(23)25-03-1986 “The Secret of Holi”

AV-(23)25-03-1986 “होली का रहस्य”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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25-03-1986 “होली का रहस्य”

आज बापदादा सर्व स्वराज्य अधिकारी अलौकिक राज्य सभा देख रहे हैं। हर एक श्रेष्ठ आत्मा के ऊपर लाइट का ताज चमकता हुआ देख रहे हैं। यही राज्य सभा होली सभा है। हर एक परम पावन पूज्य आत्मायें सिर्फ इस एक जन्म के लिए पावन अर्थात् होली नहीं बने हैं। लेकिन पावन अर्थात् होली बनने की रेखा अनेक जन्मों की लम्बी रेखा है। सारे कल्प के अन्दर और आत्मायें भी पावन होली बनती हैं। जैसे पावन आत्मायें धर्म-पिता के रूप में धर्म स्थापन करने के निमित्त बनती हैं। साथ-साथ कई महान आत्मायें कहलाने वाले भी पावन बनते हैं लेकिन उन्हों के पावन बनने में और आप पावन आत्माओं में अन्तर है। आपके पावन बनने का साधन अति सहज है। कोई मेहनत नहीं क्योंकि बाप से आप आत्माओं को सुख शान्ति पवित्रता का वर्सा सहज मिलता है। इस स्मृति से सहज और स्वत: ही अविनाशी बन जाते! दुनिया वाले पावन बनते हैं लेकिन मेहनत से। और उन्हें 21 जन्मों के वर्से के रूप में पवित्रता नहीं प्राप्त होती है। आज दुनिया के हिसाब से होली का दिन कहते हैं। वह होली मनाते और आप स्वयं ही परमात्मा रंग में रंगने वाले होली आत्मायें बन जाते हो। मनाना थोड़े समय के लिए होता है, बनना जीवन के लिए होता है। वह दिन मनाते और आप होली जीवन बनाते हो। यह संगमयुग होली जीवन का युग है। तो रंग में रंग गये अर्थात् अविनाशी रंग लग गया। जो मिटाने की आवश्यकता नहीं। सदाकाल के लिए बाप समान बन गये। संगमयुग पर निराकार बाप समान कर्मातीत, निराकारी स्थिति का अनुभव करते हो और 21 जन्म ब्रह्मा बाप समान सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी श्रेष्ठ जीवन का समान अनुभव करते हो। तो आपकी होली है संग के रंग में बाप समान बनना। ऐसा पक्का रंग हो जो समान बना दो। ऐसी होली दुनिया में कोई खेलते हैं? बाप समान बनाने की होली खेलने आते हैं। कितने भिन्न-भिन्न रंग बाप द्वारा हर आत्मा पर अविनाशी चढ़ जाते हैं। ज्ञान का रंग, याद का रंग, अनेक शक्तियों के रंग, गुणों के रंग, श्रेष्ठ दृष्टि, श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना स्वत: सदा बन जाए, यह रूहानी रंग कितना सहज चढ़ जाता है। होली बन गये अर्थात् होली हो गये। वह होली मनाते हैं, जैसे गुण हैं वैसा रूप बन जाते हैं। उसी समय कोई उन्हों का फोटो निकाले तो कैसा लगेगा। वह होली मनाकर क्या बन जाते और आप होली मनाते हो तो फरिश्ता सो देवता बन जाते हो। है सब आपका ही यादगार लेकिन आध्यात्मिक शक्ति न होने के कारण आध्यात्मिक रूप से नहीं मना सकते हैं। बाहरमुखता होने कारण बाहरमुखी रूप से ही मनाते रहते हैं। आपका यथार्थ रूप से मंगल मिलन मनाना है।

