(16)04-03-1986 “The foundation of the greatest new creation – selfless love”

AV-(16)04-03-1986 “सर्व श्रेष्ठ नई रचना का फाउण्डेशन – निस्वार्थ स्नेह”

YouTube player

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

04-03-1986 “सर्व श्रेष्ठ नई रचना का फाउण्डेशन – निस्वार्थ स्नेह”

आज बापदादा अपने श्रेष्ठ आत्माओं की रचना को देख हर्षित हो रहे हैं। यह श्रेष्ठ वा नई रचना सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ है और अति प्रिय है क्योंकि पवित्र आत्माओं की रचना है। पवित्र आत्मा होने के कारण अभी बापदादा को प्रिय हो और अपने राज्य में सर्व के प्रिय होंगे। द्वापर में भक्तों के प्रिय देव आत्मायें बनेंगे। इस समय हो परमात्म-प्रिय ब्राह्मण आत्मायें। और सतयुग त्रेता में होंगे राज्य अधिकारी परम श्रेष्ठ दैवी आत्मायें और द्वापर से अब कलियुग तक बनते हो पूज्य आत्मायें। तीनों में से श्रेष्ठ हो इस समय – परमात्म प्रिय ब्राह्मण सो फरिश्ता आत्मायें। इस समय की श्रेष्ठता के आधार पर सारा कल्प श्रेष्ठ रहते हो। देख रहे हो कि इस लास्ट जन्म तक भी आप श्रेष्ठ आत्माओं का भक्त लोग कितना आह्वान कर रहे हैं। कितना प्यार से पुकार रहे हैं। जड़ चित्र जानते भी आप श्रेष्ठ आत्माओं की भावनाओं से पूजा करते, भोग लगाते, आरती करते हैं। आप डबल विदेशी समझते हो कि हमारे चित्रों की पूजा हो रही है? भारत में बाप का कर्तव्य चला है इसलिए बाप के साथ आप सबके चित्र भी भारत में ही हैं। ज्यादा मन्दिर भारत में बनाते हैं। यह नशा तो है ना कि हम ही पूज्य आत्मायें हैं? सेवा के लिए चारों ओर विश्व में बिखर गये थे। कोई अमेरिका तो कोई अफ्रीका पहुंच गये। लेकिन किसलिए गये हो? इस समय सेवा के संस्कार, स्नेह के संस्कार हैं। सेवा की विशेषता है ही स्नेह। जब तक ज्ञान के साथ रूहानी स्नेह की अनुभूति नहीं होती तो ज्ञान कोई नहीं सुनेगा।

आप सब डबल विदेशी बाप के बने तो आप सबका फाउण्डेशन क्या रहा? बाप का स्नेह, परिवार का स्नेह, दिल का स्नेह, नि:स्वार्थ स्नेह। इसने श्रेष्ठ आत्मा बनाया। तो सेवा का पहला सफलता का स्वरूप हुआ स्नेह। जब स्नेह में बाप के बन जाते हो तो फिर कोई भी ज्ञान की प्वाइंट सहज स्पष्ट होती जाती। जो स्नेह में नहीं आता वह सिर्फ ज्ञान को धारण कर आगे बढ़ने में समय भी लेता, मेहनत भी लेता क्योंकि उनकी वृत्ति – क्यों, क्या ऐसा कैसे इसमें ज्यादा चली जाती। और स्नेह में जब लवलीन हो जाते तो स्नेह के कारण बाप का हर बोल स्नेही लगता। क्वेश्चन समाप्त हो जाते। बाप का स्नेह आकर्षित करने के कारण क्वेश्चन करेंगे तो भी समझने के रूप से करेंगे। अनुभवी हो ना। जो प्यार में खो जाते हैं तो जिससे प्यार है उसको वह जो बोलेगा उनको वह प्यार ही दिखाई देगा। तो सेवा का मूल आधार है स्नेह। बाप भी सदैव बच्चों को स्नेह से याद करते हैं। स्नेह से बुलाते हैं स्नेह से ही सर्व समस्याओं से पार कराते हैं। तो ईश्वरीय जन्म का, ब्राह्मण जन्म का फाउण्डेशन है ही स्नेह। स्नेह के फाउण्डेशन वाले को कभी भी कोई मुश्किल बात नहीं लगेगी। स्नेह के कारण उमंग-उत्साह रहेगा। जो भी श्रीमत बाप की है, हमें करना ही है। देखेंगे, करेंगे यह स्नेही के लक्षण नहीं। बाप ने मेरे प्रति कहा है और मुझे करना ही है। यह है स्नेही आशिक आत्माओं की स्थिति। स्नेही हलचल वाले नहीं होंगे। सदा बाप और मैं, तीसरा न कोई। जैसे बाप बड़े ते बड़ा है। वैसे स्नेही आत्मायें भी सदा बड़ी दिल वाली होती हैं। छोटी दिल वाले थोड़ी-थोड़ी बात में मूंझेंगे। छोटी बात भी बड़ी हो जायेगी। बड़ी दिल वालों के लिए बड़ी बात छोटी हो जायेगी। डबल विदेशी सब बड़ी दिल वाले हो ना! बापदादा सभी डबल विदेशी बच्चों को देख खुश होते हैं। कितना दूर-दूर से परवाने शमा के ऊपर फिदा होने पहुंच जाते हैं। पक्के परवाने हैं।

