AV-(14)27-02-1986 “रूहानी सेना कल्प-कल्प की विजयी”
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
27-02-1986 “रूहानी सेना कल्प-कल्प की विजयी”
सभी रूहानी शक्ति सेना, पाण्डव सेना, रूहानी सेना सदा विजय के निश्चय और नशे में रहते है न, और कोई भी सेना जब लड़ाई करती है तो विजय की गैरन्टी नहीं होती है। निश्चय नहीं होता कि विजय निश्चित ही है। लेकिन आप रूहानी सेना, शक्ति सेना सदा इस निश्चय के नशे में रहते कि न सिर्फ अब के विजयी हैं लेकिन कल्प-कल्प के विजयी हैं। अपने कल्प पहले के विजय की कथायें भी भक्ति मार्ग में सुन रहे हो। पाण्डवों के विजय की यादगार कथा अभी भी सुन रहे हो। अपने विजय के चित्र अब भी देख रहे हो। भक्ति में सिर्फ अहिंसक के बजाए हिंसक दिखा दिया है। रूहानी सेना को जिस्मानी साधारण सेना दिखा दिया है। अपना विजय का गायन अभी भी भक्तों द्वारा सुन हर्षित होते हो। गायन भी है प्रभु-प्रीत बुद्धि विजयन्ती। विपरीत बुद्धि विनशन्ति। तो कल्प पहले का आपका गायन कितना प्रसिद्ध है! विजय निश्चित होने के कारण निश्चयबुद्धि विजयी हो। इसलिए माला को भी विजय माला कहते हैं। तो निश्चय और नशा दोनों हैं ना। कोई भी अगर पूछे तो निश्चय से कहेंगे कि विजय तो हुई पड़ी है। स्वप्न में भी यह संकल्प नहीं उठ सकता कि पता नहीं विजय होगी वा नहीं, हुई पड़ी है। पास्ट कल्प और भविष्य को भी जानते हो। त्रिकालदर्शी बन उसी नशे से कहते हो। सभी पक्के हो ना! अगर कोई कहे भी कि सोचो, देखो तो क्या कहेंगे? अनेक बार देख चुके हैं। कोई नई बात हो तो सोचें भी, देखें भी। यह तो अनेक बार की बात अब रिपीट कर रहे हैं। तो ऐसे निश्चय बुद्धि ज्ञानी तू आत्मायें योगी तू आत्मायें हो ना!
आज अफ्रीका के ग्रुप का टर्न है। ऐसे तो सभी अब मधुबन निवासी हो। परमानेंट एड्रेस तो मधुबन है ना। वह तो सेवास्थान है। सेवा-स्थान हो गया दफ्तर, लेकिन घर तो मधुबन है ना। सेवा के अर्थ अफ्रीका, यू.के. आदि चारों तरफ गये हुए हो। चाहे धर्म बदली किया, चाहे देश बदली किया लेकिन सेवा के लिए ही गये हो। याद कौन-सा घर आता है? मधुबन या परमधाम। सेवा स्थान पर सेवा करते भी सदा ही मधुबन और मुरली यही याद रहता है ना! अफ्रीका में भी सेवा अर्थ गये हो ना। सेवा ने ज्ञान गंगा बना लिया। ज्ञान गंगाओं में ज्ञान स्नान कर आज कितने पावन बन गये! बच्चों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर सेवा करते हुए देख बापदादा सोचते हैं कि कैसे-कैसे स्थानों पर सेवा के लिए निर्भय बन बहुत लगन से रहे हुए हैं। अफ्रीकन लोगों का वायुमण्डल, उन्हों का आहार-व्यवहार कैसा है, फिर भी सेवा के कारण रहे हुए हो। सेवा का बल मिलता रहता। सेवा का प्रत्यक्ष फल मिलता है, वह बल निर्भय बना देता है। कभी घबराते तो नहीं हो ना! और ऑफीशल निमन्त्रण पहले यहाँ से मिला। विदेश सेवा का निमन्त्रण मिलने से ऐसे-ऐसे देशों में पहुंच गये। निमन्त्रण की सेवा का फाउण्डेशन यहाँ से ही शुरू हुआ। सेवा के उमंग-उत्साह का प्रत्यक्ष फल यहाँ के बच्चे ने दिखाया। बलिहारी उस एक निमित्त बनने वाले की जो कितने अच्छे-अच्छे छिपे हुए रत्न निकल आये। अभी तो बहुत वृद्धि हो गई है। वह छिप गया और आप प्रत्यक्ष हो गये। निमंत्रण के कारण नम्बर आगे हो गया। तो अफ्रीका वालों को बापदादा ऑफरीन लेने वाले कहते हैं। आफरीन लेने का स्थान है क्योंकि वातावरण अशुद्ध है। अशुद्ध वातावरण के बीच वृद्धि हो रही है। इसके लिए ऑफरीन कहते हैं।
शक्ति सेना और पाण्डव सेना दोनों ही शक्तिशाली हैं, मैजारिटी इण्डियन्स हैं। लेकिन इण्डिया से दूर हो गये, तो दूर होते भी अपना हक तो नहीं छोड़ सकते। वहाँ भी बाप का परिचय मिल गया। बाप के बन गये। नैरोबी में मेहनत नहीं लगी। सहज ही बिछुड़े हुए पहुँच गये और गुजरातियों के यह विशेष संस्कार हैं। जैसे उन्हों की यह रीति है – सभी मिलकर गरबा रास करते हैं। अकेले नहीं करते। छोटा हो चाहे मोटा हो, सब मिलकर गरबा डान्स जरूर करते हैं। यह संगठन की निशानी है। सेवा में भी देखा गया है गुजराती संगठन वाले होते। एक आता तो 10 को जरूर लाता। यह संगठन की रीति अच्छी है उन्हों में। इसलिए वृद्धि जल्दी हो जाती है। सेवा की वृद्धि और विस्तार भी हो रहा है। ऐसे-ऐसे स्थानों पर शान्ति की शक्ति देना, भय के बदले खुशी दिलाना यही श्रेष्ठ सेवा है। ऐसे स्थानों पर आवश्यकता है। विश्व कल्याणकारी हो तो विश्व के चारों ओर सेवा बढ़नी है, और निमित्त बनना ही है। कोई भी कोना अगर रह गया तो उल्हना देंगे। अच्छा है हिम्मते बच्चे मददे बाप। हैण्ड्स भी वहाँ से ही निकल और सेवा कर रहे हैं। यह भी सहयोग हो गया ना। स्वयं जगे हो तो बहुत अच्छा लेकिन जगकर फिर जगाने के भी निमित्त बनें, यह डबल फायदा हो गया। बहुत करके हैण्ड्स भी वहाँ के ही हैं। यह विशेषता अच्छी है। विदेश सेवा में मैजारिटी सब वहाँ से निकल वहाँ ही सेवा के निमित्त बन जाते। विदेश ने भारत को हैण्ड्स नहीं दिया है। भारत ने विदेश को दिये हैं। भारत भी बहुत बड़ा है। अलग-अलग ज़ोन हैं। स्वर्ग तो भारत को ही बनाना है। विदेश तो पिकनिक स्थान बन जायेगा। तो सभी एवररेडी हो ना। आज किसको कहाँ भेजें तो एवररेडी हो ना! जब हिम्मत रखते हैं तो मदद भी मिलती है। एवररेडी जरूर रहना चाहिए। और जब समय ऐसा आयेगा तो फिर आर्डर तो करना ही होगा। बाप द्वारा आर्डर होना ही हैं। कब करेंगे, वह डेट नहीं बतायेंगे। डेट बतावें फिर तो सब नम्बरवन पास हो जाएं। यहाँ डेट का ही अचानक एक ही क्वेश्चन आयेगा! एवररेडी हो ना। कहें यहाँ ही बैठ जाओ तो बाल-बच्चे घर आदि याद आयेगा? सुख के साधन तो वहाँ हैं लेकिन स्वर्ग तो यहाँ बनना है। तो सदा एवररेडी रहना यह हैं ब्राह्मण जीवन की विशेषता। अपनी बुद्धि की लाइन क्लीयर हो। सेवा के लिए निमित्त मात्र स्थान बाप ने दिया है। तो निमित्त बनकर सेवा में उपस्थित हुए हो। फिर बाप का इशारा मिला तो कुछ भी सोचने की जरूरत ही नहीं है। डायरेक्शन प्रमाण सेवा अच्छी कर रहे हो। इसलिए न्यारे और बाप के प्यारे हो। अफ्रीका ने भी वृद्धि अच्छी की है। वी.