RVS.भाग -1(07)चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान
राज योग
वैज्ञानिक सिद्धांत
आज हम उसके भाग एक के चेतना का विज्ञान, साइंस ऑफ कॉन्शियसनेस का सातवां पाठ कर रहे हैं।
चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान
सोचना, निर्णय लेना, आदत बनाना, बनना—एक अदृश्य आंतरिक प्रक्रिया है।
चेतन, अवचेतन और संस्कार स्तर।
संस्कार स्तर को ऑटोमेटिक माइंड कहते हैं।
संस्कार स्तर को अचेतन मन भी कहते हैं। तीन होते हैं। एक होता है चेतन। एक होता है अवचेतन। अवचेतन का दूसरा नाम क्या होता है?
कौन बताएंगे अवचेतन का दूसरा नाम?
उसको कहते हैं अंग्रेजी में सबकॉन्शियस। और हिंदी में अवचेतन को अर्ध चेतन भी कहते हैं।
अवचेतन को अर्ध चेतन भी कहते हैं। और तीसरे को वो अचेतन कहते हैं। वास्तव में वो है ऑटोमेटिक माइंड।
एक है कॉन्शियस माइंड, एक है सबकॉन्शियस माइंड। और तीसरे को दुनिया वाले कहते हैं अनकॉन्शियस माइंड। परंतु हमारी भाषा है ऑटोमेटिक माइंड।
विचार निर्णय करना, कर्म करना, आदत बनाना फिर वह संस्कार बनते हैं और संस्कार से फिर हमारा भाग्य बनता है।
यह है राजयोग के सिद्धांत में राजयोग वैज्ञानिक सिद्धांत का सातवां पाठ—चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान। इसको हम बहुत ध्यान से समझेंगे।
चेतना का विज्ञान—साइंस ऑफ कॉन्शियसनेस।
विज्ञान की साइंस ऑफ कॉन्शियसनेस, विज्ञान की चेतना कहो या चेतना का विज्ञान कहो। विज्ञान द्वारा चेतना की जानकारी।
अध्याय सात है—चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान।
महत्वपूर्ण निवेदन
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज की शिक्षाओं की आध्यात्मिक शिक्षाओं, विशेष रूप से मुरली में वर्णित फरिश्ता जीवन की एक आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, संप्रदाय, व्यक्ति या मान्यता की आलोचना करना नहीं है। हम आपको किसी बात को अंधविश्वास से स्वीकार करने के लिए नहीं कह रहे हैं।
हमारा विनम्र आग्रह है कि आप इस ज्ञान को शांत मन, खुले विचार और अपने अनुभव के आधार पर परखें।
यदि इस वीडियो से आपके जीवन में शांति, प्रेम, पवित्रता और सकारात्मक परिवर्तन आता है, तभी इसे अपने जीवन में अपनाइए।
चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान
Conscious, Subconscious और Automatic Mind की राजयोगीय व्याख्या
राजयोगी के लिए राजयोग के अनुसार इन तीनों की व्याख्या क्या है?
वैज्ञानिक सिद्धांत
वैज्ञानिक सिद्धांत जो आज हम स्टडी करेंगे वह है—Habit Formation, हमारी आदतें बनती कैसे हैं?
Automatic Processing and Cognitive Awareness.
अध्याय का मूल प्रश्न
क्यों कुछ कार्य सोचकर करने पड़ते हैं? जबकि कुछ बिना सोचे अपने आप हो जाते हैं?
जब बच्चा पहली बार साइकिल चलाता है, उसे हर बात सोचनी पड़ती है।
लेकिन कुछ वर्ष बाद वह बिना सोचे साइकिल चला लेता है। ऐसा क्यों?
