(19)”12-03-1984 “Satisfaction”


अव्यक्त मुरली-(19)”12-03-1984 “सन्तुष्टता”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

12-03-1984 “सन्तुष्टता”

आज बापदादा चारों ओर के दूर होते समीप रहने वाले सभी बच्चों की सन्तुष्टता वा रुहानियत और प्रसन्नता की मुस्कराहट देख रहे थे। सन्तुष्टता, रुहानियत की सहज विधि है, प्रसन्नता सहज सिद्धि है। जिसके पास सन्तुष्टता है वह सदा प्रसन्न स्वरुप अवश्य दिखाई देगा। सन्तुष्टता सर्व प्राप्ति स्वरुप है। सन्तुष्टता सदा हर विशेषता को धारण करने में सहज साधन है। सन्तुष्टता का खजाना सर्व खजानों को स्वत: ही अपनी तरफ आकर्षित करता है। सन्तुष्टता ज्ञान की सब्जेक्ट का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सन्तुष्टता बेफिकर बादशाह बनाती है। सन्तुष्टता सदा स्वमान की सीट पर सेट रहने का साधन है। सन्तुष्टता महादानी, विश्व कल्याणी, वरदानी सदा और सहज बनाती है। सन्तुष्टता हद के मेरे तेरे के चक्र से मुक्त कराए स्वदर्शन चक्रधारी बनाती है। सन्तुष्टता सदा निर्विकल्प, एकरस के विजयी आसन की अधिकारी बनाती है। सदा बापदादा के दिलतख्तनशीन, सहज स्मृति के तिलकधारी, विश्व परिवर्तन के सेवा के ताजधारी, इसी अधिकार के सम्पन्न स्वरुप में स्थित करती है। सन्तुष्टता ब्राह्मण जीवन का जीयदान है। ब्राह्मण जीवन की उन्नति का सहज साधन है। स्व से सन्तुष्ट, परिवार से सन्तुष्ट और परिवार उनसे सन्तुष्ट। किसी भी परिस्थिति में रहते हुए, वायुमण्डल, वायब्रेशन की हलचल में भी सन्तुष्ट। ऐसे सन्तुष्टता स्वरुप, श्रेष्ठ आत्मा विजयी रत्न के सर्टीफिकेट के अधिकारी है। तीन सर्टीफिकेट लेने पड़ें:-

(1) स्व की स्व से सन्तुष्टता (2) बाप द्वारा सदा सन्तुष्टता (3) ब्राह्मण परिवार द्वारा सन्तुष्टता।

इससे अपने वर्तमान और भविष्य को श्रेष्ठ बना सकते हो। अभी भी सर्टीफिकेट लेने का समय है। ले सकते हैं लेकिन ज्यादा समय नहीं है। अभी लेट हैं लेकिन टूलेट नहीं हैं। अभी भी सन्तुष्टता की विशेषता से आगे बढ़ सकते हो। अभी लास्ट सो फास्ट सो फर्स्ट की मार्जिन है। फिर लास्ट सो लास्ट हो जायेंगे। तो आज बापदादा इसी सर्टीफिकेट को चेक कर रहे थे। स्वयं भी स्वयं को चेक कर सकते हो। प्रसन्नचित हैं या प्रश्नचित हैं? डबल विदेशी प्रसन्नचित वा सन्तुष्ट हैं? प्रश्न खत्म हुए तो प्रसन्न हो ही गये। सन्तुष्टता का समय ही संगमयुग है। सन्तुष्टता का ज्ञान अभी है। वहाँ इस सन्तुष्ट, असन्तुष्ट के ज्ञान से परे होंगे। अभी संगमयुग का ही यह खजाना है। सभी सन्तुष्ट आत्मायें सर्व को सन्तुष्टता का खजाना देने वाली हो। दाता के बच्चे मास्टर दाता हो। इतना जमा किया है ना! स्टॉक फुल कर दिया है या थोड़ा कम रह गया है? अगर स्टाक कम है तो विश्व कल्याणकारी नहीं बन सकते। सिर्फ कल्याणी बन जायेंगे। बनना तो बाप समान है ना। अच्छा।