आज अमेरिका वालों का टर्न है! अमेरिका वालों को बाप कहते हैं “आ मेरे”। अमेरिका वाले भी कहते हैं आ मेरे। यह विशेषता है ना! वृक्ष के चित्र में आदि से विशेष शक्ति के रूप में अमेरिका दिखाया हुआ है। जब से स्थापना हुई है तो अमेरिका को बाप ने याद किया है। विशेष पार्ट है ना। जैसे एक विनाश की शक्ति श्रेष्ठ है – दूसरी क्या विशेषता है? विशेषतायें तो स्थान की हैं ही। लेकिन अमेरिका की विशेषता यह भी है – एक तरफ विनाश की तैयारियां भी ज्यादा हैं, दूसरी तरफ फिर विनाश को समाप्त करने की यू.एन. भी वहाँ है। एक तरफ विनाश की शक्ति, दूसरे तरफ है सभी को मिलाने की शक्ति। तो डबल शक्ति हो गई ना। वहाँ सभी को मिलाने के लिए प्रयत्न करते हैं, तो वहाँ से ही फिर यह रूहानी मिलन का भी आवाज बुलन्द होगा। वह लोग तो अपनी रीति से सभी को मिलाकर शांति का प्रयत्न करते हैं लेकिन यथार्थ रीति से मिलाना तो आप लोगों का ही कर्तव्य है ना। वह मिलाने की कोशिश करते भी हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं। वास्तव में सभी धर्म की आत्माओं को एक परिवार में लाना – यह है आप ब्राह्मणों का वास्तविक कार्य। यह विशेष करना है। जैसे विनाश की शक्ति वहाँ श्रेष्ठ है ऐसे ही स्थापना की शक्ति का आवाज बुलन्द हो। विनाश और स्थापना साथ-साथ दोनों झण्डे लहरावें। एक साइन्स का झण्डा और एक साइलेन्स का। साइन्स की शक्ति का प्रभाव और साइलेन्स की शक्ति का प्रभाव दोनों जब प्रत्यक्ष हों तब कहेंगे प्रत्यक्षता का झण्डा लहराना। जैसे कोई वी.आई.पी. किसी भी देश में जाते हैं तो उनका स्वागत करने के लिए झण्डा लगा लेते हैं ना। अपने देश का भी लगाते हैं और जो आता है उनके देश का भी लगाते हैं। तो परमात्म-अवतरण का भी झण्डा लहरावें। परमात्म-कार्य का भी स्वागत करें। बाप का झण्डा कोने-कोने में लहरावे तब कहेंगे विशेष शक्तियों को प्रत्यक्ष किया। यह गोल्डन जुबली का वर्ष है ना। तो गोल्डन सितारा सभी को दिखाई दे। कोई विशेष सितारा आकाश में दिखाई देता है तो सभी का अटेन्शन उस तरफ जाता है ना। यह गोल्डन चमकता हुआ सितारा सभी की आंखों में, बुद्धि में दिखाई दे। यह है गोल्डन जुबली मनाना। यह सितारा पहले कहाँ चमकेगा?