पहला स्तर — चेतन अवस्था
Conscious Mind
इस अवस्था में मन विचार करता है और बुद्धि निर्णय लेती है।
मन जो भी समस्याएं आती हैं, आगे जो भी दिखाई देता है, जो कुछ भी वह बुद्धि के पास भेजता है, बुद्धि निर्णय करती है कि आप दाएं मुड़ना है, बाएं मुड़ना है, स्लो करना है, फास्ट करना है, ब्रेक लगाना है।
मतलब जो कुछ आता है उसके बारे में उसे पता लगता रहता है।
पैर ठीक चल रहे हैं, नहीं चल रहे हैं। हैंडल ठीक पकड़ा जा रहा है। किधर जा रहे हैं? राइट जा रहे हैं, लेफ्ट जा रहे हैं, कंट्रोल हो रहा है, नहीं हो रहा है।
वह एक-एक बात ब्रेन, मन जो है वो एकदम बुद्धि को पूछता चलता है और जैसे बुद्धि उसे कहती है करता जाता है।
उस समय उसका मन और बुद्धि दोनों इतने बिजी होते हैं कि तुरंत जवाब लेना।
परंतु जैसे ही वह चलाना सीख जाता है फिर वो बुद्धि को तंग नहीं करता।
फिर वो अपने आप ही उसकी आंखें, उसके पैर, उसके हाथ—हाथ कहां घंटी बजानी है, कहां ब्रेक लगानी है। कहना नहीं पड़ता कि ब्रेक लगाओ।
वो ऑटोमेटिक उसको मालूम है कितनी दूर पहले मुझे ब्रेक लगानी है। कितनी दूर से ब्रेक लगानी है। कितना ब्रेक लगानी है।
उसके साइकिल के हिसाब से वो ट्रेंड हो जाता है।
नई साइकिल पर नई साइकिल जब चलाते हैं तो उसमें ब्रेक का अंदाजा लगाना पड़ता है। लगा के देखना पड़ता है। पता लग जाता है। फिर उसी हिसाब से ब्रेन वर्क करता है।
ब्रेन वर्क नहीं करता। मन वर्क करता है। बुद्धि निर्णय लेती है।
व्यक्ति पूरी तरह जागरूक रहता है। मन और बुद्धि दोनों बिजी हैं तो व्यक्ति पूरी तरह जागरूक रहता है।
यह सीखने की अवस्था है।
दूसरा स्तर — अवचेतन प्रक्रिया
Subconscious Processing
जब बाहरी कार्य कम हो जाते हैं, तो पहले से संचित अनुभव, स्मृतियां, अधूरे विचार और सीखे हुए पैटर्न सक्रिय होने लगते हैं।
जो पहले से संचित अनुभव है, जो पहले से यादें हैं, अधूरे विचार हैं। यह कब काम में आते हैं?
जब मन बुद्धि को छोड़ देता है। अब मन को बुद्धि से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं। अपने आप वह काम करता जा रहा है तो बुद्धि जो है ना फ्री हो जाती है।
तो बुद्धि जैसे ही फ्री होती है तो उस समय जो बातें हमने सारा दिन या कुछ दिन पहले पेंडिंग छोड़ी हुई थी, वह एक-एक करके याद आने लगती है।
जब बाहरी कार्य कम हो जाते हैं तो पहले से संचित अनुभव, स्मृतियां, अधूरे विचार और सीखे हुए पैटर्न सक्रिय होने लगते हैं।
बुद्धि उनका मंथन करती है। इसे कहते हैं अर्ध चेतन।
जब आप सवेरे उठते हो उस समय भी आपकी अवस्था अर्ध चेतन अवस्था होती है।
उस समय हमारा योग के लिए बहुत अच्छा होता है। योग अर्ध चेतन मन में ही होता है।
योग किस में होता है? अर्ध चेतन मन में ही होता है।
उस समय हां जी अचेतन या अवचेतन मन कहेंगे। हां, अवचेतन कहो, अर्ध चेतन कहो। उस समय योग अच्छा लगता है।
योग का मतलब मेरा कौन सा योग है? उस समय मन मना भव वाला योग अच्छा लगता है।
अर्ध चेतन मन को इंग्लिश में क्या बोलेंगे?
सबकॉन्शियस।
अंग्रेजी में सबकॉन्शियस कहते हैं और हिंदी में अवचेतन या अर्ध चेतन कहते हैं।
जिसमें मन और बुद्धि बिजी होते हैं। मन नहीं, जिसमें मन और बुद्धि दोनों बिजी हैं। दोनों एक्टिव हैं। वो चेतन है। Consciousness है। वो Conscious Mind है।
वही मैं कह रही हूं कॉन्शियस होता है। और जब इसमें बुद्धि को सोचना नहीं पड़ता, मन और बुद्धि अलग हो गए।
मन जो है बुद्धि को कोई काम नहीं पूछ रहा। वह अपने आप करना सीख गया है। मतलब उसने ऑटोमेटिक मोड में चला गया है। ठीक है?
