(42)28-11-1969/“Tips for Transforming the Mundane into the Supernatural”

AW.(42)28-11-1969/“लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने की युक्तियां”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने की युक्तियां”

आज भट्ठी का कौन-सा दिन है? आज है सम्पूर्ण समर्पण होने का दिन। बाप-दादा को ऐसा समझकर बुलाया है। सम्पूर्ण समर्पण होने के लिये सभी तैयार हो वा सम्पूर्ण समर्पण हो चुके हो? जो सम्पूर्ण समर्पण हो चुके हैं आज उन्हीं का समारोह है। यह सभी के सभी सम्पूर्ण समर्पण हुए हैं। सम्पूर्ण समर्पण जो हो जाता है उसकी दृष्टि क्या होती है? (शुद्ध दृष्टि, शुद्ध वृत्ति हो जाती है) लेकिन किस युक्ति से वह वृत्ति-दृष्टि शुद्ध हो जाती है? एक ही शब्द में यह कहेंगे कि दृष्टि और वृत्ति में रूहानियत आ जाती है। अर्थात् दृष्टि वृत्ति रूहानी हो जाती है। जिस्म को नहीं देखते हैं तो शुद्ध, पवित्र दृष्टि हो जाती है। जड़ चीज़ को आंखों से देंखेंगे ही नहीं तो उस तरफ वृत्ति भी नहीं जायेगी। दृष्टि नहीं जायेगी तो वृत्ति भी नहीं जायेगी। दृष्टि देखती है तब वृत्ति भी जाती है। रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को और दूसरों को भी रूह देखना चाहिए। जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना है, ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए। जैसे कोई बहुत गूढ़ विचार में रहते हैं, कुछ भी करते हैं, चलते, खाते-पीते हैं लेकिन उनको मालूम नहीं पड़ता है कि कहाँ तक आ पहुँचा हूँ, क्या खाया है। इसी रीति से जिस्म को देखते हुए भी नहीं देखेंगे और अपने उस रूह को देखने में ही बिज़ी होंगे तो फिर ऐसी अवस्था हो जायेगी जो कोई भी आपसे पूछेंगे यह कैसी थी तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा। ऐसी अवस्था होगी। लेकिन वह तब होगी जब जिस्मानी चीज़ को देखते हुए उस जिस्मानी लौकिक चीज को अलौकिक रूप में परिवर्तन करेंगे। अपने में परिवर्तन करने के लिए जो लौकिक चीजें देखते हो या लौकिक सम्बन्धियों को देखते हो उन सभी को परिवर्तन करना पड़ेगा। लौकिक में अलौकिकता की स्मृति रखेंगे। भल लौकिक सम्बन्धियों को देखते हो लेकिन यह समझो कि अब हमारी यह भी ब्रह्मा बाप के बच्चे पिछली बिरादरी हैं। ब्रह्मा वंश तो है ना। क्योंकि ब्रह्मा दी क्रियेटर है, तो भले भक्त, ज्ञानी व अज्ञानी हैं लेकिन बिरादरी तो वह भी हैं ना। तो लौकिक सम्बन्धी भी ब्रह्मावंशी हैं लेकिन वह नज़दीक सम्बन्ध के हैं, वह दूर के हैं। इसी रीति कोई भी लौकिक चीज देखते हो, दफ्तर में काम करते हो, बिज़नेस करते हो, खाना खाते हो, देखते हो, बोलते हो लेकिन एक-एक लौकिक बात में अलौकिकता हो। इसी शरीर के कार्य के लिए चल रहे हो तो साथ-साथ समझो – इन शारीरिक पाँव द्वारा लौकिक कार्य तरफ जा रहा हूँ लेकिन बुद्धि द्वारा अपने अलौकिक देश, कल्याण के कार्य के लिए जा रहा हूँ। पाँव यहाँ चल रहे हैं लेकिन बुद्धि याद की यात्रा में। शरीर को भोजन दे रहे हैं लेकिन आत्मा को फिर याद का भोजन देते जाओ। यह याद भी आत्मा का भोजन है। जिस समय शरीर को भोजन देते हो, ऐसे ही शरीर के साथ में आत्मा को भी शक्ति का, याद का बल देना है।

