(52)The need to understand the knowledge of Gita properly – 16

(52)गीता के ज्ञान को ठीक से समझने की आवश्यकता-16

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( प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

गीता का सच्चा ज्ञानदाता कौन? | अध्याय 16: दैवी और आसुरी संपत्ति की पहचान | 


गीता – एक दिव्य संवाद, न कि केवल ग्रंथ
भगवद गीता को अक्सर केवल धार्मिक ग्रंथ मान लिया जाता है। परंतु यह एक ऐसा दिव्य संवाद है, जिसमें आत्मा और परमात्मा आमने-सामने होते हैं।
पर सबसे बड़ा प्रश्न है — उस संवाद का वक्ता कौन है?
क्या वह श्रीकृष्ण हैं, या कोई और?
आज हम गीता के अध्याय 16 — दैवासुर सम्पद विभाग योग को समझकर इस रहस्य को हल करेंगे, और ब्रह्मा बाबा के माध्यम से बोले गए मुरली वाक्यों से इसका गूढ़ समाधान पाएँगे।


 1. अध्याय का परिचय: दैवी और आसुरी गुणों का भेद

गीता अध्याय 16 हमें दो प्रकार की संपत्ति सिखाता है –

  • दैवी संपत्ति: जैसे निर्भयता, आत्म-शुद्धता, तपस्या, दया, क्षमा आदि।

  • आसुरी संपत्ति: जैसे अहंकार, क्रोध, छल, कटुता आदि।

अंतिम श्लोक:
“दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः।”
(इस प्रकार दैवी और आसुरी गुणों का विभाग योग समाप्त हुआ।)

 परंतु यह विवेक हमें कब आता है?
जब सच्चा ज्ञानदाता हमें भीतर से जगाता है।


 2. गीता ज्ञानदाता: श्रीकृष्ण या परमात्मा?

18 जनवरी 2025 की मुरली में परमात्मा कहते हैं:

“बच्चे, श्रीकृष्ण तो देवता है, लेकिन गीता ज्ञानदाता मैं परमपिता परमात्मा हूँ। मैं ब्रह्मा तन में प्रवेश करके तुम आत्माओं को ज्ञान सिखाता हूँ।”

 इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि:

  • श्रीकृष्ण सतयुग में जन्म लेने वाला देवता है।

  • गीता का ज्ञान संगमयुग पर दिया गया, जब परमात्मा शिव ब्रह्मा तन में प्रवेश करते हैं।

  • इसलिए सच्चा ज्ञानदाता शिव परमात्मा हैं, न कि कोई मनुष्य या देवता।


 3. मुरली की पुष्टि: श्रीकृष्ण नहीं, शिवबाबा ज्ञानदाता

श्रीकृष्ण द्वापर युग में जन्मते हैं।
जबकि गीता का ज्ञान यथार्थ में संगमयुग का है — जब आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।

मुरली में बार-बार कहा गया है:

“मैं गीता ज्ञानदाता हूँ, श्रीकृष्ण नहीं।”
“श्रीकृष्ण तो बालक रूप है, गीता ज्ञान श्रीकृष्ण ने नहीं दिया।”

इसलिए गीता के ज्ञानदाता हैं शिवबाबा, जो हमें पावन बनाते हैं।


 4. दैवी गुणों की उत्पत्ति – योग द्वारा

गीता कहती है:

“अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञान योगव्यवस्थितिः…”
(दैवी गुण: निर्भयता, आत्म-शुद्धि, योग में स्थिति…)

मुरली में शिवबाबा समझाते हैं:

“बच्चे, जब आत्मा परमात्मा से योग लगाती है, तभी दैवी गुण उत्पन्न होते हैं।”

 दैवी गुण ज्ञान और योग से आते हैं, न कि किसी कर्मकांड या पूजा से।
आसुरी संस्कारों को समाप्त कर दैवी स्वरूप बनना ही इस अध्याय का सार है।


 5. निष्कर्ष: गीता का रहस्य – मुरली से स्पष्ट

गीता का हर अध्याय सिर्फ श्लोक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शन है।
अध्याय 16 में जो दैवी गुण गिनाए गए हैं — वे तभी संभव हैं जब:

  • आत्मा परमात्मा से जुड़ती है।

  • मुरली ज्ञान और श्रीमत के अनुसार जीवन बनता है।

 इसलिए गीता को सही तरह समझने के लिए हमें मुरली के महावाक्यों को सुनना और आत्मसात करना होगा।
तभी दैवीगुण हमारे स्वभाव में उतरेंगे, और हम सच्चे अर्थों में देवता बन सकेंगे।

गीता का सच्चा ज्ञानदाता कौन? | अध्याय 16: दैवी और आसुरी संपत्ति की पहचान | 


 प्रश्न 1: गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ क्यों नहीं कहा जा सकता?