अभी विदेश में अच्छी वृद्धि हो रही है और होनी ही है। बाप के बिछुड़े हुए बच्चे कोने-कोने में जो छिपे हुए हैं वह समय प्रमाण सम्पर्क में आ रहे हैं। सभी एक दो से सेवा में उमंग-उत्साह से आगे बढ़ रहे हैं। हिम्मत से मदद भी बाप की मिल जाती है। नाउम्मीद में भी उम्मीदों के दीपक जग जाते हैं। दुनिया वाले सोचते हैं यह होना तो असम्भव है। बहुत मुश्किल है। और लगन निर्विघ्न बनाकर उड़ते पंछी के समान उड़ाते पहुँचा देती है। डबल उड़ान से पहुंचे हो ना। एक प्लेन, दूसरा बुद्धि का विमान। हिम्मत उमंग के पंख जब लग जाते हैं तो जहाँ भी उड़ना चाहें उड़ सकते हैं। बच्चों की हिम्मत पर बापदादा सदा बच्चों की महिमा करते हैं। हिम्मत रखने से एक से दूसरा दीपक जगते माला तो बन गई है ना। मुहब्बत से जो मेहनत करते हैं उसका फल बहुत अच्छा निकलता है। यह सभी के सहयोग की विशेषता है। कोई भी बात हो लेकिन पहले दृढ़ता, स्नेह का संगठन चाहिए। उससे सफलता प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती है। दृढ़ता कलराठी जमीन में भी फल पैदा कर सकती है। आजकल साइन्स वाले रेत में भी फल पैदा करने का प्रयत्न कर रहे हैं। तो साइलेन्स की शक्ति क्या नहीं कर सकती है! जिस धरनी को स्नेह का पानी मिलता है वहाँ के फल बड़े भी होते और स्वादिष्ट भी होते हैं। जैसे स्वर्ग में बड़े-बड़े फल और टेस्टी भी अच्छे होते हैं। विदेश में बड़े फल होते हैं लेकिन टेस्टी नहीं होते। फल की शक्ल बहुत अच्छी होती लेकिन टेस्ट नहीं। भारत के फल छोटे होते लेकिन टेस्ट अच्छी होती है। फाउण्डेशन तो सब यहाँ ही पड़ता। जिस सेन्टर पर स्नेह का पानी मिलता है वह सेन्टर सदा फलीभूत होता है। सेवा में भी और साथियों में भी। स्वर्ग में शुद्ध पानी शुद्ध धरती होगी, तब ऐसे फल मिलते हैं। जहाँ स्नेह है वहाँ वायुमण्डल अर्थात् धरनी श्रेष्ठ होती है। वैसे भी जब कोई डिस्टर्ब होता है तो क्या कहते हैं! मुझे और कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ स्नेह चाहिए। तो डिस्टर्ब होने से बचने का साधन भी स्नेह ही है। बापदादा को सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि खोये हुए बच्चे फिर से आ गये हैं। अगर आप वहाँ नहीं पहुंचते तो सेवा कैसे होती। इसलिए बिछुड़ना भी कल्याणकारी हो गया। और मिलना तो है ही कल्याणकारी। अपने-अपने स्थान पर सब अच्छे उमंग से आगे बढ़ रहे हैं और सभी के अन्दर एक लक्ष्य है कि बापदादा की जो एक ही आश है कि सर्व आत्माओं को अनाथ से सनाथ बना दें, यह आश हम पूर्ण करें। सभी ने मिलकर जो शान्ति के लिए विशेष प्रोग्राम बनाया है, वह भी अच्छा है। कम से कम सभी को थोड़ा साइलेन्स में रहने का अभ्यास कराने के निमित्त तो बन जायेंगे। अगर कोई सही रीति से एक मिनट भी साइलेन्स का अनुभव करे तो वह एक मिनट की साइलेन्स का अनुभव बार-बार उनको स्वत: ही खींचता रहेगा क्योंकि सभी को शान्ति चाहिए। लेकिन विधि नहीं आती है। संग नहीं मिलता है। जबकि शान्ति प्रिय सब आत्मायें हैं तो ऐसी आत्माओं को शांति की अनुभूति होने से स्वत: ही आकर्षित होते रहेंगे। हर स्थान पर अपने-अपने विशेष कार्य करने वाले अच्छी निमित्त बनी हुई श्रेष्ठ आत्मायें हैं। तो कमाल करना कोई बड़ी बात नहीं है। आवाज फैलाने का साधन है ही आजकल की विशेष आत्मायें। जितना कोई विशेष आत्मायें सम्पर्क में आती हैं तो उनके सम्पर्क से अनेक आत्माओं का कल्याण होता है। एक वी.आई.पी. द्वारा अनेक साधारण आत्माओं का कल्याण हो जाता है। बाकी समीप सम्बन्ध में तो नहीं आयेंगे। अपने धर्म में, अपने पार्ट में उन्हों को विशेषता का कोई न कोई फल मिल जाता है। बाप को पसन्द साधारण ही हैं। समय भी वह दे सकते हैं। उन्हों को तो समय ही नहीं है। लेकिन वह निमित्त बनते हैं तो फायदा अनेकों को हो जाता है। अच्छा, ओम् शान्ति।

