Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below
| 17-04-2026 |
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
|
मधुबन |
| “मीठे बच्चे – पावन बनो तो रूहानी सेवा के लायक बनेंगे, देही-अभिमानी बच्चे रूहानी यात्रा पर रहेंगे और दूसरों को भी यही यात्रा करायेंगे” | |
| प्रश्नः- | संगम पर तुम बच्चे जो कमाई करते हो, यही सच्ची कमाई है – कैसे? |
| उत्तर:- | अभी की जो कमाई है वह 21 जन्म तक चलती है, इसका कभी भी देवाला नहीं निकलता। ज्ञान सुनना और सुनाना, याद करना और कराना – यही है सच्ची-सच्ची कमाई, जो सच्चा-सच्चा बाप ही तुम्हें सिखलाता है। ऐसी कमाई सारे कल्प में कोई भी कर न सके। दूसरी कोई भी कमाई साथ नहीं चलती। |
| गीत:- | हमें उन राहों पर चलना है…. |
ओम् शान्ति। भक्ति मार्ग में तो बच्चों ने बहुत ठोकरें खाई हुई हैं। भक्ति मार्ग में बहुत ही भावना से यात्रा करने जाते हैं, रामायण आदि सुनते हैं। ऐसे प्रेम से बैठ कहानियाँ सुनते हैं – जो रोना भी आ जाता है। हमारे भगवान की सीता भगवती को रावण डाकू ले गया। फिर सुनने समय बैठ रोते हैं। यह हैं सब दन्त कथायें, जिससे फायदा कुछ भी नहीं। पुकारते भी हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर हम दु:खी आत्माओं को सुखी बनाओ। यह नहीं समझते कि आत्मा दु:खी होती है क्योंकि वह तो आत्मा को निर्लेप कह देते हैं। समझते हैं आत्मा सुख दु:ख से न्यारी है। यह क्यों कहते हैं? क्योंकि समझते हैं – परमात्मा सुख दु:ख से न्यारा है, तो बच्चे फिर सुख दु:ख में कैसे आयेंगे? इन सब बातों को अब बच्चों ने समझा है। इस ज्ञान मार्ग में भी कभी ग्रहचारी बैठती है, कभी कुछ होता है। कभी प्रफुल्लित रहते, कभी मुरझाया हुआ चेहरा रहता है। यह होती है माया से लड़ाई। माया पर ही जीत पानी है। जब बेहोश होते हैं तब संजीवनी बूटी दी जाती है – मनमनाभव। भक्ति मार्ग में चहचटा बहुत है। देवताओं की मूर्तियों को कितना श्रृंगारते हैं, सच्चे जेवर पहनाते हैं। वह जेवर तो ठाकुर की प्रापर्टी हुई। ठाकुर की प्रापर्टी सो पुजारी वा ट्रस्टी की हो जाती है। तुम बच्चे जानते हो कि हम चैतन्य में बहुत हीरे जवाहरों से सजे हुए थे। फिर जब पुजारी बनते हैं तो भी बहुत जेवर पहनते हैं। अब कुछ भी नहीं है। चैतन्य रूप में भी पहने फिर जड़ रूप में भी पहने। अब नो जेवर। बिल्कुल साधारण हैं। बाप कहते हैं मैं साधारण तन में आता हूँ। कोई राजाई आदि की ठाठ-बाठ नहीं है। संन्यासियों के भी बहुत ठाठ-बाठ होते हैं। अभी तुम समझ गये हो बरोबर सतयुग में कैसे हम आत्मायें पवित्र थीं। शरीर भी हमारे पवित्र थे। उन्हों का श्रृंगार भी बहुत अच्छा रहता है। कोई खूबसूरत होते हैं तो उनको श्रृंगार का भी शौक रहता है। तुम भी खूबसूरत थे तो बहुत अच्छे-अच्छे जेवर पहनते थे। हीरों के बड़े हार आदि पहनते थे। यहाँ हर चीज सांवरी है। देखो, गऊयें भी सांवरी होती गई हैं। बाबा जब श्रीनाथ द्वारे गया था तो बहुत अच्छी गऊएं थी। श्रीकृष्ण की गऊयें बहुत अच्छी दिखाते