AV-07/03-04-1994-“सन्तुष्टता का आधार – सम्बन्ध, सम्पत्ति और सेहत (तन्दुरुस्ती)”
“सन्तुष्टता का आधार – सम्बन्ध, सम्पत्ति और सेहत (तन्दुरुस्ती)”
आज दिलाराम बाप अपने सदा सन्तुष्ट रहने वाली सन्तुष्ट आत्माओं व सन्तुष्ट मणियों को देख रहे हैं। ये रूहानी मणियों की चमक सारे दरबार को चमका रही है। सन्तोषी आत्मायें स्वयं को भी प्रिय और सर्व को भी प्रिय और बाप को तो प्रिय हैं ही। तो ऐसे हो ना! क्योंकि इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन में अप्राप्ति का नाम ही नहीं है। सर्व प्राप्ति सम्पन्न आत्मायें हो। तो जहाँ सर्व प्राप्ति हैं वहाँ सदा सन्तुष्टता स्वत: और स्वाभाविक है ही। नेचुरल स्वभाव उसका सन्तोष का है। और सन्तुष्टता का स्वरूप व स्वभाव, निजी संस्कार ऐसा श्रेष्ठ है जो असन्तुष्ट आत्मा को भी सन्तुष्टता का वायब्रेशन, वायुमण्डल, सन्तोष वायुमण्डल में बदल देता है। इस संगमयुग में विशेष बापदादा की देन सन्तुष्टता है। एक सन्तुष्टता की विशेषता और विशेषताओं को भी सहज अपने समीप लाती है। लेकिन सदा सन्तुष्ट हो। परिस्थिति कितनी भी बदले लेकिन सन्तुष्टता की स्थिति को परिस्थिति बदल नहीं सकती। पर-स्थिति है ही बदलने वाली। लेकिन स्व सन्तुष्टता की स्थिति सदा प्रगतिशील है। आपके आगे कैसी भी हिलाने वाली परिस्थिति ऐसे ही अनुभव होती है जैसे पपेट (कठपुतली) शो देखते हो ना। होता सब कुछ है लेकिन होता पपेट है। तो कैसी भी परिस्थिति पपेट शो लगता है वा आजकल का जो फैशन है कार्टून शो, अच्छा लगता है ना। होता तो शेर भी है, बिल्ली भी होती है, लेकिन होता क्या है? कार्टून। कहानी पूरी होती है लेकिन है कार्टून की स्टोरी, रीयल नहीं है। कभी भी, कोई भी परिस्थिति आए तो यही समझो एक बेहद के स्क्रीन पर कार्टून शो चल रहा है वा पपेट शो चल रहा है। तो वह देखकर के परेशान होंगे कि मनोरंजन करेंगे? शो देखना तो अच्छा ही है ना। तो यह माया का वा प्रकृति का यह भी एक शो है। जिसको साक्षी स्थिति में सदा सन्तुष्टता के स्वरूप में देखते रहो। अपनी शान में रहते हुए देखो – सन्तुष्ट मणि हूँ, सन्तोषी आत्मा हूँ। ये है संगम का श्रेष्ठ शान। तो शान में स्थित होना आता है ना? कि परेशान होना अच्छा लगता है? सदा सन्तुष्टता की विशेषता को इमर्ज रूप में स्मृति में रखो।
प्राप्तियों में विशेष सम्बन्ध और सम्पत्ति आवश्यक है। सम्बन्ध में भी अगर एक भी सम्बन्ध अप्राप्त है तो सम्पूर्ण सन्तुष्टता नहीं होगी। तो सम्बन्ध में भी सर्व चाहिये और अविनाशी चाहिये। अगर कोई भी सम्बन्ध विनाशी है तो अप्राप्ति और असन्तुष्टता स्वत: हो जाती है। लेकिन एक ही वर्तमान संगमयुग है जिसमें सर्व अविनाशी सम्बन्ध एक बाप से अनुभव कर सकते हो। सतयुग में भी सम्बन्ध बहुत थोड़े हैं, सर्व नहीं हैं, लेकिन इस समय जिस सम्बन्ध की आकर्षण हो, अनुभूति करना चाहे वो सम्बन्ध परम आत्मा द्वारा अनुभव कर सकते हो। हर एक के जीवन में सम्बन्ध की भी अलग-अलग पसन्दी होती है। किसको बाप का सम्बन्ध इतना अच्छा नहीं लगेगा, फ्रैण्ड ज्यादा अच्छा लगेगा। लेकिन एक समय पर और एक से सर्व सम्बन्ध प्राप्त हैं? सर्व प्राप्ति है