(44)20-12-1969/“Success of Planes by Remembering Planes”

AW.(44)20-12-1969/“प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता”

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“प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता”

आज बापदादा क्या देख रहे हैं। क्या देखने और क्या करने आये हैं? आज बापदादा अपने अति स्नेही बच्चों से एक वायदा कराने लिये आये हैं। वायदा करने में तो यह आत्मायें आदि से ही प्रवीण हैं। जैसे शुरू में वायदा करने में कोई देरी नहीं की, कुछ सोचा नहीं। इस रीति से अब भी बापदादा वायदा लेने लिये आये हैं। यूं तो सारे ड्रामा में अनेक आत्माओं के बीच तुम आत्मायें ही हिम्मतवान प्रसिद्ध हुई हो। जो हिम्मत रख बापदादा के समीप रहे और स्नेह भी लिया। मदद ली भी और की भी। तो उसी संस्कारों को फिर से टेस्ट करने आये हैं। एवररेडी तो सभी हैं ना। वायदा यही है कि अभी से सभी एकता, स्वच्छता, महीनता, मधुरता और मन, वाणी, कर्म में महानता – यह 5 बातें एक एक के हर कदम से नज़र आवें। सुनाया था ना भट्ठी के बाद सर्विस स्थानों पर निकले। वह दिन याद है ना। लोग सभी क्या कहते थे? सभी के मुख से यही निकलता था कि यह एक ही सांचे से निकली हुई हैं। सभी की बात एक ही है, सभी के रहन-सहन, सभी के आकर्षण जहाँ देखो वही नजर आता है। वह किसका प्रभाव पड़ता था? अव्यक्ति पालना का प्रभाव। व्यक्त में होते हुए भी सभी को अव्यक्त फरिश्ते नजर आते थे। साधारण रूप में आकर्षण मूर्त और अलौकिक व्यक्तियां देखने में आते थे। अब फिर से वह जैसे 16 वर्ष की भट्ठी, यह फिर 16 दिन की भट्ठी। लेकिन अब से हरेक को यह मालूम पड़ना चाहिए कि यह बदल कर आये हैं, दुनिया को बदलने के लिये। सारे दैवी परिवार की इस ग्रुप पर विशेष आंख है। तो विशेष आत्माओं को अपनी विशेषता दिखानी है, कौनसी विशेषता? वह बातें तो पांच सुनाई। जब यह 5 बातें हर संकल्प, हर बोल, हर कर्म में याद रखेंगे तब ही विशेष आत्मायें सभी को नज़र आयेंगे। जब अपने में विशेषता लायेंगे तब बाप को भी प्रत्यक्ष कर सकेंगे। अपने सम्पूर्ण संस्कारों से ही बाप को प्रत्यक्ष कर सकते हो। सिर्फ सर्विस के प्लैन्स से नहीं लेकिन अपने सम्पूर्ण संस्कारों से, अपनी सम्पूर्ण शक्ति से बाप को प्रत्यक्ष कर सकते हो। भले प्लैन्स तो बनाने पड़ते हैं लेकिन प्लैन्स भी सफलता में तब आयेंगें जब प्लैन के साथ अपनी लगन पूरी हो, प्लेन याद हो। कोई भी मिक्सचैर्टी न हो। प्लेन याद से ही सफल हो सकते हैं। प्लैन के पहले चैकिंग करो, प्लेन याद में हैं? शुरू शुरू का वायदा क्या है वह गीत याद है ना, उसको फिर से साकार रूप में लाना है अर्थात् बुद्धि की लगन एक तुम्हीं से ही है वह साक्षात्कार साकार रूप में सभी को होना चाहिए। अब समझा, क्या करने आये हो और क्या देखने आये हो? भाँति-भाँति की बातें बाबा को अच्छी लगती हैं। यह रूह रूहान है। इसमें कोई फेल होते हैं? अभी तो तुम सभी को फेल करने वाले बन गये हो, फेल होते नहीं। अपने को फेल होने नहीं देते – यह भी ठीक है। लेकिन फील करते हो। अपनी बात में विजयी बनने का आर्ट सीखना हो तो बच्चों से सीख सकते हैं। यह सिर्फ थोड़ा-सा फर्क मिट जाये तो यह सारी आत्मायें आप सभी के ऊपर मिट जायें। जैसे आप सभी बापदादा के ऊपर मिट गये, वैसे ही आपके भक्त आप शक्तियों के ऊपर मिट जायें। लेकिन सिर्फ यह बातें मिट जायें। जो फील होता है, यह बात मिट जाये। सभी से समझदार तो निकले जो फौरन ही सौदा कर लिया। सारी सृष्टि की आत्माओं के आगे हिम्मवान भी हैं, समझदार भी हैं। इसलिए बापदादा कहते हैं सभी से समझदार बच्चों का यह संगठन है। हिम्मतवान भी हैं। और भले कितने भी हिम्मत रखें लेकिन यह हिम्मत तुरन्त दान महापुण्य की जो रखी, ऐसी हिम्मत अभी कोई रख नहीं सकता। नदियों में तो भले सभी नहाते हैं लेकिन आप लोगों ने सागर में नहाया है। सागर और नदियों में नहाना – फर्क तो पड़ता है ना। इसमें तो पास हो ही गई। अभी बाकी एक बात रह गई है पास होने की। उस एक बात में ऊपर ही मार्क्स है।