नहीं तो उस समय बुद्धि को संसार का कोई काम नहीं। खासकर अमृतवेले।
मन का संस्कार बन गया।
संस्कार बन गया ना। बुद्धि आत्मा का संस्कार होता है। मन का संस्कार नहीं। आत्मा का संस्कार होता है।
आत्मा का मन होता है। आत्मा की बुद्धि होती है।
तो जब संस्कार बन जाता है तो मन ऑटोमेटिक संस्कार के अनुसार काम करना शुरू कर देता है। और बुद्धि जो है अब फ्री है।
आप शरीर से कोई भी काम करते रहें। अमृतवेले उठकर चाहे आपने जो भी काम करना है, परंतु आपकी बुद्धि फ्री है क्योंकि आप रूटीन वर्क कर रहे हो।
जैसे टहलना है, यह रूटीन वर्क है। या रूटीन में जो भी काम करते हो रोजाना, उसके लिए आपको सोचना नहीं पड़ता।
तो रूटीन वर्क में आता है—नहाना है, धोना है, कपड़े बदलने करने हैं। जो भी रूटीन वर्क है उसमें ज्यादा दिमाग चलाने की जरूरत नहीं होती। बुद्धि फ्री होती है।
ऐसे टाइम पर बुद्धि से हम ज्ञान का मंथन बहुत अच्छा कर सकते हैं।
एक तो फ्रेश होते हैं। हमारे पास दुनियावी कोई झमेला नहीं होता। मन कोई काम सामने नहीं लाता—यह कैसे करूं? यह कैसे करूं? वो सिर नहीं खाता।
अब आप ऐसे समय पर बाबा की श्रीमत के अनुसार मन मना भव कर सकते हैं। ज्ञान का मंथन कर सकते हैं। अपने आप को ट्रेन कर सकते हैं।
ठीक है?
तो इसलिए इसको बुद्धि को अमृतवेले के लिए बहुत अच्छा टाइम कहा है क्योंकि मन को कोई भी बाहर की बातें आएंगी नहीं जो आकर डिस्टर्ब करें।
यही कारण है कि कभी-कभी किसी समस्या का समाधान आराम या नींद के बाद सहज मिल जाता है।
यह मेरा मतलब जब मैं ज्ञान में नहीं था तब से मेरा अनुभव है कि मैंने कोई भी डिसीजन करना है तो अमृतवेले करना है।
मैं सो तब तो मैं यह समझता था कि उस समय भगवान जो है ना मदद करता है। भगवान जो है ना सही रास्ता दिखाता है।
पढ़ाई भी हम अमृतवेले करते थे। तो रात को सो जाना है। रात को हमने जो भी टाइम है हम सो गए और सवेरे हमको जल्दी उठना है और पढ़ना है।
पढ़ाई जो है हम सवेरे ही किया करते थे। यह नहीं कि रात को देर तक पढ़ते। रात को तो हमने सो जाना है।
हमें नींद आ भी जाती थी क्योंकि हम हार्ड वर्क जरूर करते थे। क्योंकि हार्ड वर्क था ही था।
तो हार्ड वर्क करने से रात को सोने पता ही नहीं चलता कि पढ़ भी नहीं सकते। बैठेंगे भी तो नींद आएगी।
तो कभी किसी समस्या का समाधान आराम या नींद के बाद शायद मिल जाता है।
आप सवेरे उठेंगे, कैसी भी समस्या हो आपको उसका समाधान करोगे तो बहुत आसानी से मिल जाएगा।
बाबा की श्रीमत के अनुसार अब हमें हर समस्या का समाधान करना है और उस समय कोई हमें प्रेशर देने वाली बात नहीं है।
तीसरा स्तर — संस्कार आधारित स्वचालित कार्य
Automatic Processing
जब कोई कार्य हजारों बार दोहराया जाता है तो वह संस्कार बन जाता है।
अब बुद्धि को हर बार नया निर्णय नहीं लेना पड़ता।
कार्य स्वतः होने लगता है।
यही आदत।
यही योग बल की सफलता है।
यह लाइन बहुत अच्छी तरह नोट करनी है।
यही योग बल की सफलता है।
हमने अपना कोई भी काम करने की आदत को संस्कार बना लिया, पक्का कर लिया। तो हमने एक-एक संस्कार बाबा की श्रीमत के अनुसार बना लिए तो यह है योग बल की सफलता।
शुरू में योग करना पड़ता है।
शुरू में क्या करना पड़ता है? योग करना पड़ता है।
योग अच्छा लगने लगता है। योग स्वभाव बन जाता है।
योगी जीवन अपने आप जिया जाता है। फिर हैबिट में आ जाता है।
फिर हम उसी जीवन में ही जीते हैं। जैसा हमने अपने आप को ट्रेंड कर लिया है। उसी अनुसार फिर चले।
यही स्मृति स्वरूप अवस्था है।
योग बल कैसे बदलता है?