अपने को परिवर्तन में लाने के लिए क्या करना पड़ेगा? हरेक चीज को लौकिक से अलौकिकता में परिवर्तन करना है। जिससे लोगों को मालूम हो कि यह कोई विशेष अलौकिक आत्मा है। लौकिक में रहते हुए भी हम, लोगों से न्यारे हैं। अपने को आत्मिक रूप में न्यारा समझना है। कर्तव्य से न्यारा होना तो सहज है, उससे दुनिया को प्यारे नहीं लगेंगे, दुनिया को प्यारे तब लगेंगे जब शरीर से न्यारी आत्मा रूप में कार्य करेंगे। तो सिर्फ दुनिया की बातों से ही न्यारा नहीं बनना है, पहले तो अपने शरीर से न्यारा बनना है। जब शरीर से न्यारे होंगे तब प्यारे होंगे। अपने मन के प्रिय, प्रभु प्रिय और लोक प्रिय भी बनेंगे। अभी लोगों को क्यों नहीं प्रिय लगते हैं? क्योंकि अपने शरीर से न्यारे नहीं हुए हो। सिर्फ देह के सम्बन्धियों से न्यारे होने की कोशिश करते हो तो वह उल्हने देते हैं – खुद को क्या चेन्ज किया है? पहले देह के भान से न्यारे नहीं हुए हो तब तक उल्हना मिलता है। पहले देह से न्यारे होंगे तो उल्हने नहीं मिलेंगे। और ही लोकप्रिय बन जायेंगे। कई अपने को देख बाहर की बात को देख लेते हैं और बातों को पहले चेन्ज कर लेते हैं, अपने को पीछे चेन्ज करते हैं। इसलिए प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रभाव ड़ालने के लिए पहले अपने को परिवर्तन में लाओ। अपनी दृष्टि, वृत्ति, स्मृति को, सम्पत्ति को, समय को परिवर्तन में लाओ, तब दुनिया को प्रिय लेगेंगे। क्योंकि जब सम्पूर्ण हो गये, तो उसके बाद फिर क्या करना है? बोलना-चलना कैसे हो वह बता रहे हैं। जैसे अपकी यादगार शास्त्रों में बताते हैं – सम्पूर्ण समर्पण किसने और किसको कराया और कितने में कराया? यादगार की याद आती है? (राजा जनक का मिसाल) उनको तो बच्चों ने कराया। लेकिन बाप ने कराया ऐसा भी यादगार है। बतलाते हैं ना कि वामन अर्थात् छोटा। सभी से छोटा रूप किसका है? आत्मा और परमात्मा का, तो बाप ने आकर माया बली, जो बलवान है उससे तीन पैर में सभी कुछ लिया अर्थात् सम्पूर्ण समर्पण बनाया। आप लोगों को भी सम्पूर्ण समर्पण करना है अर्थात् जो भी माया का बल है वह सभी कुछ त्यागना है। माया का बली नहीं बनना है लेकिन ईश्वरीय शक्ति में बलवान बनना है। तो जैसे वह तीन पैर दिखाते हैं। यह कौनसी तीन बातें सुनाई जाती हैं जिससे सम्पूर्ण समर्पण आ जाता है। मन्सा, वाचा और कर्मणा के लिए शिक्षा कौनसी है? अगर वह तीन बातें याद रखेंगे तो सम्पूर्ण समर्पण हो ही जायेंगे। वह तीन बातें कौनसी? एक तो देह सहित सभी सम्बन्धों का त्याग। मामेकम् याद करो। यह तो हो गया मन्सा। वाचा के लिए क्या शिक्षा मिलती है? हर समय जैसे मोती चुगते हैं, इस रीति मुख से रत्न ही निकलें। एक दो को पत्थर नहीं लेकिन ज्ञान रत्नों का दान देना है। और कर्मणा के लिए यही याद रखो कि जो कर्म मैं करूँगा मुझे देख सभी करेंगे। दूसरी बात कि जो करेंगे सो पायेंगे। यह दोनों बातें याद रहने से कर्मणा में बल मिलता है अर्थात् जो सभी के सम्पर्क में आते हैं उसमें बल मिलता है। समझा? मन्सा, वाचा, कर्मणा के लिए इन मुख्य बातों को याद रखें तो फिर सम्पूर्ण समर्पण जो हुए हो उसको अविनाशी बना सकेंगे। ऐसे नहीं कि यहाँ सम्पूर्ण समर्पण का नशा चढ़ा है वह बाद में कम हो जाये। अगर यह पक्का याद रखेंगे कि हम तो सम्पूर्ण समर्पण हो ही गये, तो यह अविनाशी याद आपको अविनाशी बनाकर रखेगी। अगर आप कुछ डगमग हुए तो फिर समस्या डगमग करेगी। आपके डगमग होने को और समस्याओं को देखते हुए लोग भी उसका तमाशा देखेंगे। बापदादा तो देखते रहते हैं।

