(27)07-04-1986 “The embodiment of asceticism, the embodiment of sacrifice, the creator alone is entitled to rule the world.”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

AV-(27)07-04-1986 “तपस्वी-मूर्त, त्याग मूर्त, विधाता ही विश्व-राज्य अधिकारी”

“तपस्वी-मूर्त, त्याग मूर्त, विधाता ही विश्व-राज्य अधिकारी”

आज रूहानी शमा अपने रूहानी परवानों को देख रहे हैं। सभी रूहानी परवाने शमा से मिलन मनाने के लिए चारों ओर से पहुंच गये हैं। रूहानी परवानों का प्यार रूहानी शमा जाने और रूहानी परवाने जाने। बापदादा जानते हैं कि सभी बच्चों के दिल का स्नेह आकर्षण कर इस अलौकिक मेले में सभी को लाया है। यह अलौकिक मेला अलौकिक बच्चे जानें और बाप जाने! दुनिया के लिए यह मेला गुप्त है। अगर किसी को कहो रूहानी मेले में जा रहे हैं तो वह क्या समझेंगे? यह मेला सदा के लिए मालामाल बनाने का मेला है। यह परमात्म-मेला सर्व प्राप्ति स्वरूप बनाने वाला है। बापदादा सभी बच्चों के दिल के उमंग-उत्साह को देख रहे हैं। हर एक के मन में स्नेह के सागर की लहरें लहरा रहीं हैं। यह बापदादा देख भी रहे हैं और जानते भी हैं कि लगन ने विघ्न विनाशक बनाए मधुबन निवासी बना लिया है। सभी की सब बातें स्नेह में समाप्त हो गई। एवररेडी की रिहर्सल कर दिखाई। एवररेडी हो गये हो ना। यह भी स्वीट ड्रामा का स्वीट पार्ट देख बापदादा और ब्राह्मण बच्चे हर्षित हो रहे हैं। स्नेह के पीछे सब बातें सहज भी लगती हैं और प्यारी भी लगती। जो ड्रामा बना वाह ड्रामा वाह! कितनी बार ऐसे दौड़े-दौड़े आये हैं। ट्रेन में आये हैं या पंखों से उड़के आये हैं? इसको कहा जाता है जहाँ दिल है वहाँ असम्भव भी सम्भव हो जाता है। स्नेह का स्वरूप तो दिखाया, अब आगे क्या करना है? जो अब तक हुआ वह श्रेष्ठ है और श्रेष्ठ रहेगा।