होली की विशेषता है जलाना, फिर मनाना और फिर मंगल मिलन करना। इन तीन विशेषताओं से यादगार बना हुआ है। क्योंकि आप सभी ने होली बनने के लिए पहले पुराने संस्कार, पुरानी स्मृतियाँ सभी को योग अग्नि से जलाया तभी संग के रंग में होली मनाया अर्थात् बाप समान संग का रंग लगाया। जब बाप के संग का रंग लग जाता है तो हर आत्मा के प्रति विश्व की सर्व आत्मायें परमात्म परिवार बन जाते हैं। परमात्म परिवार होने के कारण हर आत्मा के प्रति शुभ कामना स्वत: ही नेचुरल संस्कार बन जाती है। इसलिए सदा एक दो में मंगल मिलन मनाते रहते हैं। चाहे कोई दुश्मन भी हो, आसुरी संस्कार वाले हों लेकिन इस रूहानी मंगल मिलन से उनको भी परमात्म रंग का छींटा जरूर डालते। कोई भी आपके पास आयेगा तो क्या करेगा? सबसे गले मिलना अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा समझ गले मिलना। यह बाप के बच्चे हैं। यह प्यार का मिलन, शुभ भावना का मिलन, उन आत्माओं को भी पुरानी बातें भुला देता है। वह भी उत्साह में आ जाते। इसलिए उत्सव के रूप में यादगार बना लिया है। तो बाप से होली मनाना अर्थात् अविनाशी रूहानी रंग में बाप समान बनना। वह लोग तो उदास रहते हैं इसलिए खुशी मनाने के लिए यह दिन रखे हैं। और आप लोग तो सदा ही खुशी में नाचते गाते, मौज मनाते रहते हो। जो ज्यादा मूँझते हैं – क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ वह मौज में नहीं रह सकते। आप त्रिकालदर्शी बन गये तो फिर क्या, क्यों, कैसे यह संकल्प उठ ही नहीं सकते क्योंकि तीनों कालों को जानते हो। क्यों हुआ? जानते हैं पेपर है आगे बढ़ने लिए। क्यों हुआ? नथिंग न्यू। तो क्या हुआ का क्वेश्चन ही नहीं। कैसे हुआ? माया और मजबूत बनाने के लिए आई और चली गई। तो त्रिकालदर्शी स्थिति वाले इसमें मूँझते नहीं। क्वेश्चन के साथ-साथ रेसपाण्ड पहले आता क्योंकि त्रिकालदर्शी हो। नाम त्रिकालदर्शी और वर्तमान को भी न जान सके – क्यों हुआ, कैसे हुआ तो उसको त्रिकलदर्शी कैसे कहेंगे! अनेक बार विजयी बने हैं और बनने वाले भी हैं। पास्ट और फ्युचर को भी जानते हैं कि हम ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता बनने वाले हैं। आज और कल की बात है। क्वेश्चन समाप्त हो फुलस्टॉप आ जाता है।

होली का अर्थ भी है हो-ली, पास्ट इज़ पास्ट। ऐसे बिन्दी लगाने आती है ना! यह भी होली का अर्थ है। जलाने वाली होली भी आती। रंग में रंगने वाली होली भी आती और बिन्दी लगाने की होली भी आती। मंगल मिलन मनाने की होली भी आती। चारों ही प्रकार की होली आती है ना! अगर एक प्रकार भी कम होगी तो लाइट का ताज टिकेगा नहीं। गिरता रहेगा। ताज टाइट नहीं होता तो गिरता रहता है ना। चारों ही प्रकार की होली मनाने में पास हो? जब बाप समान बनना है तो बाप सम्पन्न भी है और सम्पूर्ण भी है। परसेन्टेज की स्टेज भी कब तक? जिससे स्नेह होता है तो स्नेही को समान बनने में मुश्किल नहीं होता। बाप के सदा स्नेही हो तो सदा समान क्यों नहीं। सहज है ना। अच्छा।

सभी सदा होली और हैपी रहने वाले होली हंसो को हाइएस्ट ते हाइएस्ट बाप समान होली बनने की अविनाशी मुबारक दे रहे हैं। सदा बाप समान बनने की, सदा होली युग में मौज मनाने की मुबारक दे रहे हैं। सदा होली हंस बन ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बनने की मुबारक दे रहे हैं। सर्व रंगों में रंगे हुए पूज्य आत्मा बनने की मुबारक दे रहे हैं। मुबारक भी है और यादप्यार भी सदा है। और सेवाधारी बाप के मालिक बच्चों के प्रति नमस्ते भी सदा है। तो यादप्यार और नमस्ते।