कि कुछ रहा हुआ है? पीछे बैठे हुए क्या समझते हैं? आज नये-नये को आगे बैठने का चांस दिया है। अच्छा, जो इस कल्प में इस बार पहली बार आये हैं वो हाथ उठाओ। भले पधारे। बापदादा भी पद्मगुणा स्नेह सम्पन्न वेलकम कर रहे हैं। नये होते भी कल्प-कल्प के अधिकारी हैं, ये तो समझते हो ना! बापदादा सदा कहते हैं बड़े तो बड़े हैं लेकिन छोटे समान बाप हैं। इसलिये सदा अपने रूहानी बेहद के सम्पूर्ण अधिकार के निश्चय और नशे में रहो। बेहद का नशा है, हद का नहीं रखना। देखो, कितने श्रेष्ठ अधिकारी हो जो स्वयं बाप ऑलमाइटी अथॉरिटी के ऊपर अधिकार रख दिया। परमात्म अधिकारी इससे बड़ा अधिकार और है ही क्या! जब बीज को अपना बना लिया तो वृक्ष तो समाया हुआ है ही। सर्व सम्बन्धों का भी अविनाशी अधिकार ले लिया और सम्पत्ति में भी अगर सिर्फ स्थूल सम्पत्ति है तो भी सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकते। स्थूल सम्पत्ति के साथ अगर सर्व गुणों की सम्पत्ति, सर्व शक्तियों की सम्पत्ति और श्रेष्ठ सम्पन्न ज्ञान की सम्पत्ति नहीं हैं तो सन्तुष्टता सदा नहीं रह सकती। लेकिन आप सबके पास यह श्रेष्ठ सम्पत्तियाँ हैं। सम्पत्तिवान हो ना! दुनिया वाले तो सिर्फ स्थूल सम्पत्ति वाले को सम्पत्ति भव का वरदान देते हैं लेकिन आप सबको वरदाता बाप सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति भव का वरदान देते हैं। तो सब सम्पत्ति हैं ना? कि कोई कम है? फुल है? पीछे वालों के ऊपर सबसे ज्यादा ध्यान है। आगे वालों का ध्यान बाप के तरफ ज्यादा है और बाप का ध्यान पीछे वालों के ऊपर ज्यादा है। जितना ही दूर हैं उतना ही नयनों में समाये हुए हैं।
साकार वतन में तो साकार की बातें होती हैं। देखो, परमधाम में आप सभी आत्मायें कितनी समीप होंगी! सभी साथ होंगे ना! और सूक्ष्म वतन में भी इतना बेहद है जो जितना समीप आना चाहे आ सकते हैं। लेकिन बच्चों का स्नेह निराकार और आकार को भी साकार बनाना चाहता है। तो बाप क्या कहते हैं? जी हज़ुर, जी हाज़िर। बच्चे तो बाप के भी हज़ुर हैं, मालिक हैं ना! मालिक को हज़ुर कहा जाता है और बालक को भी मालिक कहा जाता है। तो सभी कौन हो? सन्तुष्ट मणियां। सम्बन्ध में भी सन्तुष्ट और सम्पत्ति में भी सन्तुष्ट। सम्बन्ध, सम्पत्ति और तीसरी होती है सेहत, तन्दुरुस्ती। आप सभी तन्दुरुस्त हो ना कि बीमार हो? आत्मा तो तन्दुरुस्त है ना, शरीर की कोई बात ही नहीं। आत्मा सदा शक्तिशाली है। संगम पर श्रेष्ठ सेहत वा तन्दुरुस्ती है आत्मा की तन्दुरुस्ती। इस समय के आत्मा की तन्दुरुस्ती जन्म-जन्म के शरीर की तन्दुरुस्ती भी दिलाती है। लेकिन इस समय थोड़ा-सा प्रकृति अपना रूप दिखाती है। इसमें भी कोई बड़ी बात नहीं। यह भी कार्टून शो है। तो सर्व प्राप्तियाँ हैं ना। सम्बन्ध भी हैं, सम्पत्ति भव भी है, सर्व सम्बन्ध भव भी हैं और सदा तन्दुरुस्त भव भी हैं। तीनों वरदान वरदाता बाप से मिले हुए हैं। तो वरदानों को समय पर कार्य में लगाओ। सिर्फ वरदान सुनकर खुश नहीं हो जाओ कि हाँ, मुझे बहुत अच्छा वरदान मिला या सिर्फ नोट करके नहीं रखो लेकिन समय पर वरदान को काम में लगाने से वरदान कायम