MURLI 28-07-2026 |BRAHMA KUMARIS

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Questions & Answers (प्रश्नोत्तर):are given below

28-07-2026
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“ मीठे बच्चे – तुम्हारी बिगड़ी को सुधारने वाला अर्थात् तकदीर बनाने वाला एक बाप है , जो तुम्हें नॉलेज देकर तकदीरवान बनाते हैं ”
प्रश्नः- तुम बच्चों की इस रूहानी भट्ठी का एक कायदा कौन सा है?
उत्तर:- रूहानी भट्ठी में अर्थात् याद की यात्रा में बैठने वालों को कभी भी इधर-उधर के ख्यालात नहीं चलाने हैं, एक बाप को याद करना है। अगर बुद्धि इधर-उधर भटकती है तो झुटका खाते रहेंगे, उबासी देंगे, इससे वायुमण्डल खराब होता है। अपना ही नुकसान करते हैं।
गीत:- दिल का सहारा टूट न जाये…

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत के दो अक्षर सुने। बच्चों को सावधानी मिलती है। इस समय जो भी हैं सबकी तकदीर बिगड़ी हुई है – सिवाए तुम ब्राह्मणों के। तुम्हारी अब बिगड़ी से सुधर रही है। बाप को कहा ही जाता है तकदीर बनाने वाला। तुम जानते हो शिवबाबा कितना मीठा है। बाबा अक्षर बड़ा मीठा है। बाप से सब आत्माओं को वर्सा मिलता है। लौकिक बाप से बच्चों को वर्सा मिलता है, बच्ची को नहीं। यहाँ बच्चा वा बच्ची सब वर्से के हकदार हैं। बाप पढ़ाते हैं आत्माओं को अर्थात् अपने बच्चों को। आत्मा समझती है हम सब ब्रदर्स हैं। बरोबर ब्रदरहुड कहा जाता है ना। एक भगवान के बच्चे हैं फिर इतना लड़ते झगड़ते क्यों? सब आपस में लड़ते ही रहते हैं। अनेक धर्म, अनेक मत हैं और मुख्य बात तो रावण राज्य में लड़ाई ही चलती है क्योंकि विकारों की प्रवेशता है। काम विकार पर भी कितना लड़ाई झगड़ा होता है। ऐसे बहुत राजाओं ने लड़ाई की है। काम के लिए बहुत लड़ते हैं। कितने खुश होते हैं। कोई के साथ दिल होती है तो मार भी देते हैं। काम महाशत्रु है। क्रोध वाले को तो क्रोधी ही कहेंगे। लोभ वाले को लोभी कहेंगे। लेकिन जो कामी हैं उनके बहुत नाम रखे हुए हैं इसलिए कहा जाता है – अमृत छोड़ विष काहे को खाए। शास्त्रों में अमृत नाम लिख दिया है। दिखाते हैं सागर मंथन किया तो अमृत निकला। कलष लक्ष्मी को दिया। कितनी कहानियां हैं। इसमें भी बड़े ते बड़ी बात है सर्वव्यापी की, गीता का भगवान कौन? और पतित-पावन कौन? प्रदर्शनी में मुख्य इन्हीं चित्रों पर समझाया जाता है। पतित-पावन, ज्ञान का सागर और उनसे निकली हुई ज्ञान गंगायें वा पानी की नदी वा सागर? कितनी अच्छी-अच्छी बातें समझाई जाती हैं। बाप बैठ समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों तुमको किसने पावन बनाया? बिगड़ी को सुधारने वाला कौन है? वह पतित-पावन कब आते हैं? यह खेल कैसे बना हुआ है? कोई भी नहीं जानते हैं। बाप को कहा ही जाता है नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, पीसफुल। गाया भी जाता है – बिगड़ी को बनाने वाला एक। यह तो समझने में आता है – बरोबर रावण हमारी बिगाड़ते हैं। यह खेल है हार जीत का। रावण को भी तुम जानते हो जिसको भारतवासी वर्ष-वर्ष जलाते हैं। यह भारत का दुश्मन है। भारत में ही हर वर्ष जलाते हैं। उनसे पूछो कब से जलाते आते हो? तो कहेंगे यह तो अनादि चला आता है, जब