अव्यक्त मुरली-(25)12-04-1984 “ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन – पवित्रता”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
12-04-1984 “ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन – पवित्रता”
आज बापदादा सभी होलीहंसों को देख रहे हैं। हर एक होलीहंस कहाँ तक होली बने हैं, कहाँ तक हंस बने हैं? पवित्रता अर्थात् होली बनने की शक्ति कहाँ तक जीवन में अर्थात् संकल्प, बोल और कर्म में, सम्बन्ध में, सम्पर्क में लाई है? हर संकल्प होली अर्थात् पवित्रता की शक्ति सम्पन्न है? पवित्रता के संकल्प द्वारा किसी भी अपवित्र संकल्प वाली आत्मा को परख और परिवर्तन कर सकते हो? पवित्रता की शक्ति से किसी भी आत्मा की दृष्टि, वृत्ति और कृति तीनों ही बदल सकते हो। इस महान शक्ति के आगे अपवित्र संकल्प भी वार नहीं कर सकते। लेकिन जब स्वयं संकल्प, बोल वा कर्म में हार खाते हो तब दूसरे व्यक्ति वा वायब्रेशन से हार होती है। किसी के भी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाना – यह सिद्ध करता है कि स्वयं बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने में हार खाये हुए हैं, तब किसी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाते हैं। पवित्रता में हार खाना, इसका बीज है किसी भी व्यक्ति वा व्यक्ति के गुण, स्वभाव, व्यक्तित्व वा विशेषता से प्रभावित होना। यह व्यक्ति वा व्यक्त भाव में प्रभावित होना, प्रभावित होना नहीं लेकिन बरबाद होना है। व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषता वा गुण, स्वभाव बाप की दी हुई विशेषता है अर्थात् दाता की देन है। व्यक्ति पर प्रभावित होना यह धोखा खाना है। धोखा खाना अर्थात् दु:ख उठाना। अपवित्रता की शक्ति, मृगतृष्णा समान शक्ति है जो सम्पर्क वा सम्बन्ध से बड़ी अच्छी अनुभव होती है, आकर्षण करती है। समझते हैं कि मैं अच्छाई की तरफ प्रभावित हो रहा हूँ। इसलिए शब्द भी यही बोलते वा सोचते कि यह बहुत अच्छे लगते या अच्छी लगती है वा इसका गुण वा स्वभाव अच्छा लगता है। ज्ञान अच्छा लगता है। योग कराना अच्छा लगता है। इससे शक्ति मिलती है, सहयोग मिलता है, स्नेह मिलता है। अल्पकाल की प्राप्ति होती है लेकिन धोखा खाते हैं। देने वाले दाता अर्थात् बीज को, फाउण्डेशन को खत्म कर दिया और रंग-बिरंगी डाली को पकड़कर झूल रहे हैं तो क्या हाल होगा? सिवाए फाउण्डेशन के डाली झुलायेगी या गिरायेगी? जब तक बीज अर्थात् दाता, विधाता से सर्व सम्बन्ध, सर्व प्राप्ति के रस का अनुभव नहीं तब तक कब व्यक्ति से, कब वैभव से, कब वायब्रेशन वायुमण्डल आदि भिन्न-भिन्न डालियों से अल्पकाल की प्राप्ति का मृगतृष्णा समान धोखा खाते रहेंगे। यह प्रभावित होना अर्थात अविनाशी प्राप्ति से वंचित होना। पवित्रता की शक्ति जब चाहो, जिस स्थिति को चाहो, जिस प्राप्ति को चाहो, जिस कार्य में सफलता चाहो, वह सब आपके आगे दासी के समान हाजिर हो जायेगी। जब कलियुग के अन्त में भी रजोप्रधान पवित्रता की शक्ति धारण करने वाले नामधारी महात्माओं की अब अन्त तक भी प्रकृति दासी होने का प्रमाण देख रहे हो। अब तक भी नाम महात्मा चल रहा है, अब तक भी पूज्य हैं। अपवित्र आत्मायें झुकती हैं। तो सोचो – अन्त तक भी पवित्रता के शक्ति की कितनी महानता है और परमात्मा द्वारा प्राप्त हुई सतोप्रधान पवित्रता कितनी शक्तिशाली होगी। इस श्रेष्ठ पवित्रता की शक्ति के आगे अपवित्रता झुकी हुई नहीं लेकिन आपके पांव के नीचे हैं। अपवित्रता रुपी आसुरी शक्ति, शक्ति स्वरुप के पांव के नीचे दिखाई हुई है। जो पांव के नीचे हारी हुई है, हार कैसे खिला सकती है!
