श्रीकृष्ण का गुप्त जन्म — स्वर्णिम संसार का रहस्य
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
अध्याय : संगम युग ही नई दुनिया की नींव
भूमिका : एक प्रश्न जो पूरी दुनिया बदल देता है
आज हम जिस प्रश्न पर चिंतन करने जा रहे हैं,
वह केवल दर्शन या फिलॉसफी नहीं है —
बल्कि भविष्य की दुनिया की चाबी है।
आज पूरी दुनिया दुख, भय, असुरक्षा और संघर्ष से भरी हुई है।
लेकिन हर आत्मा के भीतर एक मौन पुकार है —
“काश, एक नई, शुद्ध और सुखमय दुनिया फिर से आ जाए।”
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान स्पष्ट करता है —
नई दुनिया कभी अचानक नहीं आती।
उसकी नींव पहले डाली जाती है… और वह नींव रखी जाती है संगम युग में।
संगम युग क्या है?
चार युग माने जाते हैं —
• सतयुग
• त्रेता
• द्वापर
• कलयुग
इन चारों के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म, गुप्त और पवित्र काल आता है —
संगम युग
यही वह समय है जब
✔ पुरानी दुनिया का अंत हो रहा होता है
✔ नई दुनिया की आत्माएँ तैयार की जाती हैं
✔ स्वयं परमात्मा शिक्षक बनकर इस धरती पर आते हैं
मुरली – 18 जनवरी 1969
“मैं संगम पर ही आता हूँ, क्योंकि यही पुरानी दुनिया का अंत और नई दुनिया की शुरुआत होती है।”
संगम में जो हम करते हैं, वही भविष्य बनता है
संगम युग केवल समय नहीं है —
यह कर्मों का बीज बोने का काल है।
जैसे बीज, वैसा पेड़
जैसे पुरुषार्थ, वैसा युग
जो आत्मा संगम युग में जैसा बनती है —
वह उसी अवस्था के अनुसार अगले युग में जाती है।
नई दुनिया की नींव आत्मा से क्यों शुरू होती है?
दुनिया ईंट-पत्थर से नहीं बनती,
दुनिया आत्माओं की अवस्था से बनती है।
• आत्मा सतोप्रधान → दुनिया सतोप्रधान
• आत्मा रजो → दुनिया रजो
• आत्मा तमोप्रधान → दुनिया दुखमय
पहले आत्माएँ बदलती हैं,
फिर संसार बदलता है।
मुरली – 7 फरवरी 1971
“सतयुग में देहभान नहीं होता, इसलिए वहाँ दुख का नामोनिशान नहीं है।”
पुरुषार्थ और युग का गहरा संबंध
जो सतयुगी पुरुषार्थ करता है —
वह सतयुग में आता है।
जो त्रेता युगी पुरुषार्थ करता है —
वह त्रेता में जाता है।
उदाहरण
अगर बीज ही सड़ा हुआ हो —
तो पेड़ कैसा निकलेगा?
इसीलिए संगम युग में
✔ देहभान समाप्त कराया जाता है
✔ आत्मा की शुद्धि कराई जाती है
✔ संस्कारों का परिवर्तन कराया जाता है
“मेरा-तेरा” ही दुख की जड़ है
जहाँ मेरा-तेरा समाप्त —
वहाँ झगड़ा भी समाप्त।
सतयुग में न अधिकार की लड़ाई है,
न संबंधों का बोझ।
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग के पहले दिन सब आत्माएँ स्वतंत्र होंगी।”
संबंध कैसे बनेंगे नई दुनिया में?