कोई भी डायरेक्शन कभी भी किसी रूप से, कहाँ के लिये भी निकले और कितने समय में भी निकल सकता, एक सेकेण्ड में तैयार होने का डायरेक्शन भी निकल सकता है। तो ऐसे एवररेडी सभी बने हैं? जैसे अशुद्ध प्रवृत्ति को छोड़ने के लिये कोई बात सोची क्या? जेवर, कपड़े, बाल-बच्चे आदि कुछ भी नहीं देखा ना। तो यह जैसे पवित्र प्रवृत्ति है इसमें फिर यह बातें देखने की क्या आवश्यकता है। आगे सिर्फ स्नेह में थे। स्नेह से यह सभी किया, ज्ञान से नहीं। सिर्फ स्नेह ने ऐसा एवररेडी बनाया। अब स्नेह के साथ शक्ति भी है। स्नेह और शक्ति होते हुए भी फिर इसमें एवररेडी बनने में देरी क्यों। जैसे शुरू में एलान निकला कि सभी को इस घड़ी मैदान में आना है, वैसे अब भी रिपीट जरूर होना है लेकिन भिन्न-भिन्न रूप में। ऐसे नहीं कि बापदादा भविष्य को जानकर के आप सभी को एलान देवें और आप इस सर्विस के बन्धन में भी अपने को बांधे हुए रखो। बन्धन होते हुए भी बन्धन में नहीं रहना है। कोई भी आत्मा के बन्धन में आना – यह निर्बन्धन की निशानी नहीं है। इसलिए सभी को एक बात पास विद ऑनर्स की पास करनी है, जो बातें आपके ध्यान में भी नहीं होंगी, स्वप्न में भी नहीं होंगी उन बातों का एलान निकलना है। और ऐसे पेपर में जो पास होंगे वही पास विद ऑनर्स होंगे। इसलिये पहले से ही सुना रहे हैं। पहले से ही ईशारा मिल रहा है। इसको कहा जाता है – महीनता में जाना। जो महीन बुद्धि होंगे उनकी विशेषता क्या होगी? महीन बुद्धि वाले कैसी भी परिस्थिति में अपने को मोल्ड कर सकेंगे। जैसी परिस्थिति उसमें अपने को मोल्ड कर सकेंगे। सामना करने का उनमें साहस होगा वह कभी घबरायेंगे नहीं। लेकिन उसकी गहराई में जाकर अपने को उसी रीति चलायेंगे। तो जब हल्के होंगे तब ही मोल्ड हो सकेंगे। नरम और गरम दोनों ही होंगे तब मोल्ड होंगे। एक की भी कमी होगी तो मोल्ड नहीं हो सकेंगे। कोई भी चीज को गरम कर नरम किया जाता है। फिर मोल्ड किया जाता है। यहाँ कौनसी नरमाई और गरमाई है। नरमाई है निर्मानता, गरमाई है शक्ति रूप। निर्मानता अर्थात् स्नेह रूप। जिसमें हर आत्मा प्रति स्नेह होगा वही निर्मानता में रह सकेंगे। स्नेह नहीं है तो न रहमदिल बन सकेंगे न नम्रचित। इसलिए निर्मानता और फिर शक्ति रूप अर्थात् जितनी निर्मानता उतना ही फिर मालिकपना। शक्तिरूप में है मालिकपना और नम्रता में सेवागुण। सेवा भी और मालिकपना भी। सेवाधारी भी हो और विश्व के मालिकपने का नशा भी हो। जब यह नरमाई और गरमाई दोनों रहेंगे तब हर बात में मोल्ड हो सकेंगे। हरेक को यह देखना है कि हमारी बुद्धि की तराजू गरम और नरम दोनों में एक समान रहती है। कहाँ-कहाँ अति निर्मानता भी नुकसान करती है और कहाँ अति मालिकपना भी नुकसान करता है, इसलिए दोनों की समानता चाहिए। जितनी समानता होगी उतनी महानता भी। अब समझा कि किस एक बात में पास विद ऑनर होंगे? यह फाइनल पेपर का पहले एनाउंस कर रहे हैं, हर समय निर्बन्धन। सर्विस के बन्धन से भी निर्बन्धन। एलान निकले और एवररेडी बन मैदान पर आ पहुंचा। यह फाइनल पेपर है जो समय पर निकलेगा, प्रैक्टिकल में। इस पेपर में अगर पास हो गये तो और कोई बड़ी बात नहीं। इस पेपर में पास होंगे अर्थात् अव्यक्त स्थिति होगी। शरीर के भान से भी परे हुए तो बाकी क्या बड़ी बात है। इससे ही परखेंगे कि कहाँ तक अपने उस जीवन की नईया की रस्सियाँ छोड़ी हैं। एक है सोने की जंजीर दूसरी है लोहे की। लोहे की जंजीर तो छोड़ी लेकिन अब सोने की भी महीन जंजीर हैं। यह फिर ऐसी है जो कोई को देखने में भी आ न सके।

