(16)aHow can one be separate from the body while living in it?

S.Y.(16)a देह में रहते हुए देह से अलग कैसे?

(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

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संगम युग | पाठ 16
देह में रहते हुए देह से अलग कैसे बनें?
न्यारा बनने की असली पहचान | जीवन मुक्त अवस्था

संगम युग – नई दुनिया की नींव पाठ 16

🔹अध्याय 1 : आज का विषय — देह में रहते हुए देह से अलग कैसे?

बाबा हमें बार-बार कहते हैं —
“बच्चे, देह में रहते हुए देह से न्यारे बनो।”

पर प्रश्न यह है —

  • क्या हम सिर्फ यह वाक्य बोलते हैं?

  • या वास्तव में इसका अनुभव भी करते हैं?

देह से न्यारा अर्थात
जीवन मुक्त अवस्था
जो सतयुग में आत्माओं की स्वाभाविक स्थिति होती है।


🔹 अध्याय 2 : आत्मा और देह का सही संबंध (उदाहरण सहित)

हम आत्माएँ परमधाम से आती हैं
देह को यूज़ करती हैं,
परंतु देह नहीं हैं

 उदाहरण

  • जैसे हम कार चलाते हैं,
    लेकिन खुद को कार नहीं समझते

  • स्कूटर की ज़रूरतें पूरी करते हैं
    पर उसके वशीभूत नहीं होते

 ठीक उसी तरह
यह शरीर मेरा है,
पर मैं शरीर नहीं हूँ।

शरीर की देखभाल ज़रूरी है,
लेकिन
 शरीर की मत पर चलना
 शरीर के कहने में आना
— यह देहभान है।


🔹 अध्याय 3 : जीवन मुक्त अवस्था क्या है?

जीवन तभी है जब आत्मा देह में है,
लेकिन जीवन मुक्त अवस्था का अर्थ —

जीवन को जीना, एंजॉय करना
लेकिन किसी भी प्रकार का बंधन न होना


🔹 अध्याय 4 : असली प्रश्न — मैं सच में न्यारा बना या नहीं?

  • सिर्फ समझ बढ़ी है?

  • या सच में देह-बाण टूट गया है?

न्यारा बनने की पहचान जीवन में दिखाई देती है।


🔹 अध्याय 5 : देह से न्यारा — इसका गलत अर्थ क्या नहीं है?

 देह छोड़ देना
 जंगल चले जाना
 शरीर की उपेक्षा करना

नहीं।

 देह में रहते हुए
 देह की पहचान से अलग होना

मेरी पहचान मेरी देह नहीं
मेरी पहचान — मैं आत्मा हूँ


 मुरली संदर्भ

 मुरली – 15 अगस्त 2001

देह छोड़ना नहीं है,
देहभान छोड़ना है।

“मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ” — यह देहभान है।

जैसे ड्राइवर कार में बैठा है
पर खुद को कार नहीं समझता,
वैसे आत्मा देह में है
पर देह नहीं है।


🔹 अध्याय 6 : देहभान क्या है?

देहभान का अर्थ

“मैं यह शरीर हूँ”

जहाँ-जहाँ
मेरा जुड़ गया —

  • मेरी इज़्ज़त

  • मेरा अपमान

  • मेरा नुकसान

वहीं देहभान है।

 मुरली – 5 मई 2004

देहभान ही सभी दुखों की जड़ है।

देहभान से आत्मा
अपने गुण और शक्तियाँ खो देती है,
और वहीं से माया का प्रवेश होता है।

 उदाहरण

कोई वाणी से कुछ कह दे
और मन तुरंत दुखी हो जाए —
चोट देह को नहीं,
आत्मा के अभिमान को लगी है।


🔹 अध्याय 7 : देह से न्यारा बनने की शुरुआत कहाँ से होती है?

