(16)“The Importance of the Power of Peace”

अव्यक्त मुरली-(16) 05-03-1984 “शान्ति की शक्ति का महत्व”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

05-03-1984 “शान्ति की शक्ति का महत्व”

शान्ति के सागर बाप अपने शान्ति के अवतार बच्चों से मिलने आये हैं। आज के संसार में सबसे आवश्यक चीज़ शान्ति है। उसी शान्ति के दाता तुम बच्चे हो। कितना भी कोई विनाशी धन, विनाशी साधन द्वारा शान्ति लेने चाहें तो सच्ची अविनाशी शान्ति मिल नहीं सकती। आज का संसार धनवान होते, सुख के साधन होते फिर भी अविनाशी सदाकाल की शान्ति के भिखारी हैं। ऐसे शान्ति की भिखारी आत्माओं को आप मास्टर शान्ति दाता, शान्ति के भण्डार, शान्ति स्वरुप आत्मायें अंचली दे सर्व के शान्ति की प्यास, शान्ति की इच्छा पूर्ण करो। बापदादा को अशान्त बच्चों को देख रहम आता है। इतना प्रयत्न कर साइन्स की शक्ति से कहाँ से कहाँ पहुँच रहे हैं, क्या-क्या बना रहे हैं, दिन को रात भी बना सकते, रात को दिन भी बना सकते लेकिन अपनी आत्मा का स्वधर्म शान्ति, उसको प्राप्त नहीं कर सकते। जितना ही शान्ति के पीछे भाग-दौड करते हैं उतना ही अल्पकाल की शान्ति के बाद परिणाम अशान्ति ही मिलती है। अविनाशी शान्ति सर्व आत्माओं का ईश्वरीय जन्म-सिद्ध अधिकार है। लेकिन जन्म-सिद्ध अधिकार के पीछे कितनी मेहनत करते हैं। सेकेण्ड की प्राप्ति है लेकिन सेकेण्ड की प्राप्ति के पीछे पूरा परिचय न होने कारण कितने धक्के खाते हैं, पुकारते हैं, चिल्लाते हैं, परेशान होते हैं। ऐसे शान्ति के पीछे भटकने वाले अपने आत्मिक रुप के भाईयों को, भाई-भाई की दृष्टि दो। इसी दृष्टि से ही उन्हों की सृष्टि बदल जायेगी।

आप सभी शान्ति के अवतार आत्मायें सदा शान्त स्वरुप स्थिति में रहते हो ना? अशान्ति को सदा के लिए विदाई दे दी है ना! अशान्ति की विदाई सेरीमनी कर ली है या अभी करनी है? जिसने अभी अशान्ति की विदाई सेरीमनी नहीं की है, अभी करनी है, वह यहाँ हैं? उनकी डेट फिक्स कर दें? जिसको अभी सेरीमनी करनी है, वह हाथ उठाओ। कभी स्वप्न में भी अशान्ति न आवे। स्वप्न भी शान्तिमय हो गये हैं ना! शान्ति दाता बाप है, शान्ति स्वरुप आप हो। धर्म भी शान्त, कर्म भी शान्त तो अशान्ति कहाँ से आयेगी। आप सबका कर्म क्या है? शान्ति देना। अभी भी आप सबके भक्त लोग आरती करते हैं तो क्या कहते हैं? शान्ति देवा। तो यह किसकी आरती करते हैं? आपकी या सिर्फ बाप की? शान्ति देवा बच्चे सदा शान्ति के महादानी, वरदानी आत्मायें हैं। शान्ति की किरणें विश्व में मास्टर ज्ञान सूर्य बन फैलाने वाले हैं, यही नशा है ना कि बाप के साथ-साथ हम भी मास्टर ज्ञान सूर्य हैं वा शान्ति की किरणें फैलाने वाले मास्टर सूर्य हैं।