इसलिये जैसे कोई भी बन्धन से मुक्त होते, वैसे ही सहज रीति शरीर के बन्धन से मुक्त हो सकें। नहीं तो शरीर के बन्धन से भी बड़ा मुश्किल मुक्त होंगे। फाइनल पेपर है – अन्त मती सो गति। अन्त में सहज रीति शरीर के भान से मुक्त हो जायें – यह है पास विद ऑनर की निशानी। लेकिन वह तब हो सकेगी जब अपना चोला टाइट नहीं होगा। अगर टाइटनेस होगी तो सहज मुक्त नहीं हो सकेंगे। टाइटनेस का अर्थ है कोई से लगाव। इसलिए अब यही सिर्फ एक बात चेक करो – ऐसा लूज चोला हुआ है जो एक सेकेण्ड में इस चोले को छोड़ सकें। अगर कहाँ भी अटका हुआ होगा तो निकलने में भी अटक होगी। इसी को ही एवररेडी कहा जाता है। ऐसे एवररेडी वही होंगे जो हर बात में एवररेडी होंगे। प्रैक्टिकल में देखा ना – एक सेकेण्ड के बुलावे पर एवररेडी रह दिखाया। यह सोचा क्या कि बच्चे क्या कहेंगे? बच्चों से बिगर मिले कैसे जावें, यह सोचा? एलान निकला और एवररेडी। चोले से इज़ी होने से चोला छोड़ना भी इज़ी होता है, इसलिए यह कोशिश हर वक्त करनी चाहिए। यही संगमयुग का गायन होगा कि कैसे रहते हुए भी न्यारे थे, तब ही एक सेकेण्ड में न्यारे हो गये। बहुत समय से न्यारे रहने वाले एक सेकेण्ड में न्यारे हो जायेंगे। बहुत समय से न्यारापन नहीं होगा तो यही शरीर का प्यार पश्चाताप में लायेगा इसलिए इनसे भी प्यारा नहीं बनना है। इससे जितना न्यारा होंगे उतना ही विश्व का प्यारा बनेंगे। इसलिए अब यही पुरुषार्थ करना है, ऐसे नहीं समझना है कि कोई व्याधि आदि का रूप देखने में आयेगा तब जायेंगे उस समय अपने को ठीक कर देंगे। ऐसी कोई बात नहीं है पीछे ऐसे-ऐसे अनोखे मृत्यु बच्चों के होने हैं जो सन शोज़ फादर करेंगे। सभी का एक जैसा नहीं होगा। कई ऐसे बच्चे भी हैं जिन्हों का ड्रामा के अन्दर इस मृत्यु के अनोखे पार्ट का गायन सन शोज़ फादर करेगा। यह भी वही कर सकेंगे जिसमें एक विशेष गुण होगा। यह पार्ट भी बहुत थोड़ों का है। अन्त तक भी बाप की प्रत्यक्षता करते जायेंगे। यह भी बहुत बड़ी सब्जेक्ट है। अन्त घड़ी भी बाप का शो होता रहेगा। ऐसी आत्मायें जरूर कोई पावरफुल होंगी जिनका बहुत समय से अशरीरी रहने का अभ्यास होगा। वह एक सेकेण्ड में अशरीरी हो जायेंगे। मानो अभी आप याद में बैठते हो कैसे भी विघ्नों की अवस्था में बैठते हो, कैसी भी परिस्थितियां सामने होते हुए भी बैठते हो लेकिन एक सेकेण्ड में सोचा और अशरीरी हो जायें। वैसे तो एक सेकेण्ड में अशरीरी होना बहुत सहज है लेकिन जिस समय कोई बात सामने हो, कोई सर्विस के बहुत झंझट सामने हो परन्तु प्रैक्टिस ऐसी होनी चाहिए जो एक सेकेण्ड, सेकेण्ड भी बहुत है, सोचना और करना साथ-साथ चले। सोचने के बाद पुरुषार्थ न करना पड़े। अभी तो आप सोचते हो तब उस अवस्था में स्थित होते हो लेकिन ऐसा जो होगा उसका सोचना और स्थित होना साथ में होगा, सोच और स्थिति में फर्क नहीं होगा। सोचा और हुआ। ऐसे जो अभ्यासी होंगे वही सर्विस करने का पान का बीड़ा उठा सकेंगे। ऐसे कोई निमित्त हैं लेकिन बहुत थोड़े। मैजारिटी नहीं हैं, मैनारिटी हैं। उन्हों के ऊपर यहाँ ही फूल बरसायेंगे। ऐसे जो पास विथ ऑनर होंगे, उन्हीं के ऊपर जो द्वापर के भक्त हैं वह अन्त में इस साकार रूप में फूलों की वर्षा करेंगे। जो अन्त तक सन शोज़ फादर करके ही जायेंगे। ऐसा सर्विसएबुल मृत्यु होता है। इस मृत्यु से भी सर्विस होती है। सर्विस के प्रति बच्चे ही निमित्त हैं, ना कि माँ बाप। वह तो गुप्त रूप में हैं। सर्विस में मात-पिता बैकबोन हैं और बच्चे सामने हैं। इस सर्विस के पार्ट में मात-पिता का पार्ट नहीं है। इसमें बच्चे ही बाप का शो करेंगे। यह भी सर्विस का अन्त में मैडल प्राप्त होता है, ऐसा मैडल ड्रामा में कोई कोई बच्चों को मिलना है। अभी हरेक अपने आपसे जज करे कि हम ऐसा मैडल प्राप्त करने लिए निमित्त बन सकते हैं? ऐसे नहीं सिर्फ पुरानी बहनें ही बन सकेंगी। कोई भी बन सकते हैं। नये-नये रत्न भी हैं जो कमाल कर दिखायेंगे।