रहते हैं। अगर वरदानों को समय पर काम में नहीं लगाया तो वह वरदान फल नहीं देता। वरदान तो अविनाशी बाप का है लेकिन वरदान को फलीभूत करना है। बीज तो है लेकिन उससे फल कितना निकालते हो, वह आपके हाथ में है। कोई सिर्फ वरदान के बीज को देखकरके खुश होते रहते हैं बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, लेकिन फलदायक बनाओ। बार-बार स्मृति का पानी दो, वरदान के स्वरूप में स्थित होने की धूप दो, फिर देखो वरदान सदा फलीभूत होता रहेगा, और वरदानों को भी साथ में लायेगा। वरदानों के फल स्वरूप बन जायेंगे। तो आज के त्रि-वरदान को फलीभूत करना और समय पर जरूर याद रखना। समय पर भूल जाते हैं, पीछे पढ़ते रहते हो कि हाँ, ये वरदान तो था! वरदानों को जितना समय पर कार्य में लगायेंगे उतना वरदान और श्रेष्ठ स्वरूप दिखाता रहेगा। तो सभी को वरदान मिला ना! अच्छा।
अभी जो 5 तरफ से ग्रुप आये हैं वो नम्बरवार हाथ उठाओ।
एशिया – इसमें भारतवासी तथा मधुबनवासी भी हाथ उठाओ। मधुबनवासी तो विशेष हैं। ये बड़ा ग्रुप है। भारत वाले भी चांस लेने में होशियार हैं। तो एशिया निवासियों के प्रति विशेष आज के दिन तीन वरदान तो सभी के हैं ही, लेकिन विशेष एशिया प्रति सदा शुभ भावना और श्रेष्ठ भाव भव। शुभ भावना और श्रेष्ठ भाव ये विशेष वरदान एशिया निवासियों के प्रति है।
यूरोप – यूरोप में इंगलैण्ड भी आ गया। यूरोप निवासियों के प्रति विशेष वरदान है कि सदा जीरो और हीरो भव। जीरो का तो पता है ना। तीन जीरो याद रखना, सिर्फ एक नहीं। जीरो और हीरो एक्टर हैं और हीरे समान हैं, डबल हीरो। तो तीन जीरो और डबल हीरो। तो ये वरदान यूरोप निवासियों के प्रति है।
अमेरिका – पूरा अमेरिका हाथ उठाओ। एक्सरसाइज करो और सीधा हाथ उठाओ। कइयों को आदत है छोटा हाथ उठाने की। बापदादा को छोटा हाथ वाला हाफ कास्ट लगता है। फुल हाथ उठाओ। तो अमेरिका निवासी सर्व आत्माओं के प्रति विशेष यही वरदान है कि सदा माया से इनोसेन्ट और विजय में सेन्ट परसेन्ट और स्थिति में सदा सेन्ट। सेन्ट खुशबू वाले भी और सेन्ट अर्थात् महान् आत्मा, डबल सेन्ट। तो सदा इनोसेन्ट भी और डबल सेन्ट भव।
अफ्रिका, मॉरिशियस – आज बापदादा सीधा हाथ उठाने की ड्रिल करा रहे हैं। डॉक्टर्स भी कहते हैं ना ड्रिल करो। सर्व अफ्रिका निवासी बच्चों प्रति विशेष यही वरदान है कि सदा सर्व प्रॉसपर्टी और सदा हर संकल्प, बोल और कर्म में सहज ऑनेस्टी भव, प्रॉसपर्टी भव और त्रि-स्वरूप से सहज ऑनेस्टी भव।
आस्ट्रेलिया, न्युजीलैण्ड – आस्ट्रेलिया निवासी सर्वश्रेष्ठ भाग्यवान आत्माओं प्रति विशेष यही वरदान है कि सदा माया से विजयी और साथ-साथ माया जीत, विश्व के राज्य जीत श्रेष्ठ वरदान भव। साथ-साथ सदा निश्चिन्त और निश्चय निश्चित भव। आस्ट्रेलिया निवासी विशेष बाप के प्रिय हैं। हैं तो सभी प्रिय लेकिन विशेष आस्ट्रेलिया निवासी प्रिय क्यों हैं? बाप की विशेष स्नेह की नज़र आस्ट्रेलिया निवासियों के ऊपर रहती है। क्यों? क्योंकि आस्ट्रेलिया निवासियों की धरनी कमाल करने में बहुत अच्छी है लेकिन बाप विशेष धरनी को स्नेह का पानी देते हैं। इसीलिये विशेष स्नेह है। समझा! तो आस्ट्रेलिया वाले कमाल बहुत कर सकते हैं। अभी थोड़ी-थोड़ी की है। और आस्ट्रेलिया का नाम भी अन्त में लिया है तो अन्त वाले को कुछ एक्स्ट्रा देना चाहिये। तो सभी को वरदान मिला।
