‘प्रश्न मंथन:-सच्चा प्यार किसे कहते हैं?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
‘सच्चा प्यार किसे कहते हैं?
श्रीमत वर्सेस परमत।
एक तरफ है श्रीमत। दूसरी तरफ है हमारी परमत।
मेरे से अलग। मैं आत्मा से अलग। देह भी मेरे साथ ट्रैवल करे।
बाबा के साथ प्यार — सच्चा प्यार किसे कहते हैं?
सच्चा स्नेही बनो जिसे बाप बाबा ने
स्मृति दिवस, शांति दिवस, शक्ति दिवस और समर्थ दिवस कहा।
बाबा ने इसे क्या नाम दिए?
स्मृति दिवस, शांति दिवस, शक्ति दिवस और समर्थ दिवस। ये चार उसके नाम।
ये वे दिन हैं जब बाबा हमें बहुत गहराई से एक ही बात समझाते हैं।
कौन सी बात समझाते हैं? — सच्चे स्नेही बनो।
सच्चा प्यार बनाम झूठा प्यार — कौन सा प्रेम बाबा स्वीकार करते हैं?
मुरली है 18 जनवरी 2008
सच्चा बच्चे, सच्चा स्नेही वही है जो सिर्फ मेरी श्रीमत पर चलता है।
बच्चे सच्चा स्नेही वही है जो सिर्फ मेरी श्रीमत पर चलता।
सवाल: क्या झूठा प्यार भी होता है?
झूठा प्यार क्या होता है?
प्यार तो प्यार होता है—सच्चा करो, झूठा करो।
बाबा कहते हैं — हाँ, बहुत होता है।
उदाहरण: दिखावटी प्रेम
जैसे कोई व्यक्ति ऊपर-ऊपर से मुस्कुराता है, प्यार जताता है
पर अंदर उसमें आपके लिए कोई भावना नहीं।
यह है दिखावटी प्रेम।
श्रीमत और परमत का अंतर — यह असली समझ है।
मुरली पॉइंट:
श्रीमत आत्मा की उन्नति कराती है
और परमत देह की।
श्रीमत आत्मा की उन्नति करती है,
परमत देह की उन्नति करती है।
श्रीमत — आत्मा की भलाई, शांति, स्थायी सुख, कल्याण कहलाती है।
परमत — देह की भलाई, क्षणिक सुख, दुख का कारण, बंधनों में फँसाती है।
उदाहरण:
बाबा कहते हैं — समय पर अमृतवेले उठो।
श्रीमत — आत्मा को शक्तिशाली बनाती है।
परमत — देह को आराम दे, अभिमान बढ़ाए।
आराम → आत्मा कमजोर।
आत्मा चेतना बनाम देह चेतना → प्यार की असली कसौटी।
मुरली पॉइंट:
आत्मा से प्यार सत्य है।
देह से प्यार असत्य है।
देह आधारित प्यार कैसा?
मेरा बेटा, मेरा परिवार, मेरी गाड़ी, मेरा घर —
हर “मेरा” एक बोझ है।
आत्मा आधारित प्यार — “मैं आत्मा हूँ, ये आत्माएं मेरे भाई।”
ये प्यार निर्बल नहीं, शक्तिशाली बनाता है।
बाबा से सच्चा प्यार क्या है?
एक ही उत्तर — शिव बाबा का कहना मानना ही सच्चा प्यार है।
सच्चा प्यार = केवल एक शिव बाबा का कहना मानना।
ना कोई बाप, ना मित्र, ना माँ, ना टीचर, ना गुरु,
ना दुनिया का कोई राजा —
जिसकी भी बात बाबा की श्रीमत के विरुद्ध होगी,
वो प्रेम झूठा है।
उदाहरण:
कोई प्रिय व्यक्ति कहे — “आज क्लास मत जाना, बाद में देख लेना।”
अगर आप रुक जाते हैं — यह परमत।
अगर आप क्लास चले जाते हैं — यह श्रीमत, यही सच्चा प्यार है।
“मेरा-मेरा” बोझ कैसे बनता है?
बाबा की गहरी शिक्षा:
मेरा-मेरा बोझ उतार दो।
जिन्हें तुमने “मेरा” कहा है, वही तुम्हारा बोझ बने हुए हैं।
मेरा शरीर → 60–90 किलो नहीं, उससे भी भारी बोझ।
मेरा घर, मेरा बच्चा, मेरा पैसा, मेरा मकान, मेरा संसार —
जितना “मेरा” बढ़ेगा, उतना बोझ बढ़ता जाएगा।
उपयोग करो → परंतु फँसो मत।
यूज़ करो → परंतु अटैच मत हो।
उदाहरण:
घर का उपयोग ठीक है,
पर घर को दिल में बैठा लिया → बोझ।
किसी से मिलना ठीक है,
पर उसे “मेरा” बना लिया → बंधन।
बाबा कहते हैं:
मिल गया तो भी अच्छा, ना मिला तो भी अच्छा।
क्योंकि हमें वही मिलता है जिसके साथ हमारा पार्ट है।
सिर्फ एक को कभी मत छोड़ना — शिव बाबा।
हर वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति को भूल सकते हो —
पर शिव बाबा को नहीं भूलना है।
यही सच्चा प्रेम है।
यही सच्ची स्मृति है।
यही सच्चा स्नेह है।
श्रीमत पर चलना — मेहनत नहीं, मोहब्बत है।
मेहनत नहीं करनी, प्यार करना है।
जिससे मोहब्बत होती है उसका कहना मानना कभी कठिन नहीं लगता।
जैसे बच्चा माँ की बात प्रेम से मानता है,
वैसे ही हमें बाबा की श्रीमत माननी है।
निष्कर्ष:
बाबा का सरल संदेश —
प्यार करो, “मेरा-मेरा” छोड़ो।
श्रीमत पर चलो, बोझ उतारो।
सिर्फ एक को याद करो — मैं तुम्हारा कल्याणकारी हूँ।

