AW.(22)19-07-1969/“मरजीवा वह है जो पुराने शूद्रपन के संस्कारों को टच भी न करे”
“मरजीवा वह है जो पुराने शूद्रपन के संस्कारों को टच भी न करे”
आप सभी पाठशाला में जाते हो ना! पाठशाला का पहला पाठ क्या है? अपने को मरजीवा बनाना मरजीवा अर्थात् अपने देह से, मित्र सम्बन्धियों से, पुरानी दुनिया से मरजीवा। यह पहला पाठ पक्का किया है? (संस्कार से मरजीवा नहीं हुए हैं) जब कोई मर जाता है तो पिछले संस्कार भी खत्म हो जाते हैं। तो यहाँ भी पिछले संस्कार क्यों याद आना चाहिए। जबकि जन्म ही दूसरा तो पिछली बातें भी खत्म होनी चाहिए। यह पहला पाठ है मरजीवा बनने का। वह पक्का करना है। पिछले पुराने संस्कार ऐसे लगने चाहिए जैसे और कोई के थे, हमारे नहीं। पहले शूद्रों के थे अभी ब्राह्मणों के हैं। तो पुराने शूद्रों के संस्कार नहीं होने चाहिए। पराये संस्कार अपने क्यों बनाते हो! जो पराई चीज़ को अपना बनाते हैं उनको क्या कहेंगे? चोर। तो यह भी चोरी क्यों करते हो? यह तो शूद्रों के संस्कार है, ब्राह्मणों के नहीं। शूद्र की चीज़ को ब्राह्मण स्वीकार क्यों करते हैं। अछूत के साथ कपड़ा भी लग जाये तो नहाते हैं। तो शूद्रपने का संस्कार ब्राह्मणों को लग जाये तो क्या करना चाहिए? उसके लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। जैसे गन्दी चीज़ को नहीं छूते हैं वैसे पुराने संस्कारों से बचना है, छूना नहीं है। इतना जब ध्यान रखेंगे तो औरों को भी ध्यान दिला सकेंगे।
2\. सर्विस की सफलता का मुख्य गुण कौन सा है? नम्रता। जितनी नम्रता उतनी सफलता। नम्रता आती है निमित्त समझने से। निमित्त समझकर सर्विस करना। नम्रता के गुण से सब आप के आगे नमन करेंगे। जो खुद झुकता है उसके आगे सभी झुकते हैं। निमित्त समझकर कार्य करना है। जैसे बाप शरीर का आधार निमित्त मात्र लेते हैं। वैसे आप समझो कि निमित्त मात्र शरीर का आधार लिया है। एक तो शरीर को निमित्त मात्र समझना है और दूसरा सर्विस में अपने को निमित्त समझना। तब नम्रता आयेगी। फिर देखो सफलता आप के आगे चलेगी। जैसे बापदादा टेप्रेरी देह में आते हैं ऐसे देह को निमित्त आधार समझो। बापदादा की देह में अटेचमेन्ट होती है क्या? आधार समझने से अधीन नहीं होंगे। अभी देह के अधीन होते हो फिर देह को अधीन करेंगे।
3\. गायन है दृष्टि से सृष्टि बनती है। कौन सी सृष्टि बनती है और कब बनती है? दृष्टि और सृष्टि का ही गायन क्यों है, मुख का गायन क्यों नहीं है? संगम पर पहले-पहले क्या बदली करते हैं? पहला पाठ क्या पढ़ाते हैं? भाई-भाई की दृष्टि से देखो। भाई-भाई की दृष्टि अर्थात् पहले दृष्टि को बदलने से सब बातें बदल जाती हैं। इसलिए गायन है कि दृष्टि से सृष्टि बनती है। जब आत्मा को देखते हैं तब यह सृष्टि पुरानी देखने में आती है। पुरुषार्थ भी मुख्य इस चीज़ का ही है दृष्टि बदलने का। जब यह दृष्टि बदल जाती है तो स्थिति और परिस्थिति भी बदल जाती है। दृष्टि बदलने से गुण और कर्म आप ही बदल जाते हैं। यह आत्मिक दृष्टि नेचुरल हो जाये।
4\. जो संगमयुग पर अपना राजा बनता है वह प्रजा का भी राजा बन सकता है। जो यहाँ अपना राजा नहीं वह वहाँ प्रजा का राजा भी नहीं बन सकता। संगमयुग पर ही सभी संस्कारों का बीज पड़ता है। यहाँ के बीज के सिवाए भविष्य का वृक्ष पैदा हो नहीं सकता है। यहाँ बीज न डालेंगे तो फूल कहाँ से निकलेगा। यहाँ अपना राजा बनने से क्या होगा? अपने को अधिकारी समझेंगे। अधिकारी बनने के लिए उदारचित का विशेष गुण चाहिए। जितना उदारचित्त होंगे उतना अधिकारी बनेंगे।