हैं। यहाँ तो देखो कोई कैसे, कोई कैसे हैं क्योंकि कलियुग है। ऐसी गऊएं वहाँ होती नहीं। तुम बच्चे विश्व के मालिक बनते हो। तुम्हारी सजावट भी वहाँ ऐसी सुन्दर रहती है। विचार करो – गऊएं तो जरूर होनी चाहिए। वहाँ की गऊओं का गोबर भी कैसा होता होगा। कितनी ताकत होगी। जमीन को खाद चाहिए ना। खाद डाली जाती है तो अच्छा अनाज पैदा होता है। वहाँ सब चीज़ें अच्छी ताकत वाली होती हैं। यहाँ तो कोई चीज़ में ताकत नहीं है। हर एक चीज़ बिल्कुल ही पावरलेस हो गई है। बच्चियाँ सूक्ष्मवतन में जाती थी। कितने अच्छे-अच्छे बड़े फल खाती थी, शूबीरस आदि पीती थी। यह सब साक्षात्कार कराते थे। माली वहाँ कैसे फल आदि काटकर देते हैं। सूक्ष्म-वतन में तो फल आदि हो न सकें। यह साक्षात्कार होता है। वैकुण्ठ तो फिर भी यहाँ होगा ना। मनुष्य समझते हैं वैकुण्ठ कोई ऊपर में है। वैकुण्ठ न सूक्ष्मवतन में, न मूलवतन में होता है। यहाँ ही होता है। यहाँ जो बच्चियाँ साक्षात्कार करती हैं वह फिर इन ऑखों से देखेंगे। जैसी पोजीशन ऐसी सामग्री भी रहती है। राजाओं के महल देखो कैसे अच्छे-अच्छे होते हैं। जयपुर में बहुत अच्छे-अच्छे महल बने हुए हैं। सिर्फ महल देखने लिए मनुष्य जाते हैं तो भी टिकेट रहती है। खास वह महल देखने लिए रखते हैं। खुद फिर और महलों में रहते हैं। सो भी अभी कलियुग में। यह है ही पतित दुनिया। कोई अपने को पतित समझते थोड़ेही हैं। तुम अभी समझते हो – हम तो पतित थे। कोई काम के नहीं थे फिर हम गोरा बनेंगे। वह दुनिया ही फर्स्टक्लास होगी। यहाँ भल अमेरिका आदि में फर्स्ट क्लास महल हैं। परन्तु वहाँ की भेंट में यह तो कुछ नहीं हैं क्योंकि यह तो अल्पकाल का सुख देने वाले हैं। वहाँ तो फर्स्टक्लास महल होते हैं। फर्स्टक्लास गऊएं होती हैं। वहाँ ग्वाले भी होते हैं। श्रीकृष्ण को ग्वाला कहते हैं ना। यहाँ जो गऊओं को सम्भालने वाले हैं, वह कहते हैं हम गूजर (ग्वाले) हैं। श्रीकृष्ण के वंशावली हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण के वंशावली नहीं कहेंगे। श्रीकृष्ण की राजधानी के कहेंगे। साहूकारों के पास गऊएं होंगी तो गूजर सम्भालने वाले भी होंगे। यह गूजर नाम सतयुग का है। कल की बात है। कल हम आदि सनातन देवी देवता धर्म के थे फिर पतित बने हैं तो अपने को हिन्दू कहला देते हैं। पूछो, तुम आदि सनातन देवी देवता धर्म के हो वा हिन्दू धर्म के हो? आजकल सब हिन्दू लिख देते हैं। हिन्दू धर्म किसने स्थापन किया? देवी देवता धर्म किसने स्थापन किया? यह भी कोई नहीं जानते हैं। बाबा यह प्रश्न पूछते हैं बताओ आदि सनातन देवी देवता धर्म किसने स्थापन किया? शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा कर रहे हैं। राम वा शिवबाबा की श्रीमत पर आदि सनातन देवी देवता धर्म स्थापन हुआ। फिर रावण राज्य होता है, विकारों में जाते हैं। भक्ति मार्ग शुरू हो जाता है तब हिन्दू कहलाने लगते हैं। अभी अपने को कोई देवता कह न सके। रावण ने विशश बनाया, बाप आकर वाइसलेस बनाते हैं। तुम ईश्वरीय मत से देवता बनते हो। बाप ही आकर तुम ब्राह्मणों को देवता बनाते हैं। सीढ़ी कैसे उतरते हैं, यह तुम बच्चों की बुद्धि में नम्बरवार बैठता है। तुम जानते हो और सभी मनुष्य आसुरी मत पर चल रहे हैं और तुम ईश्वरीय मत पर चल रहे हो। रावण की मत से सीढ़ी उतरते आये हो। 