मधुबन – मधुबन निवासी विशेष हैं। चाहे वर्तमान समय ज्ञान सरोवर निवासी हैं, चाहे विश्व को सदा हेल्दी बनाने वाले हॉस्पिटल वाले हैं, सिर्फ हेल्दी नहीं, हैप्पी हेल्दी। चाहे मधुबन में चारों ओर घेराव डालने वाले बच्चे हैं। आबू में घेराव डाल रहे हैं ना। तो सर्व मधुबन निवासी विशेष बच्चों प्रति विशेष वरदान है कि सदा मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों में सेन्ट-परसेन्ट प्रगति भव।
बाकी जहाँ से भी सभी बच्चे आये हैं भिन्न-भिन्न विदेश के देशों से वा भारत के देश से सभी को विशेष सदा सम्पन्न और सम्पूर्ण भव। अहमदाबाद वाले भी सेवा बहुत अच्छी करते हैं। मधुबन में भी अथक सेवाधारी हैं तो विशेष अहमदाबाद, दिल्ली और बाम्बे – इन तीनों स्थानों को भी सेवा का बहुत अच्छा चांस मिला हुआ है। सभी स्थान अपने स्नेह-सम्पन्न अथक सेवाधारी बन सेवा कर रहे हैं और करते रहेंगे। सेवा की मुबारक हो।
और चारों ओर के जो दूर बैठे बहुत दिल में समीप हैं, तो चारों ओर के देश-विदेश के सर्व सन्तोषी आत्माओं को, सन्तुष्टमणियों को, सर्व प्राप्ति सम्पन्न आत्माओं को, जिन्होंने भी याद, पत्र, कार्ड आज के दिवस के भी भेजे हैं, तो आज के विशेष दिवस की भी सर्व बच्चों को याद-प्यार पद्मगुणा स्वीकार हो। चाहे दूर बैठकर मन में, दिल में मना रहे हैं, चाहे सम्मुख मना रहे हैं, कार्ड वा पत्र सब पहले वतन में पहुँचते हैं। तो सभी के पत्र, कार्ड और शुभ संकल्पों की याद, शुभ भावनाओं की याद के रिटर्न में बापदादा का विशेष याद-प्यार और सर्व बालक सो मालिक बच्चों को नमस्ते। अच्छा।
दादियों से मुलाकात
सूक्ष्म इशारों की भाषा तो जानते हो ना। जैसे अव्यक्त बाप इशारों की ही भाषा जानते हैं। अव्यक्त वतन में तो नयनों की भाषा और इशारों की भाषा है। तो आप भी जानते हो ना। नयनों की भाषा जानते हो? साकार से सीखे हो ना। मुख की भाषा तो सुनी, अभी है नयनों की भाषा। नयनों की भाषा बड़ी प्यारी है। आवाज़ से परे तो जाना ही है। फिर भी बाप जी हज़ुर तो करते ही हैं। अच्छा।
(लास्ट में बापदादा ने हाथ उठाकर सभी को आशीर्वाद दिया और विदाई ली)
सन्तुष्टता का आधार
सम्बन्ध • सम्पत्ति • सेहत (तन्दुरुस्ती)
Source (Murli Note)
अव्यक्त बापदादा मुरली
दिनांक: 31 दिसम्बर 2003 (कृपया प्रकाशन से पहले मूल मुरली पुस्तक अथवा ब्रह्माकुमारीज़ के आधिकारिक अभिलेख से तिथि का एक बार सत्यापन अवश्य कर लें।)
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह अध्याय ब्रह्माकुमारीज़ की अव्यक्त मुरली के आध्यात्मिक सिद्धान्तों का सरल अध्ययन एवं व्याख्या है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, सम्प्रदाय, परम्परा या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं है। यहाँ प्रस्तुत उदाहरण केवल आध्यात्मिक समझ को सहज बनाने के लिए दिए गए हैं। आधिकारिक अध्ययन हेतु पाठक मूल मुरली का नियमित अध्ययन करें।
अध्याय 1
सन्तुष्टता क्या है?