5\. ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य है पढ़ना और पढ़ाना। इसमें बिजी रहेंगे तो और बातों में बुद्धि नहीं जायेगी। तो अपने को पढ़ने और पढ़ाने में बिजी रखो। आजकल तक बापदादा ने सुनाया है कि मन की वृत्ति और अव्यक्त दृष्टि से सर्विस कर सकते हो। अपनी वृत्ति-दृष्टि से सर्विस करने में कोई बन्धन नहीं है। जिस बात में स्वतन्त्र हो वह सर्विस करनी चाहिए।
अध्याय: मरजीवा — पुराने शूद्रपन के संस्कारों को टच भी न करना
मुरली नोट्स
मुरली: अव्यक्त बापदादा
तिथि: 18 जून 1969
मुख्य विषय: मरजीवा जीवन, पुराने संस्कारों का त्याग, नम्रता, आत्मिक दृष्टि, स्वराज्य और मन्सा-वाचा-कर्मणा सेवा
मुरली पोर्टल पर इस मुरली का शीर्षक है — “मरजीवा वह है जो पुराने शूद्रपन के संस्कारों को टच भी न करे।”
1. मरजीवा अर्थात् पुराने संस्कारों से नया जन्म
पाठशाला का पहला पाठ क्या है? — अपने को मरजीवा बनाना।
मरजीवा का अर्थ केवल देह से सम्बन्धित पुरानी पहचान को छोड़ना नहीं, बल्कि पुराने संस्कारों, पुरानी वृत्तियों और पुराने स्वभाव को भी पीछे छोड़ना है।
जब आत्मा स्वयं को ब्राह्मण जीवन में नया जन्मी हुई आत्मा समझती है, तब पुराने शूद्रपन के संस्कारों को अपना मानना उचित नहीं। उन्हें ऐसे देखना है जैसे वे किसी और के संस्कार थे, हमारे नहीं।
याद रखने योग्य बात
“पुराना संस्कार मेरा नहीं है — यह पुराने जीवन का है।”
यदि कोई पुराना संस्कार सामने आता है तो उसके साथ पहचान नहीं बनानी है। उसे पहचानना है, उससे दूरी रखनी है और योगबल से परिवर्तन करना है।
उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति को पहले क्रोध करने की आदत थी। ब्राह्मण जीवन में भी परिस्थिति आने पर क्रोध की वही वृत्ति जाग जाती है।
तब विचार होना चाहिए:
“यह मेरा वास्तविक संस्कार नहीं है। यह पुराने जीवन का संस्कार है। मैं आत्मा हूँ, शांत स्वरूप हूँ।”
यही मरजीवा बनने का अभ्यास है।
मुरली नोट
पुराने संस्कारों को बार-बार याद करके उन्हें अपना बनाना भी एक प्रकार से उन्हें स्वीकार करना है। इसलिए लक्ष्य यह हो कि पुराने संस्कारों को टच भी न करें, अर्थात् उन्हें मन में स्थान न दें।
2. सेवा की सफलता का मुख्य गुण — नम्रता
सेवा की सफलता का मुख्य गुण है — नम्रता।
जितनी नम्रता, उतनी सफलता।
नम्रता तब आती है जब हम स्वयं को निमित्त समझकर कार्य करते हैं।
जब बुद्धि में यह स्मृति रहती है कि “मैं निमित्त हूँ”, तब ‘मैंने किया’, ‘मेरी सेवा’, ‘मेरा नाम’ जैसी भावना कम होती जाती है।
दो प्रकार की स्मृति
- शरीर को निमित्त आधार समझना।
- सेवा में स्वयं को निमित्त समझना।
इन दोनों स्मृतियों से देह-अभिमान कम होता है और नम्रता आती है।
उदाहरण
यदि किसी सेवा में आपको बहुत सफलता मिलती है और सभी आपकी प्रशंसा करते हैं, तो अंदर यह भाव रहे:
“यह कार्य बाप की शक्ति और निमित्त भाव से हुआ है; मैं केवल निमित्त हूँ।”
इससे सफलता के साथ अहंकार नहीं आएगा।
अभ्यास
हर सेवा से पहले स्वयं से पूछें:
“क्या मैं यह कार्य निमित्त बनकर कर रहा हूँ या नाम और मान के लिए?”