अब समय प्रमाण सर्व स्नेही, सर्वश्रेष्ठ बच्चों से बापदादा और विशेष क्या चाहते हैं? वैसे तो पूरी सीजन में समय प्रति समय इशारे देते हैं। अब उन इशारों को प्रत्यक्ष रूप में देखने का समय आ रहा है। स्नेही आत्मायें हो, सहयोगी आत्मायें हो, सेवाधारी आत्मायें भी हो। अभी महातपस्वी आत्मायें बनो। अपने संगठित स्वरूप के तपस्या की रूहानी ज्वाला से सर्व आत्माओं को दु:ख अशान्ति से मुक्त करने का महान कार्य करने का समय है। जैसे एक तरफ खूने-नाहक खेल की लहर बढ़ती जा रही है, सर्व आत्मायें अपने को बेसहारे अनुभव कर रहीं हैं, ऐसे समय पर सभी सहारे की अनुभूति कराने के निमित्त आप महातपस्वी आत्मायें हो। चारों ओर इस तपस्वी स्वरूप द्वारा आत्माओं को रूहानी चैन अनुभव कराना है। सारे विश्व की आत्मायें प्रकृति से, वायुमण्डल से, मनुष्य आत्माओं से, अपने मन के कमजोरियों से, तन से बेचैन हैं। ऐसी आत्माओं को सुख-चैन की स्थिति का एक सेकेण्ड भी अनुभव करायेंगे तो आपका दिल से बार-बार शुक्रिया मानेंगे। वर्तमान समय संगठित रूप के ज्वाला स्वरूप की आवश्यकता है। अभी विधाता के बच्चे विधाता रूवरूप में स्थित रह, हर समय देते जाओ। अखण्ड महान लंगर लगाओ क्योंकि रॉयल भिखारी बहुत हैं। सिर्फ धन के भिखारी, भिखारी नहीं होते लेकिन मन के भिखारी अनेक प्रकार के हैं। अप्राप्त आत्मायें प्राप्ति के बूँद की प्यासी बहुत हैं। इसलिए अभी संगठन में विधातापन की लहर फैलाओ। जो खजाने जमा किये हैं वह जितना मास्टर विधाता बन देते जायेंगे उतना भरता जायेगा। कितना सुना है। अभी करने का समय है। तपस्वी मूर्त का अर्थ है – तपस्या द्वारा शान्ति के शक्ति की किरणें चारों ओर फैलती हुई अनुभव में आवें। सिर्फ स्वयं के प्रति याद स्वरूप बन शक्ति लेना वा मिलन मनाना वह अलग बात है। लेकिन तपस्वी स्वरूप औरों को देने का स्वरूप है। जैसे सूर्य विश्व को रोशनी की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनुभूति कराता है। ऐसे महान तपस्वी रूप द्वारा प्राप्ति के किरणों की अनुभूति कराओ। इसके लिए पहले जमा का खाता बढ़ाओ। ऐसे नहीं याद से वा ज्ञान के मनन से स्वयं को श्रेष्ठ बनाया, मायाजीत विजयी बनाया, इसी में सिर्फ खुश नहीं रहना। लेकिन सर्व खजानों में सारे दिन में कितनों के प्रति विधाता बनें। सभी खजाने हर रोज कार्य में लगाये वा सिर्फ जमा को देख खुश हो रहे हैं। अभी यह चार्ट रखो कि खुशी का खजाना, शान्ति का खजाना, शक्तियों का खजाना, ज्ञान का खजाना, गुणों का खजाना, सहयोग देने का खजाना कितना बांटा अर्थात् कितना बढ़ाया। सहयोग देने का खजाना कितना बांटा अर्थात् कितना बढ़ाया। इससे वह कॉमन चार्ट जो रखते हो वह स्वत: ही श्रेष्ठ हो जायेगा। पर-उपकारी बनने से स्व-उपकारी स्वत: ही बन जाते। समझा – अभी कौन-सा चार्ट रखना है? यह तपस्वी स्वरूप का चार्ट है – विश्व कल्याणकारी बनना। तो कितने का कल्याण किया? वा स्व-कल्याण में ही समय जा रहा है? स्व कल्याण करने का समय बहुत बीत चुका। अभी विधाता बनने का समय आ गया है। इसलिए बापदादा फिर से समय का इशारा दे रहे हैं। अगर अब तक भी विधातापन की स्थिति का अनुभव नहीं किया तो अनेक जन्म विश्व राज्य अधिकारी बनने के पद्मापदम भाग्य को प्राप्त नहीं कर सकेंगे, क्योंकि विश्वराजन विश्व के मात-पिता अर्थात् विधाता हैं। अब के विधातापन के संस्कार अनेक जन्म प्राप्ति कराता रहेगा, अगर अभी तक लेने के संस्कार, कोई भी रूप में हैं। नाम लेवता, शान लेवता वा किसी भी प्रकार के लेवता के संस्कार विधाता नहीं बनायेंगे।

