Avyakt Murli-(19)30-03-1983

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अव्यक्त मुरली-(19)“सर्व वरदान आपका जन्म-सिद्ध अधिकार”05-04-1983

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

05-04-1983 “सर्व वरदान आपका जन्म-सिद्ध अधिकार”

बापदादा, बाप और बच्चों का मेला देख हर्षित हो रहे हैं। द्वापर से जो भी मेले विशेष रूप में होते हैं, कोई न कोई नदी के किनारे पर होते हैं वा कोई देवी वा देवता की मूर्ति के उपलक्ष्य में होते हैं। एक ही शिवरात्रि बाप की यादगार में मनाते हैं। लेकिन परिचय नहीं। द्वापर के मेले भक्तों और देवियों वा देवताओं के होते हैं। लेकिन यह मेला महानदी और सागर के कण्ठे पर बाप और बच्चों का होता है। ऐसा मेला सारे कल्प में हो नहीं सकता। मधुबन में डबल मेला देखते हो। एक बाप और दादा महानदी और सागर का मेला देखते। साथ-साथ बापदादा और बच्चों का मेला देखते। तो मेला तो मना लिया ना! यह मेला वृद्धि को पाता ही रहेगा। एक तरफ सेवा करते हो कि वृद्धि को पाते रहें। तो वृद्धि को प्राप्त होना ही है और मेला भी मनाना ही है।

बापदादा आपस में रूहरिहान कर रहे थे। ब्रह्मा बोले – ब्राह्मणों की वृद्धि तो यज्ञ समाप्ति तक होनी है। लेकिन साकारी सृष्टि में साकारी रूप से मिलन मेला मनाने की विधि, वृद्धि के साथ-साथ परिवर्तन तो होगी ना! लोन ली हुई वस्तु और अपनी वस्तु में अन्तर तो होता ही है। अपनी वस्तु को जैसे चाहे वैसे कार्य में लगाया जाता है। और लोन भी साकार शरीर अन्तिम जन्म का शरीर है। लोन ली हुई पुरानी वस्तु को चलाने की विधि भी देखनी होगी ना। तो शिव बाप मुस्कराते हुए बोले कि तीन सम्बन्धों से तीन रीति की विधि वृद्धि प्रमाण परिवर्तन हो ही जायेगा। वह क्या होगा?

बाप रूप से विशेष अधिकार है मिलन की विशेष टोली और शिक्षक के रूप में मुरली। सतगुरू के रूप में नज़र से निहाल अर्थात् अव्यक्त मिलन की रूहानी स्नेह की दृष्टि। इसी विधि के प्रमाण वृद्धि को प्राप्त होने वाले बच्चों का स्वागत और मिलन मेला चलता रहेगा। सभी को संकल्प होता है कि हमें कोई वरदान मिले। बापदादा बोले जब हैं ही वरदाता के बच्चे तो सर्व वरदान तो आपका जन्म-सिद्ध अधिकार है। अभी तो क्या लेकिन जन्मते ही वरदाता ने वरदान दे दिये। विधाता ने भाग्य की अविनाशी लकीर जन्मपत्री में नूँध दी। लौकिक में भी जन्मपत्री नाम संस्कार के पहले बना देते हैं। भाग्य विधाता बाप ने, वरदाता बाप ने, ब्रह्मा माँ ने जन्मते ही ब्रह्माकुमार वा कुमारी के नाम संस्कार के पहले सर्व वरदानों और अविनाशी भाग्य की लकीर स्वयं खींच ली। जन्मपत्री बना दी। तो सदा के वरदानी तो हो ही। स्मृति-स्वरूप बच्चों को तो सदा सर्व वरदान प्राप्त ही हैं। प्राप्ति स्वरूप बच्चे हो। अप्राप्ति है क्या जो प्राप्ति करनी पड़े। तो ऐसी रूह-रिहान आज बापदादा की चली। यह हॉल बनाया ही क्यों है! तीन हजार, चार हजार ब्राह्मण आवें। मेला बढ़ता जाए। तो खूब वृद्धि को पाते रहो। मुरली बात करना नहीं है क्या! हाँ नज़र पड़नी चाहिए, यह सब बातें तो पूर्ण हो ही जायेंगी।