अभी सर्विस में नवीनता लानी है। जैसे अपने में नवीनता लाते हो वैसे सर्विस में भी नवीनता लानी है। नवीनता लाने की 5 बातें याद रखनी हैं। सभी के मुख से यह निकले कि यह कहाँ से आई हैं। जैसे शुरू में निकलता था, परन्तु शुरू में वाणी का बल नहीं था अभी तुमको वाणी का बल है। लेकिन अलौकिक स्थिति का बल गुप्त हो गया है, छिप गया है। इसलिए अब फिर से ऐसी अलौकिकता सभी को दिखानी है जो सभी महसूस करें कि जैसे शुरू में भट्ठी से निकली हुई आत्मायें कितनी सेवा के निमित्त बनी, अब फिर से सृष्टि के दृश्य को चेंज करने के निमित्त बनी हैं। उनसे अभी की सर्विस बढ़ी है। तो ऐसी शक्तिरूप और स्नेह रूप बन जाना है कि कितने भी हजारों के बीच खड़े हों तो भी दूर से अलौकिक व्यक्ति नज़र आओ। जैसे साकार रूप के लिए वर्णन करते हैं, कोई भी अन्जान समझ सकता था कि यह कोई अलौकिक व्यक्ति है। हजारों के बीच में वह हीरा चमकता था। तो फालो फादर। उन्हों के वायब्रेशन अपने में नहीं लाना, अपने वायब्रेशन से उन्हों को अलौकिक बनाना – यही नवीनता लानी है। अभी सर्विस के कारण कुछ संसारी लोगों में मिक्स लगते हैं। सर्विस के प्रति सम्बन्ध में रहते भी न्यारे रहने का जो मंत्र है – उसको नहीं भूलना। अभी वह संबंध जो रखना था सो रख लिया, अभी इस रीति संबंध रखने की भी आवश्यकता नहीं। सर्विस कारण अपने को हल्का करने की भी जरूरत नहीं। वह समय बीत चुका। अभी लौकिक के बीच अलौकिक नज़र आओ। अनेक व्यक्तियों के बीच अव्यक्त मूर्त लगे। वह व्यक्त देखने में आयें, आप अव्यक्त देखने में आओ – यह है परिवर्तन। शुरू में कोई के वायब्रेशन अथवा संग में अपने में परिवर्तन लाते थे, इसलिए कहते थे ब्रह्माकुमारी में हठ बहुत है लेकिन वह हठ अच्छा था ना। यह है ईश्वरीय हठ, इसलिए अब वायब्रेशन के बीच रहते अपने को न्यारा और प्यारा बनाना है। इतनी सर्विस नहीं करेंगे? सिर्फ वाणी से कुर्बान नहीं होते। आप लोगों ने कैसे कुर्बानी की? आन्तरिक आत्म-स्नेह से। प्रजा तो बहुत बनाई लेकिन अब कुर्बान करना है। यह सर्विस रही हुई है। वारिस कम और प्रजा ज्यादा बनाई है। क्योंकि वाणी से प्रजा बनती है लेकिन ईश्वरीय स्नेह और शक्ति से वारिस बनते हैं, तो वारिस बनाने हैं। यह फर्स्ट स्टेज का पुरुषार्थ है। वाणी से किसी को पानी नहीं कर सकते लेकिन स्नेह और शक्ति से एक सेकेण्ड में स्वाहा करा सकते हैं। यह भी अन्त में मार्क्स मिलते हैं – वारिस कितने बनाये, प्रजा कितनी बनाई, वारिस भी किस वैराइटी और प्रजा भी किस वैराइटी की और कितने समय में बनें। फाइनल पेपर आज सुना रहे हैं। किस-किस क्वेश्चन पर मार्क्स मिलते हैं एक तो यह क्वेश्चन अन्तिम रिजल्ट में होगा दूसरा सुनाया अन्त तक सर्विस का शो। और तीसरी बात थी, आदि से अन्त तक जो अवस्था चलती आई है उसमें कितना बारी फेल हुए हैं, पूरा पोतामेल एनाउन्स होगा। कितने बारी विजयी बने और कितने बारी फेल हुए और विजय प्राप्त की तो कितने समय में? कोई भी समस्या को सामना करने में कितना समय लगा? – उनकी भी मार्क्स मिलेगी। तो सारे जीवन की सर्विस और स्व स्थिति और अन्त तक सर्विस का सबूत – यह तीन बातें देखी जाती हैं।

