(19)Why can’t all forms of education elevate the soul?

S.Y.(19)क्यों सारी पढ़ाइयाँ आत्मा को ऊपर नहीं उठा सकती?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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संगम युग ही नई दुनिया की नींव

क्यों सारी पढ़ाइयाँ आत्मा को ऊपर नहीं उठा सकतीं?


🔹 भूमिका – एक बहुत ईमानदार सवाल

आज का मनुष्य पढ़ा-लिखा है।
डिग्रियाँ हैं।
ज्ञान का भंडार है।

फिर भी—

  • तनाव है

  • भय है

  • क्रोध है

  • अशांति है

इतनी पढ़ाई के बाद भी
जीवन में सुख-शांति क्यों नहीं?

अगर ज्ञान इतना है
तो उद्धार क्यों नहीं?
आत्मा क्यों लगातार नीचे गिरती जा रही है?


🔹 प्रश्न जो सोचने पर मजबूर करता है

  • क्यों सारी पढ़ाइयाँ आत्मा को ऊपर नहीं उठा सकतीं?

  • इतना पढ़कर भी आत्मा क्यों नहीं बचती?

  • ज्ञान बढ़ा, फिर भी पतन क्यों बढ़ा?

  • डिग्रियाँ बढ़ीं, पर जीवन में सुधार क्यों नहीं आया?

यही प्रश्न हमें संगम युग की पढ़ाई तक ले जाते हैं।


🔹 मुरली का स्पष्ट सत्य

बाबा मुरली में सीधा सत्य बताते हैं —

आत्मा कितनी भी पढ़ाई पढ़ ले,
दुनिया भर के शास्त्र, वेद, पुराण पढ़ ले,
पतन से बच नहीं सकती।
पतन तो होना ही है।

यह वाक्य चौंकाता भी है
और झकझोरता भी है।

आज हम इसी सत्य को गहराई से समझेंगे।


🔹 उद्धार का सही अर्थ क्या है?

उद्धार का अर्थ है—

  • पतित से पावन बनना

  • जीवन में आत्मिक उत्थान

  • चरित्र में परिवर्तन

  • चढ़ती कला की अवस्था

 उद्धार का अर्थ यह नहीं कि—

  • नौकरी मिल जाए

  • धन बढ़ जाए

  • मान-सम्मान मिल जाए

 मुरली – 5 मई 2004

“उद्धार देह का नहीं, आत्मा का होता है।”

देह तो एक ड्रेस है।
सुख-दुःख आत्मा के हाथ में है।


🔹 उदाहरण – क्या इसे उद्धार कहेंगे?

किसी के पास—

  • बड़ा घर हो

  • धन हो

  • अच्छा शरीर हो

लेकिन—

  • मन अशांत हो

  • संतुलन न हो

  • संबंधों में कटुता हो

तो क्या इसे उद्धार कहेंगे?
नहीं।


🔹 दुनिया की पढ़ाई किसके लिए है?

दुनिया की हर पढ़ाई—

  • देह के लिए

  • देह की सुविधाओं के लिए

  • देह की आवश्यकताओं के लिए

आत्मा को कोई जानता ही नहीं,
इसलिए आत्मा के लिए कोई पढ़ाई नहीं।

 मुरली – 10 मार्च 2006

“दुनिया की पढ़ाइयाँ देहधारी आत्माओं द्वारा देहधारी आत्माओं को दी जाती हैं।”


🔹 कार और ड्राइवर का उदाहरण

  • शरीर = कार

  • आत्मा = ड्राइवर

कार की पढ़ाई से
ड्राइवर की बीमारी ठीक नहीं होती।

कार चमक सकती है,
ड्राइवर कमजोर ही रह सकता है।


🔹 सबसे चौंकाने वाला सत्य

पढ़ने वाली भी आत्मा है,
पढ़ाने वाली भी आत्मा है—

फिर भी आत्मा का उद्धार नहीं होता।

क्यों?

क्योंकि पढ़ाने वाली आत्मा
खुद देह-भान में है,
खुद पतित है।

डूबता हुआ
दूसरे को नहीं बचा सकता।

 मुरली – 3 मार्च 2006

“ज्यों-ज्यों इलाज किया, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया।”


🔹 ज्ञान बढ़ा, पर गिरावट क्यों?