ब्राह्मण जीवन और हार खाना इसको कहेंगे नामधारी ब्राह्मण, इसमें अलबेले मत बनो। ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है – पवित्रता की शक्ति। अगर फाउण्डेशन कमजोर है तो प्राप्तियों की 21 मंजिल वाली बिल्डिंग कैसे टिक सकेगी। यदि फाउण्डेशन हिल रहा है तो प्राप्ति का अनुभव सदा नहीं रह सकता अर्थात् अचल नहीं रह सकते और वर्तमान युग को वा जन्म की महान प्राप्ति का अनुभव भी नहीं कर सकते। युग की, श्रेष्ठ जन्म की महिमा गाने वाले ज्ञानी भक्त बन जायेंगे अर्थात् समझ है लेकिन स्वयं नहीं हैं, इसको कहते हैं ज्ञानी भक्त। अगर ब्राह्मण बनकर सर्व प्राप्तियों का, सर्व शक्तियों का वरदान या वर्सा अनुभव नहीं किया तो उसको क्या कहेंगे? वंचित आत्मा वा ब्राह्मण आत्मा? इस पवित्रता के भिन्न-भिन्न रुपों को अच्छी तरह से जानों, स्वयं के प्रति कड़ी दृष्टि रखो। चलाओ नहीं। निमित्त बनी हुई आत्माओं को, बाप को भी चलाने की कोशिश करते हैं। यह तो होता ही है, ऐसा कौन बना है! वा कहते हैं यह अपवित्रता नहीं है, महानता है, यह तो सेवा का साधन है। प्रभावित नहीं हैं, सहयोग लेते हैं। मददगार है इसीलिए प्रभावित हैं। बाप भूला और लगा माया का गोला या फिर अपने को छुड़ाने के लिए कहते हैं – मैं नहीं करती, यह करते हैं। लेकिन बाप को भूले तो धर्मराज के रुप में ही बाप मिलेगा। बाप का सुख कभी पा नहीं सकेंगे। इसलिए छिपाओ नहीं, चलाओ नहीं। दूसरे को दोषी नहीं बनाओ। मृगतृष्णा के आकर्षण में धोखा नहीं खाओ। इस पवित्रता के फाउण्डेशन में बापदादा धर्मराज द्वारा 100 गुणा, पदमगुणा दण्ड दिलाता है। इसमें रियायत कभी नहीं हो सकती इसमें रहमदिल नहीं बन सकते क्योंकि बाप से नाता तोड़ा तब तो किसी के ऊपर प्रभावित हुए। परमात्म प्रभाव से निकल आत्माओं के प्रभाव में आना अर्थात् बाप को जाना नहीं, पहचाना नहीं। ऐसे के आगे बाप, बाप के रुप में नहीं धर्मराज के रुप में है। जहाँ पाप है वहाँ बाप नहीं। तो अलबेले नहीं बनो। इसको छोटी सी बात नहीं समझो। वह भी किसी के प्रति प्रभावित होना, कामना अर्थात् काम विकार का अंश है। बिना कामना के प्रभावित नहीं हो सकते। वह कामना भी काम विकार है। महाशत्रु है। यह दो रुप में आता है। कामना या तो प्रभावित करेगी या परेशान करेगी। इसलिए जैसे नारे लगाते हो – काम विकार नर्क का द्वार। ऐसे अब अपने जीवन के प्रति यह धारणा बनाओ कि किसी भी प्रकार की अल्पकाल की कामना मृगतृष्णा के समान धोखेबाज है। कामना अर्थात् धोखा खाना। ऐसी कड़ी दृष्टि वाले इस काम अर्थात् कामना पर काली रुप बनो। स्नेही रुप नहीं बनो, बिचारा है, अच्छा है, थोड़ा-थोड़ा है, ठीक हो जायेगा। नहीं! विकर्म के ऊपर विकराल रुप धारण करो। दूसरों के प्रति नहीं अपने प्रति तब विकर्म विनाश कर फरिश्ता बन सकेंगे। योग नहीं लगता तो चेक करो – जरुर कोई छिपा हुआ विकर्म अपने तरफ खींचता है। ब्राह्मण आत्मा और योग नहीं लगे, यह हो नहीं सकता। ब्राह्मण माना ही एक के हैं, एक ही है। तो कहाँ जायेंगे? कुछ है ही नहीं तो कहाँ जायेंगे? अच्छा।
सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन और भी काम विकार के बाल बच्चे हैं। बापदादा को एक बात पर बहुत आश्चर्य लगता है। ब्राह्मण कहता है, ब्राह्मण आत्मा पर व्यर्थ की विकारी दृष्टि, वृत्ति जाती है। यह कुल कलंकित की बात है। कहना बहन जी वा भाई जी और करना क्या है! लौकिक बहन पर भी अगर कोई बुरी दृष्टि जाए, संकल्प भी आये, तो उसे कुल कलंकित कहा जाता है। तो यहाँ क्या कहेंगे? एक जन्म के नहीं लेकिन जन्म-जन्म का कलंक लगाने वाले। राज्य भाग्य को लात मारने वाले। ऐसे पदमगुणा विकर्म कभी नहीं करना। यह विकर्म नहीं महा विकर्म है। इसलिए सोचो, समझो, सम्भालो। यही पाप जमदूतों की तरह चिपक जायेंगे। अभी भले समझते हैं बहुत मजे में रह रहे हैं, कौन देखता है, कौन जानता है लेकिन पाप पर पाप चढ़ता जाता है और यही पाप खाने को आयेंगे। बापदादा जानते हैं कि इसकी रिजल्ट कितनी कड़ी है। जैसे शरीर से कोई तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ता है वैसे बुद्धि पापों में तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ेगी। सदा सामने यह पाप के जमदूत रहते हैं। इतना कड़ा अन्त है। इसलिए वर्तमान में गलती से भी ऐसा पाप नहीं करना। बापदादा सिर्फ सम्मुख बैठे हुए बच्चों को नहीं कह रहे हैं लेकिन चारों ओर के बच्चों को समर्थ बना रहे हैं। खबरदार, होशियार बना रहे हैं। समझा – अभी तक इस बात में कमजोरी काफी है।
अध्याय : ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन – पवित्रता
(अव्यक्त मुरली 12-04-1984)
1. बापदादा किसे देख रहे हैं?
बापदादा आज सभी होलीहंसों को देख रहे हैं।
प्रश्न यह नहीं कि हम ब्राह्मण हैं या नहीं,
प्रश्न यह है —
कहाँ तक होली बने हैं?
कहाँ तक हंस बने हैं?
Murli Point:
पवित्रता केवल वेश या नाम नहीं,
संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क में दिखाई देनी चाहिए।
(अव्यक्त मुरली 12-04-1984)
2. पवित्रता की शक्ति क्या है?
पवित्रता कोई साधारण नियम नहीं,
यह महाशक्ति है।
पवित्र संकल्प से
-
अपवित्र संकल्प को परख सकते हैं
-
और परिवर्तन कर सकते हैं
पवित्रता से
-
दृष्टि बदलती है
-
वृत्ति बदलती है
-
कृति बदलती है
उदाहरण:
जैसे तेज रोशनी के आगे अंधकार टिक नहीं सकता,
वैसे सच्ची पवित्रता के आगे अपवित्रता वार नहीं कर सकती।
3. हार कहाँ होती है?
बापदादा कहते हैं —
जब स्वयं संकल्प, बोल या कर्म में हार खाते हो
तब दूसरे व्यक्ति, वायब्रेशन या परिस्थिति से हार होती है।
किसी व्यक्ति से प्रभावित होना
किसी सम्बन्ध या सम्पर्क में हार खाना
इसका अर्थ है —
बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने में कमजोरी।
4. व्यक्ति से प्रभावित होना = धोखा खाना
Murli का बहुत गहरा रहस्य:
व्यक्ति के गुण, स्वभाव या विशेषता से प्रभावित होना
प्राप्ति नहीं, बरबादी है।
क्यों?
क्योंकि —
-
गुण दाता (परमात्मा) की देन हैं
-
व्यक्ति को दाता समझना = बीज को भूलना
उदाहरण:
अगर कोई पेड़ की डाल पकड़कर झूल रहा है
और बीज को ही भूल गया —
तो डाल झुलाएगी या गिराएगी?
5. मृगतृष्णा समान आकर्षण
अपवित्रता की शक्ति —शुरुआत में अच्छी लगती है
आकर्षण करती है
अल्पकाल का सुख देती है
लेकिन —
यह मृगतृष्णा है
दूर से जल लगता है, पास जाकर धोखा मिलता है।
Murli Point:
अल्पकाल की प्राप्ति
अविनाशी प्राप्ति से वंचित कर देती है।
(12-04-1984)
6. पवित्रता = दासी बनकर हाजिर शक्तियाँ
बापदादा कहते हैं —
जब चाहो, जिस स्थिति की चाहो,
पवित्रता की शक्ति आपके आगे दासी के समान हाजिर हो जाएगी।
उदाहरण:
आज भी कलियुग के अन्त में
नामधारी महात्माओं की पवित्रता के आगे
प्रकृति दासी बनी हुई है।
तो सोचो —
परमात्मा द्वारा प्राप्त
सतोप्रधान पवित्रता
कितनी शक्तिशाली होगी!