यह प्रश्न ही आत्म-चेकिंग का अच्छा साधन बन सकता है।
3. दृष्टि बदलो — सृष्टि बदल जाएगी
गायन है:
“दृष्टि से सृष्टि बनती है।”
दृष्टि बदलने से स्थिति और परिस्थिति भी बदल जाती है।
संगमयुग का पहला पाठ है — भाई-भाई की दृष्टि।
जब हम सामने वाली आत्मा को केवल शरीर, भूमिका, व्यवहार या कमजोरी के आधार पर देखते हैं, तो हमारी दृष्टि पुरानी बन जाती है।
लेकिन जब आत्मिक दृष्टि से देखते हैं तो सामने वाली आत्मा दिखाई देती है।
दृष्टि बदलने का प्रभाव
दृष्टि बदली → वृत्ति बदली → स्थिति बदली → कर्म बदले → अनुभव बदला।
इसलिए पुरुषार्थ का एक मुख्य विषय है — दृष्टि को आत्मिक बनाना।
उदाहरण
किसी व्यक्ति ने आपके साथ कठोर व्यवहार किया।
पहली दृष्टि कह सकती है:
“इसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
आत्मिक दृष्टि कहेगी:
“यह भी एक आत्मा है। मुझे अपनी स्थिति और अपने संस्कारों को सुरक्षित रखना है।”
इस दृष्टि से प्रतिक्रिया के स्थान पर शांति और समझ विकसित होती है।
अभ्यास
दिन में कुछ बार रुककर स्वयं से कहें:
“मैं आत्मा हूँ। सामने वाला भी आत्मा है। मुझे आत्मिक दृष्टि से देखना है।”
जब आत्मिक दृष्टि प्राकृतिक बनती है, तो गुण और कर्म भी धीरे-धीरे श्रेष्ठ होने लगते हैं।
4. संगमयुग में अपना राजा बनो
मुरली का एक सुंदर संदेश है कि जो संगमयुग पर अपना राजा बनता है, वही भविष्य में राज्य का अधिकारी बन सकता है।
सच्चा स्वराज्य केवल बाहरी अधिकार का नाम नहीं है। स्वयं के मन, बुद्धि, संस्कार और कर्म पर अधिकार प्राप्त करना ही स्वराज्य है।
अपना राजा बनने का अर्थ
- मन पर अधिकार।
- पुराने संस्कारों पर नियंत्रण।
- इन्द्रियों को सही दिशा देना।
- संकल्पों को श्रेष्ठ बनाना।
- परिस्थितियों के अधीन न होना।
- अपने स्वमान में स्थित रहना।
विशेष गुण — उदारचित्त
अधिकारी बनने के लिए उदारचित्त होना आवश्यक है।
जिसका दिल विशाल है, वह दूसरों की कमजोरियों को देखकर भी उन्हें सुधारने का अवसर देता है।
उदाहरण
यदि कोई साथी आपकी अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं कर पाया, तो संकीर्ण दृष्टि कहेगी:
“यह हमेशा ऐसा ही करता है।”
उदारचित्त दृष्टि कहेगी:
“इसमें भी कोई विशेषता है। मुझे इसकी विशेषता को सामने लाने में सहयोग करना है।”
यही उदारचित्तता स्वराज्य की निशानी बनती है।
5. ब्राह्मण जीवन का मुख्य कर्तव्य — पढ़ना और पढ़ाना
ब्राह्मण जीवन में मुख्य कर्तव्य है:
पढ़ना और पढ़ाना।
जब बुद्धि श्रेष्ठ ज्ञान और सेवा में व्यस्त रहती है, तब व्यर्थ बातों के लिए समय और ऊर्जा कम हो जाती है।
इसलिए स्वयं को ज्ञान, योग और सेवा में व्यस्त रखना आवश्यक है।
केवल वाणी से सेवा नहीं
सेवा के अनेक रूप हो सकते हैं:
- वाणी द्वारा ज्ञान देना।
- कर्म द्वारा उदाहरण बनना।
- शुभ भावना रखना।
- श्रेष्ठ वृत्ति बनाना।
- आत्मिक दृष्टि द्वारा सकारात्मक vibration देना।
- अपने जीवन से शिक्षा देना।
मुरली साहित्य में मन्सा और दृष्टि द्वारा सेवा की इसी दिशा पर भी जोर मिलता है।