सभी देश विदेश के सर्व खजानों से सम्पन्न मास्टर सर्वशक्तिवान होकर जा रहे हो ना! आना है तो जाना भी है। बाप भी आते हैं तो जाते भी हैं ना। बच्चे भी आते हैं और सम्पन्न बनकर जाते हैं। बाप समान बनाने के लिए जाते हैं। अपने ब्राह्मण परिवार की वृद्धि करने के लिए जाते हैं। प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने जाते हैं। इसीलिए जा रहे हो ना! अपनी दिल से वा बन्धन से नहीं जा रहे हो। लेकिन बाप के डायरेक्शन से सेवा प्रति थोड़े समय के लिए जा रहे हो! ऐसे समझ जा रहे हो ना? ऐसे नहीं कि हम तो हैं ही अमेरिका के, आस्ट्रेलिया के… नहीं। थोड़े समय के लिए बापदादा ने सेवा के प्रति निमित्त बनाकर भेजा है। बापदादा भेज रहे हैं, अपने मन से नहीं जाते। मेरा घर है, मेरा देश है। नहीं! बाप सेवास्थान पर भेज रहे हैं। सभी सदा न्यारे और बाप के प्यारे! कोई बन्धन नहीं। सेवा का भी बन्धन नहीं। बाप ने भेजा है बाप जाने। निमित्त बने हैं, जब तक और जहाँ निमित्त बनावे तब तक के लिए निमित्त हैं। ऐसे डबल लाइट हो ना! पाण्डव भी न्यारे और प्यारे हैं ना। बन्धन वाले तो कोई नहीं हैं। न्यारा बनना ही प्यारा बनना है। अच्छा।

सदा सन्तुष्टता की रुहानियत में रहने वाले, प्रसन्नचित रहने वाले, सदा हर संकल्प, बोल, कर्म द्वारा सर्व को सन्तुष्टता का बल देने वाले, दिलशिकस्त आत्माओं को खजानों से शक्तिशाली बनाने वाले, सदा विश्व कल्याणकारी बेहद के बेफिकर बादशाहों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादी जी तथा दादी जानकी जी से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

होलीहंसों की रुप-बसन्त की जोड़ी अच्छी है। यह (जानकी दादी) शान्ति से रुप बन सेवा ज्यादा पसन्द करती है और इनको (दादी जी को) तो बोलना ही पड़ता है। यह जब भी चाहे एकान्त में चली जाती है। इसे रुप की सेवा पसन्द है, वैसे तो आलराउन्ड हैं सभी लेकिन फिर भी रुप-बसन्त की जोड़ी है। वैसे दोनों ही संस्कारों की आवश्यकता है – जहाँ वाणी काम नहीं करेगी तो रुप काम करेगा और जहाँ रुप काम नहीं कर सकता वहाँ बसन्त काम करेगा। तो जोड़ी अच्छी है। जो जोड़ी बनती है, वह सब अच्छी है। वह भी जोड़ी अच्छी थी – यह भी अच्छी है। (दीदी के लिए) ड्रामा में वह गुप्त नदी हो गई। उनसे डबल विदेशियों का भी बहुत प्यार है। कोई बात नहीं। दीदी का दूसरा रुप देख लिया। सब देखकर कितने खुश होते हैं। सभी महारथी साथ हैं। बृजइन्द्रा, निर्मलशान्ता सब दूर होते भी साथी हैं! शक्तियों का अच्छा सहयोग है। सभी एक दो को आगे रखने के कारण आगे बढ़ रहे हैं। और निमित्त शक्तियों को आगे रखने के कारण सब आगे हैं। सेवा के बढ़ने का कारण ही यह है, एक दो को आगे बढ़ाना। आपस में प्यार है, युनिटी है। सदा दूसरे की विशेषता वर्णन करना – यही सेवा में वृद्धि करना है। इसी विधि से सदा वृद्धि हुई है और होती रहेगी। सदैव विशेषता देखना और विशेषता देखने का औरों को सिखाना, यही संगठन की माला की डोर है। मोती भी तो धागे में पिरोते हैं ना। संगठन का धागा है ही यह। विशेषता के सिवाए और कोई वर्णन नहीं क्योंकि मधुबन महान भूमि है। महा भाग्य भी है तो महा पाप भी है, मधुबन में जा करके अगर ऐसा कोई व्यर्थ बोलता है तो उसका बहुत पाप बन जाता है। इसलिए सदैव विशेषता देखने का चश्मा पड़ा हुआ हो। व्यर्थ देख नहीं सकते। जैसे लाल चश्मे से सिवाए लाल के और कुछ देखते हैं क्या! तो सदैव यही चश्मा पड़ा हुआ हो – विशेषता देखने का। कभी कोई बात देखो भी तो उसका वर्णन कभी नहीं करो। वर्णन किया, भाग्य गया। कुछ भी कमी आदि है तो उसका जिम्मेवार बाप है, निमित्त किसने बनाया! बाप ने। तो निमित्त बने हुए की कमी वर्णन करना माना बाप की कमी वर्णन करना। इसलिए इन्हों के लिए कभी भी बिना शुभ भावना के और कोई वर्णन नहीं कर सकते।