84 जन्मों के बाद फिर पहला नम्बर जन्म होगा। ईश्वरीय बुद्धि से तुम सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जान जाते हो। यह तुम्हारा जीवन बहुत अमूल्य है, इनकी बहादुरी है। जबकि बाप आकर हमको इतना पावन बनाते हैं। हम रूहानी सेवा के लायक बनते हैं। वह है जिस्मानी सोशल वर्कर, जो देह-अभिमान में रहते हैं। तुम देही-अभिमानी हो। आत्माओं को रूहानी यात्रा पर ले जाते हो। बाप समझाते हैं तुम सतोप्रधान थे, अभी तमोप्रधान बने हो। सतोप्रधान को पावन, तमोप्रधान को पतित कहा जाता है। आत्मा में ही खाद पड़ी है। आत्मा को ही सतोप्रधान बनाना है। जितना याद में रहेंगे उतना पवित्र बनेंगे। नहीं तो कम पवित्र बनेंगे। पापों का बोझा सिर पर रह जायेगा। आत्मायें तो सभी पवित्र होती हैं फिर हर एक का पार्ट अलग है। सबका एक जैसा पार्ट हो न सके। सबसे ऊंच बाबा का पार्ट फिर ब्रह्मा-सरस्वती का कितना पार्ट है। जो स्थापना करता है, वही पालना भी करता है। बड़ा पार्ट उनका है। पहले है शिवबाबा फिर है ब्रह्मा-सरस्वती, जो पुनर्जन्म में आते हैं। शंकर तो सिर्फ सूक्ष्म रूप धारण करते हैं। ऐसे नहीं कि शंकर कोई शरीर का लोन लेते हैं। श्रीकृष्ण को अपना शरीर है। यहाँ सिर्फ शिवबाबा शरीर का लोन लेते हैं। पतित शरीर, पतित दुनिया में आकर सेवा करते हैं, मुक्ति-जीवनमुक्ति में ले जाने की। पहले मुक्ति में जाना पड़े। नॉलेजफुल एक ही बाप पतित-पावन है, उनको ही कहते हैं शिवबाबा। शंकर को बाबा कहते शोभता नहीं है। शिवबाबा अक्षर बहुत मीठा है। शिव के ऊपर कोई अक चढ़ाते हैं, कोई क्या चढ़ाते हैं। कोई दूध भी चढ़ाते हैं।
बाप बच्चों को अनेक प्रकार की समझानी देते रहते हैं। बच्चों के लिए समझाया जाता है, सारा मदार योग पर है। योग से ही विकर्म विनाश होंगे। योग वाले को ज्ञान की धारणा भी अच्छी होगी। अपनी धारणा में चलते रहेंगे क्योंकि फिर सुनाना भी पड़ता है। यह है नई बात – भगवान ने जिन्हों को डायरेक्ट सुनाया, उन्होंने ही सुना फिर तो यह ज्ञान रहता ही नहीं। अभी बाप तुमको जो सुनाते हैं वह अभी तुम सुनते हो। धारणा होती है फिर तो प्रालब्ध का पार्ट बजाना होता है। ज्ञान सुनना, सुनाना अभी होता है। सतयुग में यह पार्ट नहीं होगा। वहाँ तो है ही प्रालब्ध का पार्ट। मनुष्य बैरिस्टरी पढ़ते हैं फिर बैरिस्टर बन कमाते हैं। यह कितनी बड़ी कमाई है, इनको दुनिया वाले नहीं जानते। तुम जानते हो सच्चा बाबा हमको सच्ची कमाई करा रहे हैं। इनका कभी देवाला निकल न सके। अभी तुम सच की कमाई करते हो। वह फिर 21 जन्म साथ रहती है। वह कमाई साथ नहीं देती। यह साथ देने वाली है तो ऐसी कमाई को साथ देना चाहिए। यह बातें तुम्हारे सिवाए और कोई की बुद्धि में नहीं हैं। तुम्हारे में भी