नई दुनिया में संबंध बनेंगे —
• संस्कारों के आधार पर
• संकल्पों के कंपन से
• पूर्ण पवित्रता के आधार पर
यही कारण है कि
संगम युग में पवित्रता पर सबसे अधिक बल दिया जाता है।
श्रीकृष्ण का गुप्त जन्म — संगम युग का फल
एक बहुत बड़ा भ्रम है कि
श्रीकृष्ण द्वापर के अंत में जन्म लेते हैं।
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान कहता है —
श्रीकृष्ण का जन्म गुप्त रूप से संगम युग में होता है।
संगम युग = तैयारी
सतयुग = परिणाम
मुरली – 5 दिसंबर 1966
“जो आत्माएँ नई दुनिया में आने वाली हैं, उनके शरीर सुरक्षित रहेंगे।”
स्वर्णिम संसार का रहस्य
स्वर्णिम दुनिया केवल मनुष्य ही नहीं,
प्रकृति भी सतोप्रधान होती है।
• समुद्र का पानी मीठा
• धरती शुद्ध
• फल-फूल प्राकृतिक
मुरली – 9 सितंबर 1965
“प्रकृति भी आत्माओं के अनुसार सतोप्रधान बनती है।”
मुरली – 14 अप्रैल 1972
“जहाँ सतोप्रधानता है, वहाँ भय नहीं हो सकता।”
निष्कर्ष : संगम युग सबसे महान क्यों है?
क्योंकि —
✔ इसी युग में भगवान शिक्षक बनते हैं
✔ इसी युग में आत्मा बदलती है
✔ इसी युग में नई दुनिया की नींव रखी जाती है
मुरली – 2 अक्टूबर 1967
“संगम युग छोटा है, पर सबसे महान है।”
अंतिम संदेश (Powerful Closing)
नई दुनिया कोई कल्पना नहीं है।
नई दुनिया कोई कहानी नहीं है।
संगम युग ही नई दुनिया की नींव है।
आज नहीं बदले —
तो कल नई दुनिया में नहीं होंगे।
प्रश्न 1: आज के समय में यह विषय “संगम युग” इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
आज पूरी दुनिया दुख, भय, असुरक्षा और संघर्ष से भरी हुई है।
हर आत्मा के भीतर यह मौन प्रश्न है —
“क्या फिर से एक नई, शुद्ध और सुखमय दुनिया आ सकती है?”
यह विषय केवल दर्शन नहीं, बल्कि भविष्य की दुनिया की चाबी है।
ब्रह्मा कुमारी ज्ञान बताता है कि नई दुनिया की शुरुआत का रहस्य संगम युग में छिपा है।
प्रश्न 2: ब्रह्मा कुमारी ज्ञान के अनुसार नई दुनिया अचानक क्यों नहीं आती?
उत्तर:
नई दुनिया कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं है।
जैसे किसी इमारत की नींव पहले रखी जाती है, वैसे ही नई दुनिया की नींव भी पहले रखी जाती है।
यह नींव संगम युग में रखी जाती है, जहाँ आत्माओं का परिवर्तन किया जाता है।
प्रश्न 3: संगम युग क्या है?
उत्तर:
चार युग माने जाते हैं —
सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग।
इन चारों के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म, गुप्त और पवित्र काल आता है, जिसे संगम युग कहते हैं।
यही वह समय है जब:
• पुरानी दुनिया का अंत होता है
• नई दुनिया की आत्माएँ तैयार की जाती हैं
• स्वयं परमात्मा शिक्षक बनकर आते हैं
मुरली – 18 जनवरी 1969
“मैं संगम पर ही आता हूँ, क्योंकि यही पुरानी दुनिया का अंत और नई दुनिया की शुरुआत होती है।”
प्रश्न 4: संगम युग को “भविष्य बनाने का काल” क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
संगम युग केवल समय नहीं है, यह कर्मों का बीज बोने का काल है।
जैसे बीज वैसा पेड़
जैसे पुरुषार्थ वैसा युग
जो आत्मा संगम युग में जैसी बनती है,
वह अगले युग में वैसी ही स्थिति प्राप्त करती है।
प्रश्न 5: नई दुनिया की नींव आत्मा से ही क्यों शुरू होती है?