से सृष्टि शुरू होती है। शास्त्रों में जो पढ़ा सत-सत करते आते हैं। मुख्य भूल है ईश्वर को सर्वव्यापी कहना। बाप यह नहीं कहते कि यह किसकी भूल है! यह ड्रामा में नूँध है। हार जीत का खेल है। माया से हारे हार, माया से जीते जीत। माया से कैसे हार खाते हैं, वह भी समझाया जाता है। पूरा आधाकल्प रावणराज्य चलता है। एक सेकेण्ड का भी फर्क नहीं हो सकता। रामराज्य की स्थापना और रावण राज्य का विनाश। अपने समय पर एक्यूरेट चलते हैं। सतयुग में तो लंका होती नहीं। वह तो बुद्ध धर्म का खण्ड है। पढ़े लिखे की बुद्धि में रहता है, लण्डन इस तरफ है, अमेरिका इस तरफ है। पढ़ाई से बुद्धि का ताला खुलता है, रोशनी आती है। इसको ज्ञान का तीसरा नेत्र कहा जाता है। बुढ़ियां बहुत बातें समझ न सकें। इन्हों को एक मुख्य बात धारण करनी है, जो ही अन्त में काम आती है। मनुष्य शास्त्र तो बहुत पढ़ते हैं। पिछाड़ी में फिर भी एक अक्षर कह देते हैं कि राम-राम कहो। ऐसे नहीं कहते शास्त्र सुनाओ, वेद सुनाओ। पिछाड़ी में कहेंगे राम को याद करो। जो जास्ती समय जिस चिंतन में रहते हैं, अन्त में भी वह याद आ जाता है। अभी विनाश तो सबका होना है। तुम जानते हो सब किसको याद करेंगे? कोई श्रीकृष्ण को, कोई अपने गुरू को याद करेंगे। कोई अपने देह के सम्बन्धियों को याद करेंगे। देह को याद किया, खेल खलास। यहाँ तुमको एक ही बात समझाई जाती है कि अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते रहो। चार्ट रखो कि हम कितना याद करते हैं। जितना याद करेंगे, पावन होते जायेंगे। ऐसे नहीं कि गंगा में स्नान करने से पावन बनेंगे। आत्मा की बात है ना। आत्मा ही पतित, आत्मा ही पावन बनती है ना। बाप ने समझाया है – आत्मा एक स्टार बिन्दी है। भ्रकुटी के बीच में रहती है। कहते हैं आत्मा स्टार अति सूक्ष्म है। तुम बच्चे ही इन बातों को समझ सकते हो। बाप कहते हैं मैं कल्प के संगमयुगे आता हूँ। उन्होंने फिर कल्प अक्षर छोड़ युगे-युगे अक्षर लिख दिया है। तो मनुष्यों ने उल्टा समझ लिया है। मैंने कहा है कि कल्प-कल्प संगमयुगे आता हूँ, घोर अन्धियारा और घोर सोझरे के संगम पर। बाकी युगे-युगे आने की तो दरकार ही नहीं। सीढ़ी उतरते ही आते हैं। जब पूरे 84 जन्म की सीढ़ी उतरते हैं तब बाप आते हैं। यह ज्ञान सारी दुनिया के लिए है। संन्यासी लोग तो कह देते हैं इन्हों के चित्र सब कल्पना हैं। परन्तु कल्पना की तो इसमें कोई बात ही नहीं। यह सबको समझाया जाता है, नहीं तो मनुष्यों को कैसे पता पड़े इसलिए यह चित्र बनाये गये हैं। यह प्रदर्शनी देश-देशान्तर में ढेर होती रहेंगी। बाप कहते हैं बहुत भारत-वासी बच्चे हैं। हैं तो सब बच्चे ना। अनेक धर्मों का यह झाड़ है। बाप बैठ समझाते हैं – यह सब काम चिता पर बैठ जल मरे हैं। सतयुग में जो पहले-पहले आते हैं, वही फिर पहले-पहले द्वापर से लेकर काम अग्नि में जलते हैं इसलिए काले हो गये हैं। अभी सबकी सद्गति होनी है। तुम निमित्त बनते हो। तुम्हारे पिछाड़ी सबकी सद्गति होनी है। बाप कितना सहज रीति समझाते हैं। कहते हैं सिर्फ बाप को याद करो। आत्मा ने ही दुर्गति को पाया है। आत्मा पतित बनने से शरीर भी ऐसा मिलता है। आत्मा को पावन बनाने की युक्ति बाप बिल्कुल सहज बताते हैं।