घड़ी-घड़ी कोई भूल जाते हैं। बाप और वर्से को भूलना नहीं चाहिए। बस, बात एक ही है। बाप को याद करो। जिस बाप से 21 जन्म का वर्सा मिलता है, 21 जन्म निरोगी काया रहती है। बुढ़ापे तक अकाले मृत्यु नहीं होती। बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। बाप की याद है मुख्य, इसमें ही माया विघ्न डालती है। तूफान लाती है। अनेक प्रकार के तूफान आते हैं। तुम कहेंगे – बाप को याद करूँ, परन्तु कर नहीं सकेंगे। याद में ही बहुत फेल होते हैं। योग की बहुतों में कमी है। जितना हो सके, योग में मजबूत होना चाहिए। बाकी बीज और झाड़ का ज्ञान कोई बड़ी बात नहीं है।
बाप कहते हैं मुझे याद करो। मुझे याद करने से, मुझे जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। याद में ही सब कुछ भरा हुआ है। स्वीट बाबा, शिवबाबा को याद करना है। ऊंच ते ऊंच है भगवान। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ वह है। ऊंचे से ऊंच वर्सा देते हैं 21 जन्म के लिए। सदा सुखी अमर बनाते हैं। तुम अमरपुरी का मालिक बनते हो। तो ऐसे बाप को बहुत याद करना चाहिए। बाप को याद नहीं करेंगे तो और सब कुछ याद आ जायेगा। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) यह ईश्वरीय जीवन बहुत-बहुत अमूल्य है, इस जीवन में आत्मा और शरीर दोनों को पावन बनाना है। रूहानी यात्रा में रहकर दूसरों को यही यात्रा सिखानी है।
2) जितना हो सके – सच की कमाई में लग जाना है। निरोगी बनने के लिए याद में मजबूत होना है।
| वरदान:- | शरीर को ईश्वरीय सेवा के लिए अमानत समझकर कार्य में लगाने वाले नष्टोमोहा भव जैसे कोई की अमानत होती है तो अमानत में अपनापन नहीं होता, ममता भी नहीं होती है। तो यह शरीर भी ईश्वरीय सेवा के लिए एक अमानत है। यह अमानत रूहानी बाप ने दी है तो जरूर रूहानी बाप की याद रहेगी। अमानत समझने से रूहानियत आयेगी, अपने पन की ममता नहीं रहेगी। यही सहज उपाय है निरन्तर योगी, नष्टोमोहा बनने का। तो अब रूहानियत की स्थिति को प्रत्यक्ष करो। |
| स्लोगन:- | वानप्रस्थ स्थिति में जाना है तो दृष्टि-वृत्ति में भी पवित्रता को अण्डरलाइन करो। |
ये अव्यक्त इशारे – महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो
आपका हर बोल महान हो। हर मंसा संकल्प हर आत्मा के प्रति मधुर हो। हर एक को ऊंचा उठाने का स्वभाव, मधुरता का स्वभाव, निर्माणता का स्वभाव हो। मेरा स्वभाव ऐसा है, यह कभी नहीं बोलना। मेरा कहाँ से आया! मेरा तेज़ बोलने का स्वभाव है, मेरा आवेश में आने का स्वभाव है। स्वभाव के वश होना यही माया है। अब मायाजीत बनो। अभिमान वा दिलशिकस्त होने के, ईर्ष्या वा आवेश में आने के स्वभाव का परिवर्तन करो।
1. प्रश्न: संगम पर की जाने वाली कमाई को सच्ची कमाई क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि यह कमाई 21 जन्म तक साथ रहती है और इसका कभी भी अंत या नुकसान नहीं होता।
यह कमाई ज्ञान और योग की है, जो केवल परमात्मा सिखाते हैं।
2. प्रश्न: सच्ची कमाई वास्तव में क्या है?