साथ किसके रहेंगे? साथी अंगुली छोड़ दे तो क्या करेंगे? सभी अपना साथ निभायें। बापदादा तो किस न किस रूप से साथ निभाने अर्थात् अंगुली पकड़ने की कोशिश करते रहते हैं। इतने तक जो बिल्कुल साँस निकलने तक, साँस निकलने वाला भी होता है तो भी जान भरते हैं। लेकिन कोई आक्सीजन लगाने ही न दे, नली को ही निकाल दे तो क्या करेंगे? अगर बापदादा का सहयोग चाहिए तो वास्तव में सहयोग कोई माँगने की चीज नहीं है। सहयोग, स्नेही को स्वत: ही प्राप्त होता है। आप बापदादा का स्नेही बनो तो सहयोग स्वत: ही प्राप्त होगा। माँगने की आवश्यकता नहीं। आधा कल्प माँगते रहे, भक्त रूप में। अभी बच्चा बनकर भी माँगते रहे तो बाकी फर्क क्या रहा भक्त और बच्चों में? लेकिन कारण क्या है कि अज्ञानी होकर सहयोग माँगते हो, अधिकारी समझो तो फिर माँगने की आवश्यकता नहीं। बीती सो बीती। जो बीत चुका उसका चिन्तन न करके, बीती हुई बातों से शिक्षा लेकर आगे के लिए सावधान। अगर बीती हुई बातों को सोचते रहेंगे तो यह भी एक समस्या हो जायेगी। समस्यायें तो बहुत आती हैं, यह भी एक नई समस्या खड़ी कर देंगे। बीती को परिवर्तन में लाने, बल भरने के लिए – उस रूप से सोचो। अगर यह सोचेंगे कि यह क्यों, कैसे हुआ, अब कैसे होगा, जम्प दे सकूँगा या नहीं। क्वेश्चन नहीं करो। क्वेश्चन मार्क के बदली फुलस्टॉप, बिन्दी लगाओ। बिन्दी लगाना सहज होता है। क्वेश्चन-मार्क तो कोई लिख सके वा नहीं। लेकिन यहाँ क्वेश्चन लगाना सभी को आता है। बिन्दी लगाते जाओ तो बिन्दी रूप में स्थित हो सकेंगे। म्युज़ियम या प्रदर्शनी में आप लोग समझाने के बाद फिर क्या करते हो? म्युज़ियम व प्रदर्शनी के पश्चात् क्या करना है वह पर्चा सभी को देते हो। तो बापदादा भी आज पूछते हैं कि आप भट्ठी के पश्चात् क्या करेंगे? यज्ञ के कार्य को कैसे आगे बढ़ायेंगे? अपनी उन्नति का साधन क्या करेंगे? दैवी गुण धारण करना, स्नेही बनना – यह तो करना ही है लेकिन प्रैक्टिकल रूप से क्या देंगे? जैसे आप लोगों ने सुनाया भी कि अपने, बापदादा के, परिवार के स्नेही-सहयोगी बनेंगे। लेकिन वह भी किन-किन बातों में बनना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा के साथ-साथ तन-मन-धन तीनों रूप से अपने को चेन्ज करना है। मददगार और वफादार – जब दोनों बातें होंगी तब बापदादा और परिवार के स्नेही और सहयोगी बन सकेंगे। जो सहयोगी होंगे उनकी परख क्या होगी? वह परिवार और बापदादा के विचारों और जो कर्म होते हैं उनमें एक दो के समीप होंगे। एक दो के मत के समीप आते जायेंगे तो फिर मतभेद खत्म हो जायेगा। एक तो मददगार और वफादार, उसका तरीका भी बताया। दूसरी बात यह है कि जो भी सम्पूर्ण समर्पण होते हैं उनको अपना तन-मन-धन और समय – यह चारों चीजें कहाँ लगानी चाहिए? यह तो जरूर है कि प्रवृत्ति मार्ग तरफ भी ध्यान देना है लेकिन यह जो चारों चीज़ें देते हो उसके