ज्ञान अपने-आप में न्यूट्रल है।

अगर दिशा गलत हो
तो वही ज्ञान गिरा देता है।

ज्ञान बढ़ा
पर देह-भान भी बढ़ता गया।


🔹 शास्त्र और मुरली में अंतर

शास्त्र
 याद करना सिखाते हैं

मुरली
 अनुभव कराती है

मुरली कहती है—
आत्मा बनो, स्थिति बनाओ, परिवर्तन करो।


🔹 उद्धार याद से नहीं, स्थिति से होता है

केवल याद करने से
कोई परिवर्तन नहीं आता।

स्थिति बनानी पड़ती है।
स्वरूप बदलना पड़ता है।


🔹 आत्मा की गिरावट का असली कारण

 मुरली – 15 अगस्त 2001

“पतन का कारण अज्ञान नहीं, देह-भान है।”

दुनिया की कोई भी पढ़ाई
देह-भान नहीं तोड़ती।


🔹 उद्धार कौन कर सकता है?

 मुरली – 24 जनवरी 2003

“उद्धार वही कर सकता है जो स्वयं पतित न हो।”

 पढ़ाने वाला — परमात्मा
 विधि — राजयोग


🔹 संगम युग की पढ़ाई क्यों निराली है?

क्योंकि यह—

  • देह के लिए नहीं

  • आत्मा के लिए है

 अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996

“अब आत्मा जैसी बनेगी, वही सदा के लिए बन जाएगी।”


🔹 समापन – सार

दुनिया की पढ़ाइयाँ
जानकारी देती हैं
 परिवर्तन नहीं करतीं

उद्धार वही पढ़ाई करती है
जो—

  • देह-भान तोड़े

  • आत्म-अभिमानी बनाए

  • स्थिति बदले

और यही पढ़ाई
संगम युग में परमात्मा स्वयं पढ़ा रहे हैं।

प्रश्न 1: आज का मनुष्य इतना पढ़ा-लिखा होने के बाद भी दुखी क्यों है?

उत्तर:
आज मनुष्य के पास डिग्रियाँ हैं, ज्ञान का भंडार है, आधुनिक सुविधाएँ हैं—
फिर भी जीवन में तनाव, भय, क्रोध और अशांति है।
क्योंकि यह सारी पढ़ाई देह के लिए है, आत्मा के लिए नहीं।
आत्मा भूखी रह गई, इसलिए दुख बना रहा।


 प्रश्न 2: इतनी सारी पढ़ाइयाँ आत्मा को ऊपर क्यों नहीं उठा पातीं?

उत्तर:
क्योंकि दुनिया की पढ़ाइयों का उद्देश्य है—
रोज़गार, सुविधा, शरीर की उन्नति।
आत्मा को कोई जानता ही नहीं,
इसलिए आत्मा की उन्नति की पढ़ाई ही नहीं है।


प्रश्न 3: इतना पढ़ने के बाद भी आत्मा क्यों नहीं बचती, क्यों गिरती जाती है?

उत्तर:
बाबा मुरली में स्पष्ट कहते हैं—
आत्मा कितनी भी पढ़ाई पढ़ ले, पतन से बच नहीं सकती।
क्योंकि पतन का कारण अज्ञान नहीं, देह-भान है।

मुरली – 15 अगस्त 2001
“पतन का कारण अज्ञान नहीं, देह-भान है।”


 प्रश्न 4: दुनिया की पढ़ाइयों की सबसे बड़ी सीमा क्या है?

उत्तर:
दुनिया की पढ़ाइयों की सबसे बड़ी सीमा यह है कि
वे देह-भान को नहीं तोड़तीं
जब तक देह-भान रहेगा, आत्मा नीचे ही जाएगी।


 प्रश्न 5: ज्ञान बढ़ा, फिर भी आत्मा क्यों गिरती गई?

उत्तर:
ज्ञान अपने-आप में न्यूट्रल है।
अगर दिशा गलत हो,
तो वही ज्ञान आत्मा को और गिरा देता है।

मुरली – 3 मार्च 2006
“ज्यों-ज्यों इलाज किया, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया।”


 प्रश्न 6: पहले इतना ज्ञान नहीं था, फिर भी आत्मा क्यों गिरती गई?

उत्तर:
क्योंकि जैसे-जैसे समय बढ़ा,
देह-भान बढ़ता गया।
ज्ञान बढ़ा, पर आत्म-स्मृति नहीं बढ़ी।
इसलिए गिरावट जारी रही।

 प्रश्न 7: इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियों के बाद भी जीवन में सुधार क्यों नहीं?