पार्टियों से:-

1. सदा अमर भव की वरदानी आत्मायें हैं – ऐसा अनुभव करते हो? सदा वरदानों से पलते हुए आगे बढ़ रहे हो ना! जिनका बाप से अटूट स्नेह है वह अमर भव के वरदानी हैं, सदा बेफिकर बादशाह हैं। किसी भी कार्य के निमित्त बनते भी बेफिकर रहना यही विशेषता है। जैसे बाप निमित्त तो बनता है ना! लेकिन निमित्त बनते भी न्यारा है इसलिए बेफिकर है। ऐसे फॉलो फादर। सदा स्नेह की सेफ्टी से आगे बढ़ते चलो। स्नेह के आधार पर बाप सदा सेफ कर आगे उड़ाके ले जा रहा है। यह भी अटल निश्चय है ना। स्नेह का रूहानी सम्बन्ध जुट गया। इसी रूहानी सम्बन्ध से कितना एक दो के प्रिय हो गये। बापदादा ने माताओं को एक शब्द की बहुत सहज बात बताई है, एक शब्द याद करो “मेरा बाबा” बस। मेरा बाबा कहा और सब खजाने मिले। यह बाबा शब्द ही चाबी है खजानों की। माताओं को चाबियां सम्भालना अच्छा आता है ना। तो बापदादा ने भी चाबी दी है। जो खजाना चाहें वह मिल सकता है। एक खजाने की चाबी नहीं है, सभी खजानों की चाबी है। बस, बाबा-बाबा कहते रहो तो अभी भी बालक सो मालिक और भविष्य में भी मालिक। सदा इसी खुशी में नाचते रहो।

सर्व श्रेष्ठ नई रचना का फाउण्डेशन — निस्वार्थ स्नेह

अव्यक्त मुरली (बापदादा) | तिथि: 04-03-1986

 भूमिका: नई रचना पर बापदादा की दृष्टि

आज बापदादा अपनी श्रेष्ठ आत्माओं की नई रचना को देखकर हर्षित हैं। यह रचना इसलिए सर्वश्रेष्ठ और अति‑प्रिय है क्योंकि यह पवित्र आत्माओं की रचना है। पवित्रता के कारण ही आज ये आत्माएँ परमात्म‑प्रिय ब्राह्मण हैं, और आगे चलकर देव आत्माएँ, राज्य अधिकारी, तथा पूज्य आत्माएँ बनती हैं।

मुरली नोट (04‑03‑1986):

“तीनों में से श्रेष्ठ हो इस समय — परमात्म‑प्रिय ब्राह्मण, सो फरिश्ता आत्मायें। इस समय की श्रेष्ठता के आधार पर सारा कल्प श्रेष्ठ रहता है।”

उदाहरण: बीज अगर श्रेष्ठ हो तो पूरा वृक्ष श्रेष्ठ फल देता है। इसी प्रकार, इस समय की ब्राह्मण अवस्था पूरे कल्प की श्रेष्ठता तय करती है।


1️⃣ पूज्य से परमात्म‑प्रिय बनने की यात्रा

इस समय आप परमात्म‑प्रिय ब्राह्मण हैं; आगे चलकर सतयुग‑त्रेता में राज्य अधिकारी देव आत्माएँ, और द्वापर‑कलियुग में पूज्य आत्माएँ बनते हैं। आज भी भक्त आपके चित्रों के सामने प्रेम से पूजा, भोग और आरती करते हैं—यह इस समय की श्रेष्ठता का प्रमाण है।