त्रिमूर्ति के चित्र में ब्रह्मा का चित्र देख मनुष्य हाय-हाय मचा देते हैं। इनको ब्रह्मा क्यों कहते हो? ब्रह्मा तो सूक्ष्मवतन वासी देवता है, यहाँ कहाँ से आया? यह दादा तो नामीग्रामी था। अखबारों में सब जगह पड़ा था, एक जौहरी कहता है मैं श्रीकृष्ण हूँ, हमको 16108 रानियां चाहिए। बड़ा हंगामा मच गया था, भगाने का। अब एक-एक से माथा कौन मारे। इतने ढेर मनुष्य हैं। आबू में भी कोई आते हैं तो उनको झट कहते हैं अरे ब्रह्माकुमारियों के पास जाते हो! वह तो जादू कर देती हैं। स्त्री-पुरुष को भाई-बहिन बना देती हैं। लम्बी चौड़ी बात बताकर माथा खराब कर देते हैं। बाप कहते हैं तुम मुझे ज्ञान सागर वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहते हो। वर्ल्ड आलमाइटी अर्थात् सर्वशक्तिमान्, सब वेदों शास्त्रों आदि को जानने वाला। बड़े विद्वान को भी अथॉरिटी कहते हैं क्योंकि वह सब वेदों, शास्त्रों आदि को पढ़ते हैं फिर बनारस में जाकर टाइटिल ले आते हैं। महा-महोपाध्याय, श्री श्री 108 सरस्वती यह सब टाईटिल्स वहाँ ही मिलते हैं। जो बहुत होशियार होते हैं, उनको बड़ा टाइटिल मिलता है। शास्त्रों में जनक के लिए लिखा हुआ है। उसने कहा कि सच्चा ब्रह्म ज्ञान कोई हमको सुनाये। अब ब्रह्म ज्ञान तो है नहीं। बातें सारी यहाँ की हैं। कहानी बड़ी बना दी है। शंकर पार्वती की भी कहानी लिखी हुई है। कितनी कहानियां बैठ बनाई हैं। शंकर ने पार्वती को कथा सुनाई, वास्तव में था शिव उन्होंने फिर शंकर पार्वती का नाम दे दिया है। भागवत आदि में यह सब इस समय की बात है। फिर कहानी में बताते हैं, उनको ख्याल आया – राजा को यह ज्ञान जाकर दूँ। बाप भी समझाते हैं – राजाओं को जाकर ज्ञान दो। तुम ही सूर्यवंशी थे फिर चन्द्रवंशी, वैश्य वंशी, शूद्रवंशी बनें। तुम्हारी राजधानी ही चट हो गई है। अब फिर सूर्यवंशी राजधानी लेना हो तो पुरुषार्थ करो। राजयोग सिखाने वाला बाबा आया हुआ है। फिर आकर बेहद का स्वराज्य लो। राजाओं के पास भी बहुत चिट्ठियां जाती हैं फिर उनको मिलती थोड़ेही हैं। उनके प्राइवेट सेक्रेटरी चिट्ठियां देखते हैं। कितनी चिट्ठियां फेंक देते हैं। कोई में ऐसी जरूरी बात होती है तो उनको दिखा देते हैं। कहते हैं – अष्टापा ने जनक को सेकेण्ड में जीवनमुक्ति का साक्षात्कार कराया। यह भी अब है। अब बाप कितना अच्छी तरह बैठ तुमको समझाते हैं। जो समझने वाले नहीं हैं, वह यहाँ-वहाँ देखते रहेंगे। बाबा झट समझ जाते हैं – उनकी बुद्धि में कुछ बैठता नहीं है। बाबा चारों तरफ देखते भी हैं – सभी अच्छी तरह सुनते हैं। इनकी बुद्धि कहाँ भटकती रहती है। उबासी देते रहते हैं। ज्ञान बुद्धि में नहीं बैठेगा तो झुटके खाते रहेंगे, नुकसान हो जाता है। कराची में इन बच्चों की भट्ठी थी। कोई झुटका खाता था तो फिर झट बाहर निकाला जाता था। अपने ही बैठते थे। बाहर का कोई आता नहीं था। शुरू में इन्हों का बड़ा पार्ट चला है। लम्बी हिस्ट्री है। शुरू में तो बच्चियां बहुत ध्यान में चली जाती थी। अभी तक भी कहते रहते हैं जादू है। परमपिता परमात्मा को जादूगर कहते हैं ना। शिवबाबा देखते हैं – इनका बहुत प्रेम है, तो देखने से ही झट ध्यान में चले जाते हैं। वैकुण्ठ तो भारत-वासियों को बहुत प्यारा है। कोई मरता है तो भी कहते हैं वैकुण्ठवासी हुआ, स्वर्गवासी हुआ। अभी यह तो है ही नर्क। सब नर्कवासी हैं, तब तो कहते हैं फलाना स्वर्गवासी हुआ। परन्तु स्वर्ग में तो कोई जाता ही नहीं है। अभी सिर्फ यह तुम जानते हो हम स्वर्गवासी थे फिर 84 जन्म ले नर्कवासी बन गये हैं। अब फिर बाबा स्वर्गवासी बना रहे हैं। स्वर्ग में है राजधानी। राजधानी में बहुत पद हैं। पुरुषार्थ कर नर से नारायण बनना है। तुम जानते हो यह मम्मा बाबा भविष्य में लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। अभी पुरुषार्थ कर रहे हैं, इसलिए कहा जाता है फालो मदर-फादर। जैसे यह पुरुषार्थ करते हैं, तुम भी करो। यह भी याद में रहते हैं, स्वदर्शन चक्रधारी बनते हैं। तुम बाप को याद करो और वर्से को याद करो। त्रिकालदर्शी बनो। तुमको इस सारे चक्र का ज्ञान है, इसमें तत्पर रहो, औरों को समझाते रहो। इस सर्विस में ही लगे रहेंगे तो और कोई धन्धा आदि याद नहीं पड़ेगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सतयुग में ऊंच पद पाने के लिए मात-पिता को पूरा-पूरा फालो करना है। उनके समान पुरुषार्थ करना है। सेवा में तत्पर रहना है। एकाग्र हो पढ़ाई करनी है।

