्रश्न: बाप को याद करने के साथ-साथ शरीर निर्वाह के लिए क्या करना है?
उत्तर: धन्धा आदि करके शरीर निर्वाह करना है और जितना समय मिले बाप को याद करना है।

प्रश्न 5

प्रश्न: बाप को नॉलेजफुल क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि बाप के पास सारे ड्रामा चक्र की सम्पूर्ण नॉलेज है और वही नॉलेज बच्चों को देते हैं।

प्रश्न 6

प्रश्न: बच्चे बाप से क्या बन रहे हैं?
उत्तर: बच्चे बाप से पुरुषोत्तम बन रहे हैं और फिर से मर्यादा पुरुषोत्तम बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं।

प्रश्न 7

प्रश्न: लक्ष्मी-नारायण ने यह पद किस आधार पर प्राप्त किया?
उत्तर: ब्रह्मा द्वारा योगबल से उन्होंने यह पद प्राप्त किया।

प्रश्न 8

प्रश्न: सबसे पहले किसी को क्या समझाना चाहिए?
उत्तर: सबसे पहले बेहद के बाप का परिचय देना चाहिए और यह निश्चय कराना चाहिए कि परमपिता परमात्मा ही सभी आत्माओं के एक बाप हैं।

प्रश्न 9

प्रश्न: निराकारी रूप में आत्माओं का आपस में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर: निराकारी रूप में सभी आत्माएँ भाई-भाई हैं।

प्रश्न 10

प्रश्न: साकार में आने पर आत्माओं का सम्बन्ध क्या बनता है?
उत्तर: साकार में आने पर भाई-बहिन का सम्बन्ध बनता है, क्योंकि वे ब्रह्मा के बच्चे हैं।

प्रश्न 11

प्रश्न: वर्सा किससे मिलता है?
उत्तर: वर्सा एक बाप से मिलता है।

प्रश्न 12

प्रश्न: परमपिता परमात्मा को किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर: उन्हें बेहद का बाप, हेविनली गॉड फादर और पतित-पावन कहा जाता है।

प्रश्न 13

प्रश्न: बाप को याद करने के लिए सबसे पहले क्या निश्चय पक्का करना है?
उत्तर: यह निश्चय पक्का करना है कि मैं आत्मा हूँ और परमपिता परमात्मा मेरा बाप है।

प्रश्न 14

प्रश्न: अव्यभिचारी याद किसे कहा जाता है?
उत्तर: जीते जी सब कुछ भूलकर एक बाप को याद करना ही अव्यभिचारी याद है।

प्रश्न 15

प्रश्न: बाप को याद करने से क्या होता है?
उत्तर: बाप को याद करने से विकर्म विनाश होते हैं और आत्मा पावन बनती है।

प्रश्न 16

प्रश्न: मित्र-सम्बन्धियों को याद करने से क्या होता है?
उत्तर: केवल किसी को याद करने से विकर्म नहीं बनते, लेकिन समय व्यर्थ हो सकता है। विकर्म तब बनते हैं जब कोई गलत कर्म किया जाता है।

प्रश्न 17

प्रश्न: वर्तमान दुनिया को मुरली में किस रूप में बताया गया है?
उत्तर: वर्तमान दुनिया को विशश वर्ल्ड अर्थात् विकारी दुनिया कहा गया है।

प्रश्न 18

प्रश्न: पावन दुनिया में कौन रहते थे?
उत्तर: पावन दुनिया में देवताएँ रहते थे।

प्रश्न 19

प्रश्न: प्रदर्शनी में समझाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: अच्छी रीति से, प्रेमपूर्वक और स्पष्टता से समझाना चाहिए। डिबेट या तीखेपन से बचना चाहिए और आवश्यकता होने पर दूसरी बहन को समझाने के लिए बुलाना चाहिए।

प्रश्न 20

प्रश्न: याद का चार्ट लिखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: याद का चार्ट लिखने से अटेन्शन रहता है और पता चलता है कि कितना समय बाप की याद में रहा तथा कोई समय व्यर्थ तो नहीं किया।

प्रश्न 21

प्रश्न: दिन में धन्धा-धोरी करने के बाद किस कमाई पर ध्यान देना है?
उत्तर: रात में और जितना भी समय मिले, बाप की याद की अविनाशी कमाई करनी है।

प्रश्न 22

प्रश्न: यह अविनाशी कमाई किसके लिए है?
उत्तर: यह भविष्य के 21 जन्मों के लिए है।

प्रश्न 23

प्रश्न: वरदान के अनुसार हर समय स्वयं को किस स्मृति में रखना है?
उत्तर: यह स्मृति रखनी है कि मैं हर समय, हर सेकण्ड और हर कर्म करते हुए स्टेज पर हूँ।

प्रश्न 24

प्रश्न: सम्पूर्ण स्टेज के नजदीक आने के लिए किस बात पर अटेन्शन चाहिए?
उत्तर: हर कर्म पर अटेन्शन रखना चाहिए और वर्तमान तथा भविष्य के स्टेटस की स्मृति रखनी चाहिए।

प्रश्न 25

प्रश्न: स्लोगन के अनुसार ईर्ष्या और अप्राप्ति का कारण क्या है?
उत्तर: ईर्ष्या और अप्राप्ति का कारण इच्छायें हैं। जहाँ सर्व प्राप्तियाँ हैं वहाँ प्रसन्नता है।

प्रश्न 26

प्रश्न: अव्यक्त इशारे के अनुसार हर सेकण्ड और हर संकल्प में क्या चेक करना है?
उत्तर: चेक करना है—“कुछ दिया या लिया तो नहीं?” बाप से लेना है और अब दूसरों को देना है।

प्रश्न 27

प्रश्न: महादानी बनने से क्या प्राप्ति होती है?
उत्तर: महादानी बनने से महान शक्ति की प्राप्ति स्वतः होती है और बातें सहज हो जाती हैं।

प्रश्न 28

प्रश्न: अपने संकल्पों के सम्बन्ध में कौन-सी शक्ति चाहिए?
उत्तर: संकल्पों पर कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए और संकल्पों में मिक्सचर्टी नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 29

प्रश्न: बच्चों को किस बात का टाइम वेस्ट नहीं करना है?
उत्तर: किसी भी देहधारी को याद करके अपना समय व्यर्थ नहीं करना है और ऐसा कोई रांग कर्म नहीं करना है जो विकर्म बन जाए।

प्रश्न 30

प्रश्न: इस मुरली की मूल धारणा क्या है?
उत्तर: जीते जी देह के सम्बन्धों से न्यारे होकर स्वयं को आत्मा समझना, एक बाप को याद करना, शरीर निर्वाह के कर्म करना और याद का चार्ट रखते हुए अविनाशी कमाई करना।

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