तपस्या स्वरूप अर्थात् लेवता के त्यागमूर्त। यह हद के लेवता, त्याग मूर्त, तपस्वी मूर्त बनने नहीं देगा। इसलिए तपस्वी मूर्त अर्थात् हद के इच्छा मात्रम् अविद्या रूप। जो लेने का संकल्प करता वह अल्पकाल के लिए लेता है लेकिन सदाकाल के लिए गंवाता है। इसलिए बापदादा बार-बार इस बात का इशारा दे रहे हैं। तपस्वी रूप में विशेष विघ्न रूप यही अल्पकाल की इच्छा है। इसलिए अभी विशेष तपस्या का अभ्यास करना है। समान बनने का यह सबूत देना है। स्नेह का सबूत दिया यह तो खुशी की बात है। अभी तपस्वी मूर्त बनने का सबूत दो। समझा। वैराइटी संस्कार होते हुए भी विधातापन के संस्कार अन्य संस्कारों को दबा देंगे। तो अब इस संस्कार को इमर्ज करो। समझा। जैसे मधुबन में भाग कर पहुँच गये हो ऐसे तपस्वी स्थिति की मंजिल तरफ भागो। अच्छा, भले पधारे। सभी ऐसे भागे हैं जैसे कि अभी विनाश होना है। जो भी किया, जो भी हुआ बापदादा को प्रिय है, क्योंकि बच्चे प्रिय हैं। हर एक ने यही सोचा है कि हम जा रहे हैं। लेकिन दूसरे भी आ रहे हैं, यह नहीं सोचा। सच्चा कुम्भ मेला तो यहाँ लग गया है। सभी अन्तिम मिलन, अन्तिम टुब्बी देने आये हैं। यह सोचा कि इतने सब जा रहे हैं तो मिलने की विधि कैसी होगी! इस सुध-बुध से भी न्यारे हो गये! न स्थान देखा, न रिजर्वेशन को देखा। अभी कभी भी यह बहाना नहीं दे सकेंगे कि रिजर्वेशन नहीं मिलती। ड्रामा में यह भी एक रिहर्सल हो गई। संगमयुग पर अपना राज्य नहीं है। स्वराज्य है लेकिन धरनी का राज्य तो नहीं है, न बापदादा को स्व का रथ है, पराया राज्य, पराया तन है। इसलिए समय प्रमाण नई विधि का आरम्भ करने के लिए यह सीजन हो गई। यहाँ तो पानी का भी सोचते रहते, वहाँ तो झरनों में नहायेंगे। जो भी जितने भी आये हैं, बापदादा स्नेह के रेसपाण्ड में स्नेह से स्वागत करते हैं।

अभी समय दिया है विशेष फाइनल इम्तहान के पहले तैयारी करने के लिए। फाइनल पेपर के पहले टाइम देते हैं। छुट्टी देते हैं ना। तो बापदादा अनेक राज़ों से यह विशेष समय दे रहे हैं। कुछ राज़ गुप्त हैं कुछ राज़ प्रत्यक्ष हैं। लेकिन विशेष हर एक इतना अटेन्शन रखना कि सदा बिन्दु लगाना है अर्थात् बीती को बीती करने का बिन्दु लगाना है। और बिन्दु स्थिति में स्थित हो राज्य अधिकारी बन कार्य करना है। सर्व खजानों के बिन्दु सर्व प्रति विधाता बन सिन्धु बन सभी को भरपूर बनाना है। तो बिन्दु और सिन्धु यह दो बातें विशेष स्मृति में रख श्रेष्ठ सर्टीफिकेट लेना है। सदा ही श्रेष्ठ संकल्प की सफलता से आगे बढ़ते रहना। तो बिन्दु बनना, सिन्धु बनना यही सर्व बच्चों प्रति वरदाता का वरदान है। वरदान लेने के लिए भागे हो ना। यही वरदाता का वरदान सदा स्मृति में रखना। अच्छा!

चारों ओर के सर्व स्नेही, सहयोगी बच्चों को सदा बाप की आज्ञा का पालन करने वाले आज्ञाकारी बच्चों को, सदा फराखदिल, बड़ी दिल से सर्व को सर्व खजाने बांटने वाले, महान पुण्य आत्मायें बच्चों को, सदा बाप समान बनने के उमंग-उत्साह से उड़ती कला में उड़ने वाले बच्चों को विधाता, वरदाता सर्व खजानों के सिन्धु बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

विदाई के समय:- सभी ने जागरण किया! आपके भक्त जागरण करते हैं तो भक्तों को सिखाने वाले तो ईष्ट देव ही होते हैं, जब यहाँ ईष्ट देव जागरण करें तब भक्त कॉपी करें। तो सभी ने जागरण किया अर्थात् अपने खाते में कमाई जमा की। तो आज की रात कमाने की सीजन की रात हो गई। जैसे कमाई की सीजन होती है तो सीजन में जागना ही होता है। तो यह कमाई की सीजन है इसलिए जागना अर्थात् कमाना। तो हरेक ने अपने-अपने यथाशक्ति जमा किया और यही जमा किया हुआ महादानी बन औरों को भी देते रहेंगे और स्वयं भी अनेक जन्म खाते रहेंगे। अभी सभी बच्चों को परमात्म मेले के गोल्डन चांस की गोल्डन मॉर्निंग कर रहे हैं। वैसे तो गोल्डन से भी डायमण्ड मार्निंग है। स्वयं भी डायमण्ड हो और मार्निंग भी डायमण्ड है और जमा भी डायमण्ड ही करते हो तो सब डायमण्ड ही डायमण्ड है इसलिए डायमण्ड मार्निंग कर रहे हैं।