मुरली नोट:

“अभी बापदादा को प्रिय हो और अपने राज्य में सर्व के प्रिय होंगे।”


2️⃣ सेवा का मूल मंत्र: स्नेह के बिना ज्ञान अधूरा

सेवा की सबसे बड़ी विशेषता है रूहानी स्नेह। ज्ञान के साथ स्नेह की अनुभूति नहीं हुई, तो ज्ञान सुना नहीं जाता।

उदाहरण: जिससे प्रेम होता है, उसके शब्द भी मधुर लगते हैं। वैसे ही, स्नेह में बाप का हर बोल समाधान बन जाता है।

मुरली नोट:

“जब तक ज्ञान के साथ रूहानी स्नेह की अनुभूति नहीं होती, ज्ञान कोई नहीं सुनेगा।”


3️⃣ ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन: नि:स्वार्थ स्नेह

डबल विदेशी ब्राह्मणों का फाउण्डेशन रहा—बाप का स्नेह, परिवार का स्नेह, दिल का स्नेह और नि:स्वार्थ स्नेह। यही स्नेह आत्मा को श्रेष्ठ बनाता है और सेवा को सफल।

लक्षण:

  • स्नेह में प्रश्न समाप्त हो जाते हैं
  • श्रीमत पर ‘देखेंगे’ नहीं, ‘करेंगे’ की स्थिति
  • उमंग‑उत्साह सदा बना रहता है

मुरली नोट:

“ईश्वरीय जन्म का, ब्राह्मण जन्म का फाउण्डेशन है ही स्नेह।”


4️⃣ बड़ी दिल — स्नेही आत्मा की पहचान

स्नेही आत्माएँ बड़ी दिल वाली होती हैं। छोटी दिल में छोटी‑सी बात भी भारी लगती है, जबकि बड़ी दिल वालों के लिए बड़ी बात भी छोटी हो जाती है।

उदाहरण: जैसे समुद्र छोटी नदियों को सहज समा लेता है—वैसे ही स्नेही आत्मा हर परिस्थिति को समा लेती है।


5️⃣ अमेरिका: विनाश और स्थापना की डबल शक्ति

अमेरिका को बापदादा ने विशेष पार्ट दिया—एक ओर विनाश की शक्ति, दूसरी ओर सबको मिलाने की शक्ति (UN)। यहाँ से साइन्स और साइलेन्स—दोनों झण्डे लहराने हैं।

मुरली नोट:

“जैसे विनाश की शक्ति वहाँ श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थापना की शक्ति का आवाज बुलन्द हो।”


6️⃣ गोल्डन जुबली: प्रत्यक्षता का सितारा

गोल्डन जुबली का अर्थ है—गोल्डन सितारे की तरह चमकना, जिससे सबका ध्यान आकर्षित हो। यह चमक पहले स्नेह, संगठन और दृढ़ता से आती है।

उदाहरण: जैसे VIP आगमन पर झण्डे लगते हैं, वैसे ही परमात्म‑कार्य के स्वागत में सेवा के झण्डे लहरें।


7️⃣ स्नेह का पानी: सेवा की धरती को फलदायी बनाता है

जहाँ स्नेह का पानी मिलता है, वहाँ सेवा के फल बड़े और स्वादिष्ट होते हैं।

उदाहरण: भारत के फल छोटे पर स्वादिष्ट—क्योंकि धरती में जीवन है। वैसे ही, स्नेह से सींची सेवा में जीवन होता है।

मुरली नोट:

“जिस सेन्टर पर स्नेह का पानी मिलता है, वह सेन्टर सदा फलीभूत होता है।”


8️⃣ हिम्मत और साइलेन्स: डबल उड़ान

हिम्मत करने से बाप की मदद मिलती है। एक उड़ान प्लेन की, दूसरी बुद्धि के विमान की—यही डबल उड़ान है।

मुरली नोट:

“हिम्मत से मदद भी बाप की मिल जाती है।”


9️⃣ शान्ति का अनुभव: आत्माओं को स्वतः आकर्षित करता है

एक मिनट का भी सच्चा साइलेन्स अनुभव आत्मा को बार‑बार खींचता है, क्योंकि शान्ति सबको चाहिए—बस विधि नहीं आती।