सेकेण्ड में स्वधर्म का परिचय दे स्व स्वरुप में स्थित करा सकते हो ना? अपनी वृत्ति द्वारा, कौन-सी वृत्ति? इस आत्मा को भी अर्थात् हमारे इस भाई को भी बाप का वर्सा मिल जाए। इस शुभ वृत्ति वा इस शुभ भावना से अनेक आत्माओं को अनुभव करा सकते हो, क्यों? भावना का फल अवश्य मिलता है। आप सबकी श्रेष्ठ भावना है, स्वार्थ रहित भावना है, रहम की भावना है, कल्याण की भावना है। ऐसी भावना का फल नहीं मिले, यह हो नहीं सकता। जब बीज शक्तिशाली है तो फल जरुर मिलता है। सिर्फ इस श्रेष्ठ भावना के बीज को सदा स्मृति का पानी देते रहो तो समर्थ फल, प्रत्यक्ष फल के रुप में अवश्य प्राप्त होना ही है। क्वेश्चन नहीं, होगा या नहीं होगा। सदा समर्थ स्मृति का पानी है अर्थात् सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना है तो विश्व शान्ति का प्रत्यक्षफल मिलना ही है। सर्व आत्माओं की जन्म-जन्म की आश बाप के साथ-साथ सभी बच्चे भी पूर्ण कर रहे हो और सर्व की हो जानी है।

जैसे अभी अशान्ति के आवाज चारों ओर गूँज रहे हैं। तन-मन-धन-जन सब तरफ से अशान्ति अनुभव कर रहे हैं। भय सर्व प्राप्ति के साधनों को भी शान्ति के बजाए अशान्ति का अनुभव करा रहा है। आज की आत्मायें किसी न किसी भय के वशीभूत हैं। खा रहे हैं, चल रहे हैं, कमा रहे हैं, अल्पकाल की मौज भी मना रहे हैं लेकिन भय के साथ। ना मालूम कल क्या होगा। तो जहाँ भय का सिंहासन है, जब नेता ही भय की कुर्सी पर बैठे हैं तो प्रजा क्या होगी। जितने बड़े नेता उतने अंगरक्षक होंगे। क्यों? भय है ना। तो भय के सिंहासन पर अल्पकाल की मौज क्या होगी? शान्तिमय वा अशान्तिमय? बापदादा ने ऐसे भयभीत बच्चों को सदाकाल की सुखमय, शान्तिमय जीवन देने के लिए आप सभी बच्चों को शान्ति के अवतार के रुप में निमित्त बनाया है। शान्ति की शक्ति से बिना खर्चे कहाँ से कहाँ तक पहुँच सकते हो? इस लोक से भी परे। अपने स्वीट होम में कितना सहज पहुँचते हो! मेहनत लगती है? शान्ति की शक्ति से प्रकृतिजीत, मायाजीत कितना सहज बनते हो? किस द्वारा? आत्मिक शक्ति द्वारा। जब एटामिक और आत्मिक दोनों शक्तियों का मेल हो जायेगा। आत्मिक शक्ति से एटामिक शक्ति भी सतोप्रधान बुद्धि द्वारा सुख के कार्य में लगेगी तब दोनों शक्तियों के मिलन द्वारा शान्तिमय दुनिया इस भूमि पर प्रत्यक्ष होगी क्योंकि शान्ति, सुखमय स्वर्ग के राज्य में दोनों शक्तियाँ हैं। तो सतोप्रधान बुद्धि अर्थात् सदा श्रेष्ठ, सत्य कर्म करने वाली बुद्धि। सत अर्थात् अविनाशी भी है। हर कर्म अविनाशी बाप, अविनाशी आत्मा इस स्मृति से अविनाशी प्राप्ति वाला होगा। इसलिए कहते हैं सत कर्म। तो ऐसे सदा के लिए शान्ति देने वाले, शान्ति के अवतार हो। समझा। अच्छा।

ऐसे सदा सतोप्रधान स्थिति द्वारा, सत कर्म करने वाली आत्मायें, सदा अपने शक्तिशाली भावना द्वारा अनेक आत्माओं को शान्ति का फल देने वाली, सदा मास्टर दाता बन, शान्ति देवा बन शान्ति की किरणें विश्व में फैलाने वाली, ऐसे बाप के विशेष कार्य के सहयोगी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