उदाहरण
किसी व्यक्ति को बहुत समझाने के बजाय यदि हम स्वयं शांत, नम्र और सहयोगी बन जाएँ, तो हमारा व्यवहार ही उसके लिए शिक्षा बन सकता है।
अपने स्वरूप से शिक्षा देना — सबसे प्रभावशाली सेवा है।
पाँच मुख्य सूत्र
इस पूरे अध्याय को पाँच सूत्रों में याद किया जा सकता है:
1. मरजीवा बनो
पुराने शूद्रपन के संस्कारों को अपना मत बनाओ।
2. निमित्त बनो
निमित्त भाव से सेवा करने पर नम्रता आती है।
3. दृष्टि बदलो
आत्मिक दृष्टि से स्थिति और सृष्टि दोनों श्रेष्ठ बनती हैं।
4. अपना राजा बनो
मन, बुद्धि और संस्कारों पर स्वराज्य प्राप्त करो।
5. पढ़ो और पढ़ाओ
ज्ञान, योग और सेवा में स्वयं को व्यस्त रखो।
दैनिक पुरुषार्थ के लिए 5 प्रश्न
रात्रि में स्वयं से पूछें:
- आज मैंने किसी पुराने संस्कार को अपना तो नहीं बनाया?
- क्या आज मैंने किसी कार्य में स्वयं को निमित्त समझा?
- क्या मेरी दृष्टि आत्मिक रही?
- क्या आज मैं अपने मन का राजा रहा या परिस्थिति का अधीन?
- क्या आज मैंने पढ़ने, पढ़ाने या मन्सा सेवा में समय दिया?
एक शक्तिशाली संकल्प
“मैं आत्मा हूँ — इस संगमयुगी जन्म में नया जीवन प्राप्त करने वाली आत्मा। पुराने संस्कार मेरे नहीं हैं। मैं उन्हें स्वीकार नहीं करता। मैं निमित्त भाव से सेवा करता हूँ, आत्मिक दृष्टि रखता हूँ और अपने मन-बुद्धि का स्वराज्य अधिकारी बनता हूँ।”
YouTube के लिए Eye-Catching Title
“मरजीवा बनो! पुराने शूद्रपन के संस्कारों को TOUCH भी मत करो | 18 जून 1969 अव्यक्त मुरली”
वैकल्पिक Titles
- “पुराने संस्कार वापस क्यों आते हैं? मुरली का Powerful उत्तर | मरजीवा बनो”
- “दृष्टि बदलो, सृष्टि बदल जाएगी! | 18 जून 1969 मुरली के 5 गहरे रहस्य”
- “अपना राजा बनो | पुराने संस्कार छोड़ने और स्वराज्य प्राप्त करने की मुरली”
- “निमित्त बनो, नम्र बनो, सफल बनो | अव्यक्त मुरली 18-06-1969”
Disclaimer
Disclaimer: यह वीडियो आध्यात्मिक अध्ययन, मनन और व्यक्तिगत पुरुषार्थ के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत विचार 18 जून 1969 की अव्यक्त मुरली के दिए गए अंशों और उनके सरल अध्ययनात्मक सार पर आधारित हैं। यह वीडियो किसी आधिकारिक संस्था की ओर से जारी किया गया आधिकारिक मुरली-पाठ या आधिकारिक प्रतिनिधित्व होने का दावा नहीं करता। मूल मुरली का अध्ययन करने के लिए संबंधित आधिकारिक स्रोत को प्राथमिकता दें।
प्रश्न 1. मरजीवा बनने का पहला पाठ क्या है?
उत्तर: अपने को पुराने देह-अभिमान, पुरानी दुनिया और पुराने शूद्रपन के संस्कारों से अलग समझना और ब्राह्मण जीवन के श्रेष्ठ संस्कार धारण करना ही मरजीवा बनने का पहला पाठ है।
प्रश्न 2. पुराने संस्कारों को कैसा समझना चाहिए?
उत्तर: पुराने संस्कारों को ऐसे समझना चाहिए जैसे वे किसी और के थे, हमारे नहीं। उन्हें अपना मानकर स्वीकार नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 3. पुराने शूद्रपन के संस्कारों से कैसे बच सकते हैं?