श्रीमत।
योग।
और योग के द्वारा आते हैं श्रेष्ठ विचार।
फिर श्रेष्ठ निर्णय हो जाता है। श्रेष्ठ कर्म हो जाते हैं तो श्रेष्ठ संस्कार बनते हैं।
उसके बाद स्वतः ही श्रेष्ठ जीवन बन जाता है।
स्वतः ही श्रेष्ठ जीवन बन जाता है।
श्रीमत क्या है?
बाबा का ज्ञान।
बाबा का ज्ञान हमें जब मिलता है तो हम योग अर्थात श्रीमत को अपने जीवन में अप्लाई करते हैं।
तो हमारे मन से श्रेष्ठ विचार निकलते हैं जो श्रेष्ठ निर्णय करते हैं।
तो श्रेष्ठ कर्म करेंगे तो श्रेष्ठ संस्कार बन जाएंगे। श्रेष्ठ संस्कार बनेंगे तो हमारा जीवन भी श्रेष्ठ हो जाएगा।
श्रेष्ठ संस्कार से स्वतः ही श्रेष्ठ जीवन बनेगा।
मुरली का रहस्य
इसलिए बाबा कहते हैं—
योग बल से ही सर्व सफलता निश्चित है।
योग बल से ही सर्व सफलता निश्चित है।
योग बल से ही सर्व सफलता निश्चित है।
क्योंकि योग बल केवल विचार नहीं बदलता, वे संस्कार बदल देता है।
योग बल क्या करता है?
हमारे संस्कारों को बदल देता है।
और संस्कार बदल जाए तो भाग्य ऑटोमेटिक बदल जाता है।
संस्कार बदलेंगे तो भाग्य बदल जाता है।
स्वयं को चेक करें
क्या मेरे निर्णय बुद्धि लेती है या पुराने संस्कार?
कौन बताएगा?
स्वयं को चेक करें।
क्या मेरे निर्णय बुद्धि लेती है या पुराने संस्कार?
मेरी कौन सी आदतें स्वतः चलती हैं?
मेरी कौन सी आदतें स्वतः अपने आप चलती हैं?
क्या मैं नए दिव्य संस्कार बना रहा हूं?
क्या मैं नए दिव्य संस्कार बना रहा हूं?
क्या योग अब मेरा प्रयास है या स्वभाव?
क्या योग अब मेरा प्रयास है या स्वभाव?
अध्याय सूत्र
चेतन — अभ्यास से आरंभ होने वाला पुरुषार्थ।
संस्कार — बनने पर सहज जीवन बन जाता है।
यही योग बल की वास्तविक सफलता है।
यही योग बल की वास्तविक सफलता है।
राजयोग वैज्ञानिक सिद्धांत — प्रश्न एवं उत्तर
अध्याय 7: चेतन, अवचेतन और संस्कारों का विज्ञान
प्रश्न 1: चेतन, अवचेतन और संस्कार स्तर क्या हैं?
उत्तर: मन की कार्यप्रणाली को तीन स्तरों में समझाया गया है—चेतन मन (Conscious Mind), अवचेतन या अर्धचेतन मन (Subconscious Mind) और संस्कार आधारित स्वचालित या Automatic Mind। चेतन अवस्था में मन विचार करता है और बुद्धि निर्णय लेती है, जबकि अभ्यास के बाद कई कार्य स्वतः होने लगते हैं।
प्रश्न 2: चेतन अवस्था में मन और बुद्धि का क्या कार्य है?
उत्तर: चेतन अवस्था में मन परिस्थितियों को देखता और विचार करता है तथा बुद्धि निर्णय लेती है कि क्या करना है। उदाहरण के लिए, साइकिल सीखते समय व्यक्ति को गति, ब्रेक, दिशा और संतुलन के बारे में बार-बार सोचना पड़ता है।
प्रश्न 3: साइकिल चलाने का उदाहरण क्या समझाता है?
उत्तर: शुरुआत में साइकिल चलाना चेतन प्रयास होता है। बार-बार अभ्यास करने के बाद वही कार्य स्वचालित हो जाता है। व्यक्ति बिना हर कदम के बारे में सोचे साइकिल चला लेता है। यह अभ्यास से कार्य के स्वचालित बनने का उदाहरण है।
प्रश्न 4: अवचेतन या अर्धचेतन अवस्था क्या है?
