अव्यक्त मुरली-(23)24-03-1985 “अब नहीं तो कब नहीं”
अध्याय : “अब नहीं तो कब नहीं” – तीव्र पुरुषार्थ का महावाक्य
(अव्यक्त बापदादा मुरली – 24-03-1985)
1️⃣ ब्राह्मण जीवन = जमा का जीवन
मुरली सार:
बापदादा आज सभी बच्चों के जमा के खाते को देख रहे थे।
ब्राह्मण बनना अर्थात् –
ज्ञान जमा
शक्तियाँ जमा
श्रेष्ठ संकल्प जमा
समय जमा
क्योंकि इस एक जन्म में जो जमा होगा, वही 21 जन्मों की प्रालब्ध बनेगा।
🔹 उदाहरण
जैसे कोई व्यक्ति बैंक में आज जमा करता है, वही रकम भविष्य में ब्याज सहित मिलती है।
वैसे ही संगमयुग में किया गया पुरुषार्थ = सतयुग-त्रेता की प्रालब्ध।
मुरली नोट:
“इस एक जन्म के जमा किये हुए खाते के प्रमाण 21 जन्म प्रालब्ध पाते रहेंगे।”
(अव्यक्त मुरली 24-03-1985)
2️⃣ राज्य पद और पूज्य पद का गहरा रहस्य
मुरली भाव:
जितना श्रेष्ठ राज्य पद, उतना ही श्रेष्ठ पूज्य पद।
आधा कल्प राज करते हो, आधा कल्प पूज्य बनते हो।
-
अष्ट रत्न = महान ईष्ट
-
श्रेष्ठ आत्मा = भक्तों की श्रद्धा का केंद्र
🔹 उदाहरण
राजा को प्रजा माता-पिता समान मानती है।
वैसे ही श्रेष्ठ आत्माओं को भक्त आत्माएँ ईष्ट मानकर पूजती हैं।
मुरली नोट:
“राज्य पद श्रेष्ठ है तो पूज्य स्वरूप भी उतना ही श्रेष्ठ होता है।”
(24-03-1985)
3️⃣ “अब नहीं तो कब नहीं” – तीव्र पुरुषार्थ का मंत्र
बापदादा का स्लोगन:
अब नहीं तो कब नहीं
यह केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं,
बल्कि अज्ञानी आत्माओं को भी जगाने का नारा है।
🔹 प्रभाव
-
साधारण पुरुषार्थ समाप्त
-
उमंग-उत्साह स्वतः
-
रूहानी जागृति
-
तीव्र गति से आगे बढ़ना
🔹 उदाहरण
अगर कोई सोचता रहे – “बाद में कर लेंगे”
तो माया को बीच में आने का मौका मिल जाता है।
मुरली नोट:
“जो करना है, वह अब कर लो। इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थ।”
(24-03-1985)
4️⃣ तुरन्त दान महापुण्य क्यों कहलाता है?
गूढ़ रहस्य:
-
तुरन्त दान = महादान
-
सोचकर किया गया दान = साधारण दान
सोच और कर्म के बीच का समय = माया का मार्जिन
🔹 उदाहरण
बलि में जो तुरन्त चढ़ा – वही महाप्रसाद
जो सोचता-चिल्लाता रहा – वह महाप्रसाद नहीं।
मुरली नोट:
“सोचना और करना तुरन्त हो – यही तुरन्त दान महापुण्य है।”
(24-03-1985)
5️⃣ व्यर्थ संकल्प का भारी खाता
एक श्रेष्ठ संकल्प = पदमगुणा फल
एक व्यर्थ संकल्प =
-
उदासी
-
खुशी की कमी
-
अकेलापन
-
स्वयं को न समझ पाना
🔹 विशेष चेतावनी
अकेले होना ठीक है
लेकिन बाप से अलग होकर अकेले नहीं होना
\मुरली नोट:
“संगमयुग कम्बाइण्ड रहने का युग है।”
(24-03-1985)
6️⃣ ब्रह्मा बाप की नम्बरवन विशेषता
राज़ क्या था?
कभी ‘कब’ नहीं, सदा ‘अब’
इसी कारण:
-
नम्बरवन महान आत्मा
-
कृष्ण रूप में नम्बरवन पूजा
-
बाल, युवा, गोप-गोपिका, लक्ष्मी-नारायण – सभी रूपों में पूजन
मुरली नोट:
“महान पुण्य आत्मा सो महान पूज्य आत्मा।”
(24-03-1985)
7️⃣ चार खजानों का आत्म-चेक
बापदादा आज देख रहे थे:
-
ज्ञान का खजाना
-
शक्तियों का खजाना
-
श्रेष्ठ संकल्पों का खजाना
-
समय का खजाना
हर ब्राह्मण को स्वयं चेक करना है।
मुरली नोट:
“अभी अपने चारों खजानों का खाता चेक करो।”
(24-03-1985)
8️⃣ विशेष आत्माओं की सभा
यहाँ पहुँचना ही विशेषता है।
सम्मुख मिलना = कम भाग्य नहीं।
मुरली भाव:
“यह विशेष आत्माओं की सभा है।”
(24-03-1985)
9️⃣ अमृतवेला विशेष मुरली
(25-03-1985, सुबह 6 बजे)
डबल लाइट स्थिति का अभ्यास
डबल लाइट =
-
बोझ से मुक्त
-
बाप के साथ
-
उड़ती कला का अनुभव
🔹 होमवर्क
-
कर्म और योग का बैलेन्स
-
नीचे नहीं आना
-
चलते-फिरते अव्यक्त फरिश्ता स्थिति
मुरली नोट:
“आज नीचे नहीं आना, ऊपर ही रहना।”
(25-03-1985)
प्रश्न-उत्तर
प्रश्न:
सदा डबल लाइट स्थिति कैसे अनुभव करें?
