(14)24-02-1985“The Sangam Age – an era of unparalleled achievements”

अव्यक्त मुरली-(14)24-02-1985 “संगमयुग – सर्व श्रेष्ठ प्राप्तियों का युग”

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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24-02-1985 “संगमयुग – सर्व श्रेष्ठ प्राप्तियों का युग”

आज बापदादा चारों ओर के प्राप्ति स्वरूप विशेष आत्माओं को देख रहे थे। एक तरफ अनेक आत्मायें अल्पकाल के प्राप्ति वाली हैं जिसमें प्राप्ति के साथ-साथ अप्राप्ति भी है। आज प्राप्ति है कल अप्राप्ति है। तो एक तरफ अनेक प्राप्ति सो अप्राप्ति स्वरूप। दूसरे तरफ बहुत थोड़े सदाकाल की प्राप्ति स्वरूप विशेष आत्मायें। दोनों के महान अन्तर को देख रहे थे। बापदादा प्राप्ति स्वरूप बच्चों को देख हर्षित हो रहे थे। प्राप्ति स्वरूप बच्चे कितने पदमापदम भाग्यवान हो। इतनी प्राप्ति कर ली जो आप विशेष आत्माओं के हर कदम में पदम हैं। लौकिक में प्राप्ति स्वरूप जीवन में विशेष चार बातों की प्राप्ति आवश्यक है। (1) सुखमय सम्बन्ध। (2) स्वभाव और संस्कार सदा शीतल और स्नेही हो। (3) सच्ची कमाई की श्रेष्ठ सम्पति हो। (4) श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ सम्पर्क हो। अगर यह चारों ही बातें प्राप्त हैं तो लौकिक जीवन में भी सफलता और खुशी है। लेकिन लौकिक जीवन की प्राप्तियाँ अल्पकाल की प्राप्तियाँ हैं। आज सुखमय सम्बन्ध है कल वही सम्बन्ध दु:खमय बन जाता है। आज सफलता है कल नहीं है। इसके अन्तर में आप प्राप्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को इस अलौकिक श्रेष्ठ जीवन में चारों ही बातें सदा प्राप्त हैं क्योंकि डायरेक्ट सुखदाता सर्व प्राप्तियों के दाता के साथ अविनाशी सम्बन्ध है। जो अविनाशी सम्बन्ध कभी भी दु:ख वा धोखा देने वाला नहीं है। विनाशी सम्बन्धों में वर्तमान समय दु:ख है वा धोखा है। अविनाशी सम्बन्ध में सच्चा स्नेह है। सुख है। तो सदा स्नेह और सुख के सर्व सम्बन्ध बाप से प्राप्त हैं। एक भी सम्बन्ध की कमी नहीं है। जो सम्बन्ध चाहो उसी सम्बन्ध से प्राप्ति का अनुभव कर लो। जिस आत्मा को जो सम्बन्ध प्यारा है उसी सम्बन्ध से भगवान प्रीत की रीति निभा रहे हैं। भगवान को सर्व सम्बन्धी बना लिया। ऐसा श्रेष्ठ सम्बन्ध सारे कल्प में प्राप्त नहीं हो सकता। तो सम्बन्ध भी प्राप्त है। साथ-साथ इस अलौकिक दिव्य जन्म में सदा श्रेष्ठ स्वभाव, ईश्वरीय संस्कार होने कारण स्वभाव संस्कार कभी दु:ख नहीं देते। जो बापदादा के संस्कार वह बच्चों के संस्कार, जो बापदादा का स्वभाव वह बच्चों का स्वभाव। स्व-भाव अर्थात् सदा हर एक के प्रति स्व अर्थात् आत्मा का भाव। स्व श्रेष्ठ को भी कहा जाता है। स्व का भाव वा श्रेष्ठ भाव यही स्वभाव हो। सदा महादानी, रहमदिल, विश्व कल्याणकारी यह बाप के संस्कार सो आपके संस्कार हों। इसलिए स्वभाव और संस्कार सदा खुशी की प्राप्ति कराते हैं। ऐसे ही सच्ची कमाई की सुखमय सम्पति है। तो अविनाशी खजाने कितने मिले हैं? हर एक खजाने की खानियों के मालिक हो। सिर्फ खजाना नहीं, अखुट अनगिनत खजाने मिले हैं। जो खर्चो खाओ और बढ़ाते रहो। जितना खर्च करो उतना बढ़ता है। अनुभवी हो ना। स्थूल सम्पति किसलिए कमाते हैं? दाल रोटी सुख से खावें। परिवार सुखी हो। दुनिया में नाम अच्छा हो! आप अपने को देखो कितने सुख और खुशी की दाल रोटी मिल रही है। जो गायन भी है दाल रोटी खाओ भगवान के गीत गाओ। ऐसे गायन की हुई दाल