2) याद का सच्चा-सच्चा चार्ट रखना है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है, देह वा देहधारियों को याद नहीं करना है।

वरदान:- अपने हाइएस्ट पोजीशन में स्थित रहकर हर संकल्प , बोल और कर्म करने वाले सम्पूर्ण निर्विकारी भव
सम्पूर्ण निर्विकारी अर्थात् किसी भी परसेन्ट में कोई भी विकार तरफ आकर्षण न जाए, कभी उनके वशीभूत न हों। हाइएस्ट पोजीशन वाली आत्मायें कोई साधारण संकल्प भी नहीं कर सकती। तो जब कोई भी संकल्प वा कर्म करते हो तो चेक करो कि जैसा ऊंचा नाम वैसा ऊंचा काम है? अगर नाम ऊंचा, काम नीचा तो नाम बदनाम करते हो इसलिए लक्ष्य प्रमाण लक्षण धारण करो तब कहेंगे सम्पूर्ण निर्विकारी अर्थात् होलीएस्ट आत्मा।
स्लोगन:- कर्म करते करन-करावनहार बाप की स्मृति रहे तो स्व-पुरुषार्थ और योग का बैलेन्स ठीक रहेगा।

 

ये अव्यक्त इशारे – ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो

इस कलियुगी तमोप्रधान जड़जड़ीभूत वृक्ष की दुर्दशा देखते हुए ब्रह्मा बाप को संकल्प आता है कि अभी-अभी बच्चों के तपस्वी रूप द्वारा, योग अग्नि द्वारा इस पुराने वृक्ष को भस्म कर दें। परन्तु इसके लिए संगठित रूप में फुलफोर्स से योग ज्वाला प्रज्जवलित चाहिए। तो ब्रह्मा बाप के इस संकल्प को साकार में लाओ।

मीठे बच्चे – तकदीर बनाने वाला एक बाप | मुरली प्रश्नोत्तर

1. प्रश्न: हमारी बिगड़ी हुई तकदीर को सुधारने वाला कौन है?

उत्तर: केवल परमपिता शिवबाबा ही हमारी बिगड़ी हुई तकदीर को सुधारने वाले हैं। वे ज्ञान देकर आत्मा को पावन बनाते हैं और श्रेष्ठ भाग्य का निर्माण कराते हैं।


2. प्रश्न: रूहानी भट्ठी (याद की यात्रा) का मुख्य नियम क्या है?

उत्तर: रूहानी भट्ठी में बैठते समय केवल एक परमपिता परमात्मा को याद करना चाहिए। इधर-उधर के विचार, आलस्य या उबासी वातावरण को भी प्रभावित करते हैं और स्वयं का भी नुकसान करते हैं।


3. प्रश्न: सभी मनुष्य आपस में क्यों लड़ते-झगड़ते हैं?

उत्तर: क्योंकि रावण राज्य में पाँच विकारों का प्रभाव है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण मतभेद, संघर्ष और अशांति उत्पन्न होती है।


4. प्रश्न: सबसे बड़ा शत्रु किस विकार को कहा गया है?

उत्तर: काम विकार को महाशत्रु कहा गया है, क्योंकि यह आत्मा की शक्ति और पवित्रता को नष्ट कर देता है।


5. प्रश्न: परमात्मा को “पतित-पावन” क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि केवल परमात्मा ही पतित आत्माओं को ज्ञान और योग के द्वारा पावन बना सकते हैं।


6. प्रश्न: भारतवासी हर वर्ष रावण क्यों जलाते हैं?