आज मलेशिया ग्रुप है! साउथ ईस्ट। सभी यह समझते हो कि हम कहाँ-कहाँ बिखर गये थे। परमात्म परिवार के स्टीमर से उतर कहाँ-कहाँ कोने में चले गये। संसार सागर में खो गये क्योंकि द्वापर में आत्मिक बॉम्ब के बजाए शरीर के भान का बॉम्ब लगा। रावण ने बॉम्ब लगा दिया तो स्टीमर टूट गया। परमात्म परिवार का स्टीमर टूट गया और कहाँ-कहाँ चले गये। जहाँ भी सहारा मिला। डूबने वाले को जहाँ भी सहारा मिलता है तो ले लेते हैं ना। आप सबको भी जिस धर्म, जिस देश का थोड़ा सा भी सहारा मिला वहाँ पहुँच गये। लेकिन संस्कार तो वही हैं ना। इसलिए दूसरे धर्म में जाते भी अपने वास्तविक धर्म का परिचय मिलने से पहुँच गये। सारे विश्व में फैल गये थे। यह बिछुड़ना भी कल्याणकारी हुआ, जो अनेक आत्माओं को एक ने निकालने का कार्य किया। विश्व में परमात्म परिवार का परिचय देने के लिए कल्याणकारी बन गये। सब अगर भारत में ही होते तो विश्व में सेवा कैसे होती। इसलिए कोने-कोने में पहुँच गये हो। सभी मुख्य धर्मों में कोई न कोई पहुँच गये हैं। एक भी निकलता है तो हमजिन्स को जगाते जरूर हैं। बापदादा को भी 5 हज़ार वर्ष के बाद बिछुड़े हुए बच्चों को देख करके खुशी होती है। आप सबको भी खुशी होती है ना। पहुँच तो गये। मिल तो गये।

मलेशिया का कोई वी. आई. पी. अभी तक नहीं आया है। सेवा के लक्ष्य से उन्हों को भी निमित्त बनाया जाता है। सेवा की तीव्रगति के निमित्त बन जाते हैं इसलिए उन्हों को आगे रखना पड़ता है। बाप के लिए तो आप ही श्रेष्ठ आत्मायें हो। रूहानी नशे में तो आप श्रेष्ठ हो ना। कहाँ आप पूज्य आत्मायें और कहाँ वह माया में फँसे हुए! अंजान आत्माओं को भी पहचान तो देनी है ना। सिंगापुर में भी अब वृद्धि हो रही है। जहाँ बाप के अनन्य रत्न पहुँचते हैं तो रत्न, रत्नों को ही निकालते हैं। हिम्मत रख सेवा में लगन से आगे बढ़ रहे हैं। तो मेहनत का फल श्रेष्ठ ही मिलेगा। अपने परिवार को इकट्ठा करना है। परिवार का बिछुड़ा हुआ, परिवार में पहुँच जाता है तो कितना खुश होते और दिल से शुक्रिया गाते। तो यह भी परिवार में आकर कितना शुक्रिया गाते होंगे। निमित्त बन बाप का बना लिया। संगम पर शुक्रिया की मालायें बहुत पड़ती हैं।

अध्याय: होली का आध्यात्मिक रहस्य

मुरली संदर्भ: अव्यक्त बापदादा – 25 मार्च 1986


 1. होली – आत्माओं की अलौकिक राज्य सभा

बापदादा इस दिन एक अद्भुत आध्यात्मिक दृश्य दिखाते हैं। वह देखते हैं कि हर श्रेष्ठ आत्मा के सिर पर प्रकाश का ताज चमक रहा है। यह कोई साधारण सभा नहीं बल्कि स्वराज्य अधिकारी आत्माओं की दिव्य राज्य सभा है।

 मुरली नोट:

  • “हर एक श्रेष्ठ आत्मा के ऊपर लाइट का ताज चमकता हुआ देख रहे हैं – यही राज्य सभा होली सभा है।”