 पार्टियों से विशेष वरदान: “मेरा बाबा” — सभी खजानों की चाबी

सदा अमर भव की वरदानी आत्माएँ वही हैं जिनका बाप से अटूट स्नेह है।

एक शब्द — एक चाबी:

“मेरा बाबा”

यह शब्द सभी खजानों की चाबी है। बाबा कहा—बालक से मालिक बने; अभी भी और भविष्य में भी।

मुरली नोट:

“यह बाबा शब्द ही चाबी है खजानों की।”

प्रश्न 1: बापदादा “नई रचना” किसे कहते हैं?

उत्तर:
बापदादा उस रचना को नई रचना कहते हैं जो पवित्र आत्माओं से बनी है।
पवित्रता के कारण ही ये आत्माएँ इस समय परमात्म-प्रिय ब्राह्मण हैं और आगे चलकर देव, राज्य अधिकारी और पूज्य आत्माएँ बनती हैं।

मुरली नोट (04-03-1986):

“तीनों में से श्रेष्ठ हो इस समय — परमात्म-प्रिय ब्राह्मण, सो फरिश्ता आत्मायें।”


 प्रश्न 2: इस समय की ब्राह्मण अवस्था को सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि इस समय की श्रेष्ठता के आधार पर पूरा कल्प श्रेष्ठ बनता है।
यह वही समय है जब आत्मा सीधे परमात्मा के स्नेह में आती है।

उदाहरण:
जैसे बीज श्रेष्ठ हो तो पूरा वृक्ष श्रेष्ठ फल देता है,
वैसे ही संगमयुग की ब्राह्मण अवस्था पूरे कल्प की दिशा तय करती है।


 प्रश्न 3: पूज्य आत्मा और परमात्म-प्रिय आत्मा में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • पूज्य आत्माएँ भक्तों की प्रिय होती हैं

  • परमात्म-प्रिय आत्माएँ स्वयं परमात्मा की प्रिय होती हैं

इस समय आत्माएँ परमात्म-प्रिय हैं; आगे चलकर वही पूज्य बनती हैं।

मुरली नोट:

“अभी बापदादा को प्रिय हो और अपने राज्य में सर्व के प्रिय होंगे।”


 प्रश्न 4: सेवा का मूल मंत्र क्या बताया गया है?

उत्तर:
सेवा का मूल मंत्र है — रूहानी स्नेह
केवल ज्ञान देने से सेवा नहीं होती, जब तक आत्मा को स्नेह की अनुभूति न हो।


 प्रश्न 5: स्नेह के बिना ज्ञान अधूरा क्यों कहा गया है?

उत्तर:
क्योंकि स्नेह के बिना ज्ञान बोझ बन जाता है।
स्नेह में बाप का हर बोल समाधान और सहारा बन जाता है।

उदाहरण:
जिससे प्रेम होता है, उसके शब्द भी मधुर लगते हैं।

मुरली नोट:

“जब तक ज्ञान के साथ रूहानी स्नेह की अनुभूति नहीं होती, ज्ञान कोई नहीं सुनेगा।”


 प्रश्न 6: ब्राह्मण जीवन का पहला फाउण्डेशन क्या है?

उत्तर:
ब्राह्मण जीवन का पहला और अटल फाउण्डेशन है —
नि:स्वार्थ स्नेह

यही स्नेह आत्मा को श्रेष्ठ बनाता है और सेवा को सफल करता है।

मुरली नोट:

“ईश्वरीय जन्म का, ब्राह्मण जन्म का फाउण्डेशन है ही स्नेह।”


 प्रश्न 7: स्नेह में स्थित आत्मा की मुख्य पहचान क्या है?

उत्तर:

  • स्नेह में प्रश्न समाप्त हो जाते हैं

  • श्रीमत पर “देखेंगे” नहीं, “करेंगे” की स्थिति रहती है

  • उमंग-उत्साह सदा बना रहता है


 प्रश्न 8: “बड़ी दिल” स्नेही आत्मा किसे कहा गया है?