अभी तो आबू तक लाइन लगानी है ना। इतनी वृद्धि तो करनी है ना वा समझते हो हम थोड़े ही अच्छे हैं! सेवाधारी सदा स्वयं का त्याग कर दूसरे की सेवा में हर्षित होते हैं। मातायें तो सेवा की अनुभवी हैं ना! अपनी नींद भी त्याग करेंगी और बच्चे को गोदी के झूले में झुलायेंगी। आप लोगों द्वारा जो वृद्धि को प्राप्त होंगे उन्हों को भी तो हिस्सा दिलावेंगे ना। अच्छा।

इस बारी तो बापदादा ने भी सब भारत के बच्चों का उल्हना मिटाया है। जहाँ तक लोन का शरीर निमित्त बन सकते वहाँ तक इस बारी तो उल्हना पूरा कर ही रहे हैं। अच्छा।

सब रूहानी स्नेह को, रूहानी मिलन को अनुभव करने वाले, जन्म से सर्व वरदानों से सम्पन्न अविनाशी श्रेष्ठ भाग्यवान, ऐसे सदा महात्यागी, त्याग द्वारा भाग्य पाने वाले ऐसे पद्मापद्म भाग्यवान बच्चों को, चारों ओर के स्नेह के चात्रक बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

प्रस्तावना

ओम् शान्ति।
आज का विषय है — “सर्व वरदान आपका जन्म-सिद्ध अधिकार”
बापदादा बच्चों के संगमयुग के इस अद्भुत मेले में हर्षित हैं। यह मेला कोई साधारण मेला नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का सच्चा संगम है।


 मेला: महानदी और सागर का संगम

  • द्वापर से लेकर अब तक मेलों की परंपरा रही है, परंतु वह केवल देवताओं और मूर्तियों तक सीमित थी।

  • यह मेला अद्वितीय है क्योंकि इसमें बाप और बच्चों का प्रत्यक्ष मिलन है।

  • मधुबन में डबल मेला चलता है—

    • बाप और दादा का मिलन।

    • बापदादा और बच्चों का मिलन।


 लोन का शरीर और अपनी वस्तु का अन्तर

  • यह शरीर केवल लोन लिया हुआ साधन है।

  • लोन की वस्तु सीमित होती है, परंतु आत्मा की पहचान असीमित है।

  • शिवबाप बताते हैं कि आत्मा तीन सम्बन्धों से शक्ति प्राप्त करती है:

    1. बाप रूप से—मिलन का अधिकार।

    2. शिक्षक रूप से—मुरली का अधिकार।

    3. सतगुरू रूप से—नज़र और स्नेह का अधिकार।


 सर्व वरदान: जन्म-सिद्ध अधिकार

  • हर आत्मा को जन्मते ही वरदाता बाप से सर्व वरदान मिल चुके हैं।

  • जैसे लौकिक में जन्मपत्री बनाई जाती है, वैसे ही परमात्मा ने आत्मा की भाग्यपत्री पहले ही लिख दी है।

  • हमें कुछ पाना नहीं है—स्मृति स्वरूप बनना है कि हम पहले से ही वरदानी आत्माएँ हैं।


 सेवाधारी आत्माओं का कर्तव्य

  • सेवाधारी वही है जो स्वयं का त्याग कर दूसरों की सेवा में हर्षित रहे

  • माताएँ इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं—अपनी नींद छोड़कर बच्चे की सेवा करना।

  • सेवा के द्वारा ही यज्ञ की वृद्धि और आत्माओं का कल्याण संभव है।


 विशेष संदेश

  • बापदादा ने इस बार सब बच्चों का उल्हना मिटा दिया है।

  • जहाँ तक सम्भव था, लोन के शरीर के द्वारा बच्चों को साक्षात्कार और मिलन का अनुभव कराया।

  • अब बच्चों का कर्तव्य है—वृद्धि करते जाना, मेले को बढ़ाते रहना, और वरदानों की स्मृति में रहना