लण्डन के नोबल विजेता वैज्ञानिक जोसिफसन बापदादा से मिल रहे हैं:-

शान्ति की शक्ति के अनुभव को भी अनुभव करते हो? क्योंकि शान्ति की शक्ति सारे विश्व को शान्तिमय बनाने वाली है। आप भी शान्तिप्रिय आत्मा हो ना! शान्ति की शक्ति द्वारा साइन्स की शक्ति को भी यथार्थ रुप से कार्य में लगाने से विश्व का कल्याण करने के निमित्त बन सकते हो। साइन्स की शक्ति भी आवश्यक है लेकिन सिर्फ सतोप्रधान बुद्धि बनने से इसका यथार्थ रुप से प्रयोग कर सकते हैं। आज सिर्फ इसी नॉलेज की कमी है कि यथार्थ रीति से इसको कार्य में कैसे लगायें। यही साइन्स इस नॉलेज के आधार पर नई सृष्टि की स्थापना के निमित्त बनेंगी। लेकिन आप वह नॉलेज न होने कारण विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। तो अभी इसी साइन्स की शक्ति को साइलेन्स की शक्ति के आधार से बहुत ही अच्छे कार्य में लगाने के निमित्त बनो। इसमें भी नोबल प्राइज लेंगे ना! क्योंकि आवश्यकता इसी कार्य की है। तो जब जिस कार्य की आवश्यकता है उसमें निमित्त बनने वाले को सभी श्रेष्ठ आत्मा की नज़र से देखेंगे। तो समझा क्या करना है! अभी साइन्स और साइलेन्स का कनेक्शन कैसा है और दोनों के कनेक्शन से कितनी सफलता हो सकती है, इसकी रिसर्च करो। रिसर्च की रुचि है ना! अभी यह करना। इतना बड़ा कार्य करना है। ऐसी दुनिया बनायेंगे ना। अच्छा।

यू.के.ग्रुप:- सिकीलधे बच्चे सदा ही बाप से मिले हुए हैं। सदा बाप साथ है, यह अनुभव सदा रहता है ना? अगर बाप के साथ से थोड़ा भी किनारा किया तो माया की आंख बड़ी तेज है। वह देख लेती है यह थोड़ा-सा किनारे हुआ है तो अपना बना लेती है, इसलिए किनारे कभी भी नहीं होना। सदा साथ। जब बापदादा स्वयं सदा साथ रहने की ऑफर कर रहे हैं तो साथ लेना चाहिए ना। ऐसा साथ सारे कल्प में कभी नहीं मिलेगा, जो बाप आकर कहे मेरे साथ रहो। ऐसा भाग्य सतयुग में भी नहीं होगा। सतयुग में भी आत्माओं के संग रहेंगे। सारे कल्प में बाप का साथ कितना समय मिलता है? बहुत थोड़ा समय है ना। तो थोड़े समय में इतना बड़ा भाग्य मिले, तो सदा रहना चाहिए ना। बापदादा सदा परिपक्व स्थिति में स्थित रहने वाले बच्चों को देख रहे हैं। कितने प्यारे-प्यारे बच्चे बापदादा के सामने हैं। एक-एक बच्चे बहुत लवली हैं। बापदादा ने इतने प्यार से सभी को कहाँ-कहाँ से चुनकर इकट्ठा किया है। ऐसे चुने हुए बच्चे सदा ही पक्के होंगे, कच्चे नहीं हो सकते।

अध्याय – शान्ति की शक्ति का महत्व

(अव्यक्त मुरली — 05 मार्च 1984)


1. शान्ति के सागर बाप का संदेश

बापदादा कहते हैं:
“आज के संसार में सबसे अधिक आवश्यक चीज़ — शान्ति है।”

दुनिया के पास धन है, साधन हैं, तकनीक है…
लेकिन अविनाशी शान्ति नहीं।

उदाहरण:

जैसे पानी समुद्र में है—पर लोग समुद्र-तट पर खड़े होकर प्यासे रहते हैं।
उसी तरह शान्ति आत्मा के भीतर है—लेकिन अशान्त मनुष्य बाहर खोज रहा है।


2. शान्ति का असली स्रोत — बच्चे

बापदादा:
“सच्ची शान्ति तुम्हारे पास है। तुम मास्टर शान्ति-दाता हो।”

दुनिया शान्ति की भिखारी है।
लेकिन आप—
✔ मास्टर शान्ति-दाता
✔ शान्ति के भण्डार
✔ शान्ति स्वरुप अवतार

मुरली-नोट:

शान्ति “दी” नहीं जाती—“वृत्ति और दृष्टि” से अनुभव कराई जाती है।


3. अशान्ति की विदाई-सेरीमनी — क्या आपने की?

बापदादा प्रेम से पूछते हैं:

“अशान्ति को हमेशा के लिए विदाई दे दी है ना? अगर नहीं की — तो आज कर लो!”

उदाहरण:

जैसे विवाह में ‘विदाई’ होती है और बेटी वापस नहीं आती—
उसी तरह अशान्ति को भी एक बार विदा करके वापस नहीं आने देना है।


4. शान्ति दाता का असली धर्म

धर्म: शान्ति
कर्म: शान्ति
स्थिति: शान्ति

इसलिए पूछते हैं:

“अशान्ति कहाँ से आयेगी जब आप स्वयं शान्ति के अवतार हैं?”

