AT.S.-(14)क्या अति इंद्रिय सुख कर्म बंधन काट सकता है?
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
भूमिका: एक गहरा और व्यवहारिक प्रश्न
अक्सर साधकों के मन में यह प्रश्न उठता है –
जब मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होता है, तो क्या मेरे कर्म कट रहे हैं?
क्या यह अनुभव ही कर्म बंधन से मुक्ति दिला देता है?
आज हम इस विषय को भावना से नहीं, बल्कि मुरली और ज्ञान की कसौटी पर समझेंगे।
1️⃣ कर्म बंधन क्या है?
कर्म बंधन आत्मा द्वारा किए गए कर्मों के संस्कार और हिसाब‑किताब हैं।
- किसी को सुख दिया → बंधन बना
- किसी को दुख दिया → बंधन बना
देने वाला भी बंधता है, लेने वाला भी बंधता है।
क्योंकि घर जाने से पहले हिसाब बराबर होना ही है।
2️⃣ कर्मों के तीन प्रकार
① संचित कर्म
पिछले जन्मों के वे कर्म जिनका हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ। इनका फल –
- इस जन्म में भी मिल सकता है
- अगले जन्म में भी
② प्रारब्ध कर्म
वर्तमान जीवन में जो सुख‑दुख हम भोग रहे हैं, वह संचित कर्मों का फल है।
③ क्रियामान कर्म
जो कर्म हम अभी कर रहे हैं। इनका फल भविष्य में मिलेगा।
3️⃣ क्रिया‑प्रतिक्रिया का नियम
हर क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चित है।
- वर्तमान क्रिया
- भूत के संस्कार
- भविष्य का फल
तीनों एक साथ जुड़े हुए हैं।
कर्म कभी अकेले नहीं चलते।
4️⃣ वर्ल्ड ड्रामा और कर्म का रहस्य
5000 वर्ष के सृष्टि चक्र में –
- संचित
- प्रारब्ध
- क्रियामान
तीनों कर्म चलते रहते हैं।
अनादि‑अविनाशी वर्ल्ड ड्रामा में –
हर क्रिया ही संचित भी है और प्रारब्ध भी।
कर्म रुकता नहीं, लेन‑देन चलता ही रहता है।
5️⃣ मुरली प्रमाण: कर्म और योग
📖 मुरली – 24 जनवरी 1968
“कर्मों का हिसाब अटल है, पर योग से परिवर्तन होता है।”
योग से क्या परिवर्तन होता है?
- सामना करने की शक्ति
- दुख का प्रभाव कम
- प्रतिक्रिया में कमी
6️⃣ अतीन्द्रिय सुख क्या है?
अतीन्द्रिय सुख वह आनंद है जो –
- आत्मा को
- परमात्मा से जुड़ने पर
अनुभव होता है।
यह अनुभव है, कर्म काटने की क्रिया नहीं।
📖 मुरली – 2 फरवरी 1968
“ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।”
7️⃣ स्पष्ट उत्तर (ज्ञान की कसौटी पर)
❌ अतीन्द्रिय सुख सीधे कर्म नहीं काटता
✅ लेकिन कर्म काटने की भूमि तैयार करता है
उदाहरण
जैसे –
- दवा से राहत मिलती है
- लेकिन बीमारी नियम और परहेज से जाती है
8️⃣ कर्म काटने के चार मुख्य साधन
1️⃣ आत्म‑अभिमानी स्थिति
2️⃣ निरंतर योग (याद)
3️⃣ पवित्रता
4️⃣ साक्षी भाव से कर्म
इनसे –
- सहनशक्ति बढ़ती है
- प्रतिक्रिया कम होती है
- शांति बढ़ती है
9️⃣ अनुभव में अटकने का खतरा
केवल अनुभव को ही मुक्ति समझ लेना – यह भी सूक्ष्म बंधन है।
📖 अव्यक्त वाणी – 21 मार्च 1987
“अनुभव में अटक जाना भी सूक्ष्म बंधन है।”
🔟 कर्म कटने के वास्तविक लक्षण
✔️ प्रतिक्रिया समाप्त होना
✔️ सहनशक्ति का बढ़ना
✔️ हर परिस्थिति में शांति
✔️ संस्कारों में परिवर्तन
✔️ दुख का प्रभाव कम होना
1️⃣1️⃣ अनुभव, योग और कर्म का सही समीकरण
- अनुभव → प्रेरणा देता है (क्षणिक)
- योग → शक्ति देता है (निरंतर)
- कर्म → स्थायी परिवर्तन करता है
योग‑बल कर्म काटता है, अनुभव योग की याद दिलाता है।
🔚 निष्कर्ष
❌ अतीन्द्रिय सुख कर्म बंधन नहीं काटता
✅ लेकिन –
- मार्ग पर टिकाता है
- योग में स्थिर करता है
- कर्म परिवर्तन की शक्ति जगाता है
✨ अंतिम सूत्र
अनुभव = शाबाशी
मुक्ति = निरंतर योग + पुरुषार्थ
🕊️ Om Shanti
प्रश्न 1: जब मुझे अतीन्द्रिय सुख का अनुभव होता है, तो क्या मेरे कर्म कट रहे होते हैं?