आज का संसार सुविधा से भर गया है, लेकिन सन्तुष्टता से नहीं। पहले लोग सोचते थे कि यदि अच्छा घर मिल जाए, पर्याप्त धन हो जाए या सम्मान मिल जाए, तो जीवन पूर्ण हो जाएगा। लेकिन वास्तविक अनुभव कुछ और ही बताता है। बहुत से सम्पन्न लोग भी भीतर से खाली महसूस करते हैं, जबकि सीमित साधनों वाले अनेक लोग अत्यन्त प्रसन्न दिखाई देते हैं।
ऐसा क्यों?
बापदादा बताते हैं कि सन्तुष्टता किसी वस्तु का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मा की स्थिति है।
मुरली नोट
“इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन में अप्राप्ति का नाम ही नहीं है। जहाँ सर्व प्राप्तियाँ हैं वहाँ सदा सन्तुष्टता स्वतः और स्वाभाविक है।”
अर्थात जिस आत्मा ने परमात्मा से अपने वास्तविक सम्बन्ध को पहचान लिया, उसके जीवन में कमी की भावना समाप्त होने लगती है।
सन्तुष्ट व्यक्ति की पहचान
बापदादा कहते हैं कि सन्तुष्ट आत्मा—
- स्वयं को प्रिय होती है।
- दूसरों को भी प्रिय लगती है।
- और परमात्मा को भी प्रिय होती है।
ऐसा व्यक्ति शिकायत कम करता है और कृतज्ञता अधिक अनुभव करता है।
उदाहरण
दो मित्र एक ही कम्पनी में कार्य करते हैं।
पहले को वेतन बढ़ने के बाद भी शिकायत रहती है—
“दूसरे को मुझसे अधिक मिला।”
दूसरा कहता है—
“ईश्वर ने मुझे काम, परिवार और स्वास्थ्य दिया है। मैं आगे भी मेहनत करूँगा।”
दोनों की परिस्थितियाँ लगभग समान हैं, लेकिन सोच अलग है।
सन्तोष परिस्थिति से नहीं, दृष्टिकोण से उत्पन्न होता है।
अध्याय 2
परिस्थितियाँ हमें क्यों हिलाती हैं?
