(15) What is the relationship between purity and sensual pleasure?

AT.S.-(15)पवित्रता का और अति इंद्रिय सुख का क्या संबंध है?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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भूमिका: पवित्रता क्यों संवेदनशील विषय है?

आज हम परमात्मा क्या कहते हैं? श्रृंखला का 15वाँ विषय समझेंगे –

पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का क्या संबंध है?

अक्सर साधक कहते हैं –

“मैं योग करता हूँ, लेकिन अति इंद्रिय सुख स्थायी क्यों नहीं?”

यह विषय संवेदनशील इसलिए है क्योंकि पवित्रता पर बात होते ही भावनाएँ आहत हो सकती हैं। लेकिन आज हम इसे आरोप या नियम की तरह नहीं, बल्कि अनुभव की शर्त की तरह समझेंगे।


 पवित्रता – आनंद की चाबी

पवित्रता आनंद की चाबी है। जब तक चाबी नहीं, तब तक आनंद का ताला नहीं खुलेगा।

पवित्रता नहीं, तो योग भी सूखा रह जाता है।

यह कोई दंड नहीं, यह आत्मिक नियम है।


 बिना पवित्रता सच्चा आनंद क्यों नहीं?

प्रश्न यह नहीं कि आनंद क्यों नहीं मिल रहा, प्रश्न यह है कि पवित्रता में ऐसा क्या है जो आनंद को स्थायी बनाता है?

उत्तर है –

पवित्रता आत्मा को हल्का बनाती है।

भारी आत्मा ऊपर नहीं उड़ सकती।


 पवित्रता क्या है? (सही अर्थ)

पवित्रता केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य नहीं है।

सच्ची पवित्रता है –

  • मनसा: विचारों की पवित्रता
  • वाचा: वाणी की पवित्रता
  • कर्मणा: कर्मों की पवित्रता
  • दृष्टि और वृत्ति में आत्मिक भाव

जहाँ मिलावट नहीं, वहीं पवित्रता है।


 दुनिया की पवित्रता बनाम सच्ची पवित्रता

दुनिया पवित्रता को देह से जोड़ती है। लेकिन सच्ची अपवित्रता कहाँ से शुरू होती है?

“मेरा” कहकर जो कुछ आत्मा से चिपकाया, वही आत्मा को मैला करता है।

देह‑अभिमान आते ही सारे विकार स्वतः आ जाते हैं। इसलिए –

जड़ पर वार करो: देह‑अभिमान।


मुरली प्रमाण: पवित्रता की नींव

 मुरली – 16 मार्च 1968

“पवित्रता ही ईश्वरीय जीवन की नींव है।”


 अति इंद्रिय सुख क्या है?

अति इंद्रिय सुख वह आनंद है जो –

  • इंद्रियों से परे है
  • वस्तु और व्यक्ति से स्वतंत्र है
  • आत्मा को परमात्मा से जुड़ने पर मिलता है

 मुरली – 2 फरवरी 1968

“ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।”


 पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का सीधा सूत्र

जितनी पवित्रता, उतना अति इंद्रिय सुख।

  • अपवित्रता आत्मा को भारी बनाती है
  • पवित्रता आत्मा को हल्का बनाती है

 मुरली – 10 नवंबर 1970

“पवित्र आत्मा ही सच्चा सुख अनुभव कर सकती है।”


 अनुभव में अटकना नहीं, स्थिति बनानी है

अनुभव आना अच्छी बात है, लेकिन अनुभव में अटक जाना लक्ष्य नहीं।

लक्ष्य है –

स्थिति बनाना।


 पवित्रता बढ़ने के प्रत्यक्ष लाभ

  • योग सहज हो जाता है
  • चेहरे पर सौम्यता आती है
  • अति इंद्रिय सुख में स्थिरता आती है
  • संबंधों में निर्लिप्तता आती है
  • मन में शांति बसती है