लिए आप के मन में जजमेन्ट ठीक है कि हम यथार्थ रीति प्रयोग कर रहे हैं? सम्पूर्ण समर्पण आत्मा को जो सचमुच तन, मन, धन और समय देना चाहिए इस प्रमाण दे रहे हैं? यह पोतामेल भी निकालो कि तन, मन, धन और समय का प्रयोग कहाँ करते हैं? जैसे अपने घर का पोतामेल रखते हो वैसे जो सम्पूर्ण समर्पण हुये हैं उन्हों को यह भी पोतामेल निकालना चाहिए। तन भी कहाँ और कैसे लगाया? यह शार्ट में लिखना है लेकिन स्पष्ट। क्योंकि डिटेल भी होता है परन्तु स्पष्ट नहीं होता। इसलिए शार्ट भी हो और स्पष्ट भी हो। जितना-जितना शार्ट आर स्पष्ट लिख सकेंगे उतना आन्तरिक स्थिति भी स्पष्ट और क्लीयर होगी। संकल्प को शार्ट करेंगे तो समाचार भी शार्ट होगा और पुरुषार्थ की लाइन क्लीयर होगी। तो समाचार भी स्पष्ट होगा। इसमें सारा पोतामेल आ जायेगा। तीसरी बात यह याद रखने की है कि मन्सा, वाचा, कर्मणा जो कुछ भी अब तक पुरुषार्थ की कमी के कारण चलता रहा, उसको बुद्धि से बिल्कुल ही भूल जाओ। जैसा कि अब नया जन्म लिया है। पुरुषार्थ में जो बातें कमजोरी की हैं वह सभी यहाँ ही छोड़कर जानी है। फिर पत्रों में यह नहीं आना चाहिए कि पिछले संस्कारों के कारण यह हो गया। जबकि सम्पूर्ण समर्पण हो गये तो ऐसे ही सोचना कि दान दी हुई चीज है, जिसको अगर फिर स्वीकार करेंगे तो उसका परिणाम क्या होगा! यह स्मृति रखने से चारों बातें चेन्ज हो जायेंगी। मुख से कभी ऐसे बोल नहीं निकलनी चाहिए। समस्यायें सामने क्यों आती हैं क्योंकि ज्ञान की कई बातें उल्टे रूप में अन्दर में धारण कर ली हैं। कोई भूल होगी तो कहेंगे कि सम्पूर्ण तो बने नहीं हैं। अभी तो समय पड़ा है। पुरुषार्थी हैं। पुरुषार्थी को भूलें करने की छुट्टी नहीं है। लेकिन आजकल ऐसे समझ बैठे हैं कि पुरुषार्थी अर्थात् भूलें माफ हैं। ये ऐसा करता है तो हमको करना पड़ता है। यह ज्ञानी के बदले अज्ञानी हो गया। याद क्या रखना है, जो करेगा सो पायेगा। मैं जो करूँगा मुझे देख और करेंगे। उनको देख मुझे नहीं करना है। मैं ऐसा करूँ, जो मुझे देख और भी ऐसा करें। तो यह छोटी-छोटी बातें उल्टे रूप में धारण कर ली हैं। ज्ञान का सही एडवान्टेज जो लेना चाहिए उसके बदले उल्टे रूप से प्रयोग करने से पुरुषार्थ में कमजोरी आती है। ये पुरुषार्थहीन की बातें हैं लेकिन समझते हैं कि यही पुरुषार्थी जीवन है। इसलिए यह तो ज्ञान की पाइन्ट्स अपने पुरुषार्थ की कमी को छिपाने के साधन बनाकर रखे हैं। इन साधनों को मिटाओ। तो सभी समस्यायें आपेही खत्म हो जायेंगी। चार शक्तियों को धारण करना है। है तो एक ही ईश्वरीय शक्ति। लेकिन स्पष्ट करने के लिए कहा जाता है। 1- समेटने की शक्ति अर्थात् शार्ट करने की शक्ति, 2- समाने की शक्ति, 3- सहन करने की शक्ति, 4- सामना करने की शक्ति, लेकिन किसका सामना करना है? बापदादा व दैवी परिवार का नहीं। माया की शक्ति का सामना करने की शक्ति।