जीवन में समस्याएँ आएँगी।
कभी आर्थिक कठिनाई,
कभी स्वास्थ्य की चुनौती,
कभी सम्बन्धों में मतभेद,
कभी कार्यस्थल का तनाव।
यदि प्रत्येक परिस्थिति हमारे मन को हिला दे, तो स्थायी शान्ति असम्भव है।
बापदादा इस विषय को अत्यन्त सुन्दर उदाहरण से समझाते हैं।
मुरली नोट
“हर परिस्थिति को कार्टून शो या पपेट शो समझो।”
इसका अर्थ यह नहीं कि समस्या वास्तविक नहीं है।
अर्थ यह है कि आत्मा को उस समस्या का दास नहीं बनना है।
उदाहरण
जब हम चलचित्र देखते हैं, तो उसमें दुःख, युद्ध और संघर्ष दिखाई देता है।
फिर भी हमें भीतर से पता होता है कि यह केवल फिल्म है।
इसी प्रकार जीवन की प्रत्येक परिस्थिति भी परिवर्तनशील है।
जो आज है, वह कल बदल जाएगी।
लेकिन यदि आत्मा अपनी स्थिति में स्थिर रहे, तो वह परिस्थितियों से ऊपर उठ जाती है।
अध्याय 3
सन्तुष्टता का पहला आधार — सम्बन्ध
मनुष्य का जीवन सम्बन्धों पर आधारित है।
यदि सम्बन्ध टूटते हैं तो धन भी सुख नहीं दे सकता।
बापदादा बताते हैं कि संसार के सम्बन्ध परिवर्तनशील हैं।
लेकिन संगमयुग में एक ऐसा सम्बन्ध मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता—
परमात्मा से सम्बन्ध।
मुरली नोट
“एक ही वर्तमान संगमयुग है जिसमें सर्व अविनाशी सम्बन्ध एक बाप से अनुभव कर सकते हैं।”
परमात्मा—
- पिता भी हैं,
- माता भी,
- शिक्षक भी,
- सखा भी,
- साथी भी,
- सतगुरु भी।
उदाहरण
एक बच्चा विद्यालय में असफल हो गया।
यदि उसके माता-पिता उसका साथ छोड़ दें तो वह टूट जाता है।
लेकिन यदि वही माता-पिता कहें—
“हम तुम्हारे साथ हैं, फिर प्रयास करो।”
तो उसके भीतर नई शक्ति आ जाती है।
इसी प्रकार परमात्मा का सम्बन्ध आत्मा को आन्तरिक सुरक्षा प्रदान करता है।
अध्याय 4
सन्तुष्टता का दूसरा आधार — सम्पत्ति
सम्पत्ति का अर्थ केवल धन नहीं है।
आज अनेक लोग आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं, फिर भी मानसिक रूप से गरीब हैं।
बापदादा बताते हैं कि वास्तविक सम्पत्ति है—
- ज्ञान
- गुण
- शक्तियाँ
- पवित्र संस्कार
- श्रेष्ठ संकल्प
मुरली नोट
“स्थूल सम्पत्ति के साथ यदि सर्व गुणों की सम्पत्ति और सर्व शक्तियों की सम्पत्ति नहीं है, तो सदा सन्तुष्ट नहीं रह सकते।”
उदाहरण
एक व्यक्ति करोड़पति है।
लेकिन उसे क्रोध बहुत आता है।
दूसरा साधारण आय वाला है।
वह धैर्यवान, विनम्र और सहयोगी है।
समाज दूसरे व्यक्ति के साथ अधिक समय बिताना पसन्द करेगा।
क्यों?
क्योंकि गुण सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं।
अध्याय 5
सन्तुष्टता का तीसरा आधार — आत्मिक सेहत
मनुष्य केवल शरीर नहीं है।
आत्मा ही सोचती है,
निर्णय लेती है,
प्रेम करती है,
और दुःखी भी होती है।
इसलिए आत्मा का स्वस्थ होना सबसे आवश्यक है।
मुरली नोट
“संगम पर श्रेष्ठ सेहत है आत्मा की तन्दुरुस्ती।”
जब आत्मा शक्तिशाली होती है—
- तनाव कम होता है,
- निर्णय स्पष्ट होते हैं,
- सम्बन्ध मधुर बनते हैं,
- जीवन हल्का अनुभव होता है।
उदाहरण
मोबाइल का बाहरी कवर नया हो सकता है,
लेकिन यदि बैटरी समाप्त हो जाए तो मोबाइल कार्य नहीं करेगा।
इसी प्रकार केवल शरीर की देखभाल पर्याप्त नहीं है।
आत्मिक ऊर्जा भी आवश्यक है।
अध्याय 6
वरदान तभी फल देते हैं जब उनका प्रयोग किया जाए
बापदादा कहते हैं—
वरदान केवल सुन लेने से जीवन नहीं बदलता।
उसे व्यवहार में उतारना पड़ता है।
मुरली नोट
“वरदानों को समय पर कार्य में लगाने से वरदान कायम रहते हैं।”
उदाहरण
यदि किसी किसान के पास श्रेष्ठ बीज हों,
लेकिन वह उन्हें खेत में बोए ही नहीं,
तो फसल कैसे आएगी?
ज्ञान भी ऐसा ही बीज है।
उसे अभ्यास और व्यवहार की भूमि में बोना आवश्यक है।
दैनिक अभ्यास
प्रतिदिन स्वयं से तीन प्रश्न पूछें—
क्या आज मैंने परमात्मा से अपना सम्बन्ध अनुभव किया?