उत्तर:
जो आत्मा हर परिस्थिति को समा ले,
छोटी बात को बड़ी न बनाए — वही बड़ी दिल वाली स्नेही आत्मा है।

उदाहरण:
जैसे समुद्र छोटी नदियों को सहज समा लेता है।


 प्रश्न 9: अमेरिका को विशेष पार्ट क्यों दिया गया है?

उत्तर:
क्योंकि अमेरिका में डबल शक्ति है—

  • एक ओर विनाश की शक्ति

  • दूसरी ओर सबको मिलाने की शक्ति (UN)

यहाँ से साइन्स और साइलेन्स, दोनों का झण्डा लहराना है।

मुरली नोट:

“जैसे विनाश की शक्ति वहाँ श्रेष्ठ है, वैसे ही स्थापना की शक्ति का आवाज बुलन्द हो।”


 प्रश्न 10: गोल्डन जुबली का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
गोल्डन जुबली का अर्थ है —
गोल्डन सितारे की तरह चमकना, जिससे सबका ध्यान आकर्षित हो।

यह चमक आती है स्नेह, संगठन और दृढ़ता से।


 प्रश्न 11: स्नेह का पानी सेवा को कैसे सफल बनाता है?

उत्तर:
जहाँ स्नेह का पानी मिलता है,
वहाँ सेवा के फल बड़े, मीठे और टिकाऊ होते हैं।

उदाहरण:
भारत के फल छोटे होते हैं लेकिन स्वादिष्ट—
क्योंकि धरती में जीवन है।

मुरली नोट:

“जिस सेन्टर पर स्नेह का पानी मिलता है, वह सेन्टर सदा फलीभूत होता है।”


 प्रश्न 12: हिम्मत और साइलेन्स को “डबल उड़ान” क्यों कहा गया?

उत्तर:
एक उड़ान प्लेन की,
दूसरी उड़ान बुद्धि के विमान की
हिम्मत करने से बाप की मदद स्वतः मिलती है।

मुरली नोट:

“हिम्मत से मदद भी बाप की मिल जाती है।”


 प्रश्न 13: शान्ति का अनुभव आत्माओं को कैसे आकर्षित करता है?

उत्तर:
अगर आत्मा एक मिनट भी सच्चा साइलेन्स अनुभव करे,
तो वही अनुभव उसे बार-बार अपनी ओर खींचता है—
क्योंकि शान्ति सबको चाहिए।


 प्रश्न 14: “सदा अमर भव” का वरदान किन्हें मिलता है?

उत्तर:
जिन आत्माओं का बाप से अटूट स्नेह है,
वे सदा बेफिकर बादशाह होते हैं।


 प्रश्न 15: सभी खजानों की एक चाबी कौन-सी है?

उत्तर:
एक शब्द — “मेरा बाबा”

यह शब्द कहते ही
आत्मा बालक से मालिक बन जाती है—
अभी भी और भविष्य में भी।

मुरली नोट:

“यह बाबा शब्द ही चाबी है खजानों की।”


समापन सार

निस्वार्थ स्नेह
ही सर्व श्रेष्ठ नई रचना की नींव है,
ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है
और विश्व-सेवा की सबसे बड़ी शक्ति है।

Disclaimer (YouTube)

यह वीडियो/सामग्री ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरलियों पर आधारित आध्यात्मिक अध्ययन व आत्म‑उन्नति के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह सामग्री व्यक्तिगत आध्यात्मिक समझ के लिए है।

निस्वार्थ स्नेह, अव्यक्त मुरली, बापदादा मुरली, ब्राह्मण जीवन, ईश्वरीय स्नेह, नई रचना, परमात्म प्रिय, संगमयुग, ब्रह्माकुमारी मुरली, BK Murli, BK Hindi, आध्यात्मिक ज्ञान, स्नेह की शक्ति, सेवा का फाउंडेशन, रूहानी स्नेह, फरिश्ता आत्मा, पवित्रता, गोल्डन जुबली, साइलेन्स पावर, मेरा बाबा, Om Shanti,Selfless love, Avyakt Murli, BapDada Murli, Brahmin life, divine love, new creation, beloved of God, Confluence Age, Brahma Kumari Murli, BK Murli, BK Hindi, spiritual knowledge, power of love, foundation of service, spiritual love, angel soul, purity, Golden Jubilee, power of silence, my Baba, Om Shanti,