उत्तर:
- ज्ञान सुनना और सुनाना
- बाप को याद करना और कराना
यही सच्ची कमाई है, जो आत्मा को ऊँचा बनाती है।
3. प्रश्न: पावन बने बिना रूहानी सेवा क्यों नहीं हो सकती?
उत्तर:
क्योंकि रूहानी सेवा आत्माओं को शांति और शक्ति देने की सेवा है।
अगर आत्मा स्वयं पवित्र नहीं है, तो वह दूसरों को शांति नहीं दे सकती।
4. प्रश्न: देही-अभिमानी आत्मा की क्या पहचान है?
उत्तर:
- स्वयं को आत्मा समझती है
- बाप की याद में रहती है
- दूसरों को भी रूहानी यात्रा सिखाती है
वही सच्चा रूहानी सेवाधारी है।
5. प्रश्न: माया से लड़ाई कैसे होती है?
उत्तर:
माया बार-बार विचारों में विघ्न डालती है और याद को भुला देती है।
इससे जीतने का उपाय है – “मनमनाभव” अर्थात् बाप की निरंतर याद।
6. प्रश्न: भक्ति मार्ग में ठोकरें क्यों खानी पड़ती हैं?
उत्तर:
क्योंकि उसमें सच्चा ज्ञान नहीं होता, केवल भावनाएं और कथाएँ होती हैं।
इससे आत्मा को वास्तविक लाभ नहीं मिलता।
7. प्रश्न: आत्मा पतित से पावन कैसे बनती है?
उत्तर:
आत्मा में जो विकारों की “खाद” पड़ी है, वह योग (याद) से समाप्त होती है।
जितना अधिक याद में रहेंगे, उतना पवित्र बनेंगे।
8. प्रश्न: बाप को याद करना इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि:
- इससे पाप नष्ट होते हैं
- आत्मा शक्तिशाली बनती है
- 21 जन्म का वर्सा प्राप्त होता है
यही पूरी साधना का सार है।
9. प्रश्न: ईश्वरीय जीवन को अमूल्य क्यों कहा गया है?
उत्तर:
क्योंकि इस जीवन में:
- आत्मा पावन बनती है
- सृष्टि का ज्ञान मिलता है
- रूहानी सेवा का अवसर मिलता है
यह समय पूरे कल्प में सबसे कीमती है।
10. प्रश्न: योग का जीवन में क्या महत्व है?
उत्तर:
योग से:
- विकर्म विनाश होते हैं
- मन स्थिर होता है
- ज्ञान की धारणा बढ़ती है
योग ही आत्मा को शक्तिशाली बनाता है।
11. प्रश्न: “शरीर अमानत है” – इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
शरीर को अपना नहीं, बल्कि ईश्वर की दी हुई जिम्मेदारी (अमानत) समझना चाहिए।
इससे ममता खत्म होती है और योग सहज हो जाता है।
12. प्रश्न: नष्टोमोहा बनने का सहज उपाय क्या है?
उत्तर:
- शरीर को अमानत समझना
- बाप की याद में रहना
- अपनेपन और आसक्ति को छोड़ना
इससे आत्मा निरंतर योगी बन जाती है।
13. प्रश्न: महान बनने के लिए कौन-से गुण आवश्यक हैं?
उत्तर:
- मधुरता
- नम्रता
- निर्माणता
हर संकल्प, बोल और व्यवहार में ये गुण होने चाहिए।
14. प्रश्न: “सच्ची कमाई” का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
उत्तर:
- 21 जन्म तक सुख और सम्पन्नता
- निरोगी जीवन
- अमरपुरी (स्वर्ग) की प्राप्ति
यह कमाई आत्मा को सदा के लिए समृद्ध बना देती है।
मुरली सार (Quick Points)
- सच्ची कमाई = ज्ञान + योग
- यह कमाई 21 जन्म तक साथ रहती है
- पावन बनना = रूहानी सेवा की योग्यता
- देही-अभिमान = आत्मिक स्थिति
- योग = विकर्म विनाश का साधन
- बाप की याद = सबसे मुख्य साधना
- शरीर = ईश्वर की अमानत
- मधुरता + नम्रता = महानता का आधार
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