(03)On the first day in the new world, everyone will be strangers.

S.Y.(03)नई दुनिया के पहले दिन सब अजनबी होंगे।

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

YouTube player

अध्याय 1 : नई दुनिया का पहला दिन — एक अद्भुत कल्पना

कल्पना कीजिए… एक बिल्कुल नई दुनिया।

• पहला दिन • पहला सूर्योदय • प्रकृति पूर्णतः सतोप्रधान • धरती पूरी तरह शुद्ध

लेकिन बाबा कहते हैं —  उस पहले दिन कोई किसी को नहीं जानता।

यह सुनकर प्रश्न उठता है: यदि यह स्वर्ग है, सतयुग है, तो वहाँ अजनबीपन क्यों?

यहीं से ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान की गहराई शुरू होती है।


 अध्याय 2 : मुरली का स्पष्ट रहस्य — कोई पुराना संबंध नहीं

मुरली – 21 मार्च 1970

“सतयुग के पहले दिन सब आत्माएँ स्वतंत्र होती हैं। कोई पुराना हिसाब‑संबंध नहीं होता।”

अर्थात — • न बाप‑बेटे का रिश्ता • न पति‑पत्नी का • न भाई‑बहन का

नई दुनिया रिश्तों से नहीं, आत्माओं से शुरू होती है।

पुरानी दुनिया में:

संबंध पहले — आत्मा बाद में

नई दुनिया में:

आत्मा पहले — संबंध बाद में


 अध्याय 3 : आत्मा का जन्म और अजनबीपन का कारण

आत्मा परमधाम से आती है। आत्मा का शरीर में प्रवेश — वही जन्म है।

इसलिए: • कोई स्मृति नहीं • कोई पहचान नहीं • कोई पुराना अकाउंट नहीं

मुरली – 7 फरवरी 1971

“नए जन्म में आत्मा को पुराने संबंध याद नहीं रहते।”

यदि कोई कार्मिक अकाउंट शेष हो, तो थोड़ी‑सी अनुभूति हो सकती है, पर सेटल होते ही वह भी समाप्त हो जाती है।


 अध्याय 4 : देहभान का पूर्ण अंत — मेरा‑तेरा समाप्त

नई दुनिया की विशेषता है:  देहभान का पूर्ण अंत

मुरली – 30 नवंबर 1967

“जहाँ देहभान नहीं, वहाँ मेरा‑तेरा भी नहीं।”

जब: • मेरा शरीर नहीं • तेरा शरीर नहीं

तो: • मेरा परिवार • तेरा परिवार

ये भाव भी समाप्त हो जाते हैं।


 अध्याय 5 : पहला दिन — न्यारे और प्यारे आत्माएँ

मुरली – 18 जनवरी 1969

“सतयुग के पहले दिन सब न्यारे और प्यारे होते हैं।”

उस दिन: • कोई अधिकार नहीं • कोई अपेक्षा नहीं • कोई भय नहीं

मुरली – 9 सितंबर 1965

“जहाँ सतोप्रधानता है, वहाँ भय नहीं हो सकता।”

आज की दुनिया:

डर पर आधारित जीवन

नई दुनिया:

विश्वास और सहयोग पर आधारित जीवन


 अध्याय 6 : संबंध कैसे बनते हैं?

मुरली – 14 अप्रैल 1972

“सतयुग में संबंध संस्कारों से बनते हैं।”

यानी: • आँख न जाने • दिल पहचान ले

क्यों? • कंपन मिलते हैं • संस्कार मिलते हैं • पवित्रता मिलती है

और वहीं से संबंध शुरू होते हैं।


 अध्याय 7 : संगम का पुरुषार्थ — भविष्य की नींव

मुरली – 2 अक्टूबर 1967

“संगम युग छोटा है, पर सबसे भारी है।”

और यही नियम:

संगम पर जैसा बना, सतयुग में वैसा ही मिलेगा।

अंत और आरंभ एक‑दूसरे से जुड़े हैं। जो बनकर गए — वही बनकर आए।


 निष्कर्ष : अजनबीपन नहीं, पवित्र स्वतंत्रता

नई दुनिया का पहला दिन: • अजनबीपन का नहीं • आत्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक है

यह स्वर्ग का पहला कदम है — जहाँ आत्मा अपने सत्य स्वरूप में जीवन शुरू करती है।

यही है नई दुनिया का पहला दिन।

प्रश्न 1️⃣ : नई दुनिया के पहले दिन सब अजनबी क्यों होंगे?
उत्तर :
क्योंकि सतयुग के पहले दिन सभी आत्माएँ परमधाम से नई देह धारण करके आती हैं। कोई भी आत्मा किसी पुराने रिश्ते, पहचान या स्मृति के साथ नहीं आती।
मुरली – 21 मार्च 1970
“सतयुग के पहले दिन सब आत्माएँ स्वतंत्र होती हैं। कोई पुराना हिसाब-संबंध नहीं होता।”