7. ब्राह्मण जीवन की सबसे बड़ी भूल
ब्राह्मण जीवन और हार खाना —
यह नामधारी ब्राह्मण की निशानी है।
Murli चेतावनी:
अगर फाउण्डेशन कमजोर है
तो 21 जन्म की प्राप्तियों की बिल्डिंग टिक नहीं सकती।
पवित्रता ही —
-
ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है
-
योग की कुंजी है
-
सर्व शक्तियों का आधार है
8. कामना – महाशत्रु का सूक्ष्म रूप
काम विकार केवल स्थूल रूप में नहीं आता।
यह आता है —
-
प्रभावित करने के रूप में
-
कामना के रूप में
Murli Point:
कामना या तो प्रभावित करेगी
या परेशान करेगी।
कामना = धोखा।
(12-04-1984)
इसलिए —
काम विकार पर काली रूप बनो
स्नेही नहीं, विकराल रूप।
9. योग नहीं लगता? कारण यही है
बापदादा स्पष्ट कहते हैं —
ब्राह्मण आत्मा और योग नहीं लगे —
यह हो ही नहीं सकता।
अगर योग नहीं लग रहा है —
जरूर कोई छिपा हुआ विकर्म
बुद्धि को खींच रहा है
10. सबसे कड़ी चेतावनी
ब्राह्मण होकर —
बहन या भाई के प्रति
विकारी दृष्टि या वृत्ति
यह —
साधारण विकर्म नहीं
महा-विकर्म है।
Murli की कड़ी भाषा:
यह कुल कलंकित करने वाला कर्म है
जन्म-जन्म का कलंक।
(अव्यक्त मुरली 12-04-1984)
11. अन्त की रिजल्ट
बापदादा अन्त की स्थिति बताते हैं —
जैसे शरीर तड़प-तड़प कर छोड़ता है
वैसे बुद्धि पापों में तड़पती है
इसलिए —
अभी होशियार बनो
अभी सम्भालो
अभी परिवर्तन करो
समापन संदेश
ब्राह्मण जीवन का सार —
पवित्रता कोई नियम नहीं
यह परमात्मा से जुड़ने की शक्ति है।
जहाँ पवित्रता है
वहाँ हार नहीं
वहाँ विजय निश्चित है।प्रश्न 1: बापदादा आज किसे देख रहे हैं?
उत्तर:
बापदादा आज सभी होलीहंसों को देख रहे हैं।
मुद्दा यह नहीं है कि हम ब्राह्मण हैं या नहीं,
बल्कि यह है कि —
कहाँ तक होली (पवित्र) बने हैं?
कहाँ तक हंस (सारग्राही) बने हैं?Murli Note (12-04-1984):
पवित्रता केवल वेश या नाम नहीं,
संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क में दिखाई देनी चाहिए।
प्रश्न 2: पवित्रता की शक्ति क्या है?
उत्तर:
पवित्रता कोई साधारण नियम नहीं, यह महाशक्ति है।
पवित्र संकल्प से हम
अपवित्र संकल्पों को परख सकते हैं
और उनका परिवर्तन कर सकते हैं
पवित्रता से
दृष्टि बदलती है
वृत्ति बदलती है
कृति बदलती हैउदाहरण:
जैसे तेज रोशनी के आगे अंधकार टिक नहीं सकता,
वैसे सच्ची पवित्रता के आगे अपवित्रता वार नहीं कर सकती।
प्रश्न 3: हार कहाँ होती है?
उत्तर:
बापदादा स्पष्ट कहते हैं—
जब स्वयं संकल्प, बोल या कर्म में हार होती है,
तभी दूसरे व्यक्ति, वायब्रेशन या परिस्थिति से हार होती है।किसी व्यक्ति से प्रभावित होना
किसी सम्बन्ध या सम्पर्क में हार खाना
इस बात का संकेत है कि
बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने में कमजोरी है।
प्रश्न 4: व्यक्ति से प्रभावित होना क्यों धोखा है?
उत्तर:
किसी व्यक्ति के गुण, स्वभाव या विशेषता से प्रभावित होना
प्राप्ति नहीं, बल्कि बरबादी है।क्योंकि—
गुण दाता (परमात्मा) की देन हैं
व्यक्ति को दाता समझना = बीज को भूल जाना
उदाहरण:
अगर कोई पेड़ की डाल पकड़कर झूल रहा है
और बीज को भूल गया,
तो डाल झुलाएगी या गिराएगी?