 आध्यात्मिक अर्थ:

यह ताज दर्शाता है कि आत्मा ने अपने मन, बुद्धि और संस्कारों पर स्वराज्य प्राप्त कर लिया है।

 उदाहरण:

जैसे कोई राजा अपने राज्य का मालिक होता है, वैसे ही जो आत्मा अपने विचारों और कर्मों पर नियंत्रण पा लेती है, वह स्वराज्य अधिकारी बन जाती है।


 2. होली – केवल एक जन्म नहीं, अनेक जन्मों की पवित्रता

बापदादा बताते हैं कि ब्राह्मण आत्माएं केवल इस जन्म में पवित्र नहीं बनतीं, बल्कि यह पवित्रता अनेक जन्मों तक चलने वाली रेखा बन जाती है।

मुरली नोट:

  • “पावन बनने की रेखा अनेक जन्मों की लम्बी रेखा है।”

 अंतर समझें:

संसार की पवित्रता ब्राह्मण आत्माओं की पवित्रता
मेहनत से मिलती है परमात्मा से सहज वर्सा मिलता है
अस्थायी होती है 21 जन्मों तक चलती है

 उदाहरण:

जैसे कोई छात्र कठिन मेहनत से थोड़े समय के लिए सफलता पाता है, लेकिन जिसे विरासत में संपत्ति मिलती है वह सहज ही सम्पन्न बन जाता है।


 3. होली – मनाना नहीं, बनना

दुनिया होली को केवल उत्सव के रूप में मनाती है, लेकिन संगमयुग की आत्माएं होली जीवन बनाती हैं।

 मुरली नोट:

  • “मनाना थोड़े समय के लिए होता है, बनना जीवन के लिए होता है।”

 आध्यात्मिक रहस्य:

  • संसार – रंग लगाते हैं

  • ब्राह्मण आत्माएं – परमात्मा रंग में रंग जाती हैं

यह रंग अविनाशी होता है जो कभी मिटता नहीं।

 उदाहरण:

जैसे कपड़े पर लगाया रंग कुछ समय बाद उतर जाता है, लेकिन जब रंग कपड़े के धागों में समा जाता है तो वह स्थायी हो जाता है।

 4. परमात्मा के रंग – आत्मा को दिव्य बनाने वाले रंग

बापदादा बताते हैं कि परमात्मा कई दिव्य रंग आत्माओं पर चढ़ाते हैं।

🔹 मुरली नोट:

  • ज्ञान का रंग

  • याद का रंग

  • शक्तियों का रंग

  • गुणों का रंग

  • श्रेष्ठ दृष्टि, वृत्ति और भावना का रंग

 उदाहरण:

जैसे इंद्रधनुष कई रंगों से मिलकर सुंदर बनता है, वैसे ही आत्मा अनेक दिव्य गुणों से सम्पूर्ण बनती है।


 5. होली की तीन मुख्य विशेषताएँ

बापदादा बताते हैं कि होली का आध्यात्मिक रहस्य तीन चरणों में पूरा होता है।

1️⃣ योग अग्नि में जलाना

पुराने संस्कार, पुरानी स्मृतियाँ और विकारों को योग अग्नि में समाप्त करना।

2️⃣ परमात्म रंग में रंगना

बाप समान बनने का अभ्यास करना।

3️⃣ मंगल मिलन करना

हर आत्मा को परमात्म परिवार का सदस्य समझकर प्रेम से मिलना।

🔹 मुरली नोट:

  • “पहले पुराने संस्कार योग अग्नि से जलाये, फिर संग के रंग में रंगे, फिर मंगल मिलन मनाया।”


 6. मंगल मिलन – रूहानी प्रेम का उत्सव

जब आत्मा परमात्मा के रंग में रंग जाती है, तब वह हर आत्मा को परिवार समझती है।

 विशेषता:

  • दुश्मन आत्मा भी मित्र बन जाती है

  • शुभ भावना स्वाभाविक संस्कार बन जाती है

 उदाहरण:

जैसे परिवार में कोई गलती भी करे तो हम उसे क्षमा कर देते हैं, वैसे ही रूहानी आत्माएं हर आत्मा के प्रति शुभ भावना रखती हैं।


 7. त्रिकालदर्शी बनकर सदा खुशी में रहना

बापदादा बताते हैं कि ब्राह्मण आत्माएं त्रिकालदर्शी बन जाती हैं।

🔹 मुरली नोट:

  • “क्यों हुआ, कैसे हुआ – यह संकल्प त्रिकालदर्शी आत्मा में नहीं उठते।”

 त्रिकालदर्शी आत्मा की सोच:

  • हर परिस्थिति को पेपर समझती है

  • हर घटना को ‘Nothing New’ मानती है

 उदाहरण:

जैसे अनुभवी खिलाड़ी मैच में आने वाली कठिनाइयों से घबराता नहीं, बल्कि उन्हें जीतने का अवसर समझता है।


 8. होली का गहरा अर्थ – “हो-ली” अर्थात Past is Past

बापदादा बताते हैं कि होली का एक अर्थ है – जो हो गया, उसे समाप्त कर देना।

🔹 चार प्रकार की होली:

  1. संस्कार जलाने की होली

  2. परमात्म रंग में रंगने की होली

  3. बिन्दी लगाने की होली (Past is Past)

  4. मंगल मिलन की होली

 आध्यात्मिक संदेश:

जब आत्मा चारों होली मनाती है तभी आत्मिक ताज स्थिर रहता है।


 9. विश्व सेवा का रहस्य – परमात्म परिवार का विस्तार

बापदादा बताते हैं कि आत्माएं विश्व के अलग-अलग धर्मों और देशों में फैल गईं ताकि परमात्म ज्ञान का प्रचार हो सके।

🔹 मुरली नोट:

  • “सारे विश्व में परमात्म परिवार का परिचय देने के लिए बिछुड़ना भी कल्याणकारी बना।”

 उदाहरण:

जैसे बीज को खेत में अलग-अलग स्थानों पर बोया जाता है ताकि पूरा खेत हरा-भरा हो जाए।


 10. बापदादा की मुबारक और वरदान

बापदादा सभी आत्माओं को वरदान देते हैं:

  • सदा होली हंस बनने का वरदान

  • ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बनने का वरदान

  • सर्व गुणों से रंगे हुए पूज्य आत्मा बनने का वरदान


 निष्कर्ष

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि और परमात्म मिलन का प्रतीक है।
सच्ची होली तब होती है जब आत्मा:

✔ पुराने संस्कारों को जला देती है
✔ परमात्म रंग में रंग जाती है
✔ हर आत्मा से प्रेम का मंगल मिलन करती है

प्रश्न 1: बापदादा होली के दिन कौन सा अलौकिक दृश्य देखते हैं?

उत्तर:
बापदादा देखते हैं कि सभी श्रेष्ठ आत्माओं के सिर पर प्रकाश का ताज चमक रहा है। यह स्वराज्य अधिकारी आत्माओं की दिव्य राज्य सभा होती है, जिसे वास्तविक होली सभा कहा जाता है।


प्रश्न 2: ब्राह्मण आत्माओं की पवित्रता और दुनिया की पवित्रता में क्या अंतर है?

उत्तर:
दुनिया की आत्माएं मेहनत से थोड़े समय के लिए पवित्र बनती हैं, जबकि ब्राह्मण आत्माओं को परमात्मा से सहज रूप से पवित्रता का वर्सा मिलता है, जो 21 जन्मों तक चलता है।


प्रश्न 3: संगमयुग को होली जीवन का युग क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
क्योंकि इस समय आत्माएं परमात्मा के अविनाशी रंग में रंगकर जीवनभर के लिए पवित्र और बाप समान बन जाती हैं। यहाँ होली केवल मनाई नहीं जाती बल्कि जीवन में धारण की जाती है।


प्रश्न 4: सच्ची होली का अर्थ क्या है?