यहां भी हर एक एक-दो के सामने स्पष्ट देखेंगे कि इन तीन बातों का क्या-क्या पोतामेल रहा है? और उनको सामने लाकर के अपनी रिजल्ट को भी पहले से ही चेक कर सकते हो और जो कमी रह गई है, उनको रिवाइज कर पूर्ण कर सकते हो। अभी भी अगर इन बातों की कमी हो तो भर लो। मेकप कर सकते हो। आधा घण्टा में भी गाड़ी मेकप हो जाती है। जो 6 घण्टा भी नहीं चलते वह आधा घण्टा में हो जाते हैं। इसलिए अब मेकप करने का लास्ट चांस है। अब रिजल्ट देखेंगे। जैसे शुरू में समाचार आते थे कि कितनी ऊंच आत्मायें हमारे पास आ पहुंची हैं। ऐसा समाचार फिर से आना चाहिए। भट्ठी का अर्थ ही है बदलना।

“प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता | एक सेकण्ड में एवररेडी बनने का फाइनल पेपर | 20-12-1969 अव्यक्त मुरली”

वैकल्पिक आकर्षक शीर्षक

“पास विद ऑनर बनने का फाइनल पेपर क्या है? | एवररेडी, निर्बन्धन और अव्यक्त स्थिति | 20 दिसम्बर 1969”


 अध्याय: प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता

1. बापदादा किस वायदे के लिए आये?

बापदादा अपने अति स्नेही बच्चों से एक विशेष वायदा लेने की बात करते हैं। लक्ष्य है कि हर कदम में ये 5 विशेषताएँ स्पष्ट दिखाई दें:

  1. एकता
  2. स्वच्छता
  3. महीनता
  4. मधुरता
  5. मन, वाणी और कर्म में महानता

जब ये पाँच बातें हर संकल्प, बोल और कर्म में दिखाई देंगी, तभी विशेष आत्मा की पहचान स्पष्ट होगी।

उदाहरण

केवल ज्ञान सुनाना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति के व्यवहार में मधुरता, स्वच्छता और एकता दिखाई देती है, तो उसकी स्थिति स्वयं दूसरों को प्रभावित करती है।


2. भट्ठी के बाद की अलौकिकता

बापदादा पुराने समय की भट्ठी का उदाहरण देते हैं। भट्ठी के बाद जब बच्चे सेवा स्थानों पर निकले तो लोगों ने अनुभव किया कि सभी जैसे एक ही साँचे से निकले हुए हैं।

उनकी वाणी, रहन-सहन और आकर्षण में एकरूपता दिखाई देती थी।

इसे अव्यक्त पालना का प्रभाव बताया गया है—व्यक्त रूप में होते हुए भी लोगों को उनमें अव्यक्त फरिश्तेपन की झलक दिखाई देती थी।

आज के लिए सीख

अपने आप से प्रश्न करें:

क्या मेरी स्थिति देखकर दूसरे व्यक्ति को मेरे ज्ञान से पहले मेरे संस्कार दिखाई देते हैं?


3. केवल प्लैन्स नहीं, पहले “प्लेन” याद

मुरली का मुख्य रहस्य है:

प्लैन्स बनाना आवश्यक है, लेकिन सफलता के लिए “प्लेन” अर्थात् लक्ष्य और बाप की स्मृति स्पष्ट होनी चाहिए।

बापदादा समझाते हैं कि केवल सर्विस के प्लैन्स से सफलता नहीं आती। अपनी लगन, सम्पूर्ण संस्कार और सम्पूर्ण शक्ति भी प्लैन के साथ जुड़नी चाहिए।

उदाहरण

किसी सेवा-कार्य की योजना बहुत अच्छी हो सकती है, लेकिन यदि करने वाले की बुद्धि अनेक बातों में उलझी है, तो प्लैन की सफलता प्रभावित होगी।

पहले चेकिंग:
“क्या मेरा प्लेन याद में है?”
फिर प्लैन:
“मुझे क्या करना है?”