 निष्कर्ष

तो प्यारे बच्चों,

  • याद रखो — सर्व वरदान पहले से ही तुम्हारा जन्म-सिद्ध अधिकार है।

  • अप्राप्ति का कोई प्रश्न ही नहीं।

  • बापदादा का संकल्प है कि हर आत्मा अपनी श्रेष्ठ भाग्यपत्री को पहचानकर सदा वरदानी स्वरूप में स्थित रहे।

बापदादा का रूहानी स्नेह, याद-प्यार और नमस्ते।

“सर्व वरदान आपका जन्म-सिद्ध अधिकार | प्रश्नोत्तर”


 प्रश्न 1: यह मेला साधारण मेलों से कैसे भिन्न है?

 उत्तर: यह मेला आत्मा और परमात्मा का सच्चा संगम है। मधुबन में डबल मेला होता है—एक तरफ बाप और दादा का मिलन और दूसरी तरफ बापदादा और बच्चों का मिलन। यह अद्वितीय मेला है जो केवल संगमयुग पर ही संभव है।


 प्रश्न 2: ‘लोन का शरीर’ और ‘अपनी वस्तु’ में क्या अन्तर है?

 उत्तर: लोन का शरीर सीमित और अस्थायी है, जबकि आत्मा की पहचान असीमित और अविनाशी है। शिवबाप बताते हैं कि आत्मा को तीन सम्बन्धों से शक्ति मिलती है—बाप रूप से मिलन का अधिकार, शिक्षक रूप से मुरली का अधिकार, और सतगुरू रूप से स्नेह की दृष्टि का अधिकार।


 प्रश्न 3: “सर्व वरदान” को जन्म-सिद्ध अधिकार क्यों कहा गया है?

 उत्तर: क्योंकि आत्मा को जन्मते ही वरदाता बाप ने सर्व वरदान दे दिए हैं। जैसे लौकिक में जन्मपत्री पहले से बनाई जाती है, वैसे ही परमात्मा ने आत्मा की भाग्यपत्री पहले ही लिख दी है। इसलिए आत्मा को कुछ पाना नहीं, बल्कि स्मृति स्वरूप बनना है कि हम पहले से ही वरदानी आत्माएँ हैं।


 प्रश्न 4: सेवाधारी आत्माओं की सच्ची पहचान क्या है?

 उत्तर: सेवाधारी आत्मा वही है जो स्वयं का त्याग करके दूसरों की सेवा में हर्षित रहे। माताएँ इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं—वे अपनी नींद त्याग कर भी बच्चों की सेवा करती हैं। सेवा के द्वारा ही यज्ञ की वृद्धि और आत्माओं का कल्याण होता है।


 प्रश्न 5: बापदादा ने बच्चों को कौन-सा विशेष संदेश दिया?

 उत्तर: बापदादा ने बच्चों का उल्हना मिटाया और बताया कि अब बच्चों का कर्तव्य है वृद्धि करते रहना, मेले को बढ़ाते रहना और वरदानों की स्मृति में स्थित रहना।


 प्रश्न 6: निष्कर्ष स्वरूप बच्चों को क्या स्मृति रखनी चाहिए?

 उत्तर: बच्चों को सदा स्मृति रखनी चाहिए कि सर्व वरदान पहले से ही उनका जन्म-सिद्ध अधिकार है। अप्राप्ति का प्रश्न ही नहीं है। बापदादा का संकल्प है कि हर आत्मा अपनी श्रेष्ठ भाग्यपत्री को पहचानकर सदा वरदानी स्वरूप में स्थित रहे।

Disclaimer:- यह वीडियो ब्रह्मा कुमारियों के आध्यात्मिक संदेश और अव्यक्त मुरली के अंशों पर आधारित है। यहाँ प्रस्तुत जानकारी केवल आध्यात्मिक शिक्षा और मार्गदर्शन हेतु है। वीडियो में व्यक्त विचार और अनुभव व्यक्तिगत रूप से समझने के लिए हैं और किसी धार्मिक या लौकिक विवाद हेतु नहीं हैं।

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