उत्तर: जैसे गन्दी चीज़ को छूने से बचते हैं, वैसे ही पुराने संस्कारों को मन और बुद्धि में स्थान नहीं देना चाहिए। आत्मिक स्थिति और योगबल का अभ्यास करना चाहिए।
प्रश्न 4. सेवा में सफलता का मुख्य गुण क्या है?
उत्तर: सेवा में सफलता का मुख्य गुण नम्रता है। नम्रता तब आती है जब हम स्वयं को निमित्त समझकर सेवा करते हैं।
प्रश्न 5. निमित्त भाव रखने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: निमित्त भाव रखने से अहंकार कम होता है और सेवा सहज, निष्काम तथा प्रभावशाली बनती है।
प्रश्न 6. “दृष्टि से सृष्टि बनती है” का क्या अर्थ है?
उत्तर: हमारी दृष्टि जैसी होती है, वैसी ही हमारी अनुभूति और व्यवहार की सृष्टि बनती है। आत्मिक दृष्टि रखने से हमारी वृत्ति और कर्म भी श्रेष्ठ बनते हैं।
प्रश्न 7. संगमयुग में किस दृष्टि का अभ्यास करना है?
उत्तर: संगमयुग में भाई-भाई की आत्मिक दृष्टि का अभ्यास करना है। सामने वाले को शरीर के बजाय आत्मा के रूप में देखना है।
प्रश्न 8. अपना राजा बनने का क्या अर्थ है?
उत्तर: अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मों पर अधिकार प्राप्त करना ही अपना राजा बनना है। परिस्थितियों के अधीन होने के बजाय अपनी स्थिति पर अधिकार रखना है।
प्रश्न 9. संगमयुग के संस्कारों का क्या महत्व है?
उत्तर: संगमयुग पर डाले गए संस्कार ही भविष्य के जीवन का आधार बनते हैं। इसलिए इस समय श्रेष्ठ संस्कारों का बीज डालना आवश्यक है।
प्रश्न 10. अधिकारी बनने के लिए कौन-सा गुण आवश्यक है?
उत्तर: अधिकारी बनने के लिए उदारचित्तता का विशेष गुण आवश्यक है। उदारचित्त व्यक्ति दूसरों की कमजोरियों को समझकर उन्हें सहयोग देता है।
प्रश्न 11. ब्राह्मण जीवन का मुख्य कर्तव्य क्या है?
उत्तर: ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य है पढ़ना और पढ़ाना। ज्ञान और सेवा में व्यस्त रहने से बुद्धि व्यर्थ बातों से बची रहती है।
प्रश्न 12. मन्सा सेवा कैसे की जा सकती है?
उत्तर: शुभ संकल्प, श्रेष्ठ वृत्ति और आत्मिक दृष्टि द्वारा मन्सा सेवा की जा सकती है। इसके लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं होती।
प्रश्न 13. पुराने संस्कार और ब्राह्मण संस्कार में क्या अंतर है?
उत्तर: पुराने संस्कार देह-अभिमान और पुरानी जीवनशैली से जुड़े हैं, जबकि ब्राह्मण संस्कार आत्मिकता, पवित्रता, नम्रता, प्रेम और सेवा पर आधारित हैं।
प्रश्न 14. इस शिक्षाओं को जीवन में कैसे अपनाएँ?
उत्तर: हर परिस्थिति में पहले अपनी दृष्टि और स्थिति को चेक करें। पुराने संस्कार की प्रतिक्रिया देने के बजाय आत्मिक स्थिति में स्थित होकर श्रेष्ठ संस्कार का प्रयोग करें।
प्रश्न 15. इस पूरे पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: मरजीवा बनो, पुराने संस्कारों को अपना मत बनाओ, निमित्त बनकर सेवा करो, आत्मिक दृष्टि रखो, अपना राजा बनो और पढ़ने-पढ़ाने में व्यस्त रहो।
मुरली नोट
तिथि: 18 जून 1969
मुख्य स्मृति: “मरजीवा वह है जो पुराने शूद्रपन के संस्कारों को टच भी न करे।”
दैनिक संकल्प
“मैं आत्मा हूँ। पुराने संस्कार मेरे नहीं हैं। मैं उन्हें स्वीकार नहीं करता। मैं आत्मिक दृष्टि रखकर, निमित्त भाव से सेवा करते हुए अपने मन-बुद्धि का स्वराज्य अधिकारी बनता हूँ।”