भूमिका : अलौकिक परमात्म-मेला

आज रूहानी शमा अपने रूहानी परवानों को देख रहे हैं।
चारों ओर से आत्माएँ दौड़ी-दौड़ी आई हैं —
कोई ट्रेन से,
कोई बस से,
और कोई स्नेह के पंखों से उड़कर

यह कोई साधारण मेला नहीं,
यह सदा के लिए मालामाल बनाने वाला परमात्म-मेला है।

दुनिया के लिए गुप्त
बाप और बच्चों के लिए प्रत्यक्ष
एक ऐसा मेला जहाँ लेने नहीं, बनने की विधि है


हेडिंग 1 : स्नेह की शक्ति – जहाँ असम्भव भी सम्भव हो जाता है

बापदादा देख रहे हैं कि
सभी बच्चों को यहाँ स्नेह का आकर्षण खींच लाया है।

 उदाहरण

रिज़र्वेशन नहीं मिला,
स्थान नहीं देखा,
सुविधा नहीं सोची —
फिर भी पहुँच गये।

 यही प्रमाण है कि
जहाँ दिल है, वहाँ दूरी नहीं रहती।


हेडिंग 2 : स्नेह का प्रमाण दिया — अब तपस्या का प्रमाण दो

बापदादा कहते हैं —

“स्नेह का सबूत दिया, यह खुशी की बात है।
अब तपस्वी-मूर्त बनने का सबूत दो।”

 प्रश्न

क्या सिर्फ मिलन मनाना ही पर्याप्त है?

उत्तर

नहीं।
अब समय है —

महातपस्वी बनने का
संगठित तपस्या की ज्वाला जगाने का
विश्व को चैन देने का


हेडिंग 3 : आज विश्व को तपस्वी आत्माओं की आवश्यकता है

आज की स्थिति —

  • प्रकृति से बेचैनी

  • वातावरण से अशांति

  • मन से असहायपन

  • संबंधों से तनाव

ऐसे समय पर
आप तपस्वी आत्माएँ — विश्व की आशा हो।

 उदाहरण

यदि किसी दुखी आत्मा को
एक सेकण्ड भी शांति का अनुभव हो जाए,
तो वह दिल से धन्यवाद देगी।


हेडिंग 4 : तपस्वी-मूर्त का अर्थ क्या है?

तपस्वी-मूर्त का अर्थ —

 केवल स्वयं को शक्ति लेना
 केवल योग में सुख अनुभव करना

शांति-शक्ति की किरणें चारों ओर फैलाना

 सूर्य का उदाहरण

जैसे सूर्य —

  • अपने लिए नहीं चमकता

  • सबको रोशनी देता है

वैसे ही —
महातपस्वी आत्मा = देने वाली आत्मा


हेडिंग 5 : विधाता बनो — अखण्ड महान लंगर लगाओ

बापदादा कहते हैं —

“रॉयल भिखारी बहुत हैं।”

ये भिखारी धन के नहीं,
मन के, शांति के, प्रेम के, सहयोग के भिखारी हैं।

 मुरली-नोट

जो जितना देता है,
उतना ही खजाना भरता जाता है।


हेडिंग 6 : नया चार्ट – तपस्वी-मूर्त का चार्ट

अब सिर्फ यह मत देखो —

  • कितना जमा किया?

अब यह देखो —

  • कितना बाँटा?

 तपस्वी चार्ट

  • खुशी का खजाना — कितना दिया?

  • शांति का खजाना — कितना दिया?

  • शक्तियों का खजाना — कितना दिया?

  • ज्ञान — कितना दिया?

  • सहयोग — कितना दिया?

