Avyakta Murli-(20)“Become devoid of attachment and become worthy of God’s love”

अव्यक्त मुरली-(20)“नष्टोमोहा बन प्रभु प्यार के पात्र बनो”

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“नष्टोमोहा बन प्रभु प्यार के पात्र बनो | माताओं के प्रति बापदादा के विशेष बोल”


1. प्रस्तावना

ओम् शान्ति।
आज बापदादा माताओं को विशेष रूप से दो बोल सुना रहे हैं।
माताएँ सदा बापदादा की डबल सेवाधारी और स्नेही साथी रही हैं।
इसलिए आज का संदेश है— “नष्टोमोहा बनो और प्रभु प्यार के पात्र बनो।”


2. नष्टोमोहा की परिभाषा

‘नष्टोमोहा’ का अर्थ है— मोह, माया, और देहाभिमान से मुक्त होकर आत्मिक स्थिति में स्थित होना।
 जब आत्मा अपने असली स्वरूप में टिक जाती है, तो फिर न किसी रिश्ते का, न परिस्थितियों का, और न ही पुराने संस्कारों का बंधन उसे खींच सकता है।


3. माताओं की विशेषता

बापदादा कहते हैं— माताएँ शुरू से ही ईश्वरीय कार्य की आधारशक्ति रही हैं।
उन्होंने सहनशक्ति, त्याग, और सेवा में सदा प्रथम स्थान पाया है।
माताओं को यह विशेष उपहार दिया गया है कि वे ‘ईश्वरीय प्यार की पात्रता’ को सहजता से धारण कर सकती हैं।


4. प्रभु प्यार का पात्र कैसे बनें?

  1. सच्चा निष्ठावान बनकर – मन-बुद्धि को केवल बाबा में लगाना।

  2. वैराग्य की शक्ति से – व्यर्थ और पराए आकर्षण को समाप्त करना।

  3. साधना और सेवा से – अपना जीवन दूसरों को रोशन करने में लगाना।

  4. पवित्रता और निर्मलता से – जैसे स्वच्छ पात्र ही अमृत को संभाल सकता है, वैसे ही पवित्र आत्माएँ प्रभु प्यार की पात्र बन सकती हैं।


5. माताओं के प्रति बापदादा का विशेष संदेश

बापदादा कहते हैं—
“माताएँ केवल घर-गृहस्थ की सेवा करने वाली नहीं हैं, बल्कि विश्व की भाग्य विधाता भी हैं।”
माताएँ यदि नष्टोमोहा बन जाएँ, तो उनका हर विचार और हर कर्म विश्व को दिशा देने वाला बन सकता है।


6. निष्कर्ष

इसलिए आज का संकल्प यही है—
“हम सभी माताएँ और आत्माएँ, नष्टोमोहा बन, प्रभु प्यार की पात्रता धारण करें और विश्व सेवा में अपनी श्रेष्ठ भूमिका निभाएँ।”

“गीता का सच्चा भगवान कौन है?”


प्रश्नोत्तर (Q&A) शैली

प्रश्न 1: गीता का भगवान कौन है?

उत्तर: गीता का भगवान शिव है। गीता में ज्ञान देने वाला श्रीकृष्ण नहीं बल्कि निराकार शिव परमात्मा हैं, जो श्रीकृष्ण के माध्यम से यह ज्ञान सुनाते हैं।


प्रश्न 2: गीता ज्ञान का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: गीता ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य आत्मा को मोह, अज्ञान और बंधनों से मुक्त कराना है ताकि वह स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा से योग लगाकर पवित्र बने और फिर सत्ययुग का मालिक बने।


प्रश्न 3: गीता में ‘नष्टोमोह’ का क्या अर्थ है?

उत्तर: ‘नष्टोमोह’ का अर्थ है—आत्मा का सभी मोह और आसक्तियों से मुक्त हो जाना। जब आत्मा का मोह नष्ट हो जाता है, तब वह परमात्मा की सच्ची संतान बन जाती है।


प्रश्न 4: गीता को ‘देवियों का ग्रंथ’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: गीता में विशेष रूप से माताओं को जगाने का कार्य हुआ है। माताएँ ही पहले से पवित्रता की प्रतिमूर्ति रही हैं, इसलिए गीता को ‘देवियों का ग्रंथ’ कहा जाता है।


प्रश्न 5: गीता के सच्चे भगवान को पहचानने से क्या लाभ है?

उत्तर: गीता के सच्चे भगवान को पहचानने से आत्मा अपने असली पिता से योग जोड़ती है, व्यर्थ मोह-माया का त्याग करती है और अपने जीवन को दिव्य गुणों से भर लेती है। यही सच्चा मोक्ष और जीवन-मुक्ति का मार्ग है।

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं और मुरली बिंदुओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान, प्रेरणा और आत्मिक उन्नति देना है। यहाँ प्रस्तुत विचार किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या परंपरा की आलोचना के लिए नहीं हैं। यह वीडियो केवल आत्मा और परमात्मा के सत्य ज्ञान को साझा करने के लिए है। दर्शकगण इसे खुले मन और आत्मिक दृष्टि से स्वीकार करें।

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