उत्तर स्पष्ट है — गिराएगी।
प्रश्न 5: मृगतृष्णा समान आकर्षण क्या है?
उत्तर:
अपवित्रता की शक्ति—
शुरुआत में अच्छी लगती है
आकर्षण करती है
अल्पकाल का सुख देती हैलेकिन वास्तव में यह मृगतृष्णा है —
दूर से जल दिखता है, पास जाकर धोखा मिलता है।Murli Note (12-04-1984):
अल्पकाल की प्राप्ति,
अविनाशी प्राप्ति से वंचित कर देती है।
प्रश्न 6: पवित्रता को “दासी” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
बापदादा कहते हैं—
जब चाहो, जिस स्थिति या सफलता की चाहो,
पवित्रता की शक्ति आपके आगे दासी के समान हाजिर हो जाएगी।उदाहरण:
आज भी कलियुग के अन्त में
नामधारी महात्माओं की पवित्रता के आगे
प्रकृति दासी बनी हुई है।
तो सोचो, परमात्मा द्वारा प्राप्त
सतोप्रधान पवित्रता कितनी शक्तिशाली होगी!
प्रश्न 7: ब्राह्मण जीवन की सबसे बड़ी भूल क्या है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन में हार खाना —
यह नामधारी ब्राह्मण की निशानी है।Murli चेतावनी:
अगर फाउण्डेशन कमजोर है,
तो 21 जन्म की प्राप्तियों की बिल्डिंग टिक नहीं सकती।पवित्रता ही—
ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन
योग की कुंजी
सर्व शक्तियों का आधार है
प्रश्न 8: कामना को महाशत्रु क्यों कहा गया है?
उत्तर:
काम विकार केवल स्थूल रूप में नहीं आता,
यह सूक्ष्म रूप में आता है — कामना बनकर।Murli Point (12-04-1984):
कामना या तो प्रभावित करेगी
या परेशान करेगी।
कामना = धोखा।इसलिए काम विकार पर
स्नेही नहीं
विकराल (काली) रूप बनो।
प्रश्न 9: अगर योग नहीं लग रहा तो कारण क्या है?
उत्तर:
बापदादा कहते हैं—
ब्राह्मण आत्मा और योग नहीं लगे,
यह हो ही नहीं सकता।अगर योग नहीं लग रहा है,
तो निश्चित रूप से
कोई छिपा हुआ विकर्मबुद्धि को अपनी ओर खींच रहा है।
प्रश्न 10: सबसे कड़ी चेतावनी किस बात की है?
उत्तर:
ब्राह्मण होकर
किसी बहन या भाई के प्रति
विकारी दृष्टि या वृत्ति रखना
साधारण विकर्म नहीं, महा-विकर्म है।Murli Warning (12-04-1984):
यह कुल कलंकित करने वाला कर्म है,
जन्म-जन्म का कलंक।
प्रश्न 11: अन्त की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
बापदादा बताते हैं—
जैसे शरीर तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ता है,
वैसे बुद्धि पापों में तड़पती है।इसलिए संदेश है—
अभी होशियार बनो
अभी सम्भालो
अभी परिवर्तन करो
समापन प्रश्न–उत्तर
प्रश्न: ब्राह्मण जीवन का सार क्या है?
उत्तर:
पवित्रता कोई नियम नहीं,
यह परमात्मा से जुड़ने की शक्ति है।Disclaimer
यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के अव्यक्त मुरली (दिनांक 12-04-1984) पर आधारित आध्यात्मिक चिंतन है।
इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, पवित्रता और जीवन मूल्यों की गहरी समझ देना है।
यह किसी व्यक्ति, संस्था या मत की आलोचना नहीं है।
सभी विचार आध्यात्मिक अध्ययन और आत्म-परिवर्तन हेतु हैं।ब्राह्मण जीवन, पवित्रता, अव्यक्त मुरली, बापदादा, BK ज्ञान, ब्रह्माकुमारी, होलीहंस, योग शक्ति, आत्मिक पवित्रता, कामना रहस्य, महाविकर्म, योग नहीं लगता, मुरली पॉइंट, आध्यात्मिक चेतावनी, BK हिंदी, पवित्र संकल्प, आत्मिक शक्ति, ब्राह्मण फाउंडेशन, विजय निश्चित,Brahmin life, purity, Avyakt Murli, BapDada, BK knowledge, Brahma Kumari, Holy Swan, Yoga power, spiritual purity, secret of desires, great sins, Yoga is not possible, Murli point, spiritual warning, BK Hindi, pure thoughts, spiritual power, Brahmin Foundation, victory is certain,