यह चारों शक्तियाँ धारण करेंगे तो सम्पूर्ण समर्पण को अविनाशी कायम रख सकेंगे। जैसे कहते हैं ना कि एक तो शार्ट (छोटा) करो और शार्ट (छाँटना) करो। यह करना है, यह सोचना है, यह नहीं, यह बनना है, यह नहीं – शार्ट करते जाओ और जितना हो सके शार्ट करो। जो दस शब्द बोलने हैं, उनको शार्ट कर 2 शब्दों में रहस्य बताओ तो ऐसे शार्ट करते-करते बिल्कुल शार्ट हो जायेगा। ऐसा पुरुषार्थ इस भट्ठी के पश्चात् करना है। एक बात यह भी याद रखना कि जैसे बापदादा ने आप सभी बच्चों को सृष्टि के सामने प्रत्यक्ष किया है तो अब आप बच्चों का भी काम है कि हर कर्तव्य से, हर बात से बापदादा को अनेक आत्माओं के आगे प्रत्यक्ष करना है। वह है आपका कर्तव्य। यह भी अपना चार्ट देखो कि अब तक हमने बाप का संदेश तो दिया लेकिन उस संदेश से आत्माओं के अन्दर बापदादा के स्नेह और सम्बन्ध को प्रत्यक्ष किया? नहीं। तो वह सर्विस क्या रही? अधूरी सर्विस नहीं करनी है। अभी सम्पूर्ण समर्पण हुए हो तो सर्विस भी सम्पूर्ण करनी है। इसलिए हरेक को यह भी चेक करना है कि आज मैंने मन्सा, वाचा, कर्मणा कितनी आत्माओं के अन्दर बापदादा के स्नेह और सम्बन्ध को कहाँ तक प्रत्यक्ष किया है? सिर्फ संदेश देना सर्विस नहीं। संदेश देना अर्थात् उनको अपने सम्बन्धी बनाना। अपना सम्बन्धी बनाना अर्थात् शिववंशी ब्रह्माकुमार ब्रह्मा कुमारी बनाना। यह है अपना सम्बन्धी बनाना। अपना सम्बन्धी तब बनायेंगे जब उनको स्नेही बनायेंगे। स्नेही बनने से सम्बन्धी बन जायेंगे। सिर्फ संदेश देना तो चींटी मार्ग की सर्विस है, यह विहंग मार्ग की सर्विस है। दुनिया के अन्दर यह आवाज फैलाओ कि बापदादा अपने कर्तव्य को कैसे गुप्त वेश में कर रहे हैं। उनको इस स्नेह, सम्बन्ध में लाओ। हैं तो सभी आपके सम्बन्धी ना। तो सम्बन्धियों को अपना सम्बन्ध याद दिलाओ। बिछुड़ी आत्माओं को स्नेही बनाओ। अभी सर्विस का गुप्त रूप चल रहा है, प्रत्यक्ष रूप नहीं चल रहा है। म्युज़ियम में आते हैं, बाहर का प्रत्यक्ष रूप और चीज है। लेकिन सर्विस का रूप अभी गुप्त है। सर्विस का रूप जब प्रत्यक्ष होगा तब प्रत्यक्षता होगी। सर्विस कैसे वृद्धि को पाये उसके लिए नये-नये प्लैन्स भी बनाओ। आवाज कैसे हो। बेधड़क होकर सूचना देने, संदेश देने के लिए जाओ। प्रदर्शनी भी करते जाओ लेकिन बाद में उनको जो कहते हो वह तुम भी करो। आपस में मिलकर सोचो – दुनियाँ को यह कैसे मालूम हो कि अभी समय क्या है और कर्तव्य क्या हो रहा है? किसी भी रीति आवाज पहुँच जाये। पेपर द्वारा सर्विस होनी चाहिए, वह हुई नहीं हैं। एक संगठन के रूप में, एक दो को समझ, सहयोगी बन बेहद की सर्विस में बेहद का रूप लाना है।