मुरली-बिंदु:

• आरती में भी लोग कहते हैं—“शान्ति देवा”
• यह केवल बाप की नहीं—बच्चों की भी आरती है


5. सेकेण्ड में स्वधर्म का अनुभव कराने की शक्ति

वृत्ति = संकल्प की शक्ति
इससे आप किसी भी आत्मा को सेकण्ड में शान्ति का अनुभव करा सकते हैं।

उदाहरण:

जैसे सूरज को कोई रोक नहीं सकता—
वैसे ही मास्टर ज्ञान-सूर्य की किरणें स्वतः फैलती हैं।

मुरली-नोट:

• श्रेष्ठ भावना कभी व्यर्थ नहीं जाती।
• भावना का फल निश्चित मिलता है।
• स्मृति का जल = शान्ति की अनुभूति का साधन।


6. आज की दुनिया — भय का साम्राज्य

दुनिया चारों ओर अशान्ति + भय से भरी है।

बापदादा कहते हैं:

“जब नेता भय की कुर्सी पर बैठे हैं, तो प्रजा कैसी होगी?”

धन, साधन, आराम — सब भय के साथ।

इसलिए सच्चा शान्ति-उद्धार करना है।


7. शान्ति की शक्ति बनाम साइन्स की शक्ति

बापदादा बताते हैं:

“वर्तमान साइन्स के पास सब है—
पर शान्ति नहीं है, इसलिए उसका उपयोग विनाश की तरफ है।”

उदाहरण:

साइन्स ने दिन-रात बदल दिए,
लेकिन आत्मा की रात (अज्ञान) नहीं मिटा पाए।

मुरली संदेश वैज्ञानिकों के लिए:

साइन्स + साइलेन्स = नई सृष्टि
• एटॉमिक पावर + आत्मिक पावर
• बुद्धि सतोप्रधान हो
• साइन्स से विनाश नहीं, निर्माण हो


8. मास्टर शान्ति दाता का कर्तव्य – विश्व शान्ति

संकल्प:
“सभी आत्माओं को बाप का वर्सा मिले।”

भावना:
कल्याण, रहम, शुभ-भावना।

फल:
विश्व शान्ति निश्चित।

मुरली-पॉइंट:

“दुनिया की जन्म-जन्मांतर की आश —
बाप और बच्चे दोनों मिलकर पूर्ण करते हैं।”


9. सतोप्रधान बुद्धि — शान्तिमय राज्य का आधार

सतोप्रधान =
✔ सत्य कर्म
✔ पवित्र कर्म
✔ अविनाशी फल

स्वर्ग क्यों शान्तिमय है?
क्योंकि वहाँ
एटॉमिक और आत्मिक शक्ति
दोनों सतोप्रधान रूप में हैं।


10. लंदन के वैज्ञानिक जोसिफसन से मुलाकात

बापदादा ने कहा—

“साइन्स को साइलेन्स से जोड़ो—
तभी विश्व कल्याण होगा।”

उनसे कहा:
“यह रिसर्च करो—साइन्स और साइलेन्स का मिलन कैसे विश्व परिवर्तन ला सकता है।”


11. यू.के. ग्रुप के लिए संदेश — बाप का साथ कभी न छोड़ना

बापदादा कहते हैं:

“सदा बाप के साथ रहो।
थोड़ा भी किनारा किया तो माया पकड़ लेती है।”

सतयुग में भी ऐसा संग नहीं मिलता—
शिवबाबा स्वयं कहें: ‘मेरे साथ रहो’—
यह संग सिर्फ अभी मिलता है।


 निष्कर्ष — शान्ति का स्वरूप बनो, शान्ति की किरणें फैलाओ

• आप मास्टर शान्ति दाता हैं
• आप विश्व के कल्याणकारी हैं
• आप मास्टर ज्ञान-सूर्य हैं
• आपकी वृत्ति दुनिया को बदल सकती है

बापदादा:
“सदा शान्ति देवा बन विश्व को सम्पूर्ण सुख-शान्ति दो।”

Disclaimer 

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज की 05-03-1984 की अव्यक्त मुरली के आधार पर आध्यात्मिक अध्ययन हेतु बनाया गया है।
इसका उद्देश्य किसी भी मत, पंथ, संप्रदाय या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं है।
हम केवल आत्मा, परमात्मा और आध्यात्मिक सिद्धांतों का अध्ययन कर रहे हैं।
कृपया इसे आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में ही समझें।

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