उत्तर:
दुनिया ईंट–पत्थर से नहीं बनती,
दुनिया आत्माओं की अवस्था से बनती है।
• आत्मा सतोप्रधान → दुनिया सतोप्रधान
• आत्मा रजो → दुनिया रजो
• आत्मा तमोप्रधान → दुनिया दुखमय
पहले आत्माएँ बदलती हैं,
फिर संसार बदलता है।
मुरली – 7 फरवरी 1971
“सतयुग में देहभान नहीं होता, इसलिए वहाँ दुख का नामोनिशान नहीं है।”
प्रश्न 6: पुरुषार्थ और युग का क्या गहरा संबंध है?
उत्तर:
जो आत्मा सतयुगी पुरुषार्थ करती है, वह सतयुग में जाती है।
जो आत्मा त्रेता युगी पुरुषार्थ करती है, वह त्रेता में जाती है।
उदाहरण:
अगर बीज ही सड़ा हुआ हो, तो पेड़ कैसा निकलेगा?
इसीलिए संगम युग में:
• देहभान समाप्त कराया जाता है
• आत्मा की शुद्धि कराई जाती है
• संस्कारों का परिवर्तन कराया जाता है
प्रश्न 7: “मेरा–तेरा” को दुख की जड़ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
जहाँ मेरा–तेरा है, वहाँ अधिकार की भावना है।
जहाँ अधिकार है, वहाँ संघर्ष है।
सतयुग में:
• न अधिकार की लड़ाई होती है
• न संबंधों का बोझ होता है
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग के पहले दिन सब आत्माएँ स्वतंत्र होंगी।”
प्रश्न 8: नई दुनिया में संबंध किस आधार पर बनेंगे?
उत्तर:
नई दुनिया में संबंध बनेंगे:
• संस्कारों के आधार पर
• संकल्पों के कंपन से
• पूर्ण पवित्रता के आधार पर
इसी कारण संगम युग में पवित्रता को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।
प्रश्न 9: श्रीकृष्ण के जन्म को संगम युग से क्यों जोड़ा जाता है?
उत्तर:
एक आम धारणा है कि श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर के अंत में हुआ।
लेकिन ब्रह्मा कुमारी ज्ञान बताता है कि —
श्रीकृष्ण का जन्म गुप्त रूप से संगम युग में होता है।
संगम युग = तैयारी
सतयुग = परिणाम
मुरली – 5 दिसंबर 1966
“जो आत्माएँ नई दुनिया में आने वाली हैं, उनके शरीर सुरक्षित रहेंगे।”
प्रश्न 10: स्वर्णिम संसार केवल मनुष्यों तक सीमित क्यों नहीं है?
उत्तर:
स्वर्णिम संसार में केवल मनुष्य ही नहीं,
प्रकृति भी सतोप्रधान होती है।
• समुद्र का पानी मीठा
• धरती शुद्ध
• फल–फूल प्राकृतिक
मुरली – 9 सितंबर 1965
“प्रकृति भी आत्माओं के अनुसार सतोप्रधान बनती है।”
मुरली – 14 अप्रैल 1972
“जहाँ सतोप्रधानता है, वहाँ भय नहीं हो सकता।”
प्रश्न 11: संगम युग को सबसे महान युग क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि —
• इसी युग में भगवान शिक्षक बनते हैं
• इसी युग में आत्मा का रूपांतरण होता है
• इसी युग में नई दुनिया की नींव रखी जाती है
मुरली – 2 अक्टूबर 1967
“संगम युग छोटा है, पर सबसे महान है।”
प्रश्न 12: इस अध्याय का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या है?
उत्तर:
नई दुनिया कोई कल्पना नहीं है।
नई दुनिया कोई कहानी नहीं है।
संगम युग ही नई दुनिया की नींव है।
आज नहीं बदले —
तो कल नई दुनिया में नहीं होंगे।
डिस्क्लेमर
यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की आध्यात्मिक शिक्षाओं, मुरली ज्ञान एवं व्यक्तिगत अध्ययन पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, शास्त्र या व्यक्ति का खंडन करना नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति एवं सकारात्मक जीवन मूल्यों को साझा करना है।
सभी दर्शक इस ज्ञान को आत्मिक चिंतन के रूप में ग्रहण करें।
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