आई.पी. की सेवा अच्छी हो रही है। गवर्मेन्ट के भी कनेक्शन अच्छे हैं। यह विशेषता है जो सर्व प्रकार वाले वर्ग की आत्माओं का सम्पर्क कोई न कोई समय समीप ले ही आता है। आज सम्पर्क वाले कल सम्बन्ध वाले हो जायेंगे। उन्हों को जगाते रहना चाहिए। नहीं तो थोड़ी आंख खोल फिर सो जाते हैं। कुम्भकरण तो हैं ही। नींद का नशा होता है तो कुछ भी खा-पी भी लेते तो भूल जाते। कुम्भकरण भी ऐसे हैं। कहेंगे हाँ फिर आयेंगे, यह करेंगे। लेकिन फिर पूछो तो कहेंगे याद नहीं रहा। इसलिए बार-बार जगाना पड़ता है। गुजरातियों ने बाप का बनने में, तन-मन-धन से स्वयं को सेवा में लगाने में नम्बर अच्छा लिया है। सहज ही सहयोगी बन जाते हैं। यह भी भाग्य है। संख्या गुजरातियों की अच्छी है। बाप का बनने की लॉटरी कोई कम नहीं है।
हर स्थान पर कोई न कोई बाप के बिछुड़े हुए रत्न हैं ही। जहाँ भी पांव रखते हैं तो कोई न कोई निकल ही आते। बेपरवाह, निर्भय हो करके सेवा में लगन से आगे बढ़ते हैं तो पदम गुणा मदद भी मिलती है। आफिशियल निमन्त्रण तो फिर भी यहाँ से ही आरम्भ हुआ। फिर भी सेवा का जमा तो हुआ ना। वह जमा का खाता समय पर खींचेगा जरूर। तो सभी नम्बरवन, तीव्र पुरूषार्थी ऑफरीन लेने वाले हो ना। नम्बरवन सम्बन्ध निभाने वाले नम्बरवन सेवा में सबूत दिखाने वाले सबमें नम्बरवन होना ही है, तब तो ऑफरीन लेंगे ना। ऑफरीन ते ऑफरीन लेते ही रहना है। सभी की हिम्मत देख बापदादा खुश होते हैं। अनेक आत्माओं को बाप का सहारा दिलाने के लिए निमित्त बने हुए हो। अच्छे ही परिवार के परिवार हैं। परिवार को बाबा गुलदस्ता कहते हैं। यह भी विशेषता अच्छी है। वैसे तो सभी ब्राह्मणों के स्थान हैं। अगर कोई नैरोबी जायेंगे वा कहाँ भी जायेंगे तो कहेंगे हमारा सेन्टर, बाबा का सेन्टर है। हमारा परिवार है। तो कितने लकी हो गये! बापदादा हर एक रत्न को देख खुश होते। चाहे कोई भी स्थान के हैं लेकिन बाप के हैं और बाप बच्चों का है, इसलिए ब्राह्मण आत्मा अति प्रिय है। विशेष है। एक दो से जास्ती प्यारे लगते हैं।
प्रश्न 1:
रूहानी सेना और जिस्मानी साधारण सेना में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
जिस्मानी साधारण सेना जब युद्ध करती है, तो उसकी विजय की कोई गारंटी नहीं होती।
लेकिन रूहानी शक्ति सेना और पाण्डव सेना सदा विजय के निश्चय और नशे में रहती है, क्योंकि वे केवल वर्तमान की नहीं बल्कि कल्प-कल्प की विजयी हैं।
प्रश्न 2:
रूहानी सेना को “कल्प-कल्प की विजयी” क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि रूहानी सेना अपने पास्ट कल्प की विजय, वर्तमान विजय और भविष्य की विजय — तीनों को जानती है।
इसलिए वह त्रिकालदर्शी बनकर निश्चय से कहती है कि “विजय तो हुई पड़ी है।”
प्रश्न 3:
भक्ति मार्ग में पाण्डवों की विजय कथाएँ आज भी क्यों सुनाई जाती हैं?