4. एवररेडी बनने की परीक्षा

बापदादा बताते हैं कि कोई भी डायरेक्शन कभी भी आ सकता है—यहाँ तक कि एक सेकण्ड में तैयार होने का डायरेक्शन भी आ सकता है।

इसलिए वास्तविक एवररेडी वही है जो परिस्थिति आने के बाद तैयारी न करे, बल्कि पहले से तैयार हो।

उदाहरण

यदि किसी कार्य के लिए अचानक परिवर्तन करना पड़े तो:

  • “पहले यह पूरा कर लूँ…”
  • “फिर देखेंगे…”
  • “मेरी परिस्थिति तो ऐसी है…”

इन विचारों में रुकना एवररेडीपन की कमी दिखा सकता है।


5. महीन बुद्धि की पहचान

महीन बुद्धि वाला व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार स्वयं को मोल्ड कर सकता है।

इसके लिए दो शक्तियों का संतुलन चाहिए:

🔹 नरमाई

निर्मानता और स्नेह

🔹 गरमाई

शक्ति रूप और मालिकपन

सिर्फ नम्रता पर्याप्त नहीं और केवल शक्ति भी पर्याप्त नहीं। दोनों का संतुलन आवश्यक है।

उदाहरण

सेवा में नम्रता से सबको साथ लेकर चलना और आवश्यकता पड़ने पर शक्ति रूप होकर सही निर्णय लेना—यही संतुलन है।


6. सेवाधारी भी और मालिक भी

मुरली में एक सुंदर संतुलन बताया गया है:

सेवाधारी भी बनो और विश्व-मालिकपन का नशा भी रखो।

  • नम्रता → सेवागुण
  • शक्ति → मालिकपन

इन दोनों के संतुलन से व्यक्ति परिस्थिति के अनुसार सहज रूप से मोल्ड हो सकता है।


7. फाइनल पेपर — निर्बन्धन

बापदादा इसे फाइनल पेपर के रूप में समझाते हैं।

सिर्फ लौकिक बन्धनों से मुक्त होना पर्याप्त नहीं है। सेवा के बन्धन से भी स्वयं को मुक्त रखना है।

निर्बन्धन आत्मा की निशानी:
एलान हो और आत्मा एवररेडी होकर मैदान में पहुँच जाए।

यह अवस्था आगे चलकर अव्यक्त स्थिति की ओर ले जाती है।


8. “सोने की जंजीर” भी पहचानो

मुरली में दो प्रकार की जंजीरों का उदाहरण दिया गया है:

  • लोहे की जंजीर — स्थूल बन्धन
  • सोने की जंजीर — सूक्ष्म लगाव

कभी-कभी बाहरी बन्धन समाप्त हो जाते हैं, लेकिन सूक्ष्म लगाव बने रहते हैं।

इसलिए लक्ष्य केवल बन्धन छोड़ना नहीं, बल्कि लगाव से न्यारा बनना है।


9. “चोला” ढीला रखो

शरीर को मुरली में चोले के रूप में समझाया गया है।

यदि चोले के प्रति अत्यधिक लगाव है तो उससे सहज रूप से न्यारा होना कठिन होगा।

इसलिए पुरुषार्थ है:

“ऐसा लूज़ चोला हो कि एक सेकण्ड में छोड़ सकें।”

अर्थात् शरीर में रहते हुए भी शरीर-भान से न्यारे रहने का अभ्यास।

आत्म-चेकिंग

  • क्या किसी व्यक्ति से अत्यधिक लगाव है?
  • क्या किसी वस्तु से मेरी शान्ति जुड़ी हुई है?
  • क्या किसी परिस्थिति के बदलने से मेरी स्थिति बदल जाती है?

10. “जितना न्यारा, उतना प्यारा”

मुरली की एक महत्वपूर्ण शिक्षा:

जितना न्यारे होंगे, उतना ही विश्व के प्यारे बनेंगे।

न्यारापन सम्बन्ध छोड़ना नहीं है, बल्कि सम्बन्धों में रहते हुए भी अपनी आत्मिक स्थिति को स्वतंत्र रखना है।


11. एक सेकण्ड में अशरीरी स्थिति

मुरली में अशरीरी बनने की विशेष प्रैक्टिस पर बल है।

लक्ष्य यह है कि:

सोचा और हुआ।

अर्थात् पहले लम्बा संघर्ष करके स्थिति बनाने की आवश्यकता न पड़े। विचार और स्थिति के बीच का अंतर समाप्त हो जाए।

उदाहरण

सर्विस का तनाव, कोई समस्या या कोई परिस्थिति सामने हो और उसी क्षण:

“मैं आत्मा हूँ… अशरीरी हूँ…”

और बुद्धि तुरंत आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाए।


12. सर्विस का असली लक्ष्य — वारिस बनाना

मुरली में सर्विस की गुणवत्ता की ओर विशेष संकेत है।

वाणी से प्रजा बनती है, लेकिन ईश्वरीय स्नेह और शक्ति से वारिस बनते हैं।

इसलिए केवल अधिक लोगों तक ज्ञान पहुँचाना ही पर्याप्त नहीं; लक्ष्य है कि आत्माओं में स्नेह, शक्ति और परिवर्तन की अनुभूति हो।

उदाहरण

किसी व्यक्ति ने ज्ञान की बहुत बातें सुन लीं, लेकिन जीवन में परिवर्तन नहीं आया—यह एक स्तर की सेवा है।

दूसरी ओर, किसी आत्मा में स्नेह और शक्ति के कारण वास्तविक परिवर्तन आ गया—यह वारिस बनाने वाली सेवा है।