इस ग्रुप में इमर्ज रूप में सभी को यह उमंग है कि जैसे बापदादा चाहते हैं वैसे ही हम 100 प्रतिशत करके दिखायेंगे। जैसे यह इमर्ज रूप में है, पूरा हो जायेगा। सभी के मन में जो है कि टोटली लौकिक कार्य से सभी सरेन्डर हो जायें, वह दिन भी नज़दीक है। लेकिन वह तब होगा जब मन से सरेन्डर होंगे। फिर लौकिक कार्य से सरेन्डर होने में देरी नहीं लगेगी। इस बारी मन से सरेन्डर हो जाओ। जिसकी रिजल्ट अच्छी देखेंगे उस अनुसार नम्बर देंगे। भट्ठी का प्रोग्राम भल हो न हो लेकिन मधुबन तो है ही भट्ठी। मधुबन आते रहेंगे और अपना अमर बनने का सबूत देते रहेंगे। सभी से बड़ा सरेन्डर होना है – संकल्पों में। कोई व्यर्थ संकल्प न आये। इन संकल्पों के कारण ही समय और शक्ति वेस्ट होती है। तो संकल्प से भी सम्पूर्ण समर्पण होना है। मन के उमंगों को अब प्रैक्टिकल में लाना है।

“लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने की युक्तियां”

 अध्याय 1 — सम्पूर्ण समर्पण का वास्तविक अर्थ

सम्पूर्ण समर्पण केवल बाहरी त्याग नहीं है। मुरली में बताया गया है कि सम्पूर्ण समर्पण की निशानी है—दृष्टि और वृत्ति में रूहानियत आना।

जब हम शरीर के बजाय आत्मा को देखने का अभ्यास करते हैं, तब दृष्टि शुद्ध होती है और दृष्टि शुद्ध होने से वृत्ति भी शुद्ध होती जाती है।

उदाहरण:
किसी व्यक्ति से बातचीत करते समय केवल उसके व्यवहार या शरीर को न देखकर यह स्मृति रखें—“यह भी एक आत्मा है।”


 अध्याय 2 — लौकिक जीवन में अलौकिक स्मृति

दफ्तर, व्यापार, परिवार, भोजन और दैनिक कार्य—इन सभी लौकिक कार्यों को करते हुए बुद्धि को अलौकिक कार्य से जोड़ना है।

उदाहरण:
पाँव लौकिक कार्य के लिए चल रहे हैं, लेकिन बुद्धि याद की यात्रा में रहे।
शरीर को भोजन देते समय आत्मा को भी याद का भोजन और शक्ति का बल देते रहें।

यही लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने की कला है।


 अध्याय 3 — पहले स्वयं को परिवर्तन करो

दुनिया को बदलने या दूसरों में परिवर्तन देखने से पहले अपनी दृष्टि, वृत्ति, स्मृति, सम्पत्ति और समय को परिवर्तन में लाना है।

मुरली का विशेष संदेश है कि केवल देह के सम्बन्धों से न्यारा होने की कोशिश पर्याप्त नहीं है। पहले देह-अभिमान से न्यारा बनना है।

उदाहरण:
यदि कोई हमारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं करता, तो प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले अपनी वृत्ति को चेक करें—
“मेरी स्थिति कैसी है? क्या मैं आत्मिक स्थिति में हूँ?”


 अध्याय 4 — मन्सा, वाचा और कर्मणा का सम्पूर्ण समर्पण

सम्पूर्ण समर्पण को अविनाशी बनाने के लिए तीनों स्तरों पर परिवर्तन आवश्यक है।

1️⃣ मन्सा — मन

देह सहित सभी सम्बन्धों के मोह से ऊपर उठकर एक बाप की याद में रहना।

2️⃣ वाचा — वाणी

मुख से ज्ञान के रत्न निकलें। किसी को पत्थर न दें, बल्कि ज्ञान और शुभ भावना का दान दें।

3️⃣ कर्मणा — कर्म

स्मृति रखें—
“जो मैं करूँगा, मुझे देखकर और भी करेंगे।”

इसलिए हर कर्म ऐसा हो जो दूसरों के लिए उदाहरण बने।


 अध्याय 5 — सम्पूर्ण समर्पण को अविनाशी कैसे रखें?

केवल एक समय का उमंग पर्याप्त नहीं है। सम्पूर्ण समर्पण की स्मृति को अविनाशी बनाना है।

बीती हुई बातों को बार-बार सोचकर स्वयं को कमजोर नहीं करना। बीती बातों से शिक्षा लेकर आगे सावधान रहना है।

विशेष अभ्यास:

“ऐसा क्यों हुआ?”
“अब कैसे होगा?”
“क्या मैं कर पाऊँगा?”