क्या आज मैंने अपने गुणों का उपयोग किया?
क्या आज मेरी आत्मा शान्त और शक्तिशाली रही?
यदि इन तीनों का उत्तर “हाँ” है,
तो समझिए कि वास्तविक सन्तुष्टता की दिशा में आपका कदम बढ़ चुका है।
मुख्य शिक्षाएँ
- सन्तुष्टता बाहर नहीं, भीतर जन्म लेती है।
- परमात्मा से सम्बन्ध आत्मा को सुरक्षा देता है।
- गुण और शक्तियाँ सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं।
- आत्मिक स्वास्थ्य सभी प्रकार के सुख का आधार है।
- परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं।
- ज्ञान तभी फल देता है जब उसे जीवन में उतारा जाए।
निष्कर्ष
बापदादा का स्पष्ट संदेश है कि जीवन की वास्तविक सम्पन्नता धन, पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि परमात्मा से जुड़े हुए जीवन में है।
जब आत्मा को अविनाशी सम्बन्ध, दिव्य सम्पत्ति और आत्मिक तन्दुरुस्ती प्राप्त हो जाती है, तब सन्तुष्टता उसका स्वाभाविक संस्कार बन जाती है।
ऐसी आत्मा स्वयं भी सुखी रहती है और अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शान्ति, आशा और प्रेरणा का प्रकाश फैलाती है।
प्रश्नोत्तरी: सन्तुष्टता का आधार — सम्बन्ध, सम्पत्ति और आत्मिक सेहत
प्रश्न 1. सच्ची सन्तुष्टता क्या है?
उत्तर: सच्ची सन्तुष्टता किसी वस्तु, धन या परिस्थिति पर निर्भर नहीं होती, बल्कि आत्मा की आन्तरिक स्थिति होती है। जब आत्मा परमात्मा से अपने वास्तविक सम्बन्ध को पहचान लेती है, तब कमी की भावना समाप्त होने लगती है।
प्रश्न 2. आज सुविधाएँ बढ़ने के बाद भी लोग असन्तुष्ट क्यों हैं?
उत्तर: क्योंकि बाहरी सुविधाएँ मन की शान्ति की गारंटी नहीं देतीं। सन्तुष्टता का आधार दृष्टिकोण, आत्मिक शक्ति और परमात्मा से जुड़ाव है, न कि केवल भौतिक उपलब्धियाँ।
प्रश्न 3. सन्तुष्ट आत्मा की क्या पहचान है?
उत्तर: सन्तुष्ट आत्मा स्वयं को प्रिय होती है, दूसरों को भी प्रिय लगती है और परमात्मा को भी प्रिय होती है। वह शिकायत कम करती है और कृतज्ञता अधिक अनुभव करती है।
प्रश्न 4. सन्तोष परिस्थिति से आता है या दृष्टिकोण से?
उत्तर: सन्तोष परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण और सोच से उत्पन्न होता है। समान परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति अधिक सन्तुष्ट रहता है।
प्रश्न 5. परिस्थितियाँ हमें क्यों विचलित कर देती हैं?
उत्तर: क्योंकि हम स्वयं को परिस्थितियों से जोड़ लेते हैं। यदि आत्मा अपनी मूल स्थिति में स्थिर रहे, तो वह हर परिस्थिति से ऊपर उठ सकती है।
प्रश्न 6. बापदादा ने परिस्थितियों को किस उदाहरण से समझाया है?
उत्तर: बापदादा ने कहा कि हर परिस्थिति को “कार्टून शो” या “पपेट शो” समझो। अर्थात समस्याएँ अस्थायी हैं; आत्मा को उनका दास नहीं बनना चाहिए।
प्रश्न 7. सन्तुष्टता का पहला आधार क्या है?
उत्तर: परमात्मा से अविनाशी सम्बन्ध। यही सम्बन्ध आत्मा को सुरक्षा, प्रेम, शक्ति और स्थिरता प्रदान करता है।
प्रश्न 8. परमात्मा से कौन-कौन से सम्बन्ध अनुभव किए जा सकते हैं?
उत्तर: परमात्मा पिता, माता, शिक्षक, सखा, साथी और सतगुरु—सभी सम्बन्धों का अनुभव कराते हैं।
प्रश्न 9. परमात्मा का सम्बन्ध आत्मा को क्या प्रदान करता है?