13. सर्विस में नवीनता

अब सर्विस में भी वही अलौकिकता लानी है जो प्रारम्भिक समय में दिखाई देती थी।

लक्ष्य है कि हजारों व्यक्तियों के बीच भी व्यक्ति की अलौकिकता दूर से दिखाई दे।

मुरली का संदेश है:

दूसरों के वायब्रेशन अपने में न लाओ; अपने वायब्रेशन से दूसरों को अलौकिक बनाओ।


14. लौकिक के बीच अलौकिक बनो

सर्विस के कारण लौकिक सम्बन्धों में रहना पड़ सकता है, लेकिन अपनी आत्मिक पहचान नहीं खोनी है।

लक्ष्य:

व्यक्त लोगों के बीच स्वयं अव्यक्त दिखाई देना।

यही वास्तविक परिवर्तन है।

उदाहरण

परिवार, कार्यस्थल या समाज में रहते हुए भी:

  • वाणी मधुर हो
  • प्रतिक्रिया कम हो
  • स्थिति स्थिर हो
  • आत्मिक दृष्टि बनी रहे
  • सेवा का उद्देश्य स्पष्ट रहे

15. फाइनल रिजल्ट के तीन मुख्य प्रश्न

मुरली के अनुसार अन्तिम रिजल्ट में विशेष रूप से तीन बातें देखी जाती हैं:

① जीवन भर की सर्विस

कितनी और कैसी सेवा की?

② स्व-स्थिति

कितनी बार विजयी बने और कितनी बार कमजोर हुए?

③ अन्त तक सर्विस का सबूत

अन्तिम समय तक सेवा और बाप की प्रत्यक्षता का माध्यम बने या नहीं?

समस्या आने पर सामना करने में कितना समय लगा, यह भी पुरुषार्थ की गति को दर्शाता है।


16. अभी भी “मेकअप” का अवसर है

बापदादा कहते हैं कि अभी कमी को पूरा किया जा सकता है।

भट्ठी का अर्थ ही है—बदलना।

इसलिए जो कमी दिखाई दे, उसे देखकर निराश होने के बजाय अभी पुरुषार्थ करके उसे पूरा करना है।

आज की चेकिंग

मेरी सबसे बड़ी कमी क्या है?

  • लगाव?
  • एवररेडी न होना?
  • शक्ति और नम्रता का असंतुलन?
  • सर्विस में नवीनता की कमी?
  • अशरीरी बनने का अभ्यास कम?
  • प्रजा अधिक, वारिस कम?

 मुरली नोट्स — Proper Date

अव्यक्त मुरली: 20 दिसम्बर 1969
मुख्य विषय: “प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता”
मुख्य पुरुषार्थ: एवररेडी, निर्बन्धन, महीन बुद्धि, निर्मानता और शक्ति का संतुलन, अशरीरी स्थिति तथा सर्विस में अलौकिकता।

मुख्य स्मृति-वाक्य

“प्लेन याद से ही प्लैन्स सफल हो सकते हैं।”


 वीडियो का मुख्य संदेश

सिर्फ अच्छी योजना बनाना सफलता नहीं है।
सच्ची सफलता तब है जब प्लेन अर्थात् बाप की याद, लक्ष्य और आत्मिक स्थिति इतनी स्पष्ट हो कि हर परिस्थिति में हम एवररेडी, निर्बन्धन और अलौकिक बने रहें।

Disclaimer: यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं एवं 20-12-1969 की अव्यक्त मुरली “प्लेन याद से प्लैन्स की सफलता” पर आधारित एक आध्यात्मिक अध्ययन एवं चिंतन है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, स्व-चिंतन और पुरुषार्थ को प्रेरित करना है। प्रस्तुत विचारों को संबंधित मुरली के आध्यात्मिक संदर्भ में समझें। यह वीडियो किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या मत के विरुद्ध टिप्पणी नहीं है और न ही किसी चिकित्सकीय, वैज्ञानिक, कानूनी या व्यावसायिक सलाह का विकल्प है।

प्रश्न 1. बापदादा बच्चों से कौन-सा विशेष वायदा लेने आये?

उत्तर: बापदादा चाहते हैं कि हर बच्चे के हर कदम में एकता, स्वच्छता, महीनता, मधुरता तथा मन-वाणी-कर्म में महानता दिखाई दे।

प्रश्न 2. भट्ठी के बाद बच्चों में कौन-सी विशेषता दिखाई देती थी?

उत्तर: सभी की वाणी, रहन-सहन और आकर्षण में ऐसी एकरूपता थी कि लोग कहते थे—ये जैसे एक ही साँचे से निकली हुई हैं। यह अव्यक्त पालना का प्रभाव था।

प्रश्न 3. प्लैन्स की सफलता का मुख्य आधार क्या है?

उत्तर: केवल प्लैन्स बनाना पर्याप्त नहीं है। प्लेन अर्थात् बाप की याद और बुद्धि की लगन के साथ प्लैन बनाने से ही सफलता मिलती है।

प्रश्न 4. एवररेडी किसे कहा जाता है?