उत्तर:
नहीं। अतीन्द्रिय सुख एक अनुभव है, कर्म काटने की क्रिया नहीं। यह अनुभव आत्मा को प्रेरित करता है, लेकिन सीधे कर्म नहीं काटता।
प्रश्न 2: क्या अतीन्द्रिय सुख का अनुभव ही कर्म बंधन से मुक्ति दिला देता है?
उत्तर:
नहीं। मुक्ति निरंतर योग और पुरुषार्थ से मिलती है। अनुभव मार्ग पर टिकाता है, पर मंज़िल नहीं है।
प्रश्न 3: कर्म बंधन क्या होता है?
उत्तर:
कर्म बंधन आत्मा द्वारा किए गए कर्मों के संस्कार और हिसाब-किताब हैं।
-
किसी को सुख दिया → बंधन
-
किसी को दुख दिया → बंधन
देने वाला भी बंधता है, लेने वाला भी—क्योंकि घर जाने से पहले हिसाब बराबर होना ही है।
प्रश्न 4: कर्म कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
तीन प्रकार—
1️⃣ संचित कर्म: पिछले जन्मों के अधूरे हिसाब; फल इस या अगले जन्म में।
2️⃣ प्रारब्ध कर्म: वर्तमान जीवन के सुख-दुख; संचित का फल।
3️⃣ क्रियामान कर्म: अभी किए जा रहे कर्म; फल भविष्य में।
प्रश्न 5: क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम क्या कहता है?
उत्तर:
हर क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चित है।
वर्तमान क्रिया, भूत के संस्कार और भविष्य का फल—तीनों एक साथ जुड़े होते हैं। कर्म कभी अकेले नहीं चलते।
प्रश्न 6: वर्ल्ड ड्रामा में कर्म कैसे चलते हैं?
उत्तर:
5000 वर्ष के सृष्टि चक्र में संचित, प्रारब्ध और क्रियामान—तीनों चलते रहते हैं।
अनादि-अविनाशी ड्रामा में हर क्रिया ही संचित भी है और प्रारब्ध भी। लेन-देन निरंतर चलता है।
प्रश्न 7: मुरली कर्म और योग के बारे में क्या कहती है?
उत्तर (मुरली प्रमाण):
मुरली – 24 जनवरी 1968
“कर्मों का हिसाब अटल है, पर योग से परिवर्तन होता है।”
योग से—
-
सामना करने की शक्ति बढ़ती है
-
दुख का प्रभाव कम होता है
-
प्रतिक्रिया घटती है
प्रश्न 8: अतीन्द्रिय सुख क्या है?
उत्तर:
अतीन्द्रिय सुख वह आनंद है जो आत्मा को परमात्मा से जुड़ने पर अनुभव होता है।
यह अनुभव है, कर्म काटने की क्रिया नहीं।
मुरली – 2 फरवरी 1968
“ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।”
प्रश्न 9: तो स्पष्ट उत्तर क्या है—क्या अतीन्द्रिय सुख कर्म काटता है?
उत्तर:
सीधे कर्म नहीं काटता
✅ लेकिन कर्म काटने की भूमि तैयार करता है
उदाहरण: दवा से राहत मिलती है, बीमारी नियम और परहेज से जाती है।
प्रश्न 10: कर्म काटने के मुख्य साधन कौन-से हैं?
उत्तर:
1️⃣ आत्म-अभिमानी स्थिति
2️⃣ निरंतर योग (याद)
3️⃣ पवित्रता
4️⃣ साक्षी भाव से कर्म
इनसे सहनशक्ति बढ़ती है, प्रतिक्रिया कम होती है, शांति बढ़ती है।
प्रश्न 11: अनुभव में अटकने का खतरा क्या है?
उत्तर:
केवल अनुभव को ही मुक्ति मान लेना—यह भी सूक्ष्म बंधन है।
अव्यक्त वाणी – 21 मार्च 1987
“अनुभव में अटक जाना भी सूक्ष्म बंधन है।”
प्रश्न 12: कर्म कटने के वास्तविक लक्षण क्या हैं?
उत्तर:
✔️ प्रतिक्रिया का समाप्त होना
✔️ सहनशक्ति बढ़ना
✔️ हर परिस्थिति में शांति
✔️ संस्कारों में परिवर्तन
✔️ दुख का प्रभाव कम होना
प्रश्न 13: अनुभव, योग और कर्म का सही समीकरण क्या है?
उत्तर:
-
अनुभव → प्रेरणा देता है (क्षणिक)
-
योग → शक्ति देता है (निरंतर)
-
कर्म → स्थायी परिवर्तन करता है
योग-बल कर्म काटता है; अनुभव योग की याद दिलाता है।
निष्कर्ष
अतीन्द्रिय सुख कर्म बंधन नहीं काटता
लेकिन—मार्ग पर टिकाता है, योग में स्थिर करता है, कर्म-परिवर्तन की शक्ति जगाता है।
डिस्क्लेमर
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के साकार एवं अव्यक्त मुरली ज्ञान पर आधारित आध्यात्मिक विवेचना है। यह किसी प्रकार की चिकित्सीय, मानसिक या कानूनी सलाह नहीं है। दर्शक इसे आध्यात्मिक समझ और आत्मिक पुरुषार्थ के लिए सुनें।
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