(77)गीता में अहिंसक युध्द विकारों से असली धर्मयुध्द
करुणा का जीवन में स्थान | गीता और मुरली से सीखें सच्ची दैवी वृत्ति | Q&A स्पीच
भाषण रूपरेखा (Speech with Main Headings)
1. प्रस्तावना
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गीता और ब्रह्माकुमारीज मुरली में करुणा को सर्वोच्च दैवी गुण बताया गया है।
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इसमें दया, क्षमा, अद्वेष, निराभिमानता और सहनशीलता जैसे सभी गुण समाहित हैं।
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करुणा का स्थायी भाव केवल योगयुक्त आत्मा में ही संभव है क्योंकि वही आत्मा परमात्मा से आनंद, शांति और शक्ति का अनुभव करती है।
2. करुणा को दैवी गुण क्यों कहा गया है?
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करुणा दैवी गुणों का सार है क्योंकि इसमें दया, क्षमा, सेवा, त्याग, तपस्या और प्रेम सभी समाहित हैं।
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यह आत्मा को दूसरों के दुख को दूर करने की प्रेरणा देती है।
उदाहरण:
जैसे एक घायल व्यक्ति को देखकर स्वाभाविक रूप से मदद का भाव उत्पन्न होता है, वैसे ही करुणाशील आत्मा विकारों में फंसी आत्माओं को ज्ञान और योग का मार्ग दिखाने का संकल्प करती है।
3. करुणा और योग का आपस में संबंध
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योग के बिना करुणा स्थायी नहीं रह सकती।
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योगयुक्त आत्मा परमात्मा से शक्ति और प्रेम प्राप्त करती है।
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वही शक्ति और प्रेम करुणा के रूप में दूसरों तक पहुँचता है।
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जो आत्मा स्वयं दुखी है, वह दूसरों को कैसे सहायता कर सकती है?
4. करुणाशील व्यक्ति की मुख्य विशेषताएँ
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ज्ञानवान और योगयुक्त – आत्मा और परमात्मा का ज्ञान रखता है।
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महादानी और वरदानी – अपने शब्दों और आशीर्वादों से पवित्रता की प्रेरणा देता है।
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सेवाभावी – आत्माओं को दुख-सागर से निकालने के लिए तत्पर रहता है।
5. मुरली में करुणा के बारे में क्या कहा गया है?
साकार मुरली – 25 जुलाई 2025
“बच्चे, करुणाशील वही बन सकते हैं जिनकी बुद्धि योगयुक्त है। योग से शक्ति पाकर ही सेवा कर सकते हो। करुणा में दया, क्षमा, प्रेम, सेवा – सब समाए हुए हैं।”
6. जीवन में करुणा को कैसे विकसित करें?
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प्रतिदिन योगाभ्यास कर आत्मा को शक्ति, शांति और प्रेम से भरें।
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केवल भावुक न हों, बल्कि ज्ञान का मार्ग दिखाएँ।
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विचार, वचन और कर्म में दया और क्षमा को स्थान दें।
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सेवा और तपस्या को जीवन का अंग बनाएँ।
7. निष्कर्ष
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करुणा केवल एक भाव नहीं, बल्कि दैवी आचरण की श्रेष्ठता का प्रतीक है।
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जब हर आत्मा करुणाशील बनेगी, तब ही सुख-शांति और स्वर्णिम युग की स्थापना संभव होगी।
करुणा का जीवन में स्थान | गीता और मुरली से सीखें सच्ची दैवी वृत्ति
प्रस्तावना
गीता और ब्रह्माकुमारीज मुरली में करुणा को दैवी गुण बताया गया है। इसमें दया, क्षमा, अद्वेष, निराभिमानता और सहनशीलता जैसे कई उच्च गुण समाए हुए हैं। लेकिन करुणा का स्थायी भाव केवल योगयुक्त आत्मा में ही संभव है क्योंकि वही आत्मा परमात्मा से आनंद, शांति और शक्ति का अनुभव करती है।
प्रश्न 1: करुणा को दैवी गुण क्यों कहा गया है?
करुणा दैवी गुणों का सार है क्योंकि इसमें दया, क्षमा, सेवा, त्याग, तपस्या और प्रेम सभी समाहित हैं। यह आत्मा को दूसरों के दुख को दूर करने की प्रेरणा देती है।
उदाहरण:
जैसे एक घायल व्यक्ति को देखकर स्वाभाविक रूप से मदद का भाव उत्पन्न होता है, वैसे ही करुणाशील आत्मा विकारों में फंसी आत्माओं को ज्ञान और योग का मार्ग दिखाने का संकल्प करती है।
प्रश्न 2: करुणा और योग का आपस में क्या संबंध है?
योग के बिना करुणा स्थायी नहीं रह सकती। योगयुक्त आत्मा परमात्मा से शक्ति और प्रेम प्राप्त करती है और वही करुणा के रूप में दूसरों तक पहुँचाती है।
प्रश्न 3: करुणाशील व्यक्ति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
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ज्ञानवान और योगयुक्त
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महादानी और वरदानी
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सेवाभावी
प्रश्न 4: मुरली में करुणा के बारे में क्या कहा गया है?
साकार मुरली – 25 जुलाई 2025
“बच्चे, करुणाशील वही बन सकते हैं जिनकी बुद्धि योगयुक्त है। योग से शक्ति पाकर ही सेवा कर सकते हो। करुणा में दया, क्षमा, प्रेम, सेवा – सब समाए हुए हैं।”
प्रश्न 5: जीवन में करुणा को कैसे विकसित करें?
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प्रतिदिन योगाभ्यास कर आत्मा को शक्ति, शांति और प्रेम से भरें।
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दूसरों के दुख को देखकर भावुक होने के बजाय उन्हें ज्ञान का मार्ग दिखाएँ।
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विचार, वचन और कर्म में दया और क्षमा को स्थान दें।
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सेवा और तपस्या को जीवन का अंग बनाएँ।
निष्कर्ष
करुणा केवल एक भाव नहीं, बल्कि दैवी आचरण की श्रेष्ठता का प्रतीक है। जब हर आत्मा करुणाशील बनेगी, तब ही सुख-शांति और स्वर्णिम युग की स्थापना संभव होगी।
Disclaimer
इस वीडियो में प्रस्तुत सभी विचार, व्याख्याएँ और उदाहरण ब्रह्माकुमारीज के आध्यात्मिक ज्ञान एवं गीता की शिक्षाओं पर आधारित हैं। यह सामग्री केवल आध्यात्मिक समझ और आत्मिक उत्थान के उद्देश्य से है। किसी भी प्रकार की धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत मान्यताओं को आहत करना इसका उद्देश्य नहीं है।
वीडियो में संदर्भित मुरली पॉइंट्स आधिकारिक ब्रह्माकुमारीज स्रोतों से लिए गए हैं।
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