प्रश्न 2️⃣ : अगर यह स्वर्ग है, तो वहाँ अजनबीपन क्यों?
उत्तर :
क्योंकि स्वर्ग रिश्तों से नहीं, आत्माओं से शुरू होता है। वहाँ पहले आत्मा की पहचान होती है, संबंध बाद में बनते हैं। अजनबीपन डर नहीं, पवित्रता का संकेत है।


प्रश्न 3️⃣ : नई दुनिया की शुरुआत रिश्तों से क्यों नहीं होती?
उत्तर :
क्योंकि रिश्ते कर्मों और संस्कारों से बनते हैं, और वे धीरे-धीरे विकसित होते हैं। नई दुनिया में पहले आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर होती है, फिर संस्कारों से संबंध बनते हैं।


प्रश्न 4️⃣ : पुरानी दुनिया और नई दुनिया में मूल अंतर क्या है?
उत्तर :

  • पुरानी दुनिया: संबंध पहले, आत्मा बाद में

  • नई दुनिया: आत्मा पहले, संबंध बाद में

यही ब्रह्मा कुमारी ज्ञान का गहरा रहस्य है।


प्रश्न 5️⃣ : जन्म लेते ही आत्मा सबको क्यों नहीं पहचानती?
उत्तर :
क्योंकि जन्म का अर्थ है—आत्मा का शरीर में प्रवेश। आत्मा परमधाम से आती है, इसलिए उसे पुराने संबंध याद नहीं रहते।
मुरली – 7 फरवरी 1971
“नए जन्म में आत्मा को पुराने संबंध याद नहीं रहते।”


प्रश्न 6️⃣ : क्या नई दुनिया में कोई बाप, माँ, भाई-बहन नहीं होंगे?
उत्तर :
पहले दिन नहीं। वहाँ देहभान का पूर्ण अंत होता है। जब देहभान नहीं, तो मेरा-तेरा भी नहीं।
मुरली – 30 नवंबर 1967


प्रश्न 7️⃣ : फिर सतयुग में संबंध कैसे बनते हैं?
उत्तर :
सतयुग में संबंध रक्त से नहीं, संस्कारों से बनते हैं।
मुरली – 14 अप्रैल 1972
“सतयुग में संबंध संस्कारों से बनते हैं।”
इसीलिए कहा जाता है—
आँख न जाने, दिल पहचाने।


प्रश्न 8️⃣ : क्या यह अजनबीपन डर पैदा करेगा?
उत्तर :
नहीं। जहाँ सतोप्रधानता है, वहाँ भय नहीं हो सकता।
मुरली – 9 सितंबर 1965
नई दुनिया विश्वास और सहयोग पर आधारित होती है, डर पर नहीं।


प्रश्न 9️⃣ : नई दुनिया का पहला दिन कैसा होगा?
उत्तर :
एक अनोखा, न्यारा और प्यारा दृश्य।
मुरली – 18 जनवरी 1969
“पहले दिन सब न्यारे और प्यारे होंगे।”


प्रश्न 🔟 : आज के संगम युग से इसका क्या संबंध है?
उत्तर :
संगम पर जैसा पुरुषार्थ किया, सतयुग में वैसा ही जीवन मिलेगा।
मुरली – 2 अक्टूबर 1967
“संगम पर जैसा बना, सतयुग में वैसा ही मिलेगा।”


समापन संदेश

नई दुनिया का पहला दिन
 डर का नहीं
 अजनबीपन का नहीं
 बल्कि शुद्ध आत्मिक पहचान का दिन होगा।

डिस्क्लेमर

यह वीडियो प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुरली ज्ञान, आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, शास्त्र, परंपरा या मान्यता का खंडन करना नहीं है।

यह प्रस्तुति केवल आत्मा की पहचान, विश्व चक्र की समझ तथा सकारात्मक जीवन मूल्यों को स्पष्ट करने हेतु है। दर्शक इसे आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करें।

नई दुनिया, पहला दिन, सतयुग का रहस्य, नई दुनिया का पहला सूर्योदय, स्वर्ग का पहला दिन, सतयुग की शुरुआत, आत्मा की पहचान, आत्मा और शरीर का रहस्य, परमधाम से आत्मा, आत्मिक जन्म, ब्रह्मा कुमारी ज्ञान, मुरली ज्ञान, बाबा की मुरली, सतयुग जीवन, सतोप्रधान दुनिया, आत्मिक दृष्टि, देहभान समाप्ति, आत्मा पहले संबंध बाद में, आत्मिक संबंध, विश्व चक्र का ज्ञान, संगम युग ज्ञान, नई सृष्टि का आरंभ, आध्यात्मिक रहस्य, BK spiritual knowledge, BK murli, spiritual awakening, divine world, heavenly life,New world, first day, secret of Satyayuga, first sunrise of the new world, first day of heaven, beginning of Satyayuga, identity of the soul, secret of soul and body, soul from Paramdham, spiritual birth, Brahma Kumari knowledge, Murli knowledge, Baba’s Murli, Satyayuga life, Satpradhaan world, spiritual vision, end of body consciousness, soul first, relationship later, spiritual relationship, knowledge of the world cycle, Confluence Age knowledge, beginning of the new creation, spiritual secret, BK spiritual knowledge, BK murli, spiritual awakening, divine world, heavenly life,