उत्तर: रावण पाँच विकारों का प्रतीक है। उसका दहन इस बात का संकेत है कि मनुष्य विकारों से मुक्ति चाहता है, यद्यपि वास्तविक विजय ज्ञान और योग से ही मिलती है।


7. प्रश्न: माया से हार और जीत कैसे होती है?

उत्तर: जब आत्मा विकारों के वश में आ जाती है तो माया से हार जाती है। जब परमात्मा की याद और ज्ञान के आधार पर विकारों पर विजय प्राप्त करती है तो माया पर जीत जाती है।


8. प्रश्न: आत्मा को पावन बनाने की सहज विधि क्या है?

उत्तर: स्वयं को आत्मा समझकर निरंतर परमपिता शिवबाबा को याद करना ही आत्मा को पावन बनाने की सबसे सहज विधि है।


9. प्रश्न: बाप बार-बार चार्ट रखने की प्रेरणा क्यों देते हैं?

उत्तर: ताकि हम यह जाँच सकें कि दिनभर में हमने कितनी देर परमात्मा को याद किया और अपनी योग-स्थिति को निरंतर बढ़ा सकें।


10. प्रश्न: मृत्यु के समय वही याद क्यों आता है जिसका जीवनभर चिंतन किया हो?

उत्तर: क्योंकि अंतिम समय में मन उसी दिशा में जाता है, जिस दिशा में जीवनभर अभ्यास किया गया हो। इसलिए अभी से परमात्मा स्मृति का अभ्यास आवश्यक है।


11. प्रश्न: “अपने को आत्मा समझो” – इसका क्या महत्व है?

उत्तर: आत्म-अभिमान से देह-अभिमान समाप्त होता है, विकार कमजोर होते हैं और परमात्मा से योग सहज हो जाता है।


12. प्रश्न: “ज्ञान का तीसरा नेत्र” किसे कहा गया है?

उत्तर: आत्मिक ज्ञान को, जिससे आत्मा सृष्टि-चक्र, परमात्मा और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है।


13. प्रश्न: बाप संगमयुग में ही क्यों आते हैं?

उत्तर: क्योंकि संगमयुग ही वह समय है जब पुरानी दुनिया का परिवर्तन होकर नई सतयुगी दुनिया की स्थापना होती है।


14. प्रश्न: ब्राह्मण जीवन का मुख्य पुरुषार्थ क्या है?

उत्तर: परमात्मा की याद, आत्म-अभिमान, ज्ञान का अध्ययन और सेवा के द्वारा देवताई संस्कार धारण करना।


15. प्रश्न: स्वर्गवासी बनने का वास्तविक मार्ग क्या है?

उत्तर: ज्ञान, योग, पवित्रता और श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा अभी पुरुषार्थ करना ही स्वर्ग का अधिकारी बनाता है।


16. प्रश्न: “फॉलो मदर-फादर” का क्या अर्थ है?

उत्तर: ब्रह्मा बाबा और मम्मा के समान स्मृति, सेवा, पवित्रता और पुरुषार्थ का जीवन अपनाना।


17. प्रश्न: त्रिकालदर्शी बनने का अर्थ क्या है?

उत्तर: आदि, मध्य और अंत के ज्ञान को समझकर वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करना।


18. प्रश्न: सच्ची सेवा किसे कहा गया है?

उत्तर: स्वयं योगयुक्त रहकर दूसरों को परमात्मा का परिचय देना और ज्ञान का दान करना।


19. प्रश्न: सम्पूर्ण निर्विकारी आत्मा किसे कहा गया है?

उत्तर: जो किसी भी परिस्थिति में किसी भी विकार के आकर्षण या प्रभाव में नहीं आती, वही सम्पूर्ण निर्विकारी आत्मा है।


20. प्रश्न: कर्म करते हुए योग का संतुलन कैसे बनाए रखें?

उत्तर: स्वयं को निमित्त समझकर करन-करावनहार परमात्मा की स्मृति में रहकर कर्म करें। इससे योग और कर्म दोनों का संतुलन बना रहता है।


21. प्रश्न: ब्रह्मा बाबा बच्चों से किस विशेष तपस्या की अपेक्षा रखते हैं?

उत्तर: संगठित रूप में शक्तिशाली योग-ज्वाला प्रज्वलित कर पुराने तमोप्रधान संसार के परिवर्तन का निमित्त बनने की।


मुख्य संदेश (Takeaway)

याद ही योग है।
योग ही पवित्रता है।
पवित्रता ही तकदीर है।
और उस तकदीर का निर्माता केवल एक परमपिता शिवबाबा है।

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