इसके बजाय Question Mark (?) को Full Stop (.) में बदलना है और बिन्दी स्वरूप में स्थित होना है।

उदाहरण:
समस्या आने पर बार-बार सोचने के बजाय—
“मैं आत्मा हूँ, बिन्दी स्वरूप हूँ, बाबा का साथ है।”


 अध्याय 6 — चार शक्तियां धारण करो

सम्पूर्ण समर्पण को कायम रखने के लिए चार शक्तियों का विशेष अभ्यास बताया गया है:

 1. समेटने की शक्ति

विस्तार को समेटकर सार में स्थित होना।

 2. समाने की शक्ति

ज्ञान और शक्तियों को जीवन में धारण करना।

 3. सहन करने की शक्ति

परिस्थितियों और संस्कारों के प्रभाव में न आना।

 4. सामना करने की शक्ति

बापदादा या दैवी परिवार का सामना नहीं, बल्कि माया की शक्ति का सामना करना।


 अध्याय 7 — सेवा केवल संदेश देना नहीं

सिर्फ संदेश देना सम्पूर्ण सेवा नहीं है। वास्तविक सेवा है—आत्माओं को बापदादा के स्नेह और सम्बन्ध का अनुभव कराना।

किसी आत्मा को केवल ज्ञान की बातें सुनाने के बजाय उसे परमात्म-स्नेह का अनुभव कराना, सम्बन्ध से जोड़ना और स्नेही बनाना ही सेवा की गहराई है।

उदाहरण:
किसी को राजयोग की जानकारी देने के साथ-साथ अपने व्यवहार से शान्ति, प्रेम और सहयोग का अनुभव कराना।


 अध्याय 8 — तन, मन, धन और समय का पोतामेल

सम्पूर्ण समर्पण के बाद स्वयं का चार्ट चेक करना है:

  • मेरा तन कहाँ लग रहा है?
  • मेरा मन कहाँ लगा हुआ है?
  • मेरा धन कहाँ प्रयोग हो रहा है?
  • मेरा समय कहाँ जा रहा है?

जैसे घर का हिसाब रखते हैं, वैसे ही अपने आध्यात्मिक जीवन का भी पोतामेल निकालना है।

अभ्यास:
रात को कुछ मिनट स्वयं से पूछें—
“आज मैंने अपने तन, मन, धन और समय का कितना श्रेष्ठ प्रयोग किया?”


 अध्याय 9 — पुरानी कमजोरियों को पीछे छोड़ो

यदि सम्पूर्ण समर्पण किया है तो पुराने संस्कारों और कमजोरियों को बार-बार अपनी पहचान न बनायें।

मुरली की प्रेरणा है कि ऐसा समझें जैसे नया जन्म लिया है।

“पिछले संस्कारों के कारण ऐसा हो गया” कहकर कमजोरी को उचित ठहराने के बजाय, नई स्मृति और नई शक्ति के साथ आगे बढ़ना है।


 अध्याय 10 — भट्ठी के बाद का पुरुषार्थ

भट्ठी या आध्यात्मिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वास्तविक परीक्षा शुरू होती है—क्या सीखा हुआ जीवन में आया?

दैवी गुण धारण करना, स्नेही और सहयोगी बनना तथा यज्ञ-सेवा में तन-मन-धन-समय लगाना ही व्यावहारिक परिणाम है।

दैनिक चेकिंग:

आज मेरे संकल्प कितने शुद्ध थे?
मेरी वाणी में कितने ज्ञान-रत्न थे?
मेरे कर्म दूसरों के लिए कितने प्रेरणादायक थे?


 लौकिक में रहते हुए अलौकिक स्मृति रखनी है।
स्वयं को और दूसरों को आत्मा रूप में देखने का अभ्यास करना है।
पहले स्वयं को परिवर्तन करो, फिर दुनिया पर प्रभाव पड़ेगा।
मन्सा-वाचा-कर्मणा में सम्पूर्ण समर्पण लाना है।
Question Mark को Full Stop में बदलना है।
चार शक्तियां—समेटने, समाने, सहन करने और सामना करने की शक्ति—धारण करनी हैं।
तन, मन, धन और समय का पोतामेल निकालना है।
केवल संदेश देना नहीं, आत्माओं को बापदादा के स्नेह और सम्बन्ध का अनुभव कराना है।
व्यर्थ संकल्पों से समय और शक्ति को व्यर्थ नहीं करना है।
सम्पूर्ण समर्पण को केवल भावना नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल जीवन बनाना है। आज का अभ्यास

“मैं आत्मा हूँ।
मैं रूहानी दृष्टि और रूहानी वृत्ति वाला हूँ।
लौकिक कार्य करते हुए भी मेरी बुद्धि अलौकिक कार्य में लगी है।
मेरे मन्सा, वाचा और कर्मणा श्रेष्ठ हों—यही मेरा सम्पूर्ण समर्पण है।”

“लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने की युक्तियां”

📖 अव्यक्त मुरली — 28 नवम्बर 1969

1. सम्पूर्ण समर्पण होने पर दृष्टि और वृत्ति कैसी हो जाती है?