उत्तर:
सच्ची होली का अर्थ है परमात्मा के संग के रंग में रंगकर बाप समान बन जाना। यह ऐसा रंग है जो कभी मिटता नहीं।


प्रश्न 5: परमात्मा आत्माओं पर कौन-कौन से आध्यात्मिक रंग चढ़ाते हैं?

उत्तर:
परमात्मा आत्माओं पर ज्ञान का रंग, याद का रंग, शक्तियों का रंग, गुणों का रंग, श्रेष्ठ दृष्टि, श्रेष्ठ वृत्ति और श्रेष्ठ भावना का रंग चढ़ाते हैं।


प्रश्न 6: होली की मुख्य तीन आध्यात्मिक विशेषताएँ कौन सी हैं?

उत्तर:
1️⃣ पुराने संस्कारों को योग अग्नि में जलाना
2️⃣ परमात्मा के संग के रंग में रंगना
3️⃣ सभी आत्माओं के साथ मंगल मिलन मनाना


प्रश्न 7: मंगल मिलन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर:
हर आत्मा को परमात्मा का परिवार समझकर प्रेम, शुभ भावना और सम्मान से मिलना ही वास्तविक मंगल मिलन है।


प्रश्न 8: त्रिकालदर्शी आत्मा की विशेषता क्या होती है?

उत्तर:
त्रिकालदर्शी आत्मा भूत, वर्तमान और भविष्य को जानती है। इसलिए वह परिस्थितियों में उलझती नहीं और हर घटना को आगे बढ़ने का पेपर समझती है।


प्रश्न 9: होली का “हो-ली” अर्थ क्या बताया गया है?

उत्तर:
“हो-ली” का अर्थ है – जो हो गया वह समाप्त। अर्थात् पास्ट को भूलकर बिन्दी लगाना और आगे बढ़ना।


प्रश्न 10: चार प्रकार की होली कौन-कौन सी हैं?

उत्तर:
1️⃣ संस्कार जलाने की होली
2️⃣ परमात्म रंग में रंगने की होली
3️⃣ पास्ट को समाप्त करने की होली
4️⃣ मंगल मिलन की होली


प्रश्न 11: यदि चारों प्रकार की होली नहीं मनाई जाए तो क्या होता है?

उत्तर:
यदि इनमें से कोई एक भी कमी रह जाती है तो आत्मा का प्रकाश ताज स्थिर नहीं रह पाता और आत्मिक स्थिति कमजोर हो जाती है।


प्रश्न 12: ब्राह्मण आत्माएं सदा खुश क्यों रहती हैं?

उत्तर:
क्योंकि वे त्रिकालदर्शी बनकर हर परिस्थिति को ड्रामा का भाग मानती हैं और “क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ” जैसे संकल्पों में नहीं उलझतीं।


प्रश्न 13: आत्माएं अलग-अलग धर्मों और देशों में क्यों फैल गईं?

उत्तर:
ताकि विश्व में परमात्म परिवार का विस्तार हो सके और परमात्मा के ज्ञान का प्रचार पूरे संसार में हो सके।


प्रश्न 14: बापदादा आत्माओं को कौन-कौन सी मुबारक देते हैं?

उत्तर:
✔ सदा होली हंस बनने की मुबारक
✔ ज्ञान रत्नों से सम्पन्न बनने की मुबारक
✔ सर्व गुणों से रंगे हुए पूज्य आत्मा बनने की मुबारक
✔ सदा बाप समान बनने की मुबारक


प्रश्न 15: संगमयुग में सेवा का विशेष लक्ष्य क्या है?

उत्तर:
परमात्म परिवार के बिछुड़े हुए आत्माओं को पुनः परमात्मा से मिलाना और उन्हें आत्मिक पहचान दिलाना ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है।

Disclaimer:

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं अव्यक्त मुरली (25 मार्च 1986) पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान एवं आत्मिक उन्नति के लिए प्रेरित करना है। यह किसी धर्म, संप्रदाय या परंपरा की आलोचना नहीं करता। सभी आध्यात्मिक विचार व्यक्तिगत आत्मिक अनुभव एवं अध्ययन पर आधारित हैं।

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