उत्तर:
क्योंकि वे वास्तव में रूहानी सेना की विजय की यादगार हैं।
भक्ति मार्ग में उस रूहानी, अहिंसक विजय को हिंसक युद्ध के रूप में दिखा दिया गया है, जबकि असली विजय बुद्धि और निश्चय की थी।
प्रश्न 4:
“प्रभु-प्रीत बुद्धि विजयन्ती, विपरीत बुद्धि विनशन्ति” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जो बुद्धि प्रभु-प्रीत है, वही सदा विजयी होती है।
और जो बुद्धि विपरीत है, वही विनाश को प्राप्त होती है।
इसी कारण निश्चयबुद्धि आत्माओं को विजयी कहा गया है।
प्रश्न 5:
विजय माला को “विजय माला” क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि यह माला उन आत्माओं की है जिनकी विजय निश्चित है।
निश्चय और नशा — दोनों होने के कारण ही यह विजय माला कहलाती है।
प्रश्न 6:
निश्चयबुद्धि आत्मा का स्वप्न में भी कौन-सा संकल्प नहीं उठ सकता?
उत्तर:
निश्चयबुद्धि आत्मा के मन में स्वप्न में भी यह संकल्प नहीं उठता कि
“पता नहीं विजय होगी या नहीं।”
क्योंकि उसे पूरा विश्वास होता है कि विजय पहले से ही हो चुकी है।
प्रश्न 7:
सभी ब्राह्मण आत्माओं का परमानेंट एड्रेस कौन-सा है?
उत्तर:
सभी ब्राह्मण आत्माओं का परमानेंट एड्रेस मधुबन है।
सेवा-स्थान तो केवल ऑफिस है, लेकिन घर मधुबन ही है।
प्रश्न 8:
विदेशों में सेवा करने पर भी बच्चों को कौन-सा घर याद रहता है?
उत्तर:
चाहे अफ्रीका हो, यू.के. हो या कोई और देश —
सेवा करते हुए भी बच्चों को मधुबन और मुरली ही याद रहती है।
प्रश्न 9:
सेवा का प्रत्यक्ष फल क्या है?
उत्तर:
सेवा का प्रत्यक्ष फल है — बल।
यह बल आत्मा को निर्भय बना देता है, जिससे वह किसी भी परिस्थिति में घबराती नहीं।
प्रश्न 10:
अफ्रीका वालों को बापदादा “ऑफरीन लेने वाले” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि अशुद्ध वातावरण के बीच रहते हुए भी वहाँ सेवा की वृद्धि हो रही है।
अशुद्ध वातावरण में पवित्रता की वृद्धि होना ही ऑफरीन लेने की पात्रता है।
प्रश्न 11:
गुजरातियों के कौन-से संस्कार सेवा में सहायक बने?
उत्तर:
गुजरातियों में संगठन का संस्कार है।
जैसे गरबा रास अकेले नहीं, सब मिलकर करते हैं —
वैसे ही सेवा में भी एक आता है तो कई आत्माओं को साथ लाता है।
प्रश्न 12:
श्रेष्ठ सेवा किसे कहा गया है?
उत्तर:
जहाँ भय है वहाँ शान्ति देना,
जहाँ अशांति है वहाँ खुशी देना —
यही श्रेष्ठ और विश्व-कल्याणकारी सेवा है।
प्रश्न 13:
ब्राह्मण जीवन की विशेषता क्या बताई गई है?
उत्तर:
ब्राह्मण जीवन की विशेषता है — सदा एवर-रेडी रहना।
जब भी बाप का आर्डर मिले, बिना कुछ सोचे तुरंत तैयार रहना।
प्रश्न 14:
बाप आर्डर की डेट क्यों नहीं बताते?
उत्तर:
अगर बाप डेट बता दें, तो सभी नम्बर-वन पास हो जाएँ।
इसलिए आर्डर अचानक आता है, जिससे आत्मा की वास्तविक तैयारी की परीक्षा होती है।
प्रश्न 15:
“हिम्मते बच्चे मददे बाप” का अनुभव कब होता है?
उत्तर:
जब बच्चे बेपरवाह और निर्भय होकर सेवा में आगे बढ़ते हैं,
तब उन्हें पदम-गुणा मदद स्वतः मिलती है।
प्रश्न 16:
बापदादा ब्राह्मण परिवार को “गुलदस्ता” क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि यह परिवार अलग-अलग स्थानों के सुगंधित रत्नों से बना है।
हर आत्मा इस गुलदस्ते की शोभा बढ़ाती है।
प्रश्न 17:
ब्राह्मण आत्माएँ बापदादा को क्यों अति प्रिय हैं?
उत्तर:
क्योंकि वे बाप की हैं और बाप उनका है।
इसलिए ब्राह्मण आत्माएँ अति प्रिय, विशेष और एक-दूसरे से भी ज्यादा प्यारी लगती हैं।
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