उत्तर: जो किसी भी समय मिलने वाले डायरेक्शन के अनुसार एक सेकण्ड में तैयार हो जाए, वही एवररेडी है।

प्रश्न 5. महीन बुद्धि वाले की मुख्य निशानी क्या है?

उत्तर: वह किसी भी परिस्थिति में स्वयं को मोल्ड कर सकता है और परिस्थिति से घबराता नहीं है।

प्रश्न 6. महीन बुद्धि के लिए किन दो गुणों का संतुलन आवश्यक है?

उत्तर: नरमाई और गरमाई—नरमाई अर्थात् निर्मानता और स्नेह; गरमाई अर्थात् शक्ति रूप और मालिकपन।

प्रश्न 7. निर्मानता और शक्ति का क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: निर्मानता में सेवागुण है और शक्ति रूप में मालिकपन है। इसलिए सेवाधारी होने के साथ विश्व-मालिकपन का नशा भी चाहिए।

प्रश्न 8. फाइनल पेपर क्या है?

उत्तर: फाइनल पेपर है—हर समय निर्बन्धन और एवररेडी रहना, यहाँ तक कि सेवा के बन्धन से भी न्यारा रहना।

प्रश्न 9. “सोने की जंजीर” किसे कहा गया है?

उत्तर: स्थूल बन्धनों से मुक्त होने के बाद भी जो सूक्ष्म लगाव रह जाते हैं, उन्हें सोने की जंजीर कहा गया है।

प्रश्न 10. “लूज़ चोला” होने का क्या अर्थ है?

उत्तर: शरीर और उससे जुड़े लगावों के प्रति इतना न्यारापन हो कि आवश्यकता पड़ने पर एक सेकण्ड में शरीर-भान से मुक्त हो सकें।

प्रश्न 11. संगमयुग की विशेषता क्या बताई गई है?

उत्तर: रहते हुए भी न्यारे रहना। जो बहुत समय से न्यारे रहने का अभ्यास करते हैं, वे अन्त में सहज रीति से न्यारे हो सकेंगे।

प्रश्न 12. “जितना न्यारे होंगे उतना ही विश्व के प्यारे बनेंगे”—इसका भाव क्या है?

उत्तर: संसार और सम्बन्धों में रहते हुए भी यदि आत्मा किसी व्यक्ति या वस्तु के अत्यधिक लगाव से मुक्त रहती है, तो उसकी आत्मिक शक्ति और सेवा-योग्यता बढ़ती है।

प्रश्न 13. एक सेकण्ड में अशरीरी बनने का अभ्यास कैसे होगा?

उत्तर: ऐसा अभ्यास हो कि सोचना और स्थिति में स्थित होना साथ-साथ चले—सोचा और अशरीरी स्थिति हो गई।

प्रश्न 14. सर्विस का वास्तविक लक्ष्य क्या बताया गया है?

उत्तर: केवल प्रजा बनाना नहीं, बल्कि वारिस बनाना। वाणी से प्रजा बनती है, जबकि ईश्वरीय स्नेह और शक्ति से वारिस बनते हैं।

प्रश्न 15. सर्विस में नवीनता कैसे लानी है?

उत्तर: अपनी अलौकिक स्थिति को इतना शक्तिशाली बनाना है कि अनेक लोगों के बीच भी व्यक्ति अलौकिक और अव्यक्त दिखाई दे।

प्रश्न 16. दूसरों के वायब्रेशन के प्रति क्या सावधानी रखनी है?

उत्तर: दूसरों के वायब्रेशन अपने में नहीं लाने हैं, बल्कि अपने वायब्रेशन से दूसरों को अलौकिक बनाना है।

प्रश्न 17. अन्तिम रिजल्ट में कौन-सी तीन बातें देखी जाती हैं?

उत्तर:

  1. सारे जीवन की सर्विस
  2. स्व-स्थिति और विजय का रिकॉर्ड
  3. अन्त तक सर्विस का सबूत

प्रश्न 18. किसी समस्या को सामना करने में लगा समय क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: क्योंकि यह देखा जाता है कि आत्मा किसी परिस्थिति में कितनी जल्दी विजयी स्थिति में आती है। उसके आधार पर भी पुरुषार्थ की मार्क्स मिलती हैं।

प्रश्न 19. अभी कमी रह गई हो तो क्या किया जा सकता है?

उत्तर: अभी भी अपनी कमी को मेकअप करके पूरा किया जा सकता है। मुरली इसे बदलाव और पुरुषार्थ का अवसर बताती है।

प्रश्न 20. भट्ठी का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: भट्ठी का अर्थ ही है—बदलना। अर्थात् स्वयं में ऐसी परिवर्तनकारी स्थिति लाना जिससे अलौकिकता और विशेषता स्पष्ट दिखाई दे।

 मुख्य संदेश

“पहले प्लेन याद हो, फिर प्लैन बनाओ; एवररेडी, निर्बन्धन और अलौकिक स्थिति ही सफलता की सच्ची पहचान है।”

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