उत्तर:
जब सब कुछ बाप का हो गया –
तन
मन
धन
सम्बन्ध
तो बोझ काहे का?
मुरली वाक्य:
“बाप का बनना अर्थात् डबल लाइट बनना।”
(25-03-1985)
समापन संदेश
सदा ‘कब’ को ‘अब’ में बदलने वाले,
तुरन्त दान महापुण्य के अधिकारी,
ब्रह्मा बाप को फॉलो कर
श्रेष्ठ राज्य अधिकारी बनने वाले
प्रश्न 1: ब्राह्मण जीवन को “जमा का जीवन” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन इसलिए “जमा का जीवन” कहा गया है क्योंकि इस जीवन में आत्मा जो कुछ भी जमा करती है, वही आगे 21 जन्मों की प्रालब्ध बनता है।
ब्राह्मण बनना अर्थात्—
-
ज्ञान का खजाना जमा करना
-
शक्तियों का खजाना जमा करना
-
श्रेष्ठ संकल्प जमा करना
-
समय को जमा करना
जो इस एक जन्म में जमा होता है, वही सतयुग–त्रेता में राज्य और सुख के रूप में प्राप्त होता है।
मुरली प्रमाण:
“इस एक जन्म के जमा किये हुए खाते के प्रमाण 21 जन्म प्रालब्ध पाते रहेंगे।”
(अव्यक्त मुरली 24-03-1985)
प्रश्न 2: संगमयुग में किए गए पुरुषार्थ की तुलना बैंक जमा से क्यों की गई है?
उत्तर:
जैसे बैंक में आज जमा की गई राशि भविष्य में ब्याज सहित प्राप्त होती है,
वैसे ही संगमयुग में किया गया पुरुषार्थ आगे चलकर सतयुग–त्रेता की सुख-सम्पन्न प्रालब्ध बनता है।
इसलिए संगमयुग को पूरे कल्प का सबसे कीमती समय कहा गया है।
प्रश्न 3: राज्य पद और पूज्य पद का आपस में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
जितना श्रेष्ठ राज्य पद, उतना ही श्रेष्ठ पूज्य पद होता है।
जो आत्मा आधा कल्प राज्य करती है, वही आधा कल्प पूज्य बनती है।
अष्ट रत्न आत्माएँ महान ईष्ट बनती हैं और भक्त आत्माएँ उन्हें श्रद्धा से पूजती हैं।
मुरली प्रमाण:
“राज्य पद श्रेष्ठ है तो पूज्य स्वरूप भी उतना ही श्रेष्ठ होता है।”
(24-03-1985)
प्रश्न 4: श्रेष्ठ आत्माएँ भक्तों के लिए ईष्ट क्यों बनती हैं?
उत्तर:
जैसे राजा को प्रजा माता–पिता समान मानती है,
वैसे ही श्रेष्ठ राज्य अधिकारी आत्माएँ भक्तों के लिए ईष्ट बन जाती हैं।
उनकी श्रेष्ठता, पुण्य और दिव्यता ही उन्हें पूज्य बनाती है।
प्रश्न 5: “अब नहीं तो कब नहीं” को तीव्र पुरुषार्थ का मंत्र क्यों कहा गया है?
उत्तर:
“अब नहीं तो कब नहीं” वह स्लोगन है जो आत्मा को टालमटोल से बचाकर
तुरन्त श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है।
इस स्मृति से—
-
साधारण पुरुषार्थ समाप्त होता है
-
उमंग–उत्साह स्वतः जागृत होता है
-
रूहानी जागृति आती है
-
आत्मा तीव्र गति से आगे बढ़ती है
मुरली प्रमाण:
“जो करना है, वह अब कर लो। इसको कहा जाता है तीव्र पुरुषार्थ।”
(24-03-1985)
प्रश्न 6: “बाद में कर लेंगे” सोचने से क्या नुकसान होता है?