बापदादा तो आप रत्नों को अपने से भी श्रेष्ठ देखते हैं। बाप का श्रृंगार यह हैं ना। तो बाप को श्रृंगारने वाले बच्चे तो श्रेष्ठ हुए ना। बापदादा तो बच्चों की महिमा कर खुश होते रहते हैं। वाह मेरा फलाना रत्न, वाह मेरा फलाना रत्न। यही महिमा करते रहते हैं। बाप कभी किसकी कमजोरी को नहीं देखते। ईशारा भी देते तो भी विशेषता पूर्वक रिगार्ड के साथ इशारा देते हैं। नहीं तो बाप को अथॉरिटी है ना, लेकिन सदैव रिगार्ड देकर फिर ईशारा देते हैं। यही बाप की विशेषता सदा बच्चों में भी इमर्ज रहे। फालो फादर करना है ना।

बापदादा के आगे सभी मुख्य बहनें (दादियां) बैठी हैं:-

जीवनमुक्त जनक आपका गायन है ना। जीवनमुक्त और विदेही दो टाइटिल हैं। (दादी के लिए) यह तो है ही मणि। सन्तुष्ट मणी, मस्तक मणी, सफलता की मणी, कितनी मणियां हैं। सब मणियां ही मणियां हैं। मणियों को कितना भी छिपाके रखो लेकिन मणी की चमक कभी छिप नहीं सकती। धूल में भी चमकेगी, लाइट का काम करेगी। इसलिए नाम भी वही है, काम भी वही है। इनका भी गुण वही है, देह मुक्त जीवन मुक्त। सदा जीवन की खुशी के अनुभव की गहाराई में रहती हैं। इसको ही कहते हैं जीवन मुक्त।

अध्याय : सन्तुष्टता

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 12 मार्च 1984)


1️⃣ सन्तुष्टता: रुहानियत की सहज विधि, प्रसन्नता की सिद्धि

बापदादा आज चारों ओर के बच्चों की
सन्तुष्टता, रुहानियत और प्रसन्नता की मुस्कराहट देख रहे थे।

 Murli Note (12-03-1984)

“सन्तुष्टता, रुहानियत की सहज विधि है
और प्रसन्नता सहज सिद्धि है।”