उत्तर: दृष्टि और वृत्ति में रूहानियत आ जाती है, अर्थात् दृष्टि और वृत्ति रूहानी हो जाती है।

2. रूहानी दृष्टि का अर्थ क्या है?

उत्तर: स्वयं को और दूसरों को भी शरीर नहीं, बल्कि रूह अर्थात् आत्मा के रूप में देखना।

3. लौकिक चीजों को अलौकिक बनाने की युक्ति क्या है?

उत्तर: लौकिक कार्य करते हुए भी बुद्धि को अलौकिक देश और कल्याण के कार्य से जोड़े रखना।

4. शरीर को भोजन देते समय आत्मा को कौन-सा भोजन देना चाहिए?

उत्तर: आत्मा को याद और शक्ति का बल देना चाहिए।

5. दुनिया को प्रिय बनने के लिए पहले किस परिवर्तन की आवश्यकता है?

उत्तर: पहले अपने शरीर से न्यारे, अर्थात् देह-अभिमान से न्यारे बनना है।

6. सम्पूर्ण समर्पण के लिए मन्सा में कौन-सी शिक्षा है?

उत्तर: देह सहित सभी सम्बन्धों का त्याग करके मामेकम् याद करो

7. वाचा के लिए क्या शिक्षा दी गई है?

उत्तर: मुख से ज्ञान के रत्न निकलें; एक-दूसरे को पत्थर नहीं, बल्कि ज्ञान रत्नों का दान देना है।

8. कर्मणा के लिए कौन-सी स्मृति रखनी है?

उत्तर: “जो कर्म मैं करूँगा, मुझे देख सभी करेंगे।”

9. बीती हुई बातों के बारे में क्या करना चाहिए?

उत्तर: बीती सो बीती। उससे शिक्षा लेकर आगे के लिए सावधान रहना है, लेकिन बार-बार उसका चिन्तन नहीं करना है।

10. Question Mark को किसमें परिवर्तन करना है?

उत्तर: Question Mark (?) को Full Stop (.) अर्थात् बिन्दी में परिवर्तन करना है।

11. सम्पूर्ण समर्पण को अविनाशी बनाने के लिए कितनी शक्तियां धारण करनी हैं?

उत्तर: चार शक्तियां—समेटने, समाने, सहन करने और सामना करने की शक्ति।

12. सामना करने की शक्ति किसका सामना करने के लिए है?

उत्तर: माया की शक्ति का सामना करने के लिए।

13. सम्पूर्ण समर्पण के बाद तन, मन, धन और समय का क्या करना है?

उत्तर: इन चारों का श्रेष्ठ और यथार्थ रीति से प्रयोग करना है तथा उसका पोतामेल निकालना है।

14. सेवा को सम्पूर्ण बनाने के लिए केवल क्या करना पर्याप्त नहीं है?

उत्तर: केवल संदेश देना पर्याप्त नहीं है।

15. सम्पूर्ण सेवा का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

उत्तर: आत्माओं के अन्दर बापदादा के स्नेह और सम्बन्ध को प्रत्यक्ष करना

16. किसी आत्मा को अपना सम्बन्धी कब बनाया जा सकता है?

उत्तर: जब उसे स्नेही बनाया जाए; स्नेही बनने से वह सम्बन्धी बन जाएगी।

17. पुरुषार्थ में अपनी पुरानी कमजोरियों के बारे में क्या स्मृति रखनी है?

उत्तर: उन्हें ऐसे छोड़ना है जैसे नया जन्म लिया है; पुरानी कमजोरियों को आगे नहीं ले जाना है।

18. ज्ञान की पाइन्ट्स का गलत प्रयोग करने से क्या होता है?

उत्तर: ज्ञान की बातों को अपनी पुरुषार्थ की कमी छिपाने का साधन बनाने से पुरुषार्थ में कमजोरी आती है।

19. सम्पूर्ण समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?

उत्तर: केवल विचार या भावना नहीं, बल्कि मन के उमंगों को प्रैक्टिकल जीवन में लाना

20. भट्ठी के पश्चात् मुख्य पुरुषार्थ क्या करना है?

उत्तर: संकल्पों में सम्पूर्ण समर्पण करना है, व्यर्थ संकल्पों को समाप्त करना है और मन के उमंगों को प्रैक्टिकल में लाना है।

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