उत्तर: जब बाहरी कार्यों का दबाव कम होता है, तब पहले से संचित अनुभव, स्मृतियाँ, अधूरे विचार और सीखे हुए पैटर्न सक्रिय हो सकते हैं। इसे अवचेतन या अर्धचेतन प्रक्रिया के रूप में समझाया गया है।
प्रश्न 5: अमृतवेला योग और चिंतन के लिए उपयोगी क्यों माना गया है?
उत्तर: अमृतवेला में बाहरी गतिविधियाँ और मानसिक व्यस्तताएँ अपेक्षाकृत कम होती हैं। इसलिए व्यक्ति ज्ञान का मंथन, आत्मचिंतन और योग-अभ्यास अधिक एकाग्रता से कर सकता है।
प्रश्न 6: संस्कार कैसे बनते हैं?
उत्तर: किसी विचार या कार्य को बार-बार दोहराने से वह आदत का रूप ले सकता है और लगातार अभ्यास से संस्कार के रूप में दृढ़ हो जाता है। फिर उसी कार्य को करने के लिए हर बार नया निर्णय लेने की आवश्यकता कम हो जाती है।
प्रश्न 7: योगबल की सफलता किसे कहा गया है?
उत्तर: जब श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ निर्णय और श्रेष्ठ कर्मों का लगातार अभ्यास करके उन्हें श्रेष्ठ संस्कारों में परिवर्तित किया जाता है, तब योगी जीवन सहज बनने लगता है। इसे योगबल की सफलता के रूप में समझाया गया है।
प्रश्न 8: श्रीमत से श्रेष्ठ जीवन कैसे बनता है?
उत्तर: श्रीमत और ज्ञान के आधार पर श्रेष्ठ विचार उत्पन्न होते हैं। श्रेष्ठ विचारों से श्रेष्ठ निर्णय, श्रेष्ठ निर्णयों से श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ कर्मों से श्रेष्ठ संस्कार बनते हैं। श्रेष्ठ संस्कार अंततः श्रेष्ठ जीवन का आधार बनते हैं।
सूत्र:
श्रीमत → श्रेष्ठ विचार → श्रेष्ठ निर्णय → श्रेष्ठ कर्म → श्रेष्ठ संस्कार → श्रेष्ठ जीवन
प्रश्न 9: योगबल संस्कारों को कैसे बदलता है?
उत्तर: योगबल केवल विचारों को बदलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निरंतर अभ्यास के माध्यम से पुराने संस्कारों को कमजोर और श्रेष्ठ संस्कारों को मजबूत करने में सहायता करता है।
प्रश्न 10: संस्कार बदलने से भाग्य कैसे बदलता है?
उत्तर: हमारे संस्कार हमारे निर्णयों और कर्मों को प्रभावित करते हैं। जब संस्कार श्रेष्ठ होते हैं तो हमारे निर्णय और कर्म भी श्रेष्ठ दिशा में जाने लगते हैं। इस दृष्टि से संस्कारों में परिवर्तन जीवन की दिशा और भाग्य को बदलने का आधार बन सकता है।
प्रश्न 11: स्वयं को चेक करने के लिए कौन से प्रश्न पूछने चाहिए?
उत्तर:
- क्या मेरे निर्णय बुद्धि ले रही है या पुराने संस्कार?
- मेरी कौन-सी आदतें स्वतः चलती हैं?
- क्या मैं नए दिव्य संस्कार बना रहा हूँ?
- क्या योग अभी मेरा प्रयास है या मेरा स्वभाव बन रहा है?
प्रश्न 12: योग कब प्रयास से स्वभाव बन जाता है?
उत्तर: जब योग का नियमित अभ्यास लगातार किया जाता है और श्रेष्ठ स्मृति, विचार तथा कर्म जीवन में बार-बार दोहराए जाते हैं, तब योग धीरे-धीरे सहज स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है।
प्रश्न 13: अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: चेतन अवस्था में किया गया सही अभ्यास धीरे-धीरे संस्कार बन सकता है। जब श्रेष्ठ योग और श्रेष्ठ कर्म संस्कार बन जाते हैं, तो श्रेष्ठ जीवन अधिक सहज रूप से जीया जाने लगता है।
अध्याय सूत्र
“अभ्यास से आरंभ होने वाला पुरुषार्थ, संस्कार बनने पर सहज जीवन बन जाता है। यही योगबल की वास्तविक सफलता है।”
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