 जिसके पास सन्तुष्टता है —
वह आत्मा स्वतः ही प्रसन्न स्वरूप दिखाई देती है।


2️⃣ सन्तुष्टता = सर्व-प्राप्ति स्वरूप

बापदादा सन्तुष्टता को सिर्फ एक गुण नहीं,
सर्व-प्राप्तियों का स्वरूप बताते हैं।

 Murli Points

  • सन्तुष्टता हर विशेषता को धारण करने का सहज साधन है

  • सन्तुष्टता का खजाना, सभी खजानों को स्वतः आकर्षित करता है

  • सन्तुष्टता ज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण है

  • सन्तुष्टता बेफिकर बादशाह बनाती है

अर्थ
जो आत्मा सन्तुष्ट है,
वह परिस्थितियों से नहीं,
स्वमान की सीट से निर्णय करती है।


3️⃣ सन्तुष्ट आत्मा की पहचान

 Murli Note (12-03-1984)

“सन्तुष्टता स्वमान की सीट पर सदा सेट रहने का साधन है।”

सन्तुष्ट आत्मा:
✔ महादानी
✔ विश्व-कल्याणी
✔ वरदानी
✔ स्वदर्शन चक्रधारी
✔ निर्विकल्प, एकरस स्थिति की अधिकारी

 ऐसी आत्माएँ:
दिलतख्तनशीन, तिलकधारी और सेवा के ताजधारी बन जाती हैं।


4️⃣ सन्तुष्टता: ब्राह्मण जीवन का जीयदान

बापदादा कहते हैं —
सन्तुष्टता कोई साधारण बात नहीं,
यह ब्राह्मण जीवन का जीयदान है।

 सन्तुष्ट जीवन का सूत्र

  • स्व से सन्तुष्ट

  • परिवार से सन्तुष्ट

  • और परिवार उनसे सन्तुष्ट

 परिस्थिति, वायुमण्डल या वायब्रेशन
— किसी में भी सन्तुलन न खोना
यही सच्ची सन्तुष्टता है।


5️⃣ तीन सर्टीफिकेट: विजयी रत्न बनने की शर्त

 Murli Note (12-03-1984)

“सन्तुष्ट आत्मा विजयी रत्न के सर्टीफिकेट की अधिकारी है।”

तीन अनिवार्य सर्टीफिकेट
1️⃣ स्व की स्व से सन्तुष्टता
2️⃣ बाप द्वारा सन्तुष्टता
3️⃣ ब्राह्मण परिवार द्वारा सन्तुष्टता

यही सर्टीफिकेट
वर्तमान और भविष्य — दोनों को श्रेष्ठ बनाते हैं।


6️⃣ अभी लेट हैं, लेकिन टू-लेट नहीं

बापदादा बच्चों को चेतावनी भी देते हैं और उत्साह भी:

 Murli Line

“अभी लास्ट सो फास्ट सो फर्स्ट की मार्जिन है।”

 अभी भी समय है —
लेकिन ज्यादा समय नहीं है
जो अभी सन्तुष्टता जमा करेगा,
वही आगे विश्व-कल्याणकारी बनेगा।


7️⃣ प्रश्नचित या प्रसन्नचित? अपना चेक-अप

बापदादा पूछते हैं —
आप प्रश्नचित हैं या प्रसन्नचित?

Murli Insight

  • प्रश्न खत्म हुए → प्रसन्नता स्वतः आ गई

  • सन्तुष्टता का खजाना सिर्फ संगमयुग का है

 आगे चलकर
सन्तुष्ट-असन्तुष्ट का ज्ञान भी समाप्त हो जाएगा।


8️⃣ मास्टर दाता बनो, स्टॉक फुल करो

बापदादा कहते हैं —
आप दाता के बच्चे हो,
इसलिए मास्टर दाता बनो।

 सवाल:

  • स्टॉक फुल है या कम है?