पर-उपकारी बनो, स्व-उपकारी स्वतः बन जाओगे।


हेडिंग 7 : त्याग-मूर्त बने बिना तपस्वी-मूर्त नहीं बन सकते

 सबसे बड़ा विघ्न

अल्पकाल की इच्छा

लेने का संकल्प —
थोड़ी देर लेता है,
लेकिन सदा के लिए गँवा देता है।

 समाधान

  • इच्छा मात्रम् अविद्या

  • नाम-लेवता, मान-लेवता का त्याग

  • हद के लेवता से मुक्त


हेडिंग 8 : विधाता ही विश्व-राज्य अधिकारी

विश्व-राज्य का अधिकारी वही बन सकता है —
जो आज विश्व का माता-पिता (विधाता) बने।

 मुरली-सार

आज के विधातापन के संस्कार
अनेक जन्म राज्य दिलाएँगे।


हेडिंग 9 : बिन्दु और सिन्धु — फाइनल मंत्र

बापदादा का वरदान —

  • बिन्दु बनो — बीती को बीती करो

  • सिन्धु बनो — सबको भरपूर करो

 यही श्रेष्ठ सर्टिफिकेट है।


हेडिंग 10 : डायमण्ड मॉर्निंग — कमाई की सीजन

यह —

  • जागरण की रात

  • कमाई की सीजन

  • डायमण्ड जमा करने का समय

स्वयं भी डायमण्ड बनो
और दूसरों को भी डायमण्ड बनाओ।


समापन : बापदादा का याद-प्यार

चारों ओर के
सर्व स्नेही, सहयोगी, सेवाधारी,
फराखदिल, महान पुण्य आत्माओं को
विधाता, वरदाता बापदादा का
याद-प्यार और नमस्ते।

प्रश्न 1 : अलौकिक परमात्म-मेला क्या है?

 उत्तर :

अलौकिक परमात्म-मेला वह दिव्य संगम है जहाँ
रूहानी शमा (परमात्मा) अपने रूहानी परवानों (आत्माओं) से मिलन मनाते हैं।
यह कोई साधारण मेला नहीं, बल्कि सदा के लिए मालामाल बनाने वाला परमात्म-मेला है।

  • दुनिया के लिए यह मेला गुप्त है

  • बाप और बच्चों के लिए प्रत्यक्ष है

  • यहाँ लेने की नहीं, बनने की विधि सिखाई जाती है


 प्रश्न 2 : आत्माएँ इस परमात्म-मेले में कैसे पहुँचती हैं?

 उत्तर :

कोई ट्रेन से आता है,
कोई बस से,
और कोई स्नेह के पंखों से उड़कर

यह दर्शाता है कि यहाँ पहुँचने का साधन साधन नहीं,
दिल का स्नेह और आकर्षण है।


 प्रश्न 3 : स्नेह की शक्ति को बापदादा कैसे देखते हैं?

 उत्तर :

बापदादा देखते हैं कि
सभी बच्चों को यहाँ स्नेह का आकर्षण खींच लाया है।

रिज़र्वेशन नहीं मिला,
स्थान नहीं देखा,
सुविधा नहीं सोची —
फिर भी पहुँच गये।

 यही प्रमाण है कि
जहाँ दिल है, वहाँ दूरी नहीं रहती।


 प्रश्न 4 : क्या केवल स्नेह और मिलन मनाना ही पर्याप्त है?

 उत्तर :

नहीं।
बापदादा स्पष्ट कहते हैं —

“स्नेह का सबूत दिया, यह खुशी की बात है।
अब तपस्वी-मूर्त बनने का सबूत दो।”

अब समय है —

  • महातपस्वी बनने का

  • संगठित तपस्या की ज्वाला जगाने का

  • विश्व को शांति और चैन देने का


 प्रश्न 5 : आज विश्व को तपस्वी आत्माओं की आवश्यकता क्यों है?

 उत्तर :

आज विश्व की स्थिति है —

  • प्रकृति से बेचैनी

  • वातावरण से अशांति

  • मन से असहायपन

  • संबंधों से तनाव

ऐसे समय पर
तपस्वी आत्माएँ ही विश्व की आशा हैं।


 प्रश्न 6 : तपस्वी आत्मा का प्रभाव क्या होता है?