रोटी खा रहे हो। और ब्राह्मण बच्चों को बापदादा की गैरन्टी है – ब्राह्मण बच्चा दाल रोटी से वंचित हो नहीं सकता। आसक्ति वाला खाना नहीं मिलेगा लेकिन दाल रोटी जरूर मिलेगी। दाल रोटी भी है, परिवार भी ठीक है और नाम कितना बाला है। इतना आपका नाम बाला है जो आज लास्ट जन्म तक आप पहुँच गये हो, लेकिन आपके जड़ चित्रों के नाम से अनेक आत्मायें अपना काम सिद्ध कर रही हैं। नाम आप देवी देवताओं का लेते हैं। काम अपना सिद्ध करते हैं। इतना नाम बाला है। एक जन्म नाम बाला नहीं होता, सारा कल्प आपका नाम बाला है। तो सुखमय, सच्चे सम्पतिवान हो। बाप के सम्पर्क में आने से आपका भी श्रेष्ठ सम्पर्क बन गया है। आपका ऐसा श्रेष्ठ सम्पर्क है जो आपके जड़ चित्रों के सेकेण्ड के सम्पर्क की भी प्यासी हैं। सिर्फ दर्शन के सम्पर्क के भी कितने प्यासे हैं! सारी-सारी रातें जागरण करते रहते हैं। सिर्फ सेकेण्ड के दर्शन के सम्पर्क के लिए पुकारते रहते हैं। चिल्लाते रहते वा सिर्फ सामने जावें उसके लिए कितना सहन करते हैं! हैं चित्र और ऐसे चित्र घर में भी होते हैं फिर भी एक सेकेण्ड के सम्मुख सम्पर्क के लिए कितने प्यासे हैं। एक बेहद के बाप के बनने के कारण सारे विश्व की आत्माओं से सम्पर्क हो गया। बेहद के परिवार के हो गये। विश्व की सर्व आत्माओं से सम्पर्क बन गया। तो चारों ही बातें अविनाशी प्राप्त हैं। इसलिए सदा सुखी जीवन है। प्राप्ति स्वरूप जीवन है। अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के जीवन में। यही आपके गीत हैं। ऐसे प्राप्ति स्वरूप हो ना वा बनना है? तो सुनाया ना आज प्राप्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे थे। जिस श्रेष्ठ जीवन के लिए दुनिया वाले कितनी मेहनत करते हैं। और आपने क्या किया? मेहनत की वा मुहब्बत की? प्यार-प्यार में ही बाप को अपना बना लिया। तो दुनिया वाले मेहनत करते हैं और आपने मुहब्बत से पा लिया। बाबा कहा और खजानों की चाबी मिली। दुनिया वालों से पूछो तो क्या कहेंगे? कमाना बड़ा मुश्किल है। इस दुनिया में चलना बड़ा मुश्किल है और आप क्या कहते हो? कदम में पदम कमाना है। और चलना कितना सहज है! उड़ती कला है तो चलने से भी बच गये। आप कहेंगे चलना क्या उड़ना है। कितना अन्तर हो गया! बापदादा आज विश्व के सभी बच्चों को देख रहे थे। सभी अपनी-अपनी प्राप्ति की लगन में लगे हुए हैं लेकिन रिजल्ट क्या है! सब खोज करने में लगे हुए हैं। साइन्स वाले देखो अपनी खोज में इतने व्यस्त हैं जो और कुछ नहीं सूझता। महान आत्मायें देखो प्रभू को पाने की खोज में लगी हुई हैं। वा छोटी सी भ्रान्ति के कारण प्राप्ति से वंचित हैं। आत्मा ही परमात्मा है वा सर्वव्यापी परमात्मा है इस भ्रान्ति के कारण खोज में ही रह गये। प्राप्ति से वंचित रह गये हैं। साइन्स वाले भी अभी और आगे है और आगे है, ऐसा करते-करते चन्द्रमा में, सितारों में दुनिया बनायेंगे, खोजते-खोजते खो गये हैं। शास्त्रवादी देखो शास्त्रार्थ के चक्कर में विस्तार में खो गये हैं। शास्त्रार्थ का लक्ष्य रख अर्थ से वंचित हो गये हैं। राजनेतायें देखो कुर्सी की भाग दौड़ में खोये हुए हैं। और दुनिया के अन्जान आत्मायें देखो विनाशी प्राप्ति के तिनके के सहारे को असली सहारा समझ बैठ गई हैं। और आपने क्या किया? वह खोये हुए हैं और आपने पा लिया। भ्रान्ति को मिटा लिया। तो प्राप्ति स्वरूप हो गये। इसलिए सदा प्राप्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्मायें हो।

बापदादा विशेष डबल विदेशी बच्चों को मुबारक देते हैं कि विश्व में अनेक आत्माओं के बीच आप श्रेष्ठ आत्माओं की पहचान का नेत्र शक्तिशाली रहा। जो पहचाना और पाया। तो बापदादा डबल विदेशी बच्चों की पहचान के नेत्र को देख बच्चों के गुण गा रहे हैं कि वाह बच्चे वाह! जो दूरदेशी होते, भिन्न धर्म के होते, भिन्न रीति रसम के होते अपने असली बाप को दूर होते भी समीप से पहचान लिया। समीप के सम्बन्ध में आ गये। ब्राह्मण जीवन की रीति रसम को अपनी आदि रीति रसम समझ, सहज अपने जीवन में अपना लिया है। इसको कहा जाता है विशेष लवली और लकी बच्चे। जैसे बच्चों को विशेष खुशी है, बापदादा को भी विशेष खुशी है। ब्राह्मण परिवार की आत्मायें विश्व के कोने-कोने में पहुँच गई थी लेकिन कोने-कोने से बिछुड़ी हुई श्रेष्ठ आत्मायें फिर से अपने परिवार में पहुँच गई हैं। बाप ने ढूँढा, आपने पहचाना। इसलिए प्राप्ति के अधिकारी बन गये। अच्छा।

ऐसे अविनाशी प्राप्ति स्वरूप बच्चों को, सदा सर्व सम्बन्धों के अनुभव करने वाले बच्चों को, सदा अविनाशी सम्पतिवान बच्चों को, सदा बाप समान श्रेष्ठ संस्कार और सदा स्व के भाव में रहने वाले सर्व प्राप्तियों के भण्डार सर्व प्राप्तियों के महान दानी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

आज बापदादा ने पूरी रात सभी बच्चों से मिलन मनाया और सुबह 7 बजे यादप्यार दे विदाई ली, सुबह का क्लास बापदादा ने ही कराया।

रोज़ बापदादा द्वारा महावाक्य सुनते-सुनते महान आत्मायें बन गयी। तो आज के दिन का यही सार, सारा दिन मन के साज़ के साथ सुनना कि महावाक्य सुनने से महान बने हैं। महान ते महान कर्तव्य करने के लिए सदा निमित्त हैं। हर आत्मा के प्रति मन्सा से, वाचा से, सम्पर्क से महादानी आत्मा हैं और सदा महान युग के आह्वान करने वाले अधिकारी आत्मा हैं। यही याद रखना। सदा ऐसे महान स्मृति में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सिकीलधे बच्चों को बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग।

प्रश्न 1: बापदादा आज किन आत्माओं को देख रहे थे?
उत्तर: बापदादा आज चारों ओर प्राप्ति स्वरूप विशेष आत्माओं को देख रहे थे। एक ओर वे आत्माएँ थीं जिनकी प्राप्तियाँ अल्पकाल की थीं, जिनमें आज प्राप्ति और कल अप्राप्ति है; दूसरी ओर बहुत थोड़ी ऐसी आत्माएँ थीं जो सदाकाल की अविनाशी प्राप्ति स्वरूप हैं।


प्रश्न 2: अल्पकाल की प्राप्ति और सदाकाल की प्राप्ति में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: अल्पकाल की प्राप्ति आज है, कल नहीं रहती; उसमें सुख के साथ दुःख और धोखा भी जुड़ा होता है। सदाकाल की प्राप्ति अविनाशी होती है, जो कभी दुःख या धोखा नहीं देती।


प्रश्न 3: लौकिक जीवन में सफलता के लिए कौन-सी चार आवश्यक प्राप्तियाँ बताई गई हैं?
उत्तर:

  1. सुखमय सम्बन्ध

  2. शीतल और स्नेही स्वभाव व संस्कार

  3. सच्ची कमाई की श्रेष्ठ सम्पत्ति

  4. श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ सम्पर्क


प्रश्न 4: ये चारों प्राप्तियाँ अलौकिक ब्राह्मण जीवन में कैसे सदा रहती हैं?
उत्तर: क्योंकि ब्राह्मण आत्माओं का डायरेक्ट अविनाशी सम्बन्ध सर्व प्राप्तियों के दाता परमात्मा से है, जो कभी दुःख या धोखा देने वाला नहीं है।


प्रश्न 5: अविनाशी सम्बन्ध की विशेषता क्या है?
उत्तर: अविनाशी सम्बन्ध में सच्चा स्नेह, सदा सुख और सर्व सम्बन्धों की पूर्ण प्राप्ति है। जिस सम्बन्ध का अनुभव करना चाहो, उसी सम्बन्ध से परमात्म प्यार मिलता है।


प्रश्न 6: ‘स्वभाव’ का वास्तविक अर्थ क्या बताया गया है?
उत्तर: स्वभाव का अर्थ है — सदा हर एक के प्रति आत्मिक भाव और श्रेष्ठ भाव। बापदादा जैसे महादानी, रहमदिल और विश्व-कल्याणकारी हैं, वैसे ही बच्चों के संस्कार भी बन जाते हैं।


प्रश्न 7: सच्ची कमाई की सम्पत्ति को कैसे समझाया गया है?
उत्तर: यह अविनाशी खजाने हैं — अखुट, अनगिनत। जितना खर्च करो, उतना बढ़ते हैं। ये खजाने आत्मिक सुख और खुशी की दाल-रोटी प्रदान करते हैं।


प्रश्न 8: ब्राह्मण बच्चों के लिए दाल-रोटी के बारे में बापदादा की क्या गारंटी है?
उत्तर: बापदादा की गारंटी है कि ब्राह्मण बच्चा कभी दाल-रोटी से वंचित नहीं हो सकता। आसक्ति वाला भोजन न मिले, पर आवश्यक भोजन अवश्य मिलेगा।


प्रश्न 9: ब्राह्मण आत्माओं का ‘नाम बाला’ कैसे है?
उत्तर: ब्राह्मण आत्माओं का नाम एक जन्म के लिए नहीं, बल्कि पूरे कल्प के लिए बाला है। आज भी देवताओं के नाम से लोग अपना काम सिद्ध करते हैं।


प्रश्न 10: बाप के सम्पर्क से बच्चों को क्या विशेष सम्पर्क प्राप्त हुआ?
उत्तर: बेहद के बाप के बनने से पूरे विश्व की आत्माओं से सम्पर्क बन गया। ब्राह्मण आत्माएँ विश्व परिवार का अंग बन गईं।


प्रश्न 11: दुनिया के लोग प्राप्ति के लिए क्या कर रहे हैं और परिणाम क्या है?
उत्तर:

  • साइंस वाले खोज में खो गए हैं।

  • धर्मात्माएँ भ्रान्तियों में उलझ गई हैं।

  • शास्त्रवादी शास्त्रार्थ में अर्थ से वंचित हो गए हैं।

  • राजनेता कुर्सी की दौड़ में खोए हैं।

  • सामान्य आत्माएँ विनाशी सहारों को असली सहारा समझ बैठी हैं।


प्रश्न 12: ब्राह्मण आत्माओं ने ऐसा क्या किया जो वे प्राप्ति स्वरूप बन गईं?
उत्तर: उन्होंने भ्रान्तियों को मिटाया, मेहनत नहीं बल्कि मुहब्बत से बाप को अपना बनाया और सहज ही सर्व प्राप्तियाँ पा लीं।


प्रश्न 13: डबल विदेशी बच्चों की विशेषता क्या बताई गई है?
उत्तर: दूर देश, भिन्न धर्म और रीति-रसम के होते हुए भी उन्होंने अपने असली बाप को पहचान लिया और ब्राह्मण जीवन की रीति को सहज स्वीकार कर लिया। इसलिए वे विशेष लवली और लकी बच्चे हैं।


प्रश्न 14: आज के दिन का सार (Essence) क्या बताया गया है?
उत्तर:
महावाक्य सुनते-सुनते हम महान आत्माएँ बने हैं। अब महान से महान कर्तव्य करने के लिए सदा निमित्त बनना है — मन्सा, वाचा और सम्पर्क से महादानी बनकर युग परिवर्तन का आह्वान करना है।


प्रश्न 15: बापदादा का अंतिम संदेश क्या है?
उत्तर:
सदा प्राप्ति स्वरूप बनकर रहो, सर्व सम्बन्धों और अविनाशी सम्पत्ति के अनुभव में स्थित रहो और हर आत्मा के प्रति महान भाव से सेवा करो।

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