स्मृति से

पहला पाठ —

मैं देह नहीं,
इस देह को चलाने वाली आत्मा हूँ।

यह शरीर मेरा वस्त्र है
और मेरा घर परमधाम है।

मुरली – 24 जनवरी 2003

स्मृति ही स्थिति बनाती है।

जैसे ही आत्मा की स्मृति टूटी —
देहभान आ गया।


🔹 अध्याय 8 : देह से न्यारा बनने की पाँच मुख्य पहचान

1️⃣ प्रतिक्रिया कम हो जाती है

  • तुरंत जवाब नहीं

  • तुरंत क्रोध नहीं

 मुरली – 3 मार्च 2006

न्यारा आत्मा साक्षी बनता है।


2️⃣ मान-अपमान का असर कम

 मुरली – 18 जनवरी 1969

सम्मान और अपमान दोनों से न्यारे बनो।


3️⃣ मोह ढीला, प्रेम सच्चा

संबंध निभते हैं,
पर पकड़ नहीं रहती।

 मुरली – 12 दिसंबर 2002

न्यारा बनने से प्रेम शुद्ध होता है।


4️⃣ वाणी में ठहराव

  • कम बोलना

  • मीठा बोलना

  • ज़रूरत का बोलना

 मुरली – 10 मार्च 2006

न्यारे बच्चों की वाणी में वजन होता है।


5️⃣ अंदर हल्कापन

  • चिंता कम

  • भय कम

  • बोझ नहीं

 अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996

हल्कापन ही न्यारापन की निशानी है।


🔹 अध्याय 9 : न्यारा और लापरवाह — अंतर

न्यारा होना
 ज़िम्मेदारी निभाकर हल्का रहना

लापरवाह होना
 ज़िम्मेदारी से भागना

 मुरली – 5 मई 2004

न्यारा बनने का अर्थ
कर्म छोड़ना नहीं,
कर्म में स्थित रहना है।


🔹 अध्याय 10 : सबसे बड़ी बाधा — “मेरा”

  • मेरा शरीर

  • मेरा नाम

  • मेरा पद

  • मेरा परिवार

 मुरली – 15 अगस्त 2001

“मेरा-मेरा” ही मोह का बीज है।
जहाँ “मेरा” है, वहाँ भय है।
जहाँ “तेरा बाबा का” है, वहाँ हल्कापन है।


🔹 अध्याय 11 : न्यारापन लाने के तीन सरल अभ्यास

1️⃣ दिन में बार-बार आत्मा की स्मृति
2️⃣ हर कर्म से पहले — मैं कौन?
3️⃣ रात की चेकिंग — कहाँ देहभान आया?

मुरली – 9 सितंबर 2005

अभ्यास से स्थिति पक्की होती है।


🔹 समापन : एक वाक्य में सार

देह से न्यारा बनने का अर्थ

देह छोड़ना नहीं,
देह का भान छोड़ना है।

जब जीवन में —

  • प्रतिक्रिया कम

  • हल्कापन अधिक

  • और साक्षीपन दिखाई दे

 समझो न्यारापन आ रहा है।


 आत्म-परीक्षण

आज कोई मुझे कुछ कह दे —
मैं दुखी होता हूँ
या साक्षी रहता हूँ?

मेरा दिल भारी है
या हल्का?

प्रश्न 1 : बाबा “देह में रहते हुए देह से न्यारे बनो” क्यों कहते हैं?

उत्तर :
क्योंकि आत्मा का वास्तविक स्वरूप देह से अलग है। देह में रहते हुए भी यदि आत्मा स्वयं को देह समझती है तो वही दुख का कारण बनता है। बाबा हमें जीवन मुक्त अवस्था का अनुभव कराने के लिए देह से न्यारे बनने की शिक्षा देते हैं।


प्रश्न 2 : देह से न्यारा होने का सही अर्थ क्या है?

उत्तर :
देह से न्यारा होने का अर्थ देह छोड़ना नहीं, बल्कि देह-भान छोड़ना है।
आत्मा देह का उपयोग करती है, लेकिन स्वयं को देह नहीं मानती।

मुरली – 15 अगस्त 2001

देह छोड़ना नहीं है, देहभान छोड़ना है।


प्रश्न 3 : जीवन मुक्त अवस्था किसे कहते हैं?

उत्तर :
जीवन मुक्त अवस्था वह स्थिति है जिसमें आत्मा देह में रहते हुए जीवन को जीती है, आनंद लेती है, लेकिन किसी भी प्रकार के मोह, भय या बंधन में नहीं रहती। यह सतयुग की स्वाभाविक आत्मिक स्थिति है।


प्रश्न 4 : आत्मा और देह के संबंध को समझाने के लिए कौन-सा उदाहरण दिया गया है?

उत्तर :
जैसे ड्राइवर कार चलाता है लेकिन स्वयं को कार नहीं समझता, उसी प्रकार आत्मा देह में रहती है, देह को चलाती है, पर स्वयं को देह नहीं मानती।


प्रश्न 5 : देहभान क्या है?

उत्तर :
देहभान का अर्थ है —
“मैं यह शरीर हूँ”
जहाँ “मेरा” जुड़ जाता है — मेरी इज़्ज़त, मेरा अपमान, मेरा नुकसान — वहीं देहभान होता है।

मुरली – 5 मई 2004

देहभान ही सभी दुखों की जड़ है।


प्रश्न 6 : देहभान दुखों की जड़ क्यों है?