अगर सन्तुष्टता का स्टॉक कम है —
तो आत्मा सिर्फ कल्याणी बनेगी,
विश्व-कल्याणकारी नहीं


9️⃣ सेवा के लिए जाना = बाप के डायरेक्शन पर जाना

बापदादा स्पष्ट करते हैं —
देश-विदेश में जाना मन से नहीं,
बाप के डायरेक्शन से है।

 Murli Points

  • कोई मेरा देश, मेरा घर नहीं

  • सब बाप का है

  • हम सिर्फ निमित्त हैं

न्यारे और प्यारे बनना
यही सच्ची डबल-लाइट स्थिति है।


🔟 विशेष शिक्षा: विशेषता देखने का चश्मा

बापदादा संगठन का गूढ़ रहस्य बताते हैं:

 Murli Line

“सदैव विशेषता देखने का चश्मा पहनो।”

 नियम

  • कमी देखो भी — तो वर्णन मत करो

  • वर्णन किया → भाग्य गया

  • निमित्त की कमी देखना = बाप की कमी देखना

 यही युनिटी और वृद्धि का सूत्र है।


 समापन आशीर्वचन (Blessing)

सदा —
 सन्तुष्टता की रुहानियत में रहने वाले
 प्रसन्नचित स्वरूप में स्थित

हर संकल्प, बोल और कर्म से
सन्तुष्टता का बल देने वाले
 विश्व-कल्याणकारी, बेफिकर बादशाह बनने वाले

ब्राह्मण जीवन का जीयदान

(अव्यक्त बापदादा मुरली – 12 मार्च 1984 पर आधारित प्रश्न–उत्तर)


 प्रश्न 1: बापदादा आज बच्चों में कौन-सी विशेष स्थिति देख रहे थे?

उत्तर:
बापदादा सभी बच्चों की सन्तुष्टता, रुहानियत और प्रसन्नता की मुस्कराहट देख रहे थे। यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि आत्मा भीतर से भरपूर है।


 प्रश्न 2: सन्तुष्टता और प्रसन्नता में क्या अन्तर है?

उत्तर:
सन्तुष्टता रुहानियत की सहज विधि है और प्रसन्नता उसकी सहज सिद्धि है। जिसके पास सन्तुष्टता है, वह स्वतः ही प्रसन्न स्वरूप दिखाई देता है।


 प्रश्न 3: सन्तुष्टता को “सर्व प्राप्ति स्वरूप” क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि सन्तुष्टता वह खजाना है जो सभी खजानों को स्वतः अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। जहाँ सन्तुष्टता है, वहाँ किसी भी प्राप्ति की कमी नहीं रहती।


 प्रश्न 4: सन्तुष्टता ज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे है?

उत्तर:
यदि ज्ञान जीवन में उतरा है तो आत्मा सन्तुष्ट रहेगी। इसलिए सन्तुष्टता यह सिद्ध करती है कि ज्ञान केवल सुना नहीं, बल्कि जीवन में धारण हुआ है।

 प्रश्न 5: सन्तुष्टता आत्मा को कौन-सी राजाई देती है?

उत्तर:
सन्तुष्टता आत्मा को बेफिकर बादशाह बनाती है, जो परिस्थितियों से नहीं डरता और स्वमान की सीट पर सदा स्थित रहता है।


 प्रश्न 6: सन्तुष्टता से आत्मा किन विशेषताओं में सहज बन जाती है?

उत्तर:
सन्तुष्टता आत्मा को सहज ही

  • महादानी,

  • विश्व-कल्याणी,

  • वरदानी,
    और निर्विकल्प, एकरस स्थिति की अधिकारी बना देती है।


 प्रश्न 7: सन्तुष्टता “मेरे–तेरे” के चक्र से कैसे मुक्त करती है?

उत्तर:
सन्तुष्टता आत्मा को स्वदर्शन चक्रधारी बनाती है, जिससे हद के सम्बन्ध और लगाव समाप्त हो जाते हैं और बेहद की दृष्टि आ जाती है।


 प्रश्न 8: सन्तुष्ट आत्मा को बापदादा कौन-कौन से अधिकार देते हैं?