उत्तर:क्योंकि गीता केवल धर्म या कर्मकांड की पुस्तक नहीं है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के बीच हुआ एक दिव्य संवाद है। इसमें ब्रह्मविद्या और आत्मज्ञान समाहित है। यह ग्रंथ आत्मा को जाग्रत कर परमात्मा से मिलन कराता है।


 प्रश्न 2: गीता अध्याय 16 में कौन-कौन से गुणों की चर्चा है?

उत्तर:अध्याय 16 — दैवासुर सम्पद विभाग योग में दो प्रकार के गुण बताए गए हैं:

  • दैवी गुण: जैसे निर्भयता, सत्यता, आत्म-शुद्धता, दया, क्षमा, तप, संतोष आदि।

  • आसुरी गुण: जैसे अहंकार, क्रोध, लोभ, कटुता, द्वेष, कपट आदि।

इन गुणों का विवेक आत्मा में तब आता है जब वह सच्चे ज्ञानदाता से जुड़ती है।


प्रश्न 3: क्या श्रीकृष्ण गीता के सच्चे वक्ता हैं?

उत्तर:नहीं। श्रीकृष्ण एक पावन देवता आत्मा हैं, जो सतयुग में जन्म लेते हैं।
परंतु गीता का ज्ञान संगमयुग पर दिया जाता है, जब परमात्मा शिव ब्रह्मा के तन में प्रवेश कर आत्माओं को ब्रह्मज्ञान देते हैं।
मुरली (18 जनवरी 2025) में परमात्मा स्पष्ट कहते हैं:

“बच्चे, श्रीकृष्ण तो देवता है, गीता ज्ञानदाता मैं परमपिता परमात्मा हूँ।”


 प्रश्न 4: मुरली में बार-बार शिवबाबा को ही गीता ज्ञानदाता क्यों कहा गया है?

उत्तर:क्योंकि मुरली, परमात्मा शिव की वह वाणी है, जो संगमयुग पर ब्रह्मा के मुख से बोली जाती है।
श्रीकृष्ण तो द्वापर युग में आते हैं और स्वयं ज्ञान के फल हैं, न कि वक्ता।
मुरली वचन:

“मैं गीता ज्ञानदाता हूँ, श्रीकृष्ण नहीं।”


 प्रश्न 5: गीता के अनुसार दैवी गुण आत्मा में कैसे आते हैं?

उत्तर:गीता में श्लोक आता है:

“अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञान योगव्यवस्थितिः…”
अर्थात: निर्भयता और आत्मशुद्धि तब आती है जब आत्मा ज्ञान और योग में स्थित होती है।

 मुरली में भी शिवबाबा कहते हैं:

“बच्चे, जब आत्मा परमात्मा से योग लगाती है, तभी दैवी गुण उत्पन्न होते हैं।”


 प्रश्न 6: क्या पूजा, व्रत या कर्मकांड से दैवी गुण प्राप्त हो सकते हैं?

उत्तर:नहीं। दैवी गुण सच्चे ज्ञान और योगबल से ही आते हैं।
कर्मकांड या बाह्य पूजा आत्मा की स्थिति नहीं बदलती।
परंतु जब आत्मा परमात्मा शिव से साक्षात्कार कर श्रीमत के अनुसार जीवन जीती है, तभी उसमें दैवी स्वरूप जाग्रत होता है।


 प्रश्न 7: गीता और मुरली में क्या संबंध है?

उत्तर:गीता उस ज्ञान की स्मृति है, जो परमात्मा शिव ने संगमयुग पर दिया।
मुरली उसी ज्ञान का जीवंत रूप है, जो आज भी ब्रह्मा के मुख से प्रतिदिन सुनाया जाता है।
 इसलिए गीता और मुरली दोनों के ज्ञानदाता एक ही हैं — परमपिता परमात्मा शिव।


 प्रश्न 8: गीता अध्याय 16 का आत्मिक संदेश क्या है?

उत्तर:अध्याय 16 आत्मा को यह पहचान देता है कि वह किन गुणों से देवता बन सकती है, और किन से वह आसुरी प्रवृत्ति में गिरती है।
सत्य ज्ञान और योग के बल से आत्मा इन गुणों को धारण करती है — और यही संगमयुग की पढ़ाई का सार है।


निष्कर्ष:

  • गीता का ज्ञानदाता श्रीकृष्ण नहीं, परमात्मा शिव हैं।

  • गीता का यथार्थ अर्थ केवल मुरली से ही समझा जा सकता है।

  • दैवी गुण आत्मा में योग और ज्ञान से आते हैं — कर्मकांड से नहीं।

  • आज भी वही दिव्य ज्ञान, मुरली रूप में, ब्रह्मा के मुख द्वारा हमें मिल रहा है।

Disclaimer (डिस्क्लेमर):

इस वीडियो का उद्देश्य धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गीता और मुरली ज्ञान के आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करना है। यह किसी देवी-देवता या धार्मिक संस्था के प्रति विरोध नहीं है। प्रस्तुत विचार ब्रह्माकुमारी संस्था में प्रचलित मुरली महावाक्यों पर आधारित हैं। कृपया इस ज्ञान को खुले मन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सुनें।

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