 उत्तर :

यदि किसी दुखी आत्मा को
एक सेकण्ड भी शांति का अनुभव हो जाए,
तो वह दिल से बार-बार धन्यवाद देगी।

यही तपस्या का प्रत्यक्ष फल है।


 प्रश्न 7 : तपस्वी-मूर्त का वास्तविक अर्थ क्या है?

 उत्तर :

तपस्वी-मूर्त का अर्थ यह नहीं है कि —

 केवल स्वयं को शक्ति लेना
 केवल योग में सुख अनुभव करना

बल्कि —

शांति-शक्ति की किरणें चारों ओर फैलाना


 प्रश्न 8 : तपस्वी-मूर्त को सूर्य के उदाहरण से कैसे समझें?

 उत्तर :

जैसे सूर्य —

  • अपने लिए नहीं चमकता

  • सबको रोशनी देता है

वैसे ही —
महातपस्वी आत्मा = देने वाली आत्मा


 प्रश्न 9 : बापदादा “विधाता बनो” क्यों कहते हैं?

 उत्तर :

क्योंकि आज दुनिया में
मन के, शांति के, प्रेम के और सहयोग के भिखारी बहुत हैं।

बापदादा कहते हैं —

“रॉयल भिखारी बहुत हैं।”

जो जितना देता है,
उतना ही उसका खजाना भरता जाता है।


 प्रश्न 10 : तपस्वी-मूर्त का नया चार्ट क्या है?

 उत्तर :

अब यह मत देखो —

  • कितना जमा किया?

अब यह देखो —

  • कितना बाँटा?

तपस्वी-चार्ट :

  • खुशी — कितना दिया?

  • शांति — कितना दिया?

  • शक्ति — कितना दिया?

  • ज्ञान — कितना दिया?

  • सहयोग — कितना दिया?

 पर-उपकारी बनने से
स्व-उपकारी स्वतः बन जाते हैं।


 प्रश्न 11 : त्याग-मूर्त बने बिना तपस्वी-मूर्त क्यों नहीं बन सकते?

 उत्तर :

क्योंकि सबसे बड़ा विघ्न है —
अल्पकाल की इच्छा।

लेने का संकल्प —
थोड़ी देर लेता है,
लेकिन सदा के लिए गँवा देता है।


 प्रश्न 12 : त्याग-मूर्त बनने का समाधान क्या है?

 उत्तर :

  • इच्छा मात्रम् अविद्या

  • नाम-लेवता और मान-लेवता का त्याग

  • हद के लेवता से मुक्त होना


 प्रश्न 13 : विश्व-राज्य अधिकारी कौन बन सकता है?

 उत्तर :

वही आत्मा —
जो आज विश्व का माता-पिता (विधाता) बनती है।

मुरली-सार :

आज के विधातापन के संस्कार
अनेक जन्म राज्य दिलाएँगे।


 प्रश्न 14 : बिन्दु और सिन्धु का रहस्य क्या है?

 उत्तर :

बापदादा का फाइनल मंत्र —

  • बिन्दु बनो — बीती को बीती करो

  • सिन्धु बनो — सबको भरपूर करो

 यही श्रेष्ठ सर्टिफिकेट है।


 प्रश्न 15 : डायमण्ड मॉर्निंग क्या है?

 उत्तर :

यह —

  • जागरण की रात

  • कमाई की सीजन

  • डायमण्ड जमा करने का समय

स्वयं भी डायमण्ड बनो
और दूसरों को भी डायमण्ड बनाओ।


समापन प्रश्न : बापदादा किन बच्चों को विशेष याद-प्यार देते हैं?

 उत्तर :

जो —

  • स्नेही हैं

  • सहयोगी हैं

  • सेवाधारी हैं

  • फराखदिल हैं

  • महान पुण्य आत्माएँ हैं

डिस्क्लेमर

यह वीडियो/लेख ब्रह्मा कुमारीज़ ईश्वरीय विश्वविद्यालय की अव्यक्त मुरली (बापदादा) पर आधारित आध्यात्मिक व्याख्या है।
इसका उद्देश्य आत्म-उत्थान, विश्व-कल्याण और राजयोग के माध्यम से जीवन में शांति-शक्ति का अनुभव कराना है।
यह किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति की आलोचना नहीं करता।
राजयोग का अभ्यास व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित है।

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