उत्तर:
जब आत्मा सोचती है “बाद में कर लेंगे”,
तो सोच और कर्म के बीच जो समय आता है, वही माया का मार्जिन बन जाता है।
इसी बीच माया संकल्प को कमजोर कर देती है और श्रेष्ठ कार्य अधूरा रह जाता है।
प्रश्न 7: तुरन्त दान को महापुण्य क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि—
-
तुरन्त दान = महादान
-
सोचकर किया गया दान = साधारण दान
जब संकल्प और कर्म के बीच समय नहीं लगता,
तो माया को चांस नहीं मिलता और दान महापुण्य बन जाता है।
मुरली प्रमाण:
“सोचना और करना तुरन्त हो – यही तुरन्त दान महापुण्य है।”
(24-03-1985)
प्रश्न 8: बलि और महाप्रसाद का उदाहरण क्या सिखाता है?
उत्तर:
जो बलि तुरन्त चढ़ती है वही महाप्रसाद कहलाती है।
जो सोचते–चिल्लाते रह जाता है, वह महाप्रसाद नहीं बनता।
इसी तरह जीवन में जो श्रेष्ठ कर्म तुरन्त किया जाता है, वही महापुण्य बनता है।
प्रश्न 9: व्यर्थ संकल्प का आत्मा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
एक व्यर्थ संकल्प आत्मा को बहुत नुकसान पहुँचा सकता है, जैसे—
-
उदासी आना
-
खुशी कम हो जाना
-
अकेलापन महसूस होना
-
स्वयं को न समझ पाना
जबकि एक श्रेष्ठ संकल्प का फल पदमगुणा होता है।
मुरली प्रमाण:
“संगमयुग कम्बाइण्ड रहने का युग है।”
(24-03-1985)
प्रश्न 10: अकेलेपन के बारे में बापदादा की विशेष चेतावनी क्या है?
उत्तर:
अकेले रहना कोई बुराई नहीं है,
लेकिन बाप से अलग होकर अकेले होना ब्राह्मण जीवन नहीं है।
संगमयुग का धर्म है—
बाप के साथ कम्बाइण्ड रहना।
प्रश्न 11: ब्रह्मा बाप नम्बरवन कैसे बने?
उत्तर:
ब्रह्मा बाप की विशेषता थी—
कभी “कब”, सदा “अब”।
उन्होंने कभी टाला नहीं, सदा तुरन्त दान किया।
इसी महापुण्य के कारण—
-
नम्बरवन महान आत्मा बने
-
कृष्ण रूप में नम्बरवन पूजा
-
बाल, युवा, गोप–गोपिका, लक्ष्मी–नारायण सभी रूपों में पूज्य बने
मुरली प्रमाण:
“महान पुण्य आत्मा सो महान पूज्य आत्मा।”
(24-03-1985)
प्रश्न 12: बापदादा किन चार खजानों का आत्म-चेक करवा रहे हैं?
उत्तर:
बापदादा ने चार खजानों का चेक कराया—
-
ज्ञान का खजाना
-
शक्तियों का खजाना
-
श्रेष्ठ संकल्पों का खजाना
-
समय का खजाना
हर ब्राह्मण को स्वयं देखना है कि इन चारों में कितना जमा है।
मुरली प्रमाण:
“अभी अपने चारों खजानों का खाता चेक करो।”
(24-03-1985)
प्रश्न 13: “विशेष आत्माओं की सभा” कहने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संगमयुग में बापदादा के सम्मुख पहुँचना ही बहुत बड़ा भाग्य है।
यह सभा साधारण आत्माओं की नहीं,
बल्कि विशेष आत्माओं की सभा है।
मुरली प्रमाण:
“यह विशेष आत्माओं की सभा है।”
(24-03-1985)
प्रश्न 14: डबल लाइट स्थिति क्या है?
(अमृतवेला मुरली – 25-03-1985)
उत्तर:
डबल लाइट स्थिति का अर्थ है—
-
बोझ से मुक्त रहना
-
सदा बाप के साथ रहना
-
उड़ती कला का अनुभव करना
इस स्थिति में आत्मा अव्यक्त फरिश्ता स्वरूप में रहती है।
मुरली प्रमाण:
“आज नीचे नहीं आना, ऊपर ही रहना।”
(25-03-1985)
प्रश्न 15: सदा डबल लाइट स्थिति कैसे अनुभव करें?
उत्तर:
जब आत्मा ने—
-
तन
-
मन
-
धन
-
सम्बन्ध
सब कुछ बाप को सरेण्डर कर दिया,
तो फिर बोझ किस बात का?
मुरली वाक्य:
“बाप का बनना अर्थात् डबल लाइट बनना।”
(25-03-1985)
समापन प्रश्न–संदेश
प्रश्न:
ब्राह्मण जीवन की सबसे बड़ी सफलता क्या है?
उत्तर:
सदा “कब” को “अब” में बदलना,
तुरन्त दान महापुण्य करना,
ब्रह्मा बाप को फॉलो कर
श्रेष्ठ राज्य अधिकारी बनना—
यही ब्राह्मण जीवन की सच्ची सफलता है।
डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरलियों पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन एवं आत्मिक प्रेरणा हेतु बनाया गया है। इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह सामग्री केवल आत्मिक उन्नति, स्व-परिवर्तन और जीवन में श्रेष्ठ मूल्यों को धारण करने के लिए है।
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