उत्तर:
क्योंकि डिग्रियाँ देह को योग्य बनाती हैं,
आत्मा को नहीं।
उद्धार का संबंध नौकरी, पैसा या सम्मान से नहीं,
आत्मा की अवस्था से है।

मुरली – 5 मई 2004
“उद्धार देह का नहीं, आत्मा का होता है।”


प्रश्न 8: उद्धार का सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
उद्धार का अर्थ है—
पतित से पावन बनना,
चरित्र में परिवर्तन आना,
चढ़ती कला की अवस्था बनना।

उद्धार का अर्थ यह नहीं कि
नौकरी मिल जाए या सुविधाएँ बढ़ जाएँ।


 प्रश्न 9: क्या बाहरी सुख-सुविधाएँ उद्धार का प्रमाण हैं?

उत्तर:
नहीं।
अगर किसी के पास बड़ा घर, धन, अच्छा शरीर हो
लेकिन मन अशांत हो—
तो उसे उद्धार नहीं कहेंगे।


 प्रश्न 10: दुनिया की पढ़ाई किसके लिए बनाई गई है?

उत्तर:
दुनिया की हर पढ़ाई देह के लिए है—
देह की आवश्यकताओं के लिए।

मुरली – 10 मार्च 2006
“दुनिया की पढ़ाइयाँ देहधारी आत्माओं द्वारा देहधारी आत्माओं को दी जाती हैं।”


 प्रश्न 11: कार और ड्राइवर का उदाहरण हमें क्या सिखाता है?

उत्तर:
शरीर कार है, आत्मा ड्राइवर।
कार की पढ़ाई से ड्राइवर की बीमारी ठीक नहीं होती।
इसी तरह देह की पढ़ाई से आत्मा ठीक नहीं होती।


 प्रश्न 12: पढ़ाने वाली आत्मा होते हुए भी उद्धार क्यों नहीं होता?

उत्तर:
क्योंकि पढ़ाने वाली आत्मा स्वयं देह-भान में है, पतित है।
डूबता हुआ दूसरे को नहीं बचा सकता।


 प्रश्न 13: शास्त्र और मुरली में मूल अंतर क्या है?

उत्तर:
शास्त्र— याद करना सिखाते हैं।
मुरली— अनुभव कराती है।

मुरली कहती है—
“आत्मा बनो, स्थिति बनाओ, परिवर्तन करो।”


 प्रश्न 14: उद्धार याद से होता है या स्थिति से?

उत्तर:
उद्धार याद से नहीं,
स्थिति से होता है।
स्थिति बदले बिना जीवन नहीं बदलता।


 प्रश्न 15: आत्मा की गिरावट का असली कारण क्या है?

उत्तर:
देह-अभिमान।

मुरली – 15 अगस्त 2001
“पतन का कारण अज्ञान नहीं, देह-भान है।”


 प्रश्न 16: उद्धार कौन कर सकता है?

उत्तर:
वही जो स्वयं पतित न हो।

मुरली – 24 जनवरी 2003
“उद्धार वही कर सकता है जो स्वयं पतित न हो।”


 प्रश्न 17: उद्धार की शर्तें क्या हैं?

उत्तर:

  • पढ़ाने वाला — परमात्मा

  • विधि — राजयोग

परमात्मा ही पतित दुनिया को पावन बना सकता है।


 प्रश्न 18: संगम युग की पढ़ाई क्यों निराली है?

उत्तर:
क्योंकि यह देह के लिए नहीं, आत्मा के लिए है।

अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996
“अब आत्मा जैसी बनेगी, वही सदा के लिए बन जाएगी।”


 प्रश्न 19: इस पाठ का अंतिम निष्कर्ष क्या है?

उत्तर:
दुनिया की पढ़ाइयाँ जानकारी देती हैं,
पर परिवर्तन नहीं करतीं।

उद्धार वही पढ़ाई करती है
जो देह-भान तोड़कर
आत्म-अभिमानी बनाती है।


 Disclaimer

डिस्क्लेमर:
यह वीडियो ब्रह्मा कुमारीज़ की
साकार एवं अव्यक्त मुरलियों पर आधारित
एक आध्यात्मिक अध्ययन है।

इसका उद्देश्य किसी धर्म, शिक्षा, पद्धति
या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं,
बल्कि आत्मा की वास्तविक उन्नति के लिए
ईश्वरीय दृष्टि को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।

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