उत्तर :
क्योंकि देहभान में आकर आत्मा अपने मूल गुण और शक्तियाँ खो देती है। इसी अवस्था में माया और रावण का प्रवेश होता है, जिससे दुख बढ़ते हैं।


प्रश्न 7 : देह से न्यारा बनने की शुरुआत कहाँ से होती है?

उत्तर :
देह से न्यारा बनने की शुरुआत स्मृति से होती है —
“मैं देह नहीं, इस देह को चलाने वाली आत्मा हूँ।”

मुरली – 24 जनवरी 2003

स्मृति ही स्थिति बनाती है।


प्रश्न 8 : यदि कोई बात सुनकर मन तुरंत दुखी हो जाए, तो चोट किसे लगती है?

उत्तर :
चोट देह को नहीं, आत्मा के अभिमान को लगती है। यह देहभान की पहचान है।


प्रश्न 9 : देह से न्यारा बनने की पहली पहचान क्या है?

उत्तर :
प्रतिक्रिया कम हो जाना —
तुरंत जवाब नहीं,
तुरंत क्रोध नहीं।

मुरली – 3 मार्च 2006

न्यारा आत्मा साक्षी बनता है।


प्रश्न 10 : मान-अपमान के प्रति न्यारा आत्मा की क्या स्थिति होती है?

उत्तर :
न्यारा आत्मा मान और अपमान दोनों से समान रूप से अलग रहती है। दोनों का असर कम हो जाता है।

मुरली – 18 जनवरी 1969

सम्मान और अपमान दोनों से न्यारे बनो।


प्रश्न 11 : न्यारापन का प्रेम से क्या संबंध है?

उत्तर :
न्यारापन आने से मोह ढीला होता है और प्रेम शुद्ध बनता है। संबंध रहते हैं, लेकिन पकड़ नहीं रहती।

मुरली – 12 दिसंबर 2002

न्यारा बनने से प्रेम शुद्ध होता है।


प्रश्न 12 : न्यारा आत्मा की वाणी कैसी होती है?

उत्तर :
न्यारा आत्मा कम बोलता है, मीठा बोलता है और ज़रूरत का ही बोलता है। उसकी वाणी में वजन होता है।

मुरली – 10 मार्च 2006

न्यारे बच्चों की वाणी में वजन होता है।


प्रश्न 13 : अंदर का हल्कापन किस बात की निशानी है?

उत्तर :
चिंता कम होना, भय कम होना और बोझ का न होना — यह न्यारापन की सच्ची पहचान है।

अव्यक्त मुरली – 12 जनवरी 1996

हल्कापन ही न्यारापन की निशानी है।


प्रश्न 14 : न्यारा और लापरवाह होने में क्या अंतर है?

उत्तर :

  • न्यारा होना — ज़िम्मेदारी निभाकर हल्का रहना

  • लापरवाह होना — ज़िम्मेदारी से भागना

मुरली – 5 मई 2004

न्यारा बनने का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, कर्म में स्थित रहना है।


प्रश्न 15 : न्यारापन में सबसे बड़ी बाधा क्या है?

उत्तर :
“मेरा” —
मेरा शरीर, मेरा नाम, मेरा पद, मेरा परिवार।

मुरली – 15 अगस्त 2001

“मेरा-मेरा” ही मोह का बीज है।


प्रश्न 16 : न्यारापन लाने के तीन सरल अभ्यास कौन-से हैं?

उत्तर :

  1. दिन में बार-बार आत्मा की स्मृति

  2. हर कर्म से पहले — मैं कौन?

  3. रात को चेकिंग — कहाँ देहभान आया?

मुरली – 9 सितंबर 2005

अभ्यास से स्थिति पक्की होती है।


प्रश्न 17 : एक वाक्य में न्यारापन का सार क्या है?

उत्तर :
देह से न्यारा बनने का अर्थ —
देह छोड़ना नहीं, देह का भान छोड़ना है।


प्रश्न 18 : आत्म-परीक्षण का मुख्य प्रश्न क्या है?

उत्तर :
आज कोई मुझे कुछ कह दे —
मैं दुखी होता हूँ या साक्षी रहता हूँ?
मेरा दिल भारी है या हल्का?

Disclaimer

यह वीडियो ब्रह्मा कुमारीज़ की
साकार एवं अव्यक्त मुरली मूल्यों पर आधारित एक आत्मिक अध्ययन है।

इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म, संस्था या जीवन-शैली की आलोचना करना नहीं है,
बल्कि आत्मा की आंतरिक स्थिति को पहचानने और सुधारने हेतु
ईश्वरीय ज्ञान को सरल भाषा में प्रस्तुत करना है।

दर्शकों से विनम्र निवेदन है कि
इन शिक्षाओं का आधिकारिक मुरलियों के माध्यम से
स्वयं अध्ययन अवश्य करें।

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