गीता का भगवान कौन है?
आज हम इसका 79वा पाठ करेंगे।
युद्ध में योद्धा इंद्रियों पर विजय कैसे पाए?
आज हम गीता के एक और गहरे रहस्य पर विचार करेंगे।
लोगों ने गीता के युद्ध को बाहरी शस्त्र युद्ध समझ लिया है।
लेकिन गीता वास्तव में हमें बताती है कि यह युद्ध किसी अन्य व्यक्तियों से नहीं
बल्कि स्वयं से, अपनी कर्म इंद्रियों, अपनी इंद्रियों और मन से लड़ा जाने वाला संग्राम है।
गीता का एक श्लोक है — इंद्रियों पर नियंत्रण।
गीता के दूसरे अध्याय का सातवाँ श्लोक है:
“यत्न करने वाले विवेकी पुरुष का भी चंचल इंद्रियां बलपूर्वक मन को भटका लेती हैं।”
इस श्लोक का भाव है कि आत्मा चाहे कितनी भी समझदार और विवेकशील क्यों न हो,
यदि उसने इंद्रियों पर विजय नहीं पाई है,
तो ये चंचल इंद्रियां उसके मन को मोह में डाल सकती हैं।
इसी कारण गीता में भगवान को ऋषिकेश कहा है।
ऋषिकेश का अर्थ है — जिन्होंने इंद्रियों पर विजय पाई हो।
कृष्ण ऋषिकेश हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय पाई है।
इसका अर्थ है यदि मनुष्य अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता,
तो वे आत्म-युद्ध में हार जाते हैं।
अर्जुन ने भगवान को क्यों बनाया सारथी?
अर्जुन ने भगवान को ऋषिकेश कहकर संबोधित किया।
कृष्ण ने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, इसलिए अर्जुन ने उन्हें अपने रथ का सारथी बनाया।
अर्जुन समझ गया कि यह युद्ध केवल शस्त्र से नहीं,
बल्कि इंद्रियों को जीतने का पुरुषार्थ है।
अर्थात सारथी बनाना मतलब मार्गदर्शक, रास्ता दिखाने वाला बनाना।
साकार मुरली 12 मई 1981
“बच्चे, यह युद्ध अपने मन और इंद्रियों से है।
यदि ईश्वर को सारथी नहीं बनाओगे तो माया जीत लेगी। तुम हार जाओगे।”
असली युद्ध का क्षेत्र
भगवान ने कहा — यह शरीर ही असली कुरुक्षेत्र है।
कुरुक्षेत्र कोई बाहरी मैदान नहीं है।
यह शरीर ही कर्मक्षेत्र है,
जहाँ आत्मा और माया का संग्राम चलता है।
साकार मुरली:
“कुरुक्षेत्र कोई मैदान नहीं है,
यह तो हर मनुष्य का शरीर है,
यही विकारों से युद्ध करना है।”
उदाहरण: इंद्रियों पर विजय
मान लीजिए कोई व्यक्ति स्वाद इंद्रिय पर काबू नहीं रख पाता।
वे बार-बार अस्वस्थ करने वाली चीजें खाते हैं,
जिससे शरीर और मन दोनों रोगी हो जाते हैं।
यदि वह संयम अपनाकर भोजन को नियंत्रण में ले आता है,
तो वह इस इंद्रिय युद्ध में विजयी कहलाता है।
इसी तरह जिसने दृष्टि, वाणी और विचारों को नियंत्रण कर लिया,
वही सच्चा धर्म योद्धा है।
भगवान क्यों हैं सच्चे सारथी?
जीवन-रथ के घोड़े हैं — हमारी इंद्रियां।
मन है सारथी, बुद्धि है लगाम।
यदि मन दुर्बल है तो घोड़े (इंद्रियां) रथ को खाई में गिरा देंगे।
लेकिन जब परमात्मा सारथी बन जाते हैं,
तो आत्मा निश्चितता का प्लेटफार्म बना लेती है।
साकार मुरली 21 जुलाई 1982
“मैं ही बच्चों का सारथी हूँ।
मेरी याद से ही तुम इंद्रियों पर विजय पा सकते हो।”
निष्कर्ष
गीता का असली युद्ध बाहर नहीं, भीतर है।
दुश्मन कोई और नहीं, बल्कि अपनी ही इंद्रियां और विकार हैं।
सच्चा योद्धा वही है जो भगवान को सारथी बनाकर
अपने जीवन-रथ को नियंत्रित करता है।
यही धर्म संग्राम है और यही गीता का कल्याणकारी संदेश।