उत्तर: आत्मिक सुरक्षा, आत्मविश्वास, आशा, प्रेम और हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।
प्रश्न 10. सन्तुष्टता का दूसरा आधार क्या है?
उत्तर: वास्तविक सम्पत्ति—ज्ञान, गुण, शक्तियाँ, पवित्र संस्कार और श्रेष्ठ संकल्प।
प्रश्न 11. केवल धन से सन्तुष्टता क्यों नहीं मिलती?
उत्तर: क्योंकि धन सुविधा दे सकता है, लेकिन धैर्य, प्रेम, शान्ति, विनम्रता और सुख नहीं दे सकता। वास्तविक सम्पन्नता गुणों और शक्तियों में है।
प्रश्न 12. सबसे बड़ी सम्पत्ति किसे कहा गया है?
उत्तर: ज्ञान, दिव्य गुण, आत्मिक शक्तियाँ और श्रेष्ठ संस्कार ही सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं।
प्रश्न 13. सन्तुष्टता का तीसरा आधार क्या है?
उत्तर: आत्मिक सेहत अर्थात आत्मा की तन्दुरुस्ती।
प्रश्न 14. आत्मिक स्वास्थ्य क्यों आवश्यक है?
उत्तर: क्योंकि आत्मा ही सोचती, निर्णय लेती, प्रेम करती और अनुभव करती है। आत्मा शक्तिशाली होगी तो जीवन भी संतुलित और सुखमय होगा।
प्रश्न 15. आत्मा शक्तिशाली होने पर क्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर: तनाव कम होता है, निर्णय स्पष्ट होते हैं, सम्बन्ध मधुर बनते हैं और जीवन हल्का व आनन्दमय अनुभव होता है।
प्रश्न 16. मोबाइल की बैटरी का उदाहरण हमें क्या सिखाता है?
उत्तर: जैसे बिना बैटरी के मोबाइल काम नहीं करता, वैसे ही आत्मिक शक्ति के बिना केवल शरीर की देखभाल पर्याप्त नहीं होती।
प्रश्न 17. क्या केवल वरदान सुन लेने से जीवन बदल जाता है?
उत्तर: नहीं। वरदानों का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब उन्हें व्यवहार में उतारा जाए।
प्रश्न 18. किसान और बीज का उदाहरण क्या सिखाता है?
उत्तर: जैसे बीज बोए बिना फसल नहीं मिलती, वैसे ही ज्ञान को जीवन में उतारे बिना उसका फल प्राप्त नहीं होता।
प्रश्न 19. प्रतिदिन स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
उत्तर:
- क्या आज मैंने परमात्मा से अपना सम्बन्ध अनुभव किया?
- क्या आज मैंने अपने गुणों का उपयोग किया?
- क्या आज मेरी आत्मा शान्त और शक्तिशाली रही?
प्रश्न 20. इस पूरे अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: सच्ची सन्तुष्टता परमात्मा से अविनाशी सम्बन्ध, दिव्य गुणों की सम्पत्ति और आत्मिक तन्दुरुस्ती से प्राप्त होती है। यही जीवन की वास्तविक सम्पन्नता और स्थायी सुख का आधार है।
मुख्य बिंदु (Quick Revision)
प्रश्न: सन्तुष्टता कहाँ से जन्म लेती है?
उत्तर: आत्मा की आन्तरिक स्थिति से।
प्रश्न: सन्तुष्टता का पहला आधार क्या है?
उत्तर: परमात्मा से अविनाशी सम्बन्ध।
प्रश्न: सन्तुष्टता का दूसरा आधार क्या है?
उत्तर: ज्ञान, गुण और शक्तियों की सम्पत्ति।
प्रश्न: सन्तुष्टता का तीसरा आधार क्या है?
उत्तर: आत्मा की तन्दुरुस्ती (आत्मिक स्वास्थ्य)।
प्रश्न: ज्ञान का वास्तविक लाभ कब मिलता है?
उत्तर: जब उसे जीवन में व्यवहार के रूप में अपनाया जाता है।
प्रश्न: बापदादा का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: परमात्मा से जुड़े जीवन में ही वास्तविक सन्तुष्टता, शान्ति और सम्पन्नता प्राप्त होती है।
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