उत्तर:
सन्तुष्ट आत्मा

  • बापदादा के दिलतख्तनशीन,

  • सहज स्मृति के तिलकधारी,

  • विश्व परिवर्तन सेवा के ताजधारी
    अधिकार सम्पन्न स्वरूप में स्थित रहती है।


 प्रश्न 9: सन्तुष्टता को ब्राह्मण जीवन का “जीयदान” क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि सन्तुष्टता से ही ब्राह्मण जीवन में उन्नति, स्थिरता और निरन्तर वृद्धि सम्भव है। इसके बिना जीवन बोझ बन जाता है।


प्रश्न 10: सन्तुष्टता के तीन सर्टीफिकेट कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
1️⃣ स्व की स्व से सन्तुष्टता
2️⃣ बाप द्वारा सदा सन्तुष्टता
3️⃣ ब्राह्मण परिवार द्वारा सन्तुष्टता


 प्रश्न 11: ये तीनों सर्टीफिकेट क्यों आवश्यक हैं?

उत्तर:
इनसे वर्तमान भी श्रेष्ठ बनता है और भविष्य भी। तीनों में से एक की भी कमी उन्नति को रोक देती है।


 प्रश्न 12: “अभी लेट हैं लेकिन टू लेट नहीं” का क्या अर्थ है?

उत्तर:
अभी भी समय है। लास्ट सो फास्ट सो फर्स्ट बनने की मार्जिन है। यदि अभी भी सन्तुष्टता नहीं अपनाई तो फिर लास्ट सो लास्ट हो जायेंगे।


 प्रश्न 13: संगमयुग को सन्तुष्टता का विशेष समय क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि सन्तुष्टता का ज्ञान और अभ्यास सिर्फ संगमयुग में ही है। वहाँ (स्वर्ग में) यह ज्ञान भी नहीं रहेगा।


 प्रश्न 14: मास्टर दाता बनने के लिए क्या आवश्यक है?

उत्तर:
सन्तुष्टता का स्टॉक फुल होना चाहिए।
अगर स्टॉक कम है तो आत्मा केवल कल्याणी बनेगी, विश्व-कल्याणकारी नहीं


 प्रश्न 15: सेवा के लिए विदेश जाने की सही भावना क्या होनी चाहिए?

उत्तर:
हम अपने मन से नहीं, बल्कि बाप के डायरेक्शन से निमित्त बने हैं।
ना देश मेरा है, ना बन्धन मेरा—
सिर्फ बाप का आदेश और सेवा का निमित्त।


 प्रश्न 16: “न्यारे और प्यारे” बनने का रहस्य क्या है?

उत्तर:
जो न्यारा बनता है वही प्यारा बनता है।
कोई भी बन्धन नहीं—
ना घर का, ना सेवा का,
सिर्फ बाप पर भरोसा।


 प्रश्न 17: संगठन की माला को पिरोने का धागा क्या है?

उत्तर:
विशेषता देखने और विशेषता का वर्णन करने की दृष्टि।
यही संगठन की माला की डोर है।


प्रश्न 18: मधुबन में व्यर्थ बोलना क्यों भारी माना गया है?

उत्तर:
क्योंकि मधुबन महान भूमि है।
यहाँ विशेषता छोड़कर कमी देखना और बोलना भाग्य को नुकसान पहुँचाता है।


 प्रश्न 19: बापदादा बच्चों की कमजोरी क्यों नहीं देखते?

उत्तर:
बापदादा सदा बच्चों की महिमा करते हैं।
ईशारा भी देते हैं तो रिगार्ड और विशेषता के साथ—यही बाप की विशेषता है।


 प्रश्न 20: “जीवनमुक्त” आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर:
जो देह से मुक्त रहते हुए जीवन की गहरी खुशी का अनुभव करती है।
मणि की तरह—
धूल में भी चमकने वाली,
सबको प्रकाश देने वाली।

Disclaimer :

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की
अव्यक्त बापदादा मुरली (दिनांक 12-03-1984) पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन एवं मनन है।
इसका उद्देश्य आत्मिक उन्नति, स्व-परिवर्तन और विश्व-कल्याण की भावना को जाग्रत करना है।
यह किसी व्यक्ति, धर्म या मत की आलोचना नहीं करता।

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