 पवित्रता त्याग नहीं, सौभाग्य है

सत्य यह है –

जो छोड़ते हैं, वही पाते हैं
जो पकड़ते हैं, वही खोते हैं

अति इंद्रिय सुख पवित्रता का इनाम है।

 मुरली – 2 अक्टूबर 1966

“यह त्याग नहीं, सौभाग्य है।”


 संगम युग – अभ्यास का समय

संगम युग –

पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का अभ्यास काल है।

जो अभी अभ्यास करता है, वही भविष्य में स्वर्गीय सुख पाता है।

 मुरली – 18 जनवरी 1969“पवित्र आत्माएँ ही स्वर्ग की अधिकारी बनती हैं।”


 निष्कर्ष: अंतिम स्पष्ट सत्य

  • पवित्रता = कारण
  • अति इंद्रिय सुख = परिणाम

बिना पवित्रता सुख क्षणिक है, पवित्रता के साथ सुख स्वाभाविक और स्थायी।


 अंतिम संदेश

यदि अति इंद्रिय सुख चाहिए, तो पहले पवित्रता को प्राथमिकता दीजिए।

क्योंकि –

पवित्रता ही परमात्मा की गोद है।

प्रश्न 1: पवित्रता को संवेदनशील विषय क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
पवित्रता पर बात होते ही अक्सर लोगों को लगता है कि उन पर आरोप लगाया जा रहा है या नियम थोपे जा रहे हैं। इससे भावनाएँ आहत हो सकती हैं। इसलिए यह विषय संवेदनशील है।
लेकिन परमात्मा इसे दंड या नियम की तरह नहीं, बल्कि अनुभव की शर्त की तरह समझाते हैं।


 प्रश्न 2: आज हम “परमात्मा क्या कहते हैं?” श्रृंखला में कौन-सा विषय समझ रहे हैं?

उत्तर:
आज हम श्रृंखला का 15वाँ विषय समझ रहे हैं –
“पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का क्या संबंध है?”


 प्रश्न 3: साधकों का सबसे आम प्रश्न क्या होता है?

उत्तर:
अक्सर साधक कहते हैं –
“मैं योग करता हूँ, लेकिन अति इंद्रिय सुख स्थायी क्यों नहीं?”


 प्रश्न 4: पवित्रता को ‘आनंद की चाबी’ क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि जैसे बिना चाबी ताला नहीं खुलता, वैसे ही बिना पवित्रता सच्चा आनंद प्रकट नहीं होता

  • पवित्रता नहीं → योग सूखा

  • पवित्रता है → योग सहज और रसयुक्त

यह कोई सज़ा नहीं, बल्कि आत्मिक नियम है।


 प्रश्न 5: बिना पवित्रता सच्चा आनंद क्यों नहीं मिल सकता?

उत्तर:
क्योंकि पवित्रता आत्मा को हल्का बनाती है।
और आत्मिक नियम है –
भारी आत्मा ऊपर नहीं उड़ सकती।
हल्की आत्मा ही परमात्मा से जुड़कर स्थायी आनंद का अनुभव करती है।


प्रश्न 6: पवित्रता का सही अर्थ क्या है?

उत्तर:
पवित्रता केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य नहीं है।
सच्ची पवित्रता का अर्थ है –

  • मनसा: विचारों की पवित्रता

  • वाचा: वाणी की पवित्रता

  • कर्मणा: कर्मों की पवित्रता

  • दृष्टि और वृत्ति: आत्मिक भाव

जहाँ मिलावट नहीं, वहीं पवित्रता है।


 प्रश्न 7: दुनिया की पवित्रता और सच्ची पवित्रता में क्या अंतर है?

उत्तर:
दुनिया पवित्रता को केवल देह से जोड़ती है।
लेकिन सच्ची अपवित्रता वहाँ शुरू होती है जहाँ –
“मेरा” कहकर आत्मा के साथ देह, वस्तु, व्यक्ति या पद चिपक जाता है।

देह-अभिमान आते ही सभी विकार स्वतः आ जाते हैं।
इसलिए परमात्मा कहते हैं –
जड़ पर वार करो: देह-अभिमान।


 प्रश्न 8: मुरली में पवित्रता को कैसे बताया गया है?

उत्तर (मुरली प्रमाण):
मुरली – 16 मार्च 1968

“पवित्रता ही ईश्वरीय जीवन की नींव है।”


 प्रश्न 9: अति इंद्रिय सुख क्या है?

उत्तर:
अति इंद्रिय सुख वह आनंद है जो –

  • इंद्रियों से परे होता है

  • वस्तु और व्यक्ति से स्वतंत्र होता है

  • आत्मा के परमात्मा से जुड़ने पर अनुभव होता है

मुरली – 2 फरवरी 1968

“ईश्वरीय सुख आत्मिक अनुभूति का सुख है।”


 प्रश्न 10: पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का सीधा सूत्र क्या है?

उत्तर:
जितनी पवित्रता, उतना अति इंद्रिय सुख।

  • अपवित्रता → आत्मा भारी

  • पवित्रता → आत्मा हल्की

मुरली – 10 नवंबर 1970

“पवित्र आत्मा ही सच्चा सुख अनुभव कर सकती है।”


 प्रश्न 11: क्या केवल अनुभव आ जाना पर्याप्त है?

उत्तर:
नहीं।
अनुभव आना अच्छी बात है, लेकिन अनुभव में अटक जाना लक्ष्य नहीं
लक्ष्य है –
स्थिति बनाना।


 प्रश्न 12: पवित्रता बढ़ने से जीवन में क्या प्रत्यक्ष परिवर्तन आते हैं?

उत्तर:

  • योग सहज हो जाता है

  • चेहरे पर सौम्यता आती है

  • अति इंद्रिय सुख में स्थिरता आती है

  • संबंधों में निर्लिप्तता आती है

  • मन में शांति बसती है


 प्रश्न 13: क्या पवित्रता त्याग है?

उत्तर:
नहीं। पवित्रता त्याग नहीं, सौभाग्य है।

सत्य यह है –

  • जो छोड़ते हैं, वही पाते हैं

  • जो पकड़ते हैं, वही खोते हैं

मुरली – 2 अक्टूबर 1966

“यह त्याग नहीं, सौभाग्य है।”


 प्रश्न 14: संगम युग का इस विषय से क्या संबंध है?

उत्तर:
संगम युग –
पवित्रता और अति इंद्रिय सुख का अभ्यास काल है।

जो अभी अभ्यास करता है, वही भविष्य में स्वर्गीय सुख का अधिकारी बनता है।

मुरली – 18 जनवरी 1969

“पवित्र आत्माएँ ही स्वर्ग की अधिकारी बनती हैं।”


 निष्कर्ष: अंतिम स्पष्ट सत्य

उत्तर:

  • पवित्रता = कारण

  • अति इंद्रिय सुख = परिणाम

बिना पवित्रता सुख क्षणिक है,
पवित्रता के साथ सुख स्वाभाविक और स्थायी है।


 अंतिम संदेश

यदि अति इंद्रिय सुख चाहिए,
तो पहले पवित्रता को प्राथमिकता दीजिए।

क्योंकि –
पवित्रता ही परमात्मा की गोद है।

डिस्क्लेमर

यह वीडियो ब्रह्माकुमारीज़ के साकार एवं अव्यक्त मुरली ज्ञान पर आधारित आध्यात्मिक विवेचना है। इसका उद्देश्य आत्मिक समझ बढ़ाना है, न कि किसी की व्यक्तिगत मान्यताओं या भावनाओं को आहत करना। दर्शक इसे आध्यात्मिक प्रयोग